172- वक़्त

🙏🏽 “वक़्त”

अर्थात “समय”

जी,बिल्कुल समय का स्वभाव है सदैव अपनी गति से चलते रहने का.. जो सबके लिए अनुकरणीय है ..

सच,तो यही है जैसे “वक़्त” कभी भी ठहरता नहीं, ठीक वैसे ही हर जीवात्मा को धैर्य पूर्वक किसी स्थिति या फिर परिस्थिति में भी चलते रहना चाहिए।

शायद “चलते रहने..” का ही नाम “जीवन” है। ..चलते रहो..मगर हर सांस व हर कदम पर अपने इष्ट के नाम जप के साथ.. चलें।

सांस की बात करें,तो सामान्यतः व्यक्ति चौबीस घंटे में लगभग बीस हजार से पच्चीस हजार सांसें लेता है।

भौतिकवाद की चकाचौंध में भटके हुए बंदे नू संत लॉबी अपने प्रवचनों में अक्सर 24 घंटे में 21600 सांस खर्च हो जांदीए.. ऐसी चेतावनी वे देते रंहदे ऐं।

एक सुव्यवस्थित जीवन के लिए..हमेशा से हमारे शास्त्र भी इसी ओर संकेत करते रहे हैं।

वक़्त की प्रतिकूलता में हमें ‘धैर्य रखना चाहिए’, क्योंकि जीवन में आई प्रतिकूलता भी हमारे ही किन्हीं पूर्व कर्मों का परिणाम होती है।

और यदि जीवन में समय की अनुकूलता है, तो अपने पूर्व कर्म-संस्कारों के लिए परम सत्ता का आभार व्यक्त करते रहें.. ताकि अहंकार न पुष्ट हो सके।

मनुष्य अगर पारखी स्वभाव का है, तो वह ‘परछाई’ व ‘आईने’ से भी सीख ले सकता है।

क्योंकि ‘परछाई’ ही है जो मनुष्य का कभी साथ नही छोड़ती, और ‘आईना’ उससे कभी झूठ नहीं बोलता।

क्या आपको नहीं लगता कि, ‘धन’ की संपन्नता से ‘मन’ की संपन्नता (परिपक्वता) सदैव बेहतर सिद्ध हुई है।

शास्त्रों में ऐसे कई एक प्रसंग है जहां ‘धन’ की संपन्नता हुई है वहां ‘अहंकार’ पुष्ट होने से परिणाम में सब मटिया मैट हो गया है। जहां ‘मन’ की संपन्नता बरकार रही है वहां अच्छे ‘संस्कार’ विकसित होते रहने से व्यक्ति आध्यात्मिक जगत के उच्च पद को प्राप्त हुए है।

अभी सोलह फरवरी, 2022 की रात्रि को जब मैं अपनी कार से आगरा की ओर जा रहा था, तो कार ड्राइव करते ‘वक़्त’ मुझे कोहरे से एक सीख मिली..

कि, व्यक्ति को ‘कर्म-संस्कारों’ के वशीभूत कभी जीवन में भी ऐसे मंज़र से गुजरना पड़े..कि, कोहरे की तरह.. उसे कभी अपने निजी जीवन में आगे का रास्ता साफ नज़र न आये, तो उस वक्त बहुत दूर तक देखने की कोशिश न करके..धीरे धीरे एक एक कदम बड़ी सूझ-बूझ के साथ आगे बढ़ाते रहने से कई बार अड़चन भरे रास्ते भी सुगमता से खुलते चले जाते हैं।

लोग कहते हैं.. जिन पर “वक़्त” की मेहरबानी हो जाती है, कई बार बड़े-बड़े खतरों में से भी ‘जिन्दगी’ सुरक्षित निकल आती हैं, इसलिए हमें अपना आत्मविश्वास हमेशा बनाए रखना चाहिए। वक्त ही वो मरहम है जो मानव जीवन में आईं हुई असहनीय पीड़ा को भी मिटा देता है।

यहां महाभारत में वर्णित देवी कुन्ती का वह प्रसंग अनुकरणीय है.. युद्ध के उपरांत जब पांडवों को विजय श्री के साथ साथ हस्तनापुर का सारा राज्य प्राप्त हो जाता है तब श्री वासुदेव कृष्ण वहां से चलने लगते हैं, तो स्वाभाविक सी बात है.. कि जाने वाले की पीठ आपकी तरफ हो ही जायेगी। तब देवी कुन्ती ने कहा था.. प्रभु हमें कभी पीठ मत दीजिएगा..श्री कृष्ण ने कहा,” बुआ ये संसार का परम सत्य है.. सामान्यतः भौतिक सुख में इष्ट की विस्मृति हो ही जाती है। सामान्य जन को अजीब लगेगा परंतु इष्ट की निरंतर स्मृति तो सदैव दुःख में ही संभव है।

लेकिन दुःख को तो लोग किसी दूसरे की संपत्ति मानके बैठे हुए हैं न..? जबकि ये “दुःख” भी किसी और की नहीं इस मानव की ही संपत्ति है। जो उसके अपने ही कर्मों का परिणाम होता है।

आध्यात्मिक नजरिए से कई मायनों में दुःख..सदैव सुख से कहीं बेहतर सिद्ध हुआ है। मगर वह “दुःख” है, अतः सहज स्वीकार हो नही पाता..!!

बात हवा में नहीं कही जा रही है.. आप देख लीजिएगा.. स्थितप्रज्ञ योगियों ने जब जब इस “दुःख” को सहर्ष स्वीकार किया है,तो परिणाम में सदैव उच्च पदों को भी प्राप्त हुए हैं।

“भक्त माल” में अनेकों संतो के चरित्र इस बात के प्रमाण हैं। चाहे पूज्य मीरा जी,पूज्य सुदामा जी,पूज्य हनुमान प्रसाद पौदार उर्फ भाईजी महाराज, पूज्य राधा बाबा और वर्तमान में पूज्य श्री प्रेमानंद जी आदि के चरित्र.. देवी कुंती के “दुःख” मांगने की बात का समर्थन करते हैं। सच में ये “दुःख” ही जो मानव के चरित्र को निखारता है।

धन्यवाद

2 thoughts on “172- वक़्त”

  1. Exactly … असल में धैर्य ही मनुष्य की पूरी तरह पहुंच में है बाकी सब परमसत्ता के ही अनुसार होना संभव होता है (हमारी वैदिक वैचारिकी हमें यही बताती है )जिसमें हमारे वर्तमान जीवन के कर्म व पूर्व के प्रारब्ध की भी भागीदारी होती है । वर्तमान में हमको बस अपनी श्रद्धा, आस्था , समर्पण , साक्षी भाव को ही प्रबल रखना चाहिए , जिससे आत्मा और परमात्मा के बीच के उस अलौकिक संबंध को प्रगाढ़ता मिलती है और सब कुछ सर्वशक्तिमान के प्रति समर्पण का भाव आने के बाद स्वतः ही सुगम हो जाता है ऐसा मेरा मानना है ।
    जैसा मेरे पूज्य दादाजी अक्सर गाया करते थे “जा ही विधि राखै राम ताहि विधि रहिए ,सीता राम सीता राम सीता राम कहिए ”
    ॐ नमः शिवाय 🙏

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