221 – कर्म-गणित

आओ! आज ये जानने की चेष्टा करते हैं कि जीवन का “कर्म-गणित” क्या कहता है। क्या मनुष्य के भाग्य का “निर्धारण” पूर्व में ही हो जाता है..??

मगर उसके ग्राउंड्स या पैरामीटर्स क्या होते हैं..??

हिंदी में एक कहावत प्रचलित है.. कि, चाहे कोई कितना भी सयाना क्यों न हो मगर..

“कर्मगति” टारे नाहि टरे.. ‘अच्छी हो या बुरी’ व्यक्ति को उसका सामना एक न एक दिन करना ही होता है।

इसे एक सत्य घटना..के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।

..कहानी में अब वे इस वर्तमान जन्म में ऋषिवर हैं जबकि पूर्व जन्म में एक मछुआरे थे कहानी में जो अब डाकू है, वह पूर्व जन्म में एक शिवभक्त पंडित थे।

हां तो सुनिएगा, आई मीन पढ़िएगा.. कहानी कुछ इस प्रकार से है..

एक ऋषिवर नगर से दूर जंगल में स्थित शिव मंदिर में भगवान् शिव की पूजा में लींन रहते थे।

कई वर्षो से यह उनका अखंड नियम चल रहा था। उसी जंगल में एक नास्तिक डाकू भी डेरा डाले हुए था। उस डाकू का भय आसपास के क्षेत्र में दूर दूर तक व्याप्त था।

वह मंदिरों में भी चोरी करने से नहीं चूकता था।

एक दिन उस डाकू की नजर उस ऋषि पर पड़ गईं। उसने सोचा यह ऋषि वीरान जंगल में बने इस एकांत मंदिर में ही क्यों पूजा करता है, हो न हो इसने मंदिर में कुछ माल छुपा रखा हो,

चलो ! आज इसे ही लूटता हूं।

‘अस्थिमाल’ नाम के डाकू ने उन ‘ प्रकृत्य ‘ नामक ऋषिवर से कहा! कि, जितना भी धन छुपाकर रखा है.. चुपचाप मेरे हवाले कर दो।

ऋषि उसे देखकर तनिक भी विचलित हुए बिना बोले- कैसा धन ? मैं तो यहाँ बिना किसी लोभ के एकांत में शांति से पूजा करने चला आता हूं।

डाकू को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने क्रोध में ऋषि को जोर से धक्का मारा.. ऋषि ठोकर खाकर शिवलिंग के पास जाकर गिरा और उसका सिर फट गया.. रक्त की धारा फूट पड़ी।

इसी बीच एक आश्चर्य की बात ये हुई कि ऋषि के गिरने के फलस्वरूप शिवालय की छत से सोने की कुछ मोहरें डाकू के सामने जा गिरीं।

अब तो डाकू अट्टहास करते हुए बोला तू ऋषि होकर झूठ बोलता है। वो भी मुझ से..

अरे झूठे ! तू तो कहता था, कि यहाँ कोई धन नहीं, बता, ये सोने के सिक्के कहां से गिरे..??

अब अगर तूने मुझे सारे धन का पता नहीं बताया तो मैं यहीं पटक-पटकर तेरे प्राण ले लूंगा।

ऋषि का ह्रदय करुणा से भर गया..वह दु:खी मन से बोला- हे शिवजी! मैंने पूरा जीवन आपकी सेवा/अर्चना में समर्पित कर दिया..फिर आज मेरे सामने ये कैसी विपत्ति आन पड़ी है ?

हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए..

जब जब भक्त सच्चे मन से पुकारते हैं तो ईश्वर किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य करते हैं. ??

महेश्वर तत्क्षण प्रकट हुए.. और ऋषिवर से बोले! कि, क्या ऋषिवर आप इस होनी के पीछे का कारण अपने अंत: चक्षुओं से देख पा रहे हो..??

ऋषि भयभीत स्वर में बोले “जी नहीं” अब मेरी कोई साधना काम नही कर पा रही.. है। प्रभु आप ही बताइएगा..ये सब क्या है।

चलो! मैं ही बताता हूं. ये डाकू पूर्वजन्म में एक पंडित था इसने कई कल्पों तक मेरी भक्ति भी की। परंतु इससे प्रदोष के दिन एक भूल हो गई। जबकि यह पूरा दिन निराहार रहकर मेरी भक्ति कर रहा था। लेकिन दोपहर में जब इसे प्यास लगी तो यह जल पीने के लिए पास के ही एक सरोवर पर गया।

संयोग से उसी वक्त एक गाय का बछड़ा भी दिन भर का प्यासा वहीं पानी पीने आ पहुंचा। तब इस ब्राह्मण ने उस बछड़े को कोहनी मारकर भगा दिया था। और स्वयं जल पिया.. इस कारण से वह पंडित इस जन्म में डाकू बना। और हे ऋषिवर! तुम पूर्वजन्म में मछुआरे थे। उसी सरोवर से मछलियां पकड़कर उन्हें बेचकर अपना जीवन यापन करते थे।

उस कोहनी वाली घटना के समय तुम मछुआरे के रूप में वहीं थे। जब तुमने उस छोटे बछड़े को निर्जल प्यास से तड़फते देखा.. तो किसी पात्र में जल लाकर उसे पिला दिया.. उसी पुण्य के कारण तुम्हें फिर से मनुष्य जन्म मिला और तुम एक श्रेष्ठ ऋषिवर बने.. मगर

कर्म गणित पर ध्यान दीजिएगा.. पूर्व जन्म में पंडित के रूप में अर्जित किए गए कुछ श्रेष्ठ संचित कर्मों के आधार पर आज इस जन्म में डाकू का राजतिलक होना था।

परंतु वर्तमान में डाकू के जन्म मिलने के बाद न जाने कितने निरपराध लोगों को मारा व देवालयों में चोरियां तक की, और तुम

डाकू के रूप में स्थापित होने से तुम्हारे पूर्वजन्म के पुण्य कर्म सीमित होते चले गए.. और आज राजतिलक की जगह सिर्फ कुछ मुद्रायें ही नसीब हुई हैं।

और हे! ऋषिवर तुमने पिछले जन्म में अनगिनत मछलियों का शिकार किया था, जिसके फलस्वरूप आज तुम्हारी मृत्यु तय थी। मगर वर्तमान जन्म में ऋषि के रूप में किए गए तुम्हारे श्रेष्ठ संचित कर्मों के फलस्वरूप मृत्यु सिर्फ एक हल्की सी चोट में तब्दील हो गई..है। समझ आया ! जीवन का “कर्म-गणित” !!

शिक्षा;– दुनियां में वह नहीं होता, जो हमें अच्छा लगता है, बल्कि वह होता है, जो हमारे अपने ही कर्मों के लेखा जोखा अर्थात “कर्म-गणित” के आधार पर पूर्व में ही “निर्धारित” हो चुका होता है। जिसके लिए प्रत्येक जीव खुद जिम्मेदार होता है।

वर्तमान में जब व्यक्ति को मानव जीवन की मर्यादाओं में रहते हुए भी कुछ कष्ट प्राप्त हो रहे हो.. तो फिर आप समझ जाइयेगा कि, इस तरह ब्रह्मांड को संचालित करने वाली परमसत्ता ने आपके कुछ श्रेष्ठ संचित कर्मों के फलस्वरूप कुछ बड़े कष्ट हर कर उन्हें कम कर दिया है।

दरअसल, हम मनुष्यों की दृष्टि सीमित होती है,परंतु परमसत्ताधारी तो लोक-परलोक सब देखता है, वह ये सारा हिसाब हमारे कर्मों के ग्राउंड्स पर अपने पैरामीटर्स द्वारा पूर्व में ही निर्धारित कर लेता है।

आज मैंने डाकू ‘अस्थिमाल’ व ऋषिवर ‘प्रकृत्य’ की इस सच्ची घटना के ज़रिए..प्रत्येक जीवात्मा के “कर्म-गणित” पर प्रकाश डालने का एक प्रयास किया है। इसे समझना संसार के हर प्राणी के लिए लाजमी है।

धन्यवाद

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