219- टीम-स्प्रिट

जिस प्रकार माध्यमिक शिक्षण संस्थानों में किन्हीं अपरिहार्य कारणों से जब कभी दो एक शिक्षक अवकाश पर होते हैं, तो “टीम-स्प्रिट” अर्थात टीम भावना के मध्य ए नज़र विद्यालयों में शिक्षण कार्य बाधित न हो, इसके लिए खाली पीरियड्स वाले शिक्षकों की “अरेंज क्लासेज” लगा दी जाती हैं।

ठीक वैसे ही जब ” देव शयनी एकादशी ” को श्री भगवान विष्णु चार महीने के लिए अपने शयन कक्ष में चले जाते हैं। उन चार महीनों के दौरान सृष्टि के कार्य बाधित न हों..इस उद्देश्य से..

यहां मेरा कुछ ऐसा ही मानना है..शायद इन द सेंस ऑफ “टीम स्प्रिट” ही हमारे सनातन में सृष्टि की व्यवस्था मिल बांटकर कुछ इस प्रकार संभाली जाती रही है।

देव शयनी एकादशी के बाद..सर्वप्रथम चार दिन हमारे “गुरु लोग” सृष्टि की व्यवस्था में अपना योगदान देते हैं.. इसी आदर्श कार्य के लिए.. पूरी दुनिया में गुरु पूर्णिमा पर गुरुओं का सम्मान करने की परम्परा है।

अगले ही दिन श्रावण अर्थात सावन का महीना लग जाता है,तब पूरे एक महीने के लिए सृष्टि शिवमय हो जाती है, अतः भगवान शिव सृष्टि को संभालते हैं।

फिर आता है..भाद्रपद तो भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी आ जाती है, तब भाद्रपद के पूरे 19 दिन सभी कृष्णमय हो जाते हैं।

फिर आती है गणेश चतुर्थी पूरे दस दिन सृष्टि के समस्त प्राणी गणेशमहोत्सव में तल्लीन हो जाती है।

उसके बाद 15/16 दिन हमारे पितृदेवों की पुण्य आत्माएं सृष्टि को संभालने में अपना योगदान देती हैं।

फिर नवरात्रि आ जाती हैं मां अम्बे गौरी दुर्गा पूरे दस दिन दशहरा तक सृष्टि का कार्यभार संभाल लेती हैं।

फिर शुरू होते हैं दीवाली के 20 दिन मां लक्ष्मी सभी घरों में खुशहाली और धन धान्य से परिपूर्ण करके समस्त सृष्टि को न केवल संभालती हैं अपितु खुशहाल कर देती हैं।

दीवाली के साथ ही साथ दस दिन कुबेर जी भी सृष्टि को संभालने में अपना योगदान देव उठनी एकादशी तक देते हैं।

फिर तो.. भगवान विष्णु निद्रा से जाग कर सृष्टि का कार्यभार स्वयं संभाल ही लेते हैं

अब आप ही बताइए..?? हमारा सनातन.. है ना कमाल का धर्म!!

विशेष;– इसमें तो कभी कोई दोराय है ही नहीं कि, शिक्षक समस्त सृष्टि को ज्ञान रूपी ‘ प्रकाशमय ‘ करने में पूर्ण समर्पण भाव से मोमबत्ती की तरह अपना सारा जीवन खपा देता हैं ।

“गुरुओ को “आदर्श शिक्षक” क्यों कहा गया है, इस बात का भान सृष्टि की व्यवस्था में उनके योगदान को देखकर भी हो गया होगा।

बोलो! ॐ श्री हरि.. ॐ श्री हरि.. ॐ श्री हरि

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