192- खेल-निराले!!

“किस्मत के ‘खेल-निराले’ मेरे भैया। किस्मत का लिखा कौन टाले मेरे भैया..”

ये हिंदी फिल्म ‘एक फूल दो माली’ का बहुत ही लोकप्रिय गाना है।.. परन्तु ये बात ज़िंदगी के धरातल पर सोलह आना सही है।

मग़र अब सवाल ये है कि आख़िर इस ‘किस्मत’ को लिखता कौन है..? ये जानने के लिए हमें इस लेख को गंभीरतापूर्वक पढ़ना चाहिए👍

एक प्रकरण के माध्यम से मैं इसे अभिव्यक्त करने का प्रयास करके देखता हूँ।

अधिकतर लोग..आजकल ‘युग और नीरू’ की युगल जोड़ी के बिछड़ जाने को लेकर तरह-तरह की बात करते रहते हैं..

जैसे; “उनकी शादी विद्वानों द्वारा लग्न और मुहूर्त सब कुछ देखकर हुई थी..,उनका दैनिक व्यवहारिक,आचरण सब लगभग ठीक था,उन दोनों की ईश्वर में भी अच्छी आस्था थी..वगैरह वगैरह …

मग़र अफसोस! व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, उनका दाम्पत्य जीवन महज़ तीस एक वर्ष ही चल सका..जबकि भारतीय-समाज में कई एक लोग बिना कोई कुंडली-नक्षत्र मिलाए रिश्ता कर लेते हैं। वे आचरण की दृष्टि से भी बहुत अच्छे नहीं होते। लेकिन अपनी पूरी उम्र करते हैं। आख़िर क्या है इसके पीछे..?”

लोगों द्वारा ऐसे आंकलन करना परिस्थिति को गम्भीरता से न समझने जैसा है।

दरअसल,जीवन की खुशहाली के पीछे ‘मनुष्य’ के कर्म-संस्कारों द्वारा निर्मित “प्रारब्ध” का ही सारा खेल है।

इसलिए सवाल कुंडली व गुण-नक्षत्र मिलाने से कहीं अधिक अपने कर्म-संस्कारों का सही होना जरूरी है!! ये ही ‘किस्मत’ या ‘प्रारब्ध’ के आधार होते हैं। जिसमें कई एक जन्मों का लेखा-जोखा अंतर्निहित होता है। जो मनुष्य को जन्म-जन्मांतर तक पूरा करना ही होता है।

अब चलो ! इसे एक कहानी द्वारा समझने की कोशिश करते हैं..

एकबार दो पति-पत्नी अपनी गाड़ी से अपने एक अज़ीज मित्र के घर दावत पर जा रहे थे। जब वे एक गांव से गुज़रे, अचानक अमुक व्यक्ति की पत्नी की नज़र दो महिलाओं पर पड़ी जो अपने घर के सामने वाले अहाते में एक युवक को बड़े प्यार से नहला रही थीं।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं जो पति-पत्नी निमंत्रण में जा रहे थे। उनमें से कार चलाने वाले व्यक्ति की पत्नी में ईश्वर-प्रदत्त एक विशेष गुण था, दूसरे उसकी कुंडली भी जागृत थी। जिससे वह भविष्य में घटने वाली घटनाओं को अपनी अंतर्दृष्टि से पूर्व में ही भांप लिया करती थी।

कार में बैठी महिला को दुनियाँ में घटित किस्मत के ‘निराले खेलों को देख अचानक ‘हंसी’ आ जाती है।.

क्योंकि अपने सामने वह एक मंजर देख रही थी, कि एक व्यक्ति की बहन पानी डाल रही है,और उसकी पत्नी पीठ रगड़-रगड़कर नहला रही है। अतः संस्कारों के ताने बाने में उलझे वे लोग निकट भविष्य में उनके भी संबंधी बनने वाले थे। इस समीकरण को समझते ही उस महिला को हँसी आ गयी..गाड़ी का शीशा खुला था, तो संयोगवश नहाने वाले युवक ने भी समझ लिया कि वह महिला उस पर ही हँस रही है।

उसने तत्काल कार चालक को रुकने के लिए कहा.. वे रुक गए तब उनसे इस तरह हंसने का कारण जानना चाहा, तो उस महिला ने चुटकी लेते हुए उस नहाने वाले युवक से फ्रैंकली कहा..कि, क्यों भई क्यों..? क्या आपके घर के सामने से हंसकर गुज़रना मना है। जो मैं तुम्हें अपने हंसने का कारण बता दूँ..

दूसरी बात..क्या आप मुझे इस बात के लिए आश्वस्त कर पाएंगे कि जो मैं तुम्हें बताऊंगी उसे सुनने के बाद तुम अपना धैर्य नहीं खोओगे, तो चलो मैं बता भी दूँगी।

दरअसल मेरी हंसी का कारण जानने से पहले हर व्यक्ति अपने सब्र से पूछें कि, उनकी और उनके सब्र (धैर्य) की कैसी बनती है..?

क्या उनमें परमसत्ता की निर्धारित-व्यवस्था के अंतर्गत घटने वाली घटनाओं को सहने की सामर्थ्य है…???

यदि हां! ,तो फिर वे अधीर क्यों हैं..?

धैर्यपूर्वक रहें .. वक़्त आने पर उनके ही कर्म-संस्कारों से लिखी गयी ‘किस्मत’ की स्क्रिप्ट सामने आ ही जायेगी।

दूसरे, किसी बात को वक़्त से पूर्व बता देने से ‘घटना’ की अहमियत कम हो जाती है। जो संसार की निर्धारण-व्यवस्था के विरुद्ध भी है।

इस पर नहाने वाले युवक ने विनम्रता पूर्व कहा, हे! देवी यदि आपको कोई तकल्लुफ़ न हो,तो कृपया मैं पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ..आपकी ‘हँसी’ के रहस्य को जानने की इच्छा रखता हूँ। कृपया बता दीजिये👍

उस महिला ने कहा, चलो, मैं बता ही देती हूँ….लेकिन अपना धैर्य मत खोइयेगा!..आप और खासकर मेरे पतिदेव दोनों इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे!! 👍

सुनो! इस वक़्त मेरी ‘अंतर्दृष्टि’ कहती है.. अब से तकरीबन छह महीने बाद मैं एक स्वस्थ और सुंदर पुत्र को जन्म दूँगी.. तब कुआं-पूजन की रश्म के वक्त बैल के सींग के प्रहार से मेरी मौत हो जाएगी..वहां से पांच किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में घना जंगल है। वहां एक हिरनी के गर्भ से एक अदभुत बच्चे के रूप में मेरा पुनर्जन्म होगा। उसके ठीक छह महीने बाद दो कसाई मुझे, यानी उस हिरनी के बच्चे को पकड़कर ले जाएंगे..

आप यदि खुद को सामर्थ्यवान समझते हो, तो आप बचाने का प्रयास करके देख लीजियेगा।

मग़र ‘जीव’ के पूर्व-कर्म संस्कारों पर आधारित ‘नियति’ में जो निर्धारित है। परिस्थितिवश होता वही है।” लेकिन फिर भी फ़र्ज कहता है.. इंसान को अपनी सामर्थ्य के मुताबिक सूझ-बूझ से बेहतर से बेहतर ‘प्रयास’ कर ही लेने चाहिए👍

उस महिला ने नहाने वाले युवक की ओर मुखातिब होते हुए फिर कहा, ” हिरनी के बच्चे के रूप में मरने के बाद मेरा पुनर्जन्म, आपकी बेटी के रूप में, ‘कन्या’ का होगा।

जब वह बड़ी होगी.. तो तुम अपनी बेटी के लिए वर ढूढ़ने निकलोगे.. संयोगवश उसी बिन माँ के बच्चे के साथ रिश्ता तय करके आओगे..जिसे मैं कुआं पूजन के वक्त बैल द्वारा सींग के प्रहार से मरकर अकेला ‘बिन माँ का’ बच्चा छोड़कर आई होऊंगीं.. अर्थात भौतिक दृष्टि से देखा जाय..तो पूर्व में जन्मे मेरे अपने बेटे से ये ‘किस्मत’ के ‘निराले-खेल’ मेरी शादी तक करवा देंगे।

आपको देखते ही ये सब सोचकर मेरी “हँसी निकल पड़ी..अब इसमें मेरी ‘हँसी’ क्या दोष है..? इस दुनियाँ में ‘किस्मत के खेल’ ही जो ‘निराले’ हैं।

मृत्युलोक में गम्भीर से गम्भीर चोट का मरहम केवल ‘धैर्य व वक़्त’ के ही पास है।

‘धैर्य’ और ‘सयंम’ ही प्रत्येक ‘जीव’ का अधिकार है।

इसलिए विकट परिस्थितियों में भी हम ‘धैर्य’ और ‘सयंम’ को नहीं खो सकते।

पूर्व घटनाएं साक्षी हैं जिसने भी धैर्य खोया है स्थितियां और बदत्तर हुई हैं।

यहां मेरा अपना अनुभव कहता है,कि हमें भविष्य के प्रति आशान्वित रहते हुए.. सदैव अपना ‘धैर्य’ व ‘संयम’ बनाये रखना चाहिए।

विचारक ; युग

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