148-“Son of India”

दुनियाँ में बेईमान और भ्र्ष्टाचारियों का बाहुल्य दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है..

आज यदि कोई अपने फर्ज के प्रति ईमानदारी बरतता है तो लोग उसे “डैड-ऑनेस्ट” की संज्ञा देते हैं..हालांकि वह भी पूर्ण ईमानदार होने का ही पर्याय है।.. मग़र कुछ लोग ये व्यंग्यात्मक भाव में कहते हैं..

इस पर मुझे एक बात याद आ रही..कि,

एकबार किसी ‘चर्चा-परिचर्चा’ के दौरान किसी ने मुझसे सवाल करते हुए कहा था कि,

आप ही बताइए कि,” देश का नेता, होना कैसा चाहिए..? उस वक्त भी मैंने बेहिचक यही कहा था.. जो अभी भी कह रहा हूँ.. कि, न केवल किसी स्तर पर नेतृत्व करने के लिए वल्कि एक साफ-सुथरा जीवन जीने के लिए भी ईमानदारी की मिसाल। “भारत का लाल” अव्वल दर्जे का नेता यदि स्वस्थ मस्तिष्क से विश्लेषण किया जाय,तो अभी तक के भारतीय राजनीतिक इतिहास में तो एक ही है..पूर्व प्रधानमंत्री “श्री लालबहादुर जी शास्त्री” जो अनुकरणीय हैं।

यूँ तो उनकी ईमानदारी के अनेक किस्से लोकप्रिय हैं मग़र आज मैं उनके और उनकी पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री जी के दो-एक खास किस्सों का जिक्र करना चाहूँगा.

. देश के प्रधानमंत्री की हैसियत को ध्यान में रखते हुए.. भारत सरकार ने उन्हें एक इम्पोर्टेड-कार “इम्पाला” दे रखी थी जो उन दिनों काफ़ी महंगी और स्टैंडर्ड कार हुआ करती थी।

एक दिन उनके बेटे अनिल शास्त्री व सुनील शास्त्री के मन में आया कि चलो! इम्पाला कार का लुत्फ उठाते हैं अपने मित्र के पास घूम के आते हैं, जैसी कि, बच्चों की फ़ितरत होती है.. तो ड्राइवर ‘रामदेव’ जी से चाबी मांग ली और चले गए..

देर रात जब लोटे तो शास्त्री जी को पता चला..उन्होंने तत्काल सुनील शास्त्री व अपनी पत्नी ललिता शास्त्री जी को बुलाया..और सुनील के कंधे पर हाथ रखते हुऐ कहा..बेटे अब तुम सोलह वर्ष के होगए हो..इसलिए ऐसी गलती फिर से मत करिएगा..

ड्राइवर को बुलाया कहा, मीटर देखो गाड़ी कितने किलोमीटर चली है उसने बताया “चौदह कि.मी.”..

सुनील!’लॉग-बुक’ लाओ और लिखो उसमें..”कार व्यक्तिगत कार्य के लिए 14 किमी.प्रयोग की गयी” अपना नाम लिखो.. ; सुनील शास्त्री और

अपनी पत्नी से कहा, सेक्रेटरी ‘सहाय’ जी को बुलाकर इसका भुगतान कर देना..ऐसे! ईमानदार थे शास्त्री जी।

मग़र बच्चों ने इस घटना के बाद कहा.. अब घर पर अपनी गाड़ी भी तो होने चाहिए..उन्होंने कहा चलो एक फ़ीएट गाड़ी ले लेते हैं।

लेकिन हमारे पास इतने पैसे तो हैं नहीं..

शास्त्री जी ने तभी पंजाब नेशनल बैंक को लोन लेने के लिए एक एप्लीकेशन लिखी..दस मिनट के अंदर बैंक मैनेजर आ गया..और तुरन्त कागज़ात पूरे कराके चलने लगा. तब प्रधानमंत्री शास्त्री जी ने कहा..बहुत बहुत धन्यवाद..👍 ऐसी ही तत्परता सामान्य आदमी के काम में भी दिखाया करो..👍

ये बात 1965 की है कार खरीद ली गयी।

ये हम सभी जानते हैं कि,1966 में अपनी कार-लोन की किश्त चुकाए बिना वे अचानक हम सबको छोड़ के दुनियाँ से चले गए।

जब श्रीमती इंदिरा गांधी प्राइम-मिनिस्टर बनीं,तो उन्होंने बैंक वालों से कहा, कि लोन का बाकी पैसा हम सरकारी खजाने से भर देंगे।

मग़र उसी वक़्त श्रीमती ललिता शास्त्री ने प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी को पत्र लिखा ..प्लीज आप ये मत करिए..इससे मेरे पति की आत्मा को बहुत कष्ट होगा। ये लोन मैं अपनी ग्रेच्युटी व पेंशन में से भर दूंगी। और यही हुआ..भी।

वही गाड़ी आज मोतीलाल नेहरू मार्ग पर स्थित शास्त्री नामक म्यूजियम में खड़ी है।

शास्त्री-परिवार का ऐसा ही एक वाकया और है..जो हम सबके लिए प्रेरणादायी है..ये उस समय की बात है जब प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जेल में थे। तब उनकी पत्नी उनसे मिलने गयीं। आम का सीज़न था वे जानती थीं कि शास्त्री जी को आम बहुत पसन्द हैं, तो ‘दो आम’ चुपके से वे उनके लिए ले गयीं। लेकिन ये नियमों का उलंघन था जेल में बिना अनुमति के कोई किसी कैदी के लिए कुछ भी ले कर नहीं आ सकता। और शास्त्री तो पहले से ही “डैड-ऑनेस्ट” थे। ये देखते ही वे अपने आपको नहीं रोक सके अपनी पत्नी पर भभक पड़े..अरे ! ये क्या किया आपने, बहुत बड़ी गलती है ये।

अब तो ललिता जी रोने लग गयीं.. शास्त्री जी के मित्र ने कहा भाभी जी आप ‘आम’ छोड़ कर घर चली जाओ..बड़े दुखी मन से ललिता जी घर वापस चली गयीं।

बाद में मित्र ने कहा, “वो तो लायीं थी आपके लिए आम और उन्हें मिली फ़टकार..अरे भई किसी की भावना को तो समझना चाहिए.. और बात कहने का ढंग भी तो हो..”

अब शास्त्री जी भी दुःखी हो गए उन्होंने मित्र से कहा, अब क्या करूँ..?

तभी उन्होंने देखा एक कैदी जो बहुत दिनों से जेल में ही था वे दोनों आम उस कैदी को दे दिए।उसने वे बड़े ही चाव से खाये..मानो उसे तो अमृत ही मिल गया हो।

अब शास्त्री जी ने अपनी पत्नी को एक चिट्ठी लिखी..

उन्होंने लिखा मैं अपने उस दिन के रूखे व्यवहार के लिये क्षमा चाहता हूँ।आपने जो किया वो ठीक ही रहा आपको सुनकर खुशी होगी वे दोनों आम एक ऐसे कैदी ने खाये जिसने जेल में होने के कारण दसों वर्षो से आम चखे तक नहीं थे। मैं फिर से आपको धन्यवाद देते हुए..अपने लिए आप से क्षमा मांगता हूँ।

जेल में रहने के दौरान एक बार श्री शास्त्री पैरोल पर अपने बीबी-बच्चों से मिलने आये,तो उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी बहुत कमजोर हो रहीं हैं तब जाते वक्त उन्होंने ललिता जी को कहा आप रोजाना एक गिलास दूध पिया करो..

वो बेचारी कर क्या सकती थी पति तो वापस चले गए जेल.. घर में पैसे थे ही नहीं, तभी उन्होंने अपनी बेटी से कहा, बेटा बाजार से एक ऐसा गिलास लाओ बहुत छोटा सा जैसा तुम्हारे गुड़िया-गड्ढों के हैं। ललिता जी ने रोज़ाना ऐसा ही “एक गिलास” दूध पिया जिससे पति की बात भी रह गयी, और कम पैसों में काम चल गया…

वाह! क्या ईमानदार थे वे लोग.. क्या आचरण की पवित्रता थी उनमें..!! अनुकरणीय..👍

; योगेन्द्र पचहरा,

जैन इंटर कॉलेज,सासनी, हाथरस

2 thoughts on “148-“Son of India””

Leave a reply to विकास देशवाल Cancel reply