231- The SOUL

A Journey ..

( Long walk to be Human soul)

दरअसल देखा जाए,तो “आत्मा” के लिए ये काफ़ी लंबी यात्रा है। गौर करने वाली बात ये है कि, सभी अस्सी लाख योनियों को पार करने के बाद ही जीवात्मा को मनुष्योनि नसीब होती है।

मनुष्य योनि मिलने पर भी यदि किसी “जीवात्मा” में बेहोशी बरकरार रहती है..वह खुद को जागृत नहीं हो पाता है, तो संभव है कि मृत्युलोक के इस ‘जीवन-चक्र’ से ऐसी जीवात्माएं कभी निकल भी न पाएं।

ज़ाहिर सी बात है कि, वे अपनी बेहोशी के कारण बार बार निम्न योनियों में जन्म मरण के हिचकोले खाने को विवश,तो रहेंगी ही।

हम सभी अपने बुजुर्गों से सुनते आए हैं… कि ‘जीवात्मा’ संसार में आकर चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने के लिए बाध्य होती है।

हालांकि उसका निर्धारण भी जीवात्मा” के संचित कर्मों के आधार पर ही होता है। वो एक अलग तथ्य है उस पर किसी अन्य लेख में चर्चा करेंगे।

मैं इस जटिल तथ्य को “पद्मपुराण” के एक श्लोक की सहायता से आपके समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूं।

अ जर्नी ऑफ “द सॉल”..

यानी सरल शब्दों में कहा जाए, तो ‘मनुष्य’ का चोला ग्रहण करने के लिए “आत्मा” को एक लंबी यात्रा से गुजरना होता है।

(वॉकिंग आफ्टर अ लॉन्ग रनवे..”द सॉल” गैट अ “ह्यूमन-बॉडी”)

श्लोक है..

” जलज नव लक्षाणी,स्थावरा लक्ष विसंति। पक्षिणाम दस लक्षणाम,कृमियां रुद्र संख्यकाय, तीस लक्षाणि पशव:, चतुर लक्षाणी मानुष:।”

जिस प्रकार प्रथम पंक्ति में ‘जलज नव लक्षाणी’ अर्थात नौ लाख योनियां जल में रहने वाले जीवों की बताई गईं हैं..

इस पॉइंट को मैं विशेषरूप से आज की युवा पीढ़ी की ओर मुखातिब होकर लिख रहा हूं.. कि हमें नौ लाख टाइम बर्थ जल में भी लेने होते हैं।

जैसे; कभी हम डॉल्फिन बने हैं,तो कभी सार्क या झींगा मछलियां,तो कभी कैंकडा..फेफड़ा आदि।

स्थावरा लक्ष्य विसंती.. संसार में बीस लाख प्रकार की योनियां पेड़-पौधों की होती है।

दूसरी पंक्ति में ‘पक्षीणाम दस लक्षणाम’ अर्थात दस लाख योनियां पक्षियों (बर्ड्स) की होती हैं..

‘कृमियाँ रूद्र संख्यकाय.. ‘ और दुनियां में जो कीट,पतंगे,मक्खी,मच्छर (इंसेक्ट्स) आदि..की योनियां भी ग्यारह लाख उल्लिखित की गई हैं।

तीसरी पंक्ति में ‘तीस लक्षाणि पशव:’ तीस लाख योनियां पशुओं व जानवरों (एनिमल्स) की होती हैं। जो चार पैरों पर चलते हैं। जिन्हें वेदों में तिर्यक कहा गया है वे आदतन कभी सीधे नहीं चलते। सदैव तिरछे ही चलते हैं।

तब कहीं जाकर ‘चतुर लक्षाणी मानुष:’

तब हूंक “नर” करुणा कर “देही” अर्थात तब प्रभु की कृपा से जीवात्मा को ‘नर देही’ नसीब हो पाती है।

खेल प्रेमियों को इस युग में धरातल पर यदि किसी उदाहरण के ज़रिए बताया जाए, तो आज के युवाओं का एक जुनूनी खेल “क्रिकेट” है.. उसके हवाले से यदि मैं उपमा देने की हिमांकत करूंगा.. जबकि ये उसके बराबर तो नहीं..है। परंतु कुछ कुछ..लगभग.. में समझने के लिहाज से चलो मान लेते हैं।

आत्मा सारे जन्मों / शुरू की अस्सी लाख योनियों में अपने जन्म मरण की प्रक्रिया पूरी करके एक लंबी यात्रा के उपरांत चार लाख प्रकार की जो मनुष्य योनि बताई गईं हैं। उनमें ‘जन्म’ ले पाती है।

शायद इसीलिए विद्वान लोग इस “मनुष्य योनि” को सर्वश्रेष्ठ यानी “मोक्ष का द्वार” तक बताते हैं।

ये “मानुष तन” मिलना तो दुनियां में सबसे अधिक दुर्लभ है।इसकी उपमा तो किसी से की ही नहीं जा सकती। फिर भी युवाओं के लिए

जैसे ; क्रिकेट के प्लेयर्स को फील्डिंग व बॉलिंग के अपने ओवर्स पूरे डालने..अर्थात काफ़ी पसीना बहाने के बाद जब किसी खास प्लेयर को “बैटिंग” का जौहर दिखाने का अवसर टीम के कैप्टन द्वारा दिया जरूर जाता है..लेकिन वो उसकी कार्य कुशलता को देखते हुए..वैसे ही मिलता है..जैसे ईश्वर जीव के कर्मों का खाता देखकर अन्य योनियों में विचरण के बाद ‘ मनुष्य ‘ बनाता है। तब उस बैट्समैन को भी लगभग वैसी ही सुखद अनुभूति होती है..,जैसे अन्य अस्सी लाख योनियों में विचरण के बाद “मनुष्य आत्मा” को होती है।

Comparative study..

जिस प्रकार बैट्समैन एक बहुत बड़ा कीर्तिमान स्थापित करने के अपने सपने को साकार करने के लिए पूरी सूझ बूझ से खेलता है। ठीक वैसे ही हर मनुष्य आत्मा को अपने जीवन के एक एक पल को बेहद संजीदगी एवं प्रसन्नता के साथ अनाशक्त होकर जीना चाहिए।

निष्कर्षत: अन्य योनियों की तुलना में ‘मानव देह’ में रहकर “ईश्वर भक्ति” करना काफी सुगम है। इसलिए सारे भटकावों से दूर हम सभी मनुष्यत्माओं को हमेशा सदमार्ग पर ही रहना

होगा।

वरना ध्यान रखिए फिर से वही ‘जीवन चक्र’ अस्सी लाख योनियों की डगर आपके लिए पुनः तैयार है। मगर बहुत कठिन हैं ये “डगर”

धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा,

के एल जैन इं का.सासनी,हाथरस।

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