248- सम्राट अशोक

क्या आपने कभी गौर किया है कि, “सम्राट अशोक” की जन्म-जयंती भारत देश में क्यों नहीं मनाई जाती है.. ??

बहुत सोचने पर भी, ऐसे बहुत से प्रश्नों के “उत्तर” आसानी से नहीं मिल पाते हैं !! आप थोड़ा चिंतन कीजियेगा।

सम्राट अशोक:

पिताजी का नाम – बिन्दुसार गुप्त

माताजी का नाम – सुभद्राणी

जिस “सम्राट” के नाम के साथ संसारभर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते रहे हैं।

जिस -“सम्राट” का राज चिन्ह “अशोक चक्र” भारत के अपने ध्वज में भी है।

जिस “सम्राट” के राज चिन्ह “चारमुखी शेर” को भारतीय “राष्ट्रीय प्रतीक” मानकर हम भारतीय देशभर में सरकार चलाते हैं।

और हमने “सत्यमेव जयते” को भी अपनाया हुआ है।

जिस देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान, सम्राट अशोक के नाम पर, “अशोक चक्र” तक दिया जाता है।

जिस सम्राट से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ”…जिसने “अखंड भारत” (आज का नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान, और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक-छत्र राज किया हो।

नोट कीजिएगा.. सम्राट अशोक के ही, समय में “23 विश्वविद्यालयों” की स्थापना की गई थी। जिसमें तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, कंधार, आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे। इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से छात्र उच्च शिक्षा पाने भारत आया करते थे।

जिस “सम्राट” के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार, भारतीय इतिहास का सबसे “स्वर्णिम काल” मानते हैं।

जिस “सम्राट” के शासन काल में भारत “विश्व गुरु” था। जिसे लोग “सोने की चिड़िया” कहा करते थे।

समस्त जनता में आपस में कोई भेदभाव नहीं था।इसीलिए बहुत खुशहाल भी थी।

जिस सम्राट के शासन काल में, सबसे प्रख्यात महामार्ग “ग्रैंड ट्रंक रोड” जैसे कई हाईवे तक बने थे। 2,000 किलोमीटर लंबी पूरी “सडक” पर दोनों ओर पेड़ भी लगाये गए “सरायें” अर्थात होटेल्स भी बनाए गए..मानव तो मानव..,पशुओं के लिए भी, प्रथम बार “चिकित्सा घर” (हॉस्पिटल) तक खोले गए

पशुओं को मारना भी बंद करा दिया गया था।

ये सबसे बड़ा सवाल है..? ऐसे “महान सम्राट अशोक” जिनकी जन्म जयंती उनके अपने ही देश भारत में आखिर मनाई क्यों नहीं जाती.. ??

इस पावन दिन न कोई छुट्टी ही घोषित की जाती है।

विडंबना के साथ साथ आप विचार कीजिए कि, कितनी बड़ी साजिश रही होगी कि देश के नागरिकों को इतिहास की असल जानकारी से ही वंचित कर दिया गया। जिससे कि वे अपनी वास्तविक पहचान को भूल जाएं।

जरा चिंतन कीजिए..”जो जीता वहीचंद्रगुप्त” की जगह “जो जीता वही सिकन्दर” कैसे हो गया??

जबकि ये बात सभी जानते हैं, कि सिकन्दर की सेना ने चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभाव को देखते हुए खुद ही लड़ने से मना कर दिया था।

सिकंदर का मनोबल बहुत बुरी तरह से टूट गया था। इसलिए वह “वापस भी लौट गया था”। लेकिन फिर भी..??

शायद आप भी मेरी इस बात के एग्री करेंगे.. कि सब कुछ अपनी आंखों से देखने व कानों से सुनने के बावजूद भी विश्वास नहीं होता.. कि कोई इतनी.. बड़ी गद्दारी अपने ही देश के साथ कैसे कर सकता है..??

क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय नेतृत्व को ऐसी “ऐतिहासिक साजिशों” को जो पकड़े जाने पर प्री प्लान्ड बड़ी चालाकी से “ऐतिहासिक भूल” बोल दे देते हैं।

जनमानस की आवाज है.. कि

वक्त रहते ..देश की ज़िम्मेदार बॉडी को संज्ञान लेना होगा। धन्यवाद

👍👍 पढ़ने के लिए सभी का 🙏🏻 || साभार ||🙏🏻

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