138-“दो-पल”

“दो-पल” अपने लिए भी …

कभी फुर्सत के पलों में या प्रत्येक रात्रि को आराम फ़रमाते वक़्त नींद के आग़ोश में जाने से पूर्व..

जब हम बिस्तर पर होते हैं, उस वक़्त सिर्फ “दो-पल” आत्मचिन्तन के रूप में यदि हम अपने दिनभर के सारे “क्रिया-कलापों पर पुनः एक सरसरी नज़र डालने को अपनी रोज की आदत बना लें,और किसी भूलबस जाने अनजाने में या किसी मद में आकर हमारे द्वारा हुई खामियों को उसी वक्त सुधारने का एक संकल्प ले लिया जाय, तथा दिनभर के अपने ‘सारे-कर्म’ एवं ख़ुद को भी अपने इष्ट या मेरे “गोविंद” को समर्पित कर दिया जाय..

तो मेरा ऐसा मानना है कि जीवन की राह से भटकाने वाली दुनियादारी की “कार्मिक-लेयर” जो हमारी आत्मा पर दिन-प्रतिदिन जमती चली जातीं हैं..मेरे ख़्याल से इतनी मजबूती से फिर न जम सकेगी, तो यहां मेरा ऐसा मानना है कि, हम ‘पथ-भ्रष्ट’ होने से बचे रहेंगे..?

और जब पथभ्रष्ट नहीं होंगे तो ज़ाहिर सी बात है..हमारा जीवन सदैव खुशहाल एवं शांतिपूर्ण तो होगा ही जो डिजायरेबल है..👍

; युग, पचहरा, नीमगाँव

🙏🌹राधे-गोविंद🌹🙏

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