163-मन-दर्पण

आपने देखा होगा कार ड्राइव करते वक़्त पीछे का दृश्य देखने के लिए कार में एक शीशा दिया होता है। चलने से पूर्व ड्राइवर उसे अपनी अनुकूलता से सैट कर लेता है।

ठीक उसी प्रकार आपका मन रूपी दर्पण भी वैसे ही है। समझदार लोग इसे भी संसार के दृश्य देखने के लिए अपनी अनुकूलता के अनुसार सैट कर लिया करते है।

मेरा ऐसा मानना है कि, संसार तो सबके लिए एक जैसा ही है। परन्तु हम मनुष्यों के सोचने का.. संसार की घटनाओं को देखने और समझने का जो दृष्टिकोण है वह “पर्सन टू पर्सन डिफ्फरेंसीएट” करता है।

अर्थात सब का नज़रिया अलग-अलग होता है। इसलिए किसी को संसार सुखदाई लगता है,तो किसी को दुखदाई।

ऐसा कौन है ..?

जो संसार में सुख से जीना नहीं चाहता..।

कॉमन सेंस की बात है….सभी चाहते हैं।

जिस प्रकार कार का ड्राइवर अपने हिसाब से शीशे को सेट कर लेता है, और उसे सड़क के पीछे का दृश्य ठीक प्रकार से दिखाई देने लग जाता है। वैसे ही हमको अपना ‘मन-दर्पण’ प्राकृतिक नियमों के अनुरूप सैट कर लेना चाहिए।

यदि आप अपने मन के दर्पण को उन प्रकृति के नियमों के अनुसार सेट कर पाए, तो आपको भी संसार उसी प्रकार दिखाई देगा, जैसा के संसार के अन्य सुखी लोगों को दिखाई देता है और आप भी आनंद से जी पाएंगे।”

“मेरे कहने का तात्पर्य यह विल्कुल भी नहीं है, कि संसार बदल जाएगा, या इसमें होने वाली घटनाएं अब होंगी नहीं, और संसार में शुभ ही शुभ होगा,

यहां मेरा आशय भी वही है जो महाकवि तुलसीदास, अपनी एक चौपाई के माध्यम से बहुत पहले कह गए हैं..

“जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।।

जिस दृष्टिकोण से आप संसार या संसार के व्यक्तियों व चीज़ो को देखोगे जाहिर सी बात है वे भी आपको वैसी ही दिखेंगी।

ईश्वर न सुख देता है न दुख, हमारी ‘कर्म-गति’ के अनुरूप “जीवन में होने वाली घटनाएं अच्छी भी होंगी, और बुरी भी। मनुष्य के जीवन में आने वाला सुख-दुख तो उसके कर्म-संस्कार की नियति है जिसका जिम्मेदार मनुष्य स्वयं ही है।

‘विजडम’ आने से आपके सोचने का ढंग ऐसा हो जाएगा जो प्रकृति के सास्वत नियमों के अनुरूप होगा,

आपका नजरिया ठीक होने से दुख आपको अधिक प्रभावित नहीं करेगा। ऐसा करने से आप कम से कम दुखी होंगे तो अधिक से अधिक सुखी जीवन जी पाएंगे।”

अब सवाल उठता कि हमें किस दृष्टिकोण से संसार को देखना होगा..? इस सवाल के जवाब में मेरा अनुभव कहता है कि, व्यक्ति, वस्तु, घटनाओं से ऊपर उठकर हमें ‘विचार’ के प्रति गम्भीर होने के साथ-साथ हमारा चिंतन भी सदैव “सकारात्मक” होना चाहिए।

पॉजिटिव-थिंकिंग रखते हुए हर चीज को गॉड-गिफ्टेड अपने कर्म-फल के रूप में स्वीकारते हुए प्रकृति की सास्वत-व्यवस्था से प्राप्त “हमें बहुत कुछ मिला है। हमें जितना मिला, वह काफी है। हमारे जीवन को ठीक-ठाक चलाने के लिए पर्याप्त है। इस भाव में रहना चाहिए।

और दूसरी बात — ” मानलो कुछ चीजें जो आपको आपकी इच्छा के अनुकूल, या अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाई, उनके बारे में भी निराशा धारण न करते हुए.. यही सोचेंगे, कि “कोई बात नहीं। अब नहीं मिला, तो आगे मिल जाएगा।

चलो उसके लिए और अधिक प्रयास करेंगे। शायद हमारे पुरुषार्थ में कहीं कमी रही होगी, इसीलिए वह वस्तु हमें प्राप्त नहीं हो सकी। हम अब और अधिक पुरुषार्थ करेंगे। सास्वत सत्ता की कृपा से भविष्य में वह वस्तु भी मिल जाएगी।” और यदि नहीं भी मिली, तो भी हम यही सोचेंगे, कि “कोई बात नहीं। संसार में ऐसे करोड़ों व्यक्ति हैं, जिनको ये सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं, जितनी सुविधाएं हमें आज प्राप्त हैं। हम उतने में ही संतोष कर लेंगे।” यदि हमारे चिंतन का स्तर ये होगा तो कभी दुःखी नहीं होंगे।

यदि आप इस ढंग से मन के अंदर विचारों से अपना “माइंड-सैट” कर लेंगे, तो आप कभी दुखी नहीं होंगे। सदा सुखी शांत प्रसन्न और आनंदित ही होंगे। कभी शिकायत नहीं करेंगे। ऐसा सोचने से “आपका संसार सुंदर एवं उत्तम होगा। आप सदा ईश्वर का और समाज के लोगों का धन्यवाद ही करेंगे। शायद यही सुख पूर्वक जीवन जीने का रहस्य है।”👍

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