257 अदभुत रचना

आज के इंसान को दुनियां के प्रपंच से फुर्सत मिले तब.. ही तो जानें, कि ये “मानव देह” वास्तव में प्रभु की एक “अद्भुत रचना” है।

संतों के जगाने पर कुछ गुणी मनुष्यों के मन मस्तिष्क में जगह बनाने वाली ये बात कि “मानव देह” न सिर्फ दुर्लभ होती है,अपितु ये मानव शरीर ही एकमात्र वह साधन है जिसे पाकर इंसान भगवत प्राप्ति कर सकता है।

स्वाभाविक है माइंड ओवर मैटर होने के नाते इसमें आपका थोड़ा चिंतन तो लगेगा..

देखिए! न कोई आवेदन, न कोई सिफारिश. फिर भी हमारे करुणामय राधे गोविंद की दया दृष्टि ही है कि, नवजात शिशु को मानव देह के रूप में एक ऐसा “शरीर” प्रदान किया है।

जिसमें सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक हर क्षण “रक्त” प्रवाह रहता है….

जिसके अंदर ऐसे ऐसे स्वचालित “यंत्र” लगे हैं कि, सजीव होने का प्रतीक “हृदय” निरंतर धड़कता रहे ऐसी व्यवस्था की गई!! …

हजार-हजार मेगापिक्सल वाले किसी कैमरे को भी फेल करती हुई.. दो-दो आँखे जो प्रतिपल संसार के हर दृश्य को मन रूपी मेमोरी में संजोए रहती हैं।

दस-दस हजार तरह के अलग अलग स्वाद चखने की सामर्थ्य रखने वाली रसेंद्री यानी जीभ भी है।

सेंकड़ो संवेदनाओं का अनुभव कराने वाली त्वचा है जो किसी सेंसर से कम नहीं है।

“स्वर प्रणाली” तो ऐसी कि बस आप देखते ही रह जाए, अलग-अलग फ्रीक्वेंसी की आवाज निकाल दे।

दूसरे उन सब फ्रीक्वेंसीज का कोडिंग-डीकोडिंग करने वाले कान रूपी यंत्र इस शरीर की सबसे बड़ी विशेषता है।

ताज्जुब देखिए!!! पचहत्तर प्रतिशत जल से भरा हुआ ये मानव शरीर जिसकी त्वचा में लाखों रोमकूप होने के बावजूद भी मजाल हैं कहीं से लीक हो जाए..

इस मानव देह में हर एक चीज़..चकित कर देने वाली है।

देखिए!! ये “मानव देह” बिना किसी सहारे के दो पैरों पर न सिर्फ सीधा खड़ा रह सकता है,अपितु हरपल न जाने कितने अजीबो गरीब करतब करता है।

मनुष्य निर्मित गाड़ी के टायर चलने पर घिसते हैं, और कितनी ही बार बदल दिए भी जाते हैं। परंतु इस मनुष्य शरीर के पैर के तलवे जीवन भर चलने के उपरांत भी भला कभी घिसे हैं।

है न !! “अद्भुत रचना” !!

हे परमात्मा ! इसके संचालक, निर्माता जो भी हैं आप ही है। स्मृति, शक्ति, शांति हमको ये सब सामर्थ्य भी आप ही देते है।

आप ही भीतर बैठ कर “शरीर की संरचना” को सुचारू रूप से चलाते हैं।

जबकि, दुनियां का अस्सी फीसदी मनुष्य “कस्तूरी कुंडल बसे,मृग ढूंढे बन माहीं” की तर्ज पर राधे गोविंद को कहीं अन्यत्र समझकर अपने जीवन को संसार के प्रपंचों में ऐसा उलझा लेता है कि,ये तो ये अपना परलोक भी बिगाड़ ले रहा है।

ये मानव देह “अविश्वसनीय।” है। ये कौन नहीं जानता है कि, इस “शरीर रूपी” यंत्र में हमेशा आप ही है, इसकी सजीवता का अनुभव कराने वाला “आत्मा” भी तो भगवन आप का ही अंश है।

न जाने क्यों मुझे तो ये समूचा जीवन आपका एक खेल भर लगता है।

मैं आपके इस खेल का निश्छल, निस्वार्थ आनंद का एक हिस्सा हूं… ऐसी सद्बुद्धि मुझ में निरन्तर बनी रहे.!! “सब कुछ आप ही संभालते हैं ये भान भी हमेशा बना रहे।”

प्रतिदिन पल-पल हर मनुष्य शरीरधारी में कृतज्ञता से आपका ऋणी होने का स्मरण एवं चिंतन भी उत्पन्न हो। ऐसी शुभकामना के साथ, मैं परम प्रभु श्री राधे गोविंद के चरणारबिंदो में सदैव के लिए समाहित हो जाने की चाह रखता हूं ..। धन्यवाद .

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