सही और ग़लत की समझ मनुष्य-आत्माओं में शुरू से ही होती है.. जो कि ईश्वर-प्रदत्त है।
मग़र हम सबके सामने असल चुनौती, अपने ‘चंचल-मन’ को काबू में रखकर सदैव संयम के साथ ‘अनुशासन’ में रहने की होती है।
स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि, “शिक्षा का प्रथम पाठ ‘मन’ को अपने नियंत्रण में रखना है,न कि मन के बहकाने में आकर भटकाव मोड.. पर चले जाएं।”
ये सामान्य जन के लिए अंतरभेद की स्थिति होती है।
यदि आप इसे एक और नज़रिए से देख पाओ,तो दुनियाँ में स्वाभिमान से जीने के लिए “अनुशासन” एक ‘मूल-मंत्र’ भी हो सकता है।
ये जग ज़ाहिर है कि, जब, जब किसी देश,समाज,संस्था,परिवार या फिर व्यक्ति ने अपने आचरण में अनुशासन हीनता को जगह दी है.. उसका बंटाढार ही हुआ है।
क्योंकि किसी व्यक्ति,परिवार,समाज या फिर देश को सही व्यवस्था में लाने के लिए ‘अनुशासन’ को रीढ़ की हड्डी माना जाता है। जिस प्रकार रीढ़ की हड्डी के बिना मानव शरीर सीधे खड़ा नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही किसी भी कार्य, व्यक्ति या देश को वांछनीय व्यवस्था में लाने के लिए “अनुशासन” को ही सक्षम माना गया है।
इसीलिए अनुशासित होना नितान्त आवश्यक है।…
धन्यवाद👍
युग, पचहरा, नीमगाँव 🙏🌹 राधे गोविंद 🌹🙏
आप आदर्श हैं उन सभी के लिए जो आपके लिखे हुए ब्लॉग को पढ़ते हैं ।
इसी प्रकार आप आदर्श प्रस्तुत कर समाज में स्वयं के आत्म अवलोकन को प्रेरित करते हैं । धन्यवाद
LikeLike
मेरे ख़्याल से आदर्श कोई व्यक्ति नहीं होता हाँ व्यक्ति के आधार के कुछ मानक जरूर होते हैं..thanks for your great thought👍..
LikeLike