232- गुनना..

Do you know the fact..?? Multiplied with Experiences यानी “गुनना”

जीवन के अनुभवों से प्राप्त जानकारियां ‘बुद्धिमानी पूर्वक’ जब “जिंदगी को संवारती” हैं। उसी को शायद हमारे बड़े बुजुर्गों की जुबान से “गुनना” कहा गया है।

चलो! एक सत्य घटना के सहारे आज इस तथ्य की गहराइयों में उतरते हैं..

ये मंज़र उस दौर का है। जब श्री टी.एन.शेषन जी भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे।

एकबार वे अपनी देवी जी अर्थात पत्नी के साथ यूपी की यात्रा पर आए थे..

जब गाड़ी कहीं सड़क के किनारे रुकी,तो उनकी पत्नी ने सड़क के किनारे पेड़ पर लटका एक घोंसला देखा.. यूपी में पाई जाने वाली एक बहुत ही सुयोग्य चिड़िया जिसे हम लोग ‘बैया’ के नाम से जानते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि वह घोंसला उस चिड़िया की कलाकारी और परिश्रम का एक नायब नमूना है। देखते ही वे, श्री टी एन शेषन साहब से माता सीता जी की तरह.. प्रभु श्रीराम से सोने का हिरण मांगने जैसी जिद करते हुए, .. कहतीं हैं.. कि, “तुम ये “घोंसला” मुझे ला के दो..??” मैं इसे अपने घर में सजाकर रखना चाहती हूं।

किसी हद तक ये किन्हीं अमुक लोगों के स्तर भर के ही विचार होते हैं जैसे; अपनी खुशी के लिए किसी जानवर या पक्षी को बंधन में रखना..आदि। ये आदमी की फितरत या सनक भर हैं.. मगर ऐसी फितरत या फिर सनक जैसी हरकतों को ‘विवेकपूर्ण विचार’ ने कभी मान्य नहीं किया है।

श्री टी एन शेषन साहब ने भी शायद अपनी पद प्रतिष्ठा के आवेश में आकर अपने साथ में चल रहे सुरक्षा गार्ड से उस घोंसले को पेड़ की डाली से उतार लाने को बोल दिया..

सुरक्षा गार्ड शरीर से ज़रा भारी था। उसने वहीं पास में भेड़-बकरियां चरा रहे एक अनपढ़ से दिख रहे लड़के से पहले आदेशित भाषा में फिर नजदीक आने पर थोड़ा लालच देते हुए कहा कि, अगर तुम ये घोंसला उतार कर दोगे तो मैं तुम्हें दस रुपये का नोट दूंगा।

लेकिन लड़के ने तुरंत मना कर दिया। फिर श्री शेषन साहब स्वयं उसके पास गये..और उस लड़के को पचास रुपये का नोट देने की पेशकश करने लगे..

लेकिन अब उस लड़के ने घोंसले को पेड़ से उतार कर न लाने के अपने इनकार का रहस्य बताते हुए कहा कि..

“बाबू जी पेड़ से घोंसला उतारना मेरे लिए कोई बड़ा काम नहीं है। लेकिन चाहते हुए भी मैं ऐसा कर नहीं सकूंगा.. क्योंकि, घोंसले कोई खेलने की चीज़ नहीं होते..वल्कि ये पक्षियों व उनके बच्चों के लिए हम इंसानों की ही तरह ‘घर’ होते हैं। जिनमें छिपकर तेज हवा,धूप,ताप, बारिस आदि से ये लोग खुद को बचा लेते हैं।

और दिनभर अपने बच्चों के लिए दाने चुनने के बाद शाम को जब वह चिड़िया अपने घोंसले (घर) पर वापस आएगी तब वह अपने बच्चों को घोंसले से बाहर रोते-बिलखते देख बड़ी उदास होंगी।

इसलिए तुम मुझे कितने भी रुपए क्यों न दो, मगर मैं कोई भी घोंसला, तो नहीं उतार पाऊंगा।”

इस घटना का जिकर श्री टी.एन. शेषन साहब ने एक जगह अपनी बुक में भी किया है। वे लिखते हैं कि,

“मुझे जीवन भर इस बात का अफ़सोस रहा.. कि न सिर्फ पढ़े-लिखे बल्कि एक आई ए एस ऑफिसर में वो विचार और भावनाएँ क्यों नहीं आ सकीं.. जो गांव के देहाती, अनपढ़-गंवार, कहे या हम लोगों द्वारा समझे जाने वाले एक अदना से लड़के ने वे भावनाएं महसूस करलीं..??”

उन्होंने आगे लिखा है कि- “मेरी आई ए एस की डिग्री, पद, प्रतिष्ठा, पैसा.. उस अनपढ़ बच्चे के “उच्च विचार एवं स्वच्छ भावनाओं” के सामने सब मिट्टी में मिल गए।”

इसी को गांव की भाषा में हमारे बड़े बुजुर्ग सदैव “गुनना” अर्थात मल्टीप्लाई विद क्वालिटीज & एक्सपीरियंस कहते हैं।

दरअसल, कोई भी जीवन तभी आनंददायक बनता है जब व्यक्ति में ” बुद्धि और धन के साथ-साथ संवेदनशीलता” भी होती है।

बंधुवर! टी एन शेषन साहब के वैचारिक रूप से ट्रांसफॉर्म हो जाने के साथ-साथ…

आज मैं भी परमसत्ताधारी से प्रार्थना करता हूं कि क्या ही अच्छा हो..कि, इस लेख को पढ़ने के बाद उस अनपढ़ बच्चे जैसी पवित्र भावनाएं हम सभी के दिलों में भी ‘ घर कर ‘ जाएं..??

धन्यवाद

विचारक : योगेंद्र सिंह पचहरा,नीमगांव, राया,मथुरा।

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