“नज़रिए..” का खेल देखिएगा..
“नजरिया” क्या क्या खेल दिखाता हैं??
परिस्थिति आने पर या किसी परिस्थिति की आशंका पर…सामान्यजन के मुंह से,तो ज्यादातर निकल ही जाता हैं.. कि “मैं न होता, तो क्या होता..?” जबकि कौन नहीं जानता..?? कि,”दुनियां बिच घटने वाली हर छोटी बड़ी घटना “विधाता के “पूर्व निर्धारण व्यवस्था” (प्रारब्ध) का ही हिस्सा होती हैं।
और कुछ नहीं ये “अहम भाव” भी गलतफहमी के शिकार होने पर उत्पन्न होता है।
इसलिए हमेशा सावधान! रहें..कई बार देखा गया है कि,ये कभी कभी ईश्वर के अनन्य भक्तों को भी अपने प्रभाव में लेने का प्रयास करता है।
इसे सुंदरकांड में आए एक प्रसंग के नज़रिए से समझने की कोशिश करते हैं।
ये मंज़र उस दौर का है जब “अशोक वाटिका” में रावण क्रोध से भरा हुआ तलवार लेकर, मां सीता को मारने के लिए दौड़ पड़ता है, तब हनुमान जी को लगा, कि इसकी तलवार छीनकर, अब मुझे इसका सर काट ही लेना होगा।
किन्तु, अगले ही क्षण, उन्होंने देखा कि, ख़ुद “मंदोदरी” ने ही रावण का हाथ पकड़ लिया!
यह देखकर हनुमान गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि जल्दबाजी में, मैं आगे बढ़ जाता,तो मैं सदैव इस भ्रम का शिकार बन जाता कि अशोक वाटिका पर यदि ..
“मै, न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?”
शायद इसीलिए जीवन में कहीं कहीं धैर्य रखने..को भी एक असल पहलू बताया गया है।
संसारी व्यक्ति अपनी अधीरता के कारण कई बार स्थिति को बिगाड़ लेते हैं। फिर अहम के शिकार मति भ्रम होने पर लोगों के बीच कहते.. फिरते हैं कि, अमुक वक्त पर.. यदि “मैं,न होता, तो क्या हो..ता।”
मेरा अनुभव कहता है..कुछ नहीं होता..परमसत्ता एवं प्रकृति हमेशा स्वयं संतुलन बना लेती है।
वशर्ते कि हम थोड़ा धैर्य रखें। अब आप सुंदरकांड के प्रकरण पर ही गौर कीजिएगा..
सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये, कि प्रभु आप सद्बुद्धि और दुरबुद्धि के द्वारा जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, उससे.. वही कार्य करा लेते हो। धन्य हैं प्रभो..आप धन्य हैं।
आगे चलकर जब “त्रिजटा” ने कहा कि “लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!” तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है, फिर ये त्रिजटा ऐसा कैसे कह रही है..?? कि उसने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? चलो! देखते हैं.. जो प्रभु इच्छा!
जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब “विभीषण” ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने का उपाय प्रभु ने विभीषण को सद्बुद्धि देकर कर दिया!
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण से ही कहलवा दिया, कि “बंदर अर्थात दूत को मारा नहीं जायेगा!!” देखिए! बंदर को अपनी पूंछ से बहुत प्रेम होता है इसलिए इसकी पूंछ मे कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगा दीजिए इसको इतनी ही सजा काफ़ी है, तो हनुमान जी सोचने लगे कि, त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? मगर सारा प्रबन्ध आपने रावण से ही करा दिया! जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो फिर मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !
इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब व्यक्ति के कर्म संस्कारों के ताने बाने में बुना हुआ.. विधान है जो पूरी तरह ईश्वरीय है!
हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं!
इसीलिये हमें कभी भी किसी भ्रम में आकर किसी दृश्य को इस नज़रिया से नहीं देखना चाहिए.. कि… “मैं, न होता, तो क्या होता..?”
जी, हां! न मैं श्रेष्ठ हूँ, न मैं ख़ास हूँ,
मैं, तो अपने राधे गोविंद का बस एक छोटा सा दास हूँ॥ 👍 🙏🙏
Sir when will your blog come✍️🙏
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Thanks
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