क्या आपको अपने इतिहास में अंकित ये शहादतें याद हैं..? कहीं आप भी दूसरों की तरह दुनियादारी की भागमभाग में देश के सच्चे अमर सपूतों की ये अविस्मरणीय “बेमिसाल-शहादतें” भूल तो नहीं गए!!
महानुभाव !
ये जो सप्ताह अभी चल रहा है …… यानि 21 दिसम्बर से ले के 27 दिसम्बर तक …….. इन्ही 7 दिनों में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार इस देश के लिए शहीद हो गया था।
एक ज़माना था जब अपने पंजाब में इस हफ्ते …….. सब लोग ज़मीन पे सोते थे …….. क्योंकि माता गूजरी ने वो रात , दोनों छोटे साहिबजादों के साथ , नवाब वजीर खां की गिरफ्त में , सरहिन्द के किले में , ठंडी बुर्ज में गुजारी थी ……..
ये सप्ताह भारत के इतिहास में शोक का सप्ताह होता है …….. .. श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की कुर्बानियों को इस मुल्क ने मात्र 300 वर्षों में भुला दिया अफ़सोस😢
जो कौमें अपना इतिहास अपनी कुर्बानियाँ भूल जाती हैं वो खुद मिटने के कगार पर होती हैं और एक दिन मिट ही जाती हैं..इतिहास बन जाती है ।।। आज के हर बच्चे को इस जानकारी से अवगत कराओ आओ आपको क़ुरबानी की एक ऐसी मिसाल से अवगत करवाते हैं जो दुनियां में शायद ही कहीं मिले:-
21 दिसंबर:
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने परिवार सहित श्री आनंदपुर साहिब का किला छोड़ा।
22 दिसंबर:
गुरु साहिब अपने दोनों बड़े पुत्रों सहित चमकौर के मैदान में पहुंचे और गुरु साहिब की माता और छोटे दोनों साहिबजादों को गंगू नामक व्यक्ति जो कभी गुरु घर का रसोइया था, उन्हें अपने साथ अपने घर ले आया। …..
चमकौर की जंग शुरू और दुश्मनों से जूझते हुए गुरु साहिब के बड़े साहिबजादे श्री अजीत सिंह उम्र महज 17 वर्ष और छोटे साहिबजादे श्री जुझार सिंह उम्र महज 14 वर्ष अपने 11 अन्य साथियों सहित मजहब और मुल्क की रक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हो गए।
23 दिसंबर :
गुरु साहिब की माता श्री गुजर कौर जी और दोनों छोटे साहिबजादे गंगू के द्वारा गहने एवं अन्य सामान चोरी करने के उपरांत तीनों को मुखबरी कर मोरिंडा के चौधरी गनीखान और मनीखान के हाथों गिरफ्तार करवा दिया गया और गुरु साहिब को अन्य साथियों की बात मानते हुए चमकौर छोड़ना पड़ा।
24 दिसंबर :
तीनों को सरहिंद पहुंचाया गया और वहां ठंडे बुर्ज में नजरबंद किया गया।
25 और 26 दिसंबर:
छोटे साहिबजादों को नवाब वजीर खान की अदालत में पेश किया गया और उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए लालच दिया गया।
27 दिसंबर:
साहिबजादा जोरावर सिंह उम्र महज 8 वर्ष और साहिबजादा फतेह सिंह उम्र महज 6 वर्ष को तमाम जुल्मों जब्र उपरांत जिंदा दीवार में चिनने के उपरांत जिबह (गला रेत) कर शहीद किया गया और खबर सुनते ही माता गुजर कौर ने अपने प्राण त्याग दिए।
क़ुरबानी की ऐसी अनोखी और शायद दुनिया की इकलौती मिसाल को “शहीदी सप्ताह” जो हमारे लिए एक शोक सप्ताह..और सिख धर्म की बुनियाद का लोगों को पता चल सके..ऐसी भावना से हमने इसे एक लेख की शक्ल देने का प्रयास किया है।
इसीलिए, मेरे साथियों ! इस पूरे “शहीदी-सप्ताह” में अपनी जिन्दगी के कीमती वक्त में से कुछ पल निकाल कर यदि ये सन्देश भारत के जन-जन तक पहुंचा दिया जाय तो शायद उन अमर सपूतों की उन ” बेमिसाल-शहादतों ” के प्रति ये एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी.. वरना भागमभाग में तो सारा वक्त जाया हो ही रहा है। 🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼