जी, हां कई बार हम ‘जाने अंजाने’ में वो कर गुजरते हैं, जो नहीं करना चाहिए।
दरअसल; उत्तर भारत के लोगों को गणेश, विसर्जन नही करना चाहिए.. इसके पीछे लॉजिक है, कि गणेश जी केवल एक सप्ताह के लिए उत्तर से दक्षिण भारत, अपने भाई कार्तिकेय जी से मिलने गए थे। जब वे एक सप्ताह बाद वापस आने लगे, तो जैसा कि हमारी भारतीय संस्कृति में मेहमान को पुनः आगमन की कहने का चलन है.. अतः वहां (दक्षिण भारत) के लोगों ने अगले वर्ष पुनः आगमन के आग्रह में निमंत्रण देते वक्त ऐसा कहा या गाया, कि “गणपति बप्पा मोरिया, अगले वर्ष तू जल्दी आ..”
तब से दक्षिण भारत में ये पर्व उसी सुखद स्मृति में परम्परागत तरीके से मनाया जाता रहा है।
जबकि, हमारे उत्तर भारत में तो गणेश जी सदा विराजमान हैं।
आप ज़रा सोचिए, तो अगर आप भी उन दक्षिण भारतीयों की देखा देखी गणेश जी को अपने घर से विसर्जित कर देंगे, तो..बताइए.. इस पर्व के बाद हर वर्ष दीपावली का बड़ा पर्व आता है। यदि अब विसर्जन कर देंगे, तब आप दीपावली की पूजा बिना गणेश जी के कर सकेंगे क्या..??
हमारे उत्तर भारत का बच्चा बच्चा भी जनता है कि, दीपावली पर श्री लक्ष्मी गणेश जी की पूजा का बड़ा महत्व है..??
भाई जी! हमारे भारत में कुछ त्योहारों को “भौगोलिक महत्ता प्राप्त है। ” परंपरागत तरीके से वे सदैव उसी विशेष क्षेत्र में मनाये जाते रहे हैं। जहां उनका महत्व है।
इसलिए..”पूजन” तो देश दुनियां के किसी भी कोने में आप कर लीजिएगा।..मगर “विसर्जन” की परंपरा में शामिल होने पर तो आपको गंभीरता से मनन करना ही होगा।
“जाने अंजाने” किसी अंधी दौड़ में शामिल न हो जाइयेगा..
Thanks
विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस से 🙏
🤔🙏
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