223- असल-कमाई

एक शिक्षक व विचारक का अपनी “Teaching & Writing-Skill” के प्रति समर्पित आचरण ही उसकी “असल-कमाई” का स्रोत होता है। जो उसके शिक्षार्थियों व पाठकों के दिमांग की ऊंचाई एवं ह्रदय की गहराई बढ़ाने का द्योतक है। यही वे ग्राउंड्स हैं जिनके आधार पर हासिल किया गया सम्मान ही उनकी “असल-कमाई” है।

जो दुनियां दे जहन बिच हमेशा के लिए स्थापित हो जां दी ए.. अब चाहे आप सशरीर दुनियां में हों या न हों !! इससे कोई फर्क नहीं पैंदा ए।

क्योंकि वे वन्दे जो इनिंग्स खेल गए। वे अपने समया नू खेल गए.. हुंण दी रॉयल्टी इब कहीं होर न जां दी ए।

चलो! पूरा मंज़र समझिए .. कि, ये उण दिनों दी गल्ला ए, जिस वर्ष मेनु टायफाइयड हो जां दा ए। जिससे काफी दिण तक मैं अपणे अंदर वीकनेस महसूस कित्ता.. तब..

इक दिन देवी जी बोल दी ए.. “अजी सुनो! आज किन्नी तारीख हों दी ए..?? आपणी सैलरी कब तक आंदी ए ..? मैंनू पूछा क्यों.? की गल ए..?? अजी दूध वाला पर्चा दे गया सी। अकाउंट से कुछ रुपे निकड़वा लेते। किससे निकलवाऊं..?? मैं ही बैंक जाबंगा, आणे में ज़रा देर,तो हो जागी, तेन्यु परेशान न हों दी ए..बाजार दे होर भी कामों को निपटा लाबंगा। आप अपने कॉलेज के किसी शिक्षा सहायक कर्मचारी नू चैक देके रुपए निकड़वा लो ना। वीक्नेस दे बिच अभी तेनु बाजार जाने दी रिस्क ना लो। अजी, अब हमारे आपके दौर के जैसे युवक थोड़ेना ए..?? आज दे वन्दे नू टैम दी कद्र कहाँ है। छोटे-छोटे कामा नू घंटों लगा देवें ” इस पर देवी जी ने कहा, ” कॉलोनी में कॉलेज के इत्ते सारे विद्यार्थी तो, हेंगे, उन्हीं में से कोन्नू भेज देओ ना।

डाइनिंग हॉल में नाश्ता करते-करते मैंनू , देवी नू कहा..अरे भई ! मणा तो कोई ना करेगा मगर आप समझती ना हो, “ज़माणा बदल गया सी। अब वैसे विद्यार्थी कहाँ?? जो अपणे गुरुओं दे कामों के लिए दिल से आतुर रहवा करे..ए । इसमें दोष आज दे शिष्यों नू कोई ना। शिक्षा के इस व्यवसायीकरण ने उन्ने काफ़ी फॉर्मल बणा दियो सी।”

ये कहते-कहते मैं धीरे-धीरे बैंक दी ओर चल दिया.. महीने दा पहला सप्ताह होण वास्ते बैंक में बड्डी भीड़ थी। इक खाली कुर्सी नू देख कै मैं बैठ गया सी। होर विद ड्रॉल फार्म भर कै कैशियर वाले डेस्क के सामणे लाइण में खड़े होंण लाग रहे वन्दे नू संग मैनू ला गयो। तभी इक बैंक कर्मी नू मुझे बड़े आदर-सत्कार नू कुरसी पर बैठ जाणे कू बोल्या, और स्वयं फ़ार्म लेके कैशियर दी केबिन में चला गया। मैं नू कुछ समझ सकदा तब तक बैंक का एक असिस्टेंट मेरे लिए चाय ले आया। मैंने ये कहकर मना कर दिया कि भैया! डॉक्टर ने अभी कुछ दिण तेज पत्ती दी चाय नू मना कित्ता ए। असिस्टेंट बोला, “साहब ने आपको देख के हल्की पत्ती दी चाय दा आर्डर दिया था।” ये कहकर उसणे मेरे हथ में चाय थमा दी।

मैंनू घड़ी नू देख्या, दस बजकर पाँच मिंट हों ण लागरे थे। मैं नू सोचणे लगा, चाय दे रा ए, लगता है दो एक घंटे नू पहले काम न हो पावेगा।

तभी तकरीबन इक बाइस वर्षीय बंदा नू आक्के मेरे पैर छुए. होर विड्राॅल दी रकम मेरे हथ पै रख दी। इतनी फास्ट काम होते देख मैंनू दंग रह गया। मैंनू उण वन्दे नू धन्यवाद देते हुवे पुछ्या,

उसने बताया, “सर, मैं इस बैंक का नया ब्रांच मैनेजर हूं, एक सप्ताह पहले ही मैंने ज्वाॅइन किया है लेकिन शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए हैं..मैं ‘सुमित’ आपका विद्यार्थी रहा हूँ।”

“कौण से बैच दा सुमित!!” मैं नू आश्चर्य से पूछा। उसने कहा, जो एक बार परीक्षा कक्ष में भी आपने चांटे लगाए थे। सन् 2008 में ही तो मैं आपके कॉलेज से पास आउट होकर गया हूं। सर आपने मुझे अंग्रेजी पढ़ाई है। आप तो जानते ही हैं,अंग्रेजी में..मैं ठीक नहीं था।

घनी दाढ़ी के कारण नए बच्चों में आपका बड़ा खौफ रहता है। वैसे पढ़ते पढ़ते पता चलता है..आप काफी “सॉफ्ट हर्टेड पर्सन” हो। आपको अगर ध्यान हो तो रूम नंबर इक्कीस में आपकी कक्ष निरीक्षक की ड्यूटी थी। ग्यारहवीं की अर्द्ध वार्षिक परीक्षा के दौरान पास होने के लिहाज़ से मैं ना समझी.. से एक छोटी सी पर्ची रख लाया था..जैसे ही मैंने नकल करनी चाही..तभी उस वक्त के चीफ़ प्रॉक्टर श्री डी.पी.उपाध्याय जी के हाथों पकड़ा गया। आपने आकर तुरंत मेरे दो चांटे जड़ दिए..उस वक्त मन ही मन मैं उपाध्याय जी से कम आप से अधिक खफा हो रहा था।

उसने कहा! “प्रिंसिपल साहब और उपाध्याय जी दौनों मुझे रस्टीकेट करने पर आमदा थे..के एल जैन में होम एग्जाम में भी वही रूल्स फॉलो होते हैं जो बोर्ड में होते हैं..मुझे सेकंड कॉपी देने के लिए बोल दिया गया था.. तभी आप एक नए अंदाज में फिल्म “अंधाकानून” में अभिनीत अमिताभ बच्चन वाले डायलॉग..को बोलते हुए.. एकदम आगे आ गए..और कहा.. “नहीं सर!! ये बच्चा तो अभी एक अनसमझ परीक्षार्थी है..

मगर.. “एक, जुर्म के लिए किसी अपराधी को, कोई अदालत भी, दो बार सजा नहीं दे सकती।” उपाध्याय जी ने कहा, क्या मतलब..?? आपने उन्हें ध्यान दिलाते हुए कहा कि, उपाध्याय जी आपके ही सामने मैंने अभी इस बच्चे के गाल पै दो चांटे लगाए हैं। अपनी नासमझी की सजा तो ये पा चुका। That solve..इसीलिए अब इसे रस्टीकेट नहीं किया जा सकेगा..!!”

दूसरी बात ये कि, परीक्षार्थी तो गलती करते ही हैं। हम और आप निरीक्षक के साथ-साथ शिक्षक भी हैं, हमारा काम न केवल उनकी निगरानी है वल्कि उन्हें सही राह दिखाना भी है।

शायद सुमित की यह पहली गलती है,रस्टीकेट कर देने से तो इसका पूरा एक वर्ष बर्बाद हो जाएगा। इसलिए इसे जो सजा मिल गई है मेरे ख्याल से वही काफ़ी है। ”

सर! हम स्टूडेंट्स ने अपनी स्टडी के दौरान आपको कई एक बार ऐसे ही “हीरोइक-अंदाज” में देखा हुआ है। आप सदैव विद्यार्थियों के हित में विद्यालय प्रशासन के समक्ष भी खड़े होते रहे हो।

उस दिन आप एक “स्मार्ट इनविजिलेटर” के साथ-साथ.. मेरे एक वर्ष को बचाने के लिए वहीं तत्काल मुझे एक “पोलाइट गार्जियन” की भूमिका में भी नज़र आए।

आखिरकार सुयोग्य प्राचार्य श्री के एम शर्मा साहब ने आपकी बात को तेवज्जो देते हुए मेरा रस्टिकेशन कैंसिल कर दिया।

मेरे अर्द्ध वार्षिक परीक्षा परिणाम को देखते हुए.. आपने अतिरिक्त समय देकर मुझ जैसे कमजोर बच्चों के लिए कई एक्स्ट्रा क्लासेज भी दी थी। जिससे हम वार्षिक परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो सके.. परिणामस्वरूप आज आपकी सेवा में.. मैं एक ब्रांच मैनेजर की हैसियत से तैनात हूँ।

आपके द्वारा पढ़ाए हुए..मुझ जैसे कई एक शिष्य देश के उच्च पदों पर नियुक्त होकर राष्ट्र एवं राज्यों की सेवाओं में लगे हुए हैं।

उसी ने बताया सर ! मेरे ही नाम राशि सुमित कुमार जी जैन इस वक्त मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में पी सी एस के थ्रू सेलेक्ट होकर प्रशासनिक सेवा में एस डी एम के पद को सुशोभित कर रहे हैं।

उस दिन घर लौटते बखत मेरे “मानस मन” में ये विचार .. आणा लाज़मी था कि ज़माणा चाहे कित्ता भी क्यों न बदल जाए, यू सारी दुणीयां फुल्ली कंप्यूटराइज्ड क्यों ण हो जाए..but पाजी!शिक्षार्थियों व पाठकों के “ह्रदय की गहराइयों” में शिक्षकों व विचारकों का सम्माण, तो हमेशा रहबे गा।

शत श्रीअकाल

आपणा “युग” but इ कोई बंदा ना ए..युग,तो

इक “विचारधारा” दा नाम ए जी..थैंक यू

4 thoughts on “223- असल-कमाई”

  1. Sir, I also look at your every suggestion and try my best to make myself like this, do you want that you can upload classic classes like me, that too from tomorrow, where you can motivate along with studies. Yes, because I studied in 9th class and I still follow the ideas given by you, sir.

    Will you study our classic class🙏

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