आज चलो! “इंसान” को केंद्र में रखकर एक छोटे से बिंदु पर कुछ चिंतन करते हैं..मगर उसमें थोड़ा पुट अध्यात्म का लगा कर देखेंगे,तो और भी आनंददायक लगेगा।
लेकिन पाजी! मांफ कर णा आज मैनू “माणव जाति” दे इक इंसान दी टेक्निकली कंपैरेटिव स्टडी करके दिखायासी.. जैसे;
जब हम कौनू गड्डी चलांदे ऐं.. ना! यू तो बड़ी सिंपल सी गल है गी कि इक निर्धारित समय पर उस गड्डी नू सर्विस करान वास्ते गैराज भी ले जां दें ऐं,
क्योंकि सफाई दे संग संग गड्डी ने कल,पुर्जे भी चैक हो जां दे ऐं.. जिससे मशीनरी भी लंबे वक्त तक मेंटेन रहंदीं ए।
But..do You think so..anyway..??
ठि..क वैसे ही इस “माणव जाति” दे इंसान नू “संत-समागम” भी गैराज की तरह ही हो वे। जहॉ हमारे “मन मस्तिष्क” में जमीं दुनियांदारी दी कार्मिक लेयर बड़ी असानी दे साफ हो जां दी ऐ।
It would be your belief..too.. I think so..
दरअसल, यू जिन्दगी भी ना! इक गड्डी दी तरहा ही होवे सी। वो भी ऐं मे ई ना “संकल्प दी गड्डी”🚖।
अगर इस गड्डी नू होंसले दे पहिऐ,
🛞 धर्म दा इंजण ,
कर्म दा ईंधण
संयम दा स्टेयरिंग,
मर्यादित एक्सीलरेटर,
अनुशासित ब्रेक
होर.. ज़िंदगी दी इस “संकल्पित गड्डी” के टूल-बाक्स मा “ज्ञान होर चरित्र” के औजा..र हर वक्त संग हो वे सी, तो मैनू दावा नहीं ईब,तो मैनू टोटल विशवास हैगा सी जीवण दी..यू “संकल्प दी गड्डी” निश्चित रूप से इस लोक में, तो बड़े स्मूथली अपणी यात्रा पूरी कर ही ले वे गी ..फिर तो यू अपणे सगे प्रिया प्रीतम “राधे गोविन्द” दे धाम को भी ले जावेगी.. सब लोग इक संग बोल देऊ “राधे गोविंद” 👍🏻
“राधे गोविन्द..राधे गोविन्द” 🦚 🙏🙏🏻
Your ideas are really amazing!👍🏻🙏🏻
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Thanks UDIT ji
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