195-मानसिक-ग़ुलामी

देखिए! कैसी विडंबना है!! हम पर अंग्रेजियत किस क़दर हावी है..

इसे हम भारतीयों की मानसिकता से अच्छी तरह समझा जा सकता है।

अंग्रेजी ‘नववर्ष’ आने के दो एक दिन पूर्व से ही हम भारतीय-नागरिकों के दिलो-दिमांग पर किसी संक्रामक बीमारी की तरह ‘हैप्पी न्यू ईयर’ मनाने और बोलने का एक पागलपन सा सवार हो जाता है। जिससे ‘मानसिक-गुलामी’ की बू आती है। लानत है हमारे शिक्षित होने पर..?

जैसे ; हर वर्ष हिंदी कलेंडर के अनुसार वीर विक्रमी ‘नव संवत्सर’ आता है मगर हममें से कितने लोग हैं जो उसका जश्न मनाते हैं..?? उसके प्रति उनकी उदासीनता और अनभिज्ञता को देखते हुए अगर उसे ‘गुलामी’ की मानसिकता न कहें, तो आप ही बताओ क्या कहें..??

जब श्री मुरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्हें एक जनवरी के दिन पत्र द्वारा नववर्ष का पहला शुभकामना संदेश प्राप्त हुआ, तो उन्होंने उसके प्रतिउत्तर में लिखा कि,

” मेरे देश का सम्मान तो ‘वीर विक्रमी नवसंवत्सर’ मनाने में है। मैं उसी को मनाता हूँ.. ये एक जनवरी वाला नवबर्ष तो पराधीनता की याद दिलाता है इसलिए मैं इसे नहीं मना सकता।” मगर सवाल यहां भी है कि हम कितने लोग हैं जो संवत लिखते हैं..?? डालनी तो सन के अनुरूप तारीख ही पड़ती है। क्योंकि प्रचलन में तो हर स्तर पर वह जीसस क्राइस्ट वाला सन ही हैं न..?? ये भी एक मानसिक गुलामी का ही सूचक है कि व्यवहारिक तौर पर देश के सरकारी विभागों आदि में विक्रम संवत प्रचलन तक में नहीं आ सका है..??

स्वामी विवेकानन्द जी ने हमारे देश की शिक्षा-पध्दति और पढ़ाने के तौर-तरीकों को पूरी तरह से ग़लत बताया है। ये तो आप भी जानते हैं जो शिक्षा-व्यवस्था भारत देश में लागू है वह आज से नहीं,1847 से लागू है जिसे अंग्रेजों ने शुरू किया था। जब हम उनके गुलाम थे। जिसमें माध्यमिक स्तर तक का पाठ्यक्रम बच्चों को केवल क्लेरिकल के लिए तैयार करना था। जिससे यदि भारतीय पढ़ जाएं, तो भी सिर्फ क्लर्क बनकर हमारी जी हुजूरी ही करते रहें और हमें ‘Yes Sir’-‘Yes Sir’ बोलते रहें बस। इस ‘एजुकेशन-सिस्टम’ का कोई और मक़सद नहीं था।

यदि विश्वास न हो पा रहा हो तो आप धरातल पर देख लीजियेगा।

माध्यमिक-स्तर तक शिक्षित होने के बाद भी भारत के बच्चे वो भी केवल सम्पन्न-परिवारों के अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपना कैरियर-सेटल करने की तैयारी के लिए देश के प्राइवेट संस्थानों में चल रही कोचिंग्स में जाने के लिए बाध्य होते हैं। तब कहीं जाकर बड़ी मेहनत से अपने आप को कहीं सेटल कर पाते हैं। जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे इस ‘रॉंग-एजुकेशन-सिस्टम’ की बलि चढ़ कर फैक्ट्री,कारखानों, ठेला लगाने या मजदूरी करने को मजबूर होते हैं। मगर भला हो इस “कोरोना” नामक महामारी का चाहे मजबूरी में ही सही जिसने हमें “ऑन लाइन” एजुकेशन प्लेटफॉर्म ईजाद करने के लिए बाध्य किया.. उन्हीं प्लेटफॉर्म की वजह से आज पुअर बैक ग्राउंड के बच्चे देश के नामचीन पदों पर काबिज़ हो पा रहे हैं।

देश में चल रहे इस ‘रॉंग एजुकेशन सिस्टम’ पर होने वाले कीमती ‘समय’ और ‘रुपये’ की बर्वादी का क्या हमें कोई अंदाजा है..??

सन 1847 से लागू होने के ठीक सौ वर्ष बाद 1947 में देश के असंख्य क्रांतिकारियों के बलिदान ने हमें भौतिकरूप से आज़ाद भी करा दिया, मग़र अभी भी उसी शिक्षा-पद्यति को हम ढोये चले जा रहे हैं।

असल में ये हमारे देश की सत्ता पर काबिज़ ‘नीति-नियंताओं’ की ‘मानसिक-गुलामी’ का द्योतक है..??? जनता क्या करे उसकी तो मजबूरी है.. इसे ढोने की।

मेरा तो ऐसा विचार है.. आप भी जरा सोचिएगा..यदि हम आठवीं तक का पाठ्यक्रम मानव-जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से सम्बंधित तथ्यों पर तैयार कर लागू कर दें तो जूनियर के बाद हमारे बच्चे 9,10,11,12 के इन चार वर्षों के पाठ्यक्रम में अपनी-अपनी रुचि के मुताबिक कोई ‘चार-वर्षीय’ बेहतरीन रोजगार-परक प्रोफेशनल कोर्स करके उम्र व अनुभव में मैच्योर होते-होते वे अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।

देश के युवा नागरिक, जिन्हें सिर्फ एक वोट समझकर जाति, धर्मों में बांटकर लगभग सैकड़ों वर्षों से उन्हें अपनी तमाम उम्र बेरोजगारी से जूझते हुए तनावपूर्ण जीवन जीने लिए मजबूर करते सत्तारूढ़ दल कहें या दलदल नियुक्तियों के नाम पर ड्राफ्ट, पोस्टल ऑर्डर्स आदि लेकर व्याप्त असीमित बेरोजगारी जो इन सरकारों की नाकामी बयां करते करते भी, हर सत्र में सरकार की ही अच्छी खासी कमाई करा देते हैं।

अफसोस तो इस बात का है कि, देश की कुर्सी पर बैठे जिम्मेदार लोगों की इस बाबत अभी भी कोई ठोस नीति बनाने की मनसा नजर नहीं आ रही है।

इसीलिए मैं कहता हूँ काहे का ‘नववर्ष’..???

हिंदी कलेंडर के आधार पर चैत्र माह में शुरू होने वाला नवसंवत्सर न केवल भौतिक रूप से वल्कि प्राकृतिक रूप से सब कुछ नया लेकर आता है।उस वक्त प्रकृति स्वयं अपना रूप सँवारती है..हम कृषि प्रधान देश के नागरिक हैं। उसी वक़्त हमारे अन्नदाताओं के खेत से फसल कटकर उनके घर आती है।

जनवरी के महीने में नया होता क्या है..???

कुछ भी तो नहीं..जागो! भारतीयो जागो! देश का नेतृत्व सम्भाल रहे इन काले अंग्रेजों की बहकाने-भटकाने वाली मानसिकता को समझो। और इनके द्वारा बनाई गई मानसिकता के पूर्वा ग्रहों से बाहर निकलो! आख़िर कब तक हम दूसरों के द्वारा हाँके जाते रहेंगे..???

बिंदु विचारणीय है…आपका हर दिन शुभ हो..👍

आपका

युग पचहरा

4 thoughts on “195-मानसिक-ग़ुलामी”

  1. सही कहा sir हमारा हर दिन नया होता है क्यों कि आप कभी नही जानते कल आपके लिए क्या लाने बाला है क्योंकी मनुष्य एक बेवकूफ मिट्टी है

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