160 “कर्म-गति”

” जब हम, कोई ग़लत काम करते हैं.तो संसार में नियत-नटी के खेलों को संचालित करने वाली परम् सत्ता ..ईश्वर, अल्ला, वाहिगुरू या गौड जिस रूप में भी हम उसे मानते हैं, प्रतिपल वह ‘शक्ति’ हमारे कर्मों को देख रही होती है। वह हमारे कर्मों का हिसाब रखती है। समय आने पर दंड भी देती है।

जबकि हम जनते हैं जो काम हम, कर रहे हैं यह न केवल घर-परिवार, समाज, देश एवं ईश्वर के संविधान के विपरीत है, दुनियाँ में प्रचलित सारे रीति रिवाज, परम्पराओं आदि के भी विल्कुल विरुद्ध है।”

हम, किसी भी खुशफ़हमी में क्यों न रहें कितनी ही होशियारी में दम क्यों न भरें..

मग़र “हमारे द्वारा जो भी पाप-कर्म होता है। वह चाहे कोई छिपकर करें, या सबके सामने करे उसका दंड हमें भोगना ही होगा।

उसके लिए जैसे; बचपन में चाहे माता पिता दंड दें, बड़े होने पर समाज गांव,नगर, महानगर व देश का हेड-पर्सन दंड दे। या फिर परम-सत्ता ईश्वर दंड दें, हमारे हर पाप कर्म का कभी न कभी कुछ न कुछ दंड तो अवश्य मिलेगा ही।”

यदि हमारा ऐसा माइंड-सेट होगा.. तो विद्वानों के विचार से चलने के कारण हम पाप नहीं करेंगें जानते हुए कभी भी कोई गलती नहीं करेंगें।

वेदों के अनुसार, ऋषियों के संदेश के अनुसार, तथा ‘कर्म-गति’ के अनुरूप ..

हम सबको इस बात से इत्तिफाक रखना होगा। और इसे अच्छी तरह समझने के साथ-साथ अपने ज़हन में ठीक से बिठा लेना चाहिए कि ” व्यक्ति द्वारा किया हुआ ‘कर्म’ कभी भी निष्फल नहीं होता।

उचित समय आने पर अवश्य ही उसका फल मिलता है। “जैसा कर्म वैसा फल”।

कर्म फल मिलने में कई बार देरी जरूर हो जाती है। मग़र अंधेरी न तो कभी हुई है न होगी। हाँ वह बात अलग है। कर्म संस्कार एवं प्रारब्ध के वशीभूत इस जन्म में मिले, या किसी अन्य जन्म में, परन्तु मिलेगा अवश्य।

क्योंकि “कर्म” फल से कभी कोई वंचित रहा नहीं है।

वह तो “भोगना ही होगा।”

इस पर बार-बार चिंतन करें। विचार करें, और इसे गंभीरतापूर्वक समझने का प्रयत्न भी..👍

जिससे कि सब लोग पाप से बचकर पुण्य ‘कर्म’ की ओर मुखातिब हों और अपना भविष्य उज्ज्वल रख सकें। ताकि इन सांसारिक दुखों से छूट कर आत्मिक स्तर पर पूर्ण आनंद की प्राप्ति हो।👍

2 thoughts on “160 “कर्म-गति””

  1. 🌹श्रीमान आपके विचार बहुत नेक हैं मैं आपके विचार जब भी पढता बहुत मोटीवेट होता हूं 🌹🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
    बहुत बहुत धन्यबाद गुरु जी🙏🏻🙏🏻

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