234- लज्जा

दुनिया में कुछ डबल स्टैंडर्ड सोच वाले लोगों ने ऐसा माइंड-सेट बना रखा है कि, ”लज्जा” तो सिर्फ महिलाओं का गहना है। इस पर मुझे आपत्ति है..??

क्योंकि, “लज्जा, हया,शर्म एक दूसरे के पर्याय होते हुए भी इन शब्दों में से किसी को भी जब भाषा में पिरोया जाता है,तो उस शब्द का अर्थ, उस शब्द की प्लेस वैल्यू लेखक की शैली पर भी बहुत कुछ निर्भर करती है, कि उस अमुक शब्द को उसने अपनी लेखनी से किस भाव में प्रयुक्त किया है।

इसलिए सभी को मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि शब्दों के जाल में न फंसते हुए.. आप हमेशा भावात्मक पक्ष को ही फोकस किया कीजिएगा।

इस आधार पर मेरा कहने का आशय सिर्फ इतना है कि, लज्जा भाव सेवा,सत्कार जैसी कुछ अनुभूतियां हिंदी भाषा में ऐसी हैं जिन्हें कभी भी ‘जेंडर’ के चश्मा से देखा ना ही देखा जाए, तो ही ठीक है।

क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि, हर स्वाभिमानी.. व्यक्ति को अनुचित रवैए पर “लज्जा” महसूस होती है।

इतिहास साक्षी है कि, “नारी-शक्ति” ने “पुरुष बल” की तुलना में सदैव हर स्तर पर खुद को सेंसटिव प्रूव किया है। इसलिए कुछ साहित्यकारों ने अपने अलंकारिक दृष्टिकोण से “लज्जा” को उनका गहना क्या बोल दिया..दोहरी सोच की मानसिकता वाली लॉबी ने अक्सर इस “लज्जा” शब्द को महिलाओं के पल्लू से ही बांध दिया है.!!! जो सरासर गलत है।

मेरे विचार से यही वो बातें हैं जो दुनियां में “पुरुष-प्रधान” समाज की अवधारणा को बल देती हैं। जो कदापि ठीक नहीं हैं।

हो सकता है ऐसी मानसिकता वाले बंदों को कहीं भी समाज में हो रहे.. अनैतिक क्रिया कलापों पर “लज्जा” न आती हो !!!!

दरअसल, ऐसे लोगों को “लज्जा” न आने के पीछे एक और बड़ा कारण ये भी हो सकता है कि, दुनियां में सामाजिक स्तर पर कुछ सेल्फिश लोग,अपना स्वार्थ साधने की..फितरत में ऐसे दुराचारियों को अक्सर सपोर्ट.. करते रहे हैं। शायद इसी कारण से दुनियां के हर समाज में घोर असामाजिकता, जिसे यदि “सामाजिक प्रदूषण” कह दिया जाए..तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, आज पूरी तरह व्याप्त है।

जरा सोचो !!

जब कहीं किसी असहाय जनमानस / किसी निरीह प्राणी के साथ किसी के द्वारा दुराचार या अन्याय होता है, तो उस कृत्य पर “स्वस्थ मानसिकता” वाले लोगों को “लज्जा” आना स्वाभाविक है। और आनी क्यों नहीं चाहिए। लज्जा आनी भी चाहिए।

इतिहास के पन्नों को उलटिए.. दुनियाँ में कितने जघन्य अपराध व वीभत्स कांड होते रहे हैं !! दुनिया के समाज में यदि “लज्जावान” चरित्र नहीं होते,तो क्या दुनिया की हस्ती अब तक बरकरार रह पाती..?? कभी नहीं.. ज़रा सोचो! तो..??

• इसलिए मैं फिर कहूंगा ऐसी सिचुएशन के समय कम से कम जागृत लोगों को,अवश्य सार्थक भूमिका में होना चाहिए।

• जब कोई महिला या पुरुष अपने किसी अन्य रिश्ते के साथ..जैसे; सास-बहू, ननद-भाभी, जेठानी-देवरानी..ठीक वैसे ही पुरुष; पिता-पुत्र,बड़ा भाई-छोटा भाई,मालिक-नौकर वस्तुत: किसी भी रिश्ते में..जब अन्यायपूर्ण आचरण करते हैं, तो ऐसे दुर्व्यवहार पर भला किसे ‘लज्जा’ नहीं आएगी..?? और कब तक नहीं आएगी..??

बिल्कुल, लज्जा आती है, और उसका आना लाज़मी है।

लेकिन असल पहलू ऐसी घटनाओं से आगे के लिए सबक लेने का और सचेत रहने का होता है।

“समय” साक्षी है.. दुनियां के इतिहास में ऐसे कई एक मंजर हैं .. जब जब जिम्मेदार बॉडी ने उचित प्रतिक्रिया नहीं दी है। एवं वहां अपना पक्ष तक भी नहीं रखा है, तो इतिहास के पन्नों पर नामचीन व्यक्तित्व भी महज़ “एक सवाल” बनकर रह गए हैं। जिन्हें बाद की पीढियां.. नीची नजरों से देखती हैं और हमेशा देखती रहेंगी। चाहे कुछ जानकार लोग उनकी परिस्थिति के पक्ष में कितने ही तर्क क्यों न दें..?? विचारकों के लिए ऐसे व्यक्तित्व सदैव “सवालों के घेरे” में ही रहेंगे।

अच्छा! आप ही बताइए ऐसी स्थिति में चेतन व्यक्ति को “लज्जा” नहीं आयेगी…??

शायद इसीलिए आज हम सबको अपने आचरण को लेकर सजग होने की महती आवश्यकता है।

एक आंकड़े के मुताबिक पूरी दुनियां में लगभग अस्सी प्रतिशत लोगों का एक बहुत बड़ा जमावड़ा है, जो ज्यादातर जीवन के असल पहलू से दूर ही रहा है। यहां तक है कि वह जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी अनजान अपनी तमाम उम्र यूं ही गुजार देता है। अतः यही वो जमावड़ा है,जो मृत्युलोक के जीवन चक्र में चौरासी लाख योनियों में बार बार हिचकोले खाने को मजबूर है।

दूसरे “भौतिक चका चौंद” में रहने वाले लोग ताउम्र एक अजीब खुशफहमी का शिकार भी रहते हैं कि, अन्याई, दुराचारी के विरुद्ध अपना पक्ष न रखकर..इंसानियत के सामने नजरें झुकाकर हम दुनियां में बने रहेंगे..अर्थात जीवंत रहेंगे

मैं उनसे ये पूछना चाहता हूं?? कि, ऐसे चरित्रों के लिए दुनियां में बने रहना .. “जीवन” हो सकता है क्या..?? मेरा मतलब “ऐसा जीना भी कोई जीना है.??.

बताइए!! क्या ऐसे चरित्रों पर आप लज्जित नहीं होंगे..??

जरा! मानवता के दायरे में..खड़े होकर सोचिएगा!! कि, हमने किसी अन्याई चरित्र को अन्याय करने से नहीं रोका या तत्काल उसे अपना रुख भी महसूस नहीं कराया, तो क्या हमारा ऐसा रवैया “अन्याय की मौन सहमति” नहीं कह लाएगा..??

कहना न होगा कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हम भी ऐसे अनेक पापों के भागीदार हो जाते हैं।

अब बोलिए! हमारे ऐसे ढुलमुल रवैए पर किसे ‘लज्जा’ नहीं आएगी।

इन द सेंस ऑफ स्प्रिचुअलिटी.. ‘जीवआत्मा’ दो रूपों में होती है।

एक “सूक्ष्म शरीर” (Subtle body), जो अदृश्य (invisible) होता है। किसी को नज़र नहीं आता।

दूसरा “स्थूल शरीर” (Gross body) जो सबको दिखता है।जिसे सजाने, संवारने में हम अपने जीवन के कीमती पलों को भी खपा दे रहे हैं। खैर..

“अध्यात्म” एक ऐसा दृष्टिकोण है जो स्थूल शरीर में केवल सांसों के आवागमन को “जिंदा” होना नहीं मानता।

ये नज़रिया कहता है, कि जीवन में किए गए क्रिया-कलापों अर्थात कर्मों का “मानवता” की कसौटी पर खरा होना..ही किसी को ‘जीवंत’ बनाता है।

निष्कर्षतः कोई भी इस गुमान में न रहे कि अत्याचार,अनाचार आदि का हिस्सा होने के बावजूद भी वह ठीक है.. मजे में.. हैं,उसकी लाइफ तो सही चल रही है।

ज़रा जीवन के सही कैलकुलेशन को समझिएगा..! कोई दोराय नहीं है कि, अच्छे कर्मों के फल हमें ही मिलते हैं, तो उसी प्रकार बुरे कर्मों के परिणाम भी कोई दूसरा नहीं भुगतेगा। वो सब हमारे संचित कर्मों से निर्मित “प्रारब्ध” के वशीभूत आगे पीछे हमें ही भुगतने होते हैं। ये कौन नहीं जानता है कि, गोविन्द के दरबार में दिन देरी है..मगर अंधेरी न थी और न कभी होगी।

शायद लोगों के ज्ञान चक्षुओं को खोलने के उद्देश्य से ही श्रीकृष्ण “कर्मयोग” में बड़े स्पष्ट रुप से कहते हैं कि,

“कोई भी जीव किसी प्रकार की खुशफहमी में न रहे! कि हमारे द्वारा किए गए कर्म/विकर्म किसी उपाय (भंडारे करना या गंगा स्नान) आदि से नष्ट हो जाएंगे, या फिर हमारे पाप धुल जाएंगे। जी,नहीं कर्मयोग में इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। वह इसकी अनुमति कदापि नहीं देता है।

एक और बात यदि हम चाहें,तो वैचारिक प्लेटफॉर्म पर या दैनिक व्यवहार..के अपने सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों के चलन के ज़रिए भी उस “अमुक दुराचारी व्यक्ति” से दूरी बनाकर या उपेक्षा करके उसे खुद के अन्यायपूर्ण रवैए पर पुनः सोचने और सुधार लाने को बाध्य कर सकते हैं।

ऐसा करना न केवल उसके लिए.. अपितु उसके समाज एवं सम्पूर्ण जगत के लिए बेहतर होगा।

धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा,

जैन इंटर कॉलेज,सासनी से

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