जी, हां लगभग पिछले एक दशक से देश की ‘जनता’ “सरकार और मीडिया” के इस “आउट ऑफ ट्रैक” या “पथ-भ्रष्ट” वाले खेला को न सिर्फ देख रही है वल्कि इन दोनों के इन नाजायज संबंधों को अच्छी तरह जान भी रही..है।
देश की सत्ता पर काबिज़ “नेताओं और मीडिया” को ट्रैक पर लाने के लिए.. हिंदी फिल्म “रोटी” के गाने की प्रासंगिकता भी अब थोड़ी सी और बढ़ गई है..जिसमें किसी भी स्तर के पथ भ्रष्टों को चेतावनी देने का भाव है।
उसके शुरू के बोल हैं..
“ये पब्लिक है.. सब जानती है..पब्लिक है..
अरे ! अंदर क्या है..?? अरे! बाहर क्या है..??
अन्दर बाहर ये सबकुछ पहचानती है..पब्लिक है..
ये पब्लिक है अपना हक मांगती है..पब्लिक है। पब्लिक है।”
हमारे देश की “सरकार व मीडिया” ने सत्ता की अंधी दौड़ में.. आपस में कुछ ऐसी सौदेबाजी कर ली हैं। कुछ खबरें होती नहीं हैं.. तब भी बना दी जाती हैं..
सच में जो “खबर” जनता के हित की होती हैं वे दबा दी जाती हैं। अर्थात उनको कवरेज देने के बजाय “कवर्ड” कर दिया जाता है। आप भी समझ रहे हो कि, ऐसा खेला देश में लगभग पिछले एक दशक से लगातार चल रहा है।
क्या देश के जिम्मेदार व सक्षम संस्थानों को इसका संज्ञान नहीं लेना चाहिए..??
इससे भी आगे बढ़कर एक और काम हो रहा है.. कि, अगर कोई सच्चा न्यूट्रल पत्रकार ऐसी खबर को कवरेज दे दे..जिसमें सरकार की मनसा नहीं हो। तत्काल उसके पीछे.. ईडी.. सी डी लगा दी जाती है। उसे “एनी हाऊ” जेल में ठूंस दिया जा रहा है।
ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि, बेचारी जनता विश्वास करे भी तो किस पै करे..??
ईडी का मिसयूज करने वाली सरकार पर..या उन फेक चैनल्स पर..जिनकी सरकार के साथ अच्छी सांठ गांठ है।
या फिर जेल में बंद बेचारे न्यूट्रल पत्रकार की सच्ची पत्रकारिता पर..??
क्योंकि इन समाचार प्रसारित करने वाले चैनल्स पर तो खबरों के नाम पर कुर्सी हड़पने की कहानियां गढ़ी जाती रहती हैं।
जहां संजीदा और सच्ची खबरों को छोड़कर टीआरपी के नाम पर सेंसेसनल लिज्म बेचा जा रहा है।
जबकि ये कौन नहीं जानता है कि लोकतांत्रिक देश में सबको अपने भले बुरे के बारे में सोचने की आजादी होती है।
लेकिन तथाकथित मीडिया ने किस हक से.. “निष्पक्ष होकर सच की जुवान” बनने के बजाय सरकार से अपना संपर्क बिठाना शुरू कर दिया है..ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि, शासन का स्वभाव भी ऐसी सेटिंग्स को तरजीह दे रहा है।
आखिर क्यों..?? क्यों बदल दिया है..देश के मीडिया ने अपना किरदार..?? कौन..?? क्या..? खबर किस अंदाज में बताएगा.. अनेकों अखबार न्यूज़ चैनल्स इसी होड़ में जुटे रहते हैं।
यह होड़ सिर्फ ‘खबर के बाजार’ में बने रहने की नहीं है, बल्कि खुद को सबसे तेज.. सबसे आगे.. साबित करने की एक ‘रेट रेसिंग’ है। जिसका लक्ष्य है ‘कामयाबी बनाम पैसा’ इस दौड़ में आगे रहने के लिए चाहिए ‘ ज्यादा से ज्यादा ऊंची टीआरपी’ जो तब्दील होती है ‘ एट रैवन्यू ‘ में। इस ‘एट रैवन्यू’ का मतलब होता है “अपार दौलत”।
कैसी विडंबना है !!! जहां पत्रकारों का “लक्ष्य” होना चाहिए था ‘खबरों’ का। वहां पैसा बन गया है। जबकि ‘पैसा’ किसी भी कार्य को अंजाम देने के लिए सिर्फ माध्यम बताया गया है।।
आज अधिकतर पत्रकारों ने इसका उलट कर दिया है ‘पैसा’ बना लिया है ‘लक्ष्य’ और खबरें बनके रह गई है सिर्फ ‘माध्यम’।
विचारक; योगेंद्र सिंह पचहरा,जैन इंटर कॉलेज,सासनी से..
👍👍🙏
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