174-Paying Guest..

आप भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं..क्या..?

उदाहरण के तौर पर..

” परम् सत्ता की पूर्व निर्धारित-व्यवस्था के अंतर्गत हम सब इस संसार में एक नियत समय के लिए सिर्फ ‘पेइंग गेस्ट’ अर्थात किरायेदार की हैसियत से हैं।”

आप भी ऐसा ही मानते हैं क्या.. ? अगर नहीं तो ज़रा सोचिए!!

“जब कभी आपके ऑफिस की कोई कुर्सी टूट जाती है, तो आपको उतना कष्ट नहीं होता, जितना कि,अपने घर की कुर्सी टूट जाने, पर होता है।” क्यों..?

विचारणीय है ..

“क्योंकि व्यक्ति को जो कष्ट होता है, वह किसी वस्तु या व्यक्ति के अपने पास से हट जाने का नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे उसके साथ रहने से जो मुहब्बत या लगाव हो जाता है। कष्ट की असल बजह वो होती है।”

आप जानते हैं कि, हमारे अपने ऑफिस की कुर्सी के साथ स्वामित्व या एक मालिक वाला वो संबंध नहीं जुड़ पाता, जितना कि अपने घर की कुर्सी के साथ जुड़ जाता है। ये स्वतः प्रक्रिया..है। घर की कुर्सी के हम मालिक हैं..वह हमारी संपत्ति है। ऐसा हमने मान लिया है।

अब इसे ज़रा अध्यात्म के नज़रिए से देखिए!! ….

“यदि हम अपने आपको शरीर का मालिक समझते हैं, तो इस शरीर के रोगी होने पर, चोट लगने पर, अथवा अन्य किसी प्रकार की कोई भी हानि होने पर, या हानि होने की संभावना पर भी, हमको अनेक प्रकार की चिंताएं सताने लग जाती हैं।, हमारा बी पी बढ़ जाता है,”

कि “कहीं ऐसा न हो..कहीं वैसा न हो..? वगैरा.. वगैरा..

मेरे विचार से इस भाव में जीना शायद कहीं बेहतर होगा.. कि, आपके पास ये ईश्वर-प्रदत्त शरीर उसकी धरोहर है। इसलिए न केवल कभी भी इसका दुरुपयोग हो.. वल्कि इसे पूर्णत: उसीको समर्पित करते हुए.. जैसे ”मैं एक आत्मा हूँ जो एक नियत वक़्त के लिए इस शरीर में महज़ एक “किराएदार” की हैसियत से हूँ।” मेरे विचार से इस भाव में ..जीवन की तश्वीर ही कुछ और होगी।

यदि हम ऐसा ‘भाव’ बना पाए और दुनियाँ में वैसा आचरण कर पाएं, तो हमको कभी चिंता,तनाव व अहंकार आदि नहीं होगा।

दूसरे हम अपने शरीर की सुरक्षा करते हुए.. सही दिशा में इसका सद्पयोग भी कर पाएंगे। तथा कोई परेशानी आने की स्थिति में हम शायद तनाव से उतने ग्रस्त नहीं होंगे जितने कि सामान्यतः होते हैं।

जैसे हम ऑफिस की कुर्सी की सुरक्षा का ख्याल करते हुए उसे उपयोग में लेते हैं।

परंतु फिर भी किसी कारण से यदि वह डैमेज जाती है, तो

हम बहुत ज्यादा परेशान नहीं होते,शायद एकदम से तनाव ..में तो नहीं आते।

“यदि ऐसा भाव हम अपने शरीर के साथ भी बनाएं तो शायद ‘जीवन’ को सामान्य से असामान्य होने में वक़्त नहीं लगेगा।”

ये शरीर ईश्वर-प्रदत्त है। सदैव इस भाव के साथ इसका उचित तरीके से उपयोग करें।

हम ऐसा सोचें कि, ये ‘जीवात्मा’ हमारे संचित कर्मों पर आधारित प्रारब्ध के अनुरूप अपना नियत-वक़्त लेकर इस शरीर में महज़ एक किराएदार की तरह है, तो जाहिर सी बात है एक न एक दिन उसे जाना तो होगा ही।

जब हम अपने अंतःकरण में इस “शाश्वत-सत्य” को बिठा लेंगे,तो

ऐसा भाव रखने वालों के साथ..बाई द वे किन्हीं परिस्थितियों वश अपने किसी प्रिय साथी के ‘स्थूल-शरीर’ की हानि होने से भौतिक दूरी बन भी जाती है, तो उससे कोई बहुत अधिक फ़र्क नहीं पड़ेगा ..!!

स्थूल में रहें न रहें.. ऐसे लोगों में आपसी “भावनात्मक-एकत्व” था। वही उन्हें सदैव एक दूसरे के साथ ही रखता है। अर्थात वे कभी अकेलापन महसूस नहीं करते।हालाँकि इस परिस्थिति को फेस करने का मेरा अनुभव अभी बहुत ज्यादा तो नहीं है मग़र मैं इतना कह सकता हूँ कि अपने किसी प्रियजन के स्थूल-शरीर की ‘दूरी’..तो भावनात्मक रूप से और अधिक नजदीकियां पैदा कर देती है। इसलिए दुःखी होने का सवाल यहाँ खत्म हो जाता है।

दूसरे

“जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए..”

वाले सन्देश को सहज स्वीकार लेना ही अब उनकी नियति है।

इस प्रकार की मनःस्थिति उन्हें सामान्य करने में काफ़ी सहायक होती है।👍

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