205- सत्कर्म

सत्कर्म तभी संभव हैं जब व्यक्ति को आत्मज्ञान हो जाय, यदि आत्मज्ञान नहीं होगा, तो हमारे कितने भी अच्छे कर्म क्यों न हों..उनसे अहंकार या लोकप्रियता पाने की बू आयेगी ही।

चलो! आज इसे हम गीता के एक प्रकरण के जरिए समझने का प्रयास करेंगे..

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन साथ साथ टहल रहे थे। उस वक्त अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु: मेरे मन में एक जिज्ञासा है, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ..?

श्री कृष्ण ने कहा: अर्जुन, तुम मुझसे बेहिचक, कुछ भी पूछ सकते हो।

तब अर्जुन ने कहा: कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई कि, दान तो मै भी बहुत करता हूँ, परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी कहते हैं..क्यों..??

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले: चलो! आज मैं तुम्हारी ये जिज्ञासा शांत कर देता हूं।

श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित ‘दो पहाड़ियों’ को पूरी तरह सोने का बना दिया। इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे! अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा लेकर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया। अर्जुन ने सभी गाँव वालों को बुलाया। उनसे कहा कि सभी लोग पंक्ति बना लें अब “मैं, आपको सोना बाटूंगा..”

गाँव वालों ने अर्जुन की जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे। उनमें ये सब करते कराते अहंकार आ चुका था। जैसी कि कुछ लोगों की आदत होती है गाँव के कुछ लोग वापस आ..आ.. कर दोबारा से लाईन में लग रहे थे।

अब अर्जुन काफी थक चुके थे। जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई। वे वैसी ही थीं। वहां अभी भी भरपूर सोना था।

उन्होंने थक हारकर श्री कृष्ण से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।

प्रभु ने कहा कि ठीक है, चलो! तुम विश्राम कर लो।

तभी उन्होंने कर्ण को बुलवाया। और कहा कि, कर्ण! इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।

कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये।

उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा: यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ख़ुद ले के जा सकता है। ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देखकर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया..?

श्री कृष्ण ने अर्जुन को शिक्षाप्रद भाव में जवाब दिया कि, तुम्हे ‘सोने’ से मोह,तो था ही। दूसरे तुम अपनी हाकिमगिरी दिखाते हुए गांव वालों की नज़रों में लोकप्रिय होने की लालसा से भी सोना वितरण करते रहे।

सखा! तुम में दाता होने का भाव जो आ गया था..वो कभी ठीक नहीं है।

जबकि, कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। कर्ण गांव वालों द्वारा होने वाली अपनी जयजयकार..या प्रशंसा को सुनना नहीं चाहता!! उसके पीठ पीछे लोग क्या कहते हैं उससे कर्ण को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये है कर्ण की विशेषता।

प्रिय पाठको! यहां मेरी अपनी रिसर्च ये कहती है.. कि, ऐसा एक ‘आत्मज्ञानी-व्यक्ति’ ही कर सकता है। विद्वानों द्वारा ऐसी स्थिति को..”नेकी कर दरिया में डालना..” कहा गया है। ‘Do good & forget..’ यानि ‘अच्छा करो और भूल जाओ..’ दाएं हाथ से भलाई करो,तो बाएं को पता भी न चले। ताकि अहंकार व लोकप्रिय होने का भाव व्यक्ति के मन में उत्पन्न न हो पाए..

क्योंकि यदि ऐसा हुआ, तो हमारे जीवन का हश्र ..”नौ दिन चले अढ़ाई कोस..” ही हो के रह जायेगा। अर्थात जीवन के सारे किए धरे पर पानी फिरने में देर नहीं लगेगी।

यही वो कारण है जिससे व्यक्ति के अच्छे कर्म अक्सर उसके प्रारब्ध में जुड़ने से रह जाते हैं।

इस तरह श्री कृष्ण ने एक खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर तो दिया ही परंतु साथ ही एक नसीहत भी दी।

शिक्षा;

दान देने के बदले में..धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना..हमारे ‘उपहार’ को महज एक व्यवहारिक ‘सौदा’ बनाके रख देता है।

व्यक्ति अज्ञानतावश यहां-वहां अपने नाम के शिला पट लगवाता फिरता है।

यदि व्यक्ति किसी को कुछ दान या कोई मदद करता है, तो उसे इसके बदले किसी भी तरह की उम्मीद या आशा नहीं करनी चाहिए, ताकि उसका कर्म सत्कर्म बन सके, कहीं ऐसा न हो कि वह केवल उसका अहंकार बनके रह जाय।

धन्यवाद..

आपके पचहरा सर

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