200 – ‘योग’..???

‘मृत्यु’ एक हकीकत है। इसमें कोई दोराय नहीं.. मगर भौतिक दृष्टि से ये सवाल भी अपने आप में अहम है.. “कि ‘योग’ बेचारा इन परिस्थितियों में करता ही क्या….???

चलो! थोड़ा आगे बढ़ते हैं। पढ़ने सुनने में तो लोगों को ये कहानी ही लगेगी विश्वास कीजिए इसमें किसी के जीवन की सच्चाई है..

एकबार की बात है.. ‘योग’ नामक युवक जिसकी गुणवान बीवी जो सूरत और सीरत दोनों से ही बहुत सुंदर थी। उनके प्यारे प्यारे दो बच्चे भी थे। योग ने अपने जीवन में संघर्ष करके.. शहर की पॉश कॉलोनी में अपने सपनों का एक छोटा सा घर भी बना लिया था। वह स्वभाव से गम्भीर तथा विचारशील व्यक्ति था। “योग” पत्नी के साथ साथ अपने परिवार में सभी से बेहद प्यार करता था।

ये अलग बात है कि योग को अपना प्यार व स्नेह जताना कभी आया नहीं।

इसके अलावा वह अपने इष्ट ‘श्याम जी’ का तो लगभग दीवाना था। और योग अपनी सामर्थ्य के मुताबिक संपर्क में आने वालों के प्रति अपने दिल में काफी दया भी रखता था। इसीलिए अपनी सामर्थ्य के अनुरूप उससे जो बन पड़ता,जरूरतमंदो के लिए चुपके से करता रहता।

अपने जानते उसने कभी किसी को कोई दुःख नहीं दिया। उसकी ऐसी विशेषताओं के कारण “श्यामजी” उससे बहुत प्रसन्न थे। वे सदैव उसके साथ हैं। विश्वास कीजिएगा इष्ट सदैव अपने भक्त के साथ ही होता है। कुछ भी करते कराते..सभी भक्तों के मन की आंखें हरपल अपने इष्ट में ही होती हैं। कभी आवश्यक होने पर मन ही मन उनके साथ बातें भी हो जाया करती हैं।

लेकिन इसके बावजूद योग ने व्यक्तिगत तौर पर कभी अपने श्यामजी से कुछ माँगा नहीं। अध्यात्म में इसी को निष्काम भक्ति कहा गया है।

योग स्वाभाविक रूप से अपनी कर्मशीलता में हमेशा खुश रहता। क्यूंकि वह सदैव अपने श्याम जी के साथ होने की अनुभूति में जो जीता है। कुल मिलाकर वह अपने जीवन से लगभग संतुष्ट था। विश्वास कीजिएगा योग अपने जीवन में होश संभालते ही श्यामजी के मार्गदर्शन से ही सब कुछ करता चला जा रहा था।

मगर वक्त ने ऐसी करवट बदली.. कि,बस कुछ मत पूछिए.. श्याम जी की अनन्य भक्त योग की कर्मशील पत्नी की अचानक दो एक बार तबियत क्या ख़राब हुई.. उन्हें हॉस्पिटलाइज होना पड़ा। आराम मिलने पर घर के लिए रिलीव भी होकर आईं।

लेकिन ‘ नियति ‘ के खेल बड़े निराले होते हैं।अधिकांश ऐसे सीन आखिर में ही कुछ कुछ समझ आते हैं.. उस वक्त न जाने क्यों हिय माथे की सब फूट जाती हैं।

विडंबना देखिए! डॉक्टर्स उनकी बीमारी को ठीक से डाईग्नोस ही नहीं कर सके, तो वे इलाज क्या खाक करते…

योग ने अपनी ‘जिंदगी’ को बचाने के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अपनी पूरी ताकत लगा कर देख ली।

लेकिन स्थानीय पैथोलॉजी की गलत रिपोर्ट्स पर चलते ट्रीटमेंट से कोई लाभ न मिल पाने से कुछ एक पारिवारिक सदस्यों का दवाब..,बना। वहीं कुछ रिश्तेदारों के सुझाव .. ,

अनभिज्ञ डॉक्टर्स का परामर्श आदि। परिस्थितियों वश ‘किंकर्तव्यविमूढ’ ‘योग’ आनन फानन में अपने दोनों बच्चों को साथ लेकर हर कीमत पर अपनी जिन्दगी को बचाने की दिल में उम्मीद लिए बड़े शहर में बड़े हॉस्पिटल्स की बड़ी बड़ी सुविधाओं..की ओर चल पड़ा..(आज उसे ऐसा लगता है कि, कृत्रिम ऑक्सीजन की अती..ने उसकी जिंदगी को निगल लिया।)

नियति के खेल देखिए.. वहां के डॉक्टर्स अच्छी खासी लूट करते करते भी तसल्ली के बजाय योग का दिल बैठाने की बातें एकबार नहीं बार बार कहते रहे..कि, वो उनके स्वास्थ्य के संबंध में “अभी भी कुछ नहीं कह सकते!! आप रुपए पैसे का इंतजाम कर लीजिएगा..पता नहीं इन्हें यहां कब तक रखना पड़े। यदि इस पर योग कुछ बोलने को होता, तो डॉक्टर्स तपाक से कह देते..कि हम और आप अभी यहां बात कर रहे हैं। क्या पता उधर वो निकल लें…”बगेरा..बगेरा.. अब बताइए.. ‘योग’ क्या कर सकता था..??’

क्योंकि ऑपरेटेड पेशेंट को कोई दूसरा हॉस्पिटल आसानी से लेता कब है??

हॉस्पिटल में मिलने आने वाले सभी लोगों ने यहीं इलाज होते रहने.. की बात के साथ साथ योग से भगवान् पर भरोसा रखने की तसल्ली के लिए ही बोला। लेकिन इलाज कहां वहां तो उनकी हर सांस पर लुटाई चल रही थी। तभी योग को अपने श्याम जी का ख्याल आया..सौभाग्य से हॉस्पिटल के बराबर में बने ‘श्यामजी’ के प्राचीन मंदिर पर जाकर उसने श्याम जी को पुकारा.. यद्यपि लौकिक लोग भक्ति भाव की इन अलौकिक बातों पर विश्वास नहीं कर सकते…

मगर योग के मन मंदिर में तुरंत श्याम जी दौड़े चले आए। योग ने कहा हे सखा! तुम्हें तो लोग भगवान कहते हैं मेरी ‘जिंदगी’ बहुत परेशान है। प्लीज उसे बचा लो। श्यामजी बोले – जिंदगी बचाना तो मेरे भी हाथ में नहीं हैं।

“हानि,लाभ,जीवन,मरण,यश, अपयश” ये सब विधि का विधान होते है। जो प्रारब्ध के अधीन पहले ही नियत हो जाते हैं ये सुनकर योग श्यामजी से नाराज हो गया।

यही सांसारिकता है। क्योंकि जब इंसान पर विकट परिस्थितियां आती हैं, तो उस वक्त उसका अध्यात्म शून्य हो जाता है। और भौतिकता हावी हो जाती है।

इसीलिए योग लड़ने लगा, गुस्से में उन्हें कौसने भी लगा। परम सत्ता ने उसे बहुत समझ देने की कोशिश की, लेकिन जिसकी दुनियां लूट रही होती है उसे कुछ समझ नहीं आता।

तब श्याम जी ने उससे कहा – चलो!, मेरी एक बात सुनो! मैं तेरी एक मदद कर सकता हूँ। लेकिन इसके लिए तुझे एक काम करना होगा। योग ने तुरंत पूछा कैसा काम ?

तुम्हे ! किसी ऐसे परिवार से एक मुट्ठी ज्वार लानी होगी। जिस घर में कभी कोई मौत न हुई हो।

बेचारा योग आवेश में झट से हाँ बोल दिया..और ज्वार की तलाश में निकल पड़ा। उसने कई दरवाजे खटखटायें। हर घर में ज्वार तो मिलती लेकिन ऐसा कोई नहीं होता जिनके परिवार में किसी की मृत्यु ना हुई हो। किसी का पिता, किसी का दादा, किसी का भाई, माँ, काकी या बहन आदि.. दो दिन तक भटकने के बाद भी योग को ऐसा एक भी घर नहीं मिला।

तब थक हार जाने व कुछ वक्त बीत जाने के बाद उसे इस बात का अहसास हुआ कि मृत्यु एक अटल सत्य हैं। जो बहुत कॉमन है। इसका सामना सभी को करना ही होता है। इससे कोई नहीं भाग सकता। तब फिर अपने व्यवहार के लिए वह अपने सखा श्याम जी से क्षमा मांगता हैं और निर्णय लेता है जब तक वह खुद जीवित है तब तक वह अपनी गुणवान पत्नी की हर उचित बात को ध्यान करके उनकी यादों को अपनी ताकत बनाएगा और दिन प्रति दिन आगे बढ़ता रहेगा। खुद से भी अधिक सदैव उस देवी के बच्चों का ख्याल रखेगा।

दरअसल, पत्नी जो इंसान की ‘जिंदगी’ का पर्याय होती है। उसके लिए इससे उचित विनयांजली व श्रद्धांजली और क्या हो सकती है।

दोस्तों ! इसी प्रकार हम सबको ये सच स्वीकार कर ही लेना चाहिये कि, “मृत्यु एक अटल सत्य हैं ” उसे स्वीकार न करना मुर्खता हैं। दुःख होता है। लेकिन उस दुःख के जाल में फँसे रहना तो बहुत ही गलत है। क्योंकि केवल आप ही उस दुःख से पीड़ित नहीं हैं। अपितु सम्पूर्ण मानव जाति देर सबेर उस दुःख से रूबरू होती ही है। क्योंकि “मृत्यु एक हकीकत है” इस सच को स्वीकार करके आगे बढ़ना .. ही असल “जीवन” हैं।

कई बार हम अपने किसी खास के चले जाने से इतने बेबस हो जाते हैं कि, सामने खड़ा जीवन और उससे जुड़े लोग उस वक्त हमें बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ते। ऐसे अंधकार से निकलना मुश्किल तो है मगर नामुमकिन नहीं।

जो मनुष्य मृत्यु के सत्य को स्वीकार कर लेता है। उसका जीवन भार विहीन हो जाता हैं और उसे कभी कोई कष्ट तोड़ नहीं पाता। वो जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ता चला जाता हैं।

मित्रो! सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है,दरअसल, वही पर्याप्त होता है।।

पचहरा सर नीमगाँव से 🙏

199-Noble-Family

Really ‘Tata-Family’ is ‘Noble- family’ in all-over the Country.

(Bringing a less known noble act)

The woman in the picture wearing a large diamond around her neck.

This is 254 carat “Jubilee Diamond”, double the weight of “Koh-e-Noor” diamond in size and weight.

Her husband presented this on a marriage anniversary. The lady is ‘Mehrbai Tata’, wife of Jamshedji Tata’s elder son Sir Dorabji Tata.

In 1924 when there was recession in the world and the Tata company (TISCO) did not have money to pay employees, lady Mehrbai mortgaged this precious Jubilee Diamond to the Imperial Bank for Rs1crore so that employees continue to get salary and the company continues to run.

After her untimely death from blood cancer, Sir Dorabji Tata established Tata Memorial Cancer Research Foundation by selling this diamond for better treatment of cancer patients in India.

Many people are not even aware of the history of what gives us life!

The irony is, glorifying the Taj Mahal as a love monument.

I Salute to Noble members of TATA families…

198-सत्य की ओर..पार्ट-2

“ढोल,गंवार,क्षुब्ध पशु, रारी..” का पार्ट 2 यदि ऐसा ही होता तो.. भील शबरी के जूठे बेर को भगवान द्वारा खाये जाने का वह चाहते तो लेखन न करते।

यदि ऐसा होता तो केवट को गले लगाने का महिमा मंडन भी न करते।

स्वामी जी के अनुसार.. ये चौपाई सही रूप में – ढोल,गवार, शूद्र,पशु, नारी नहीं है बल्कि यह “ढोल,गवार,क्षुब्ध पशु,रारी” है।

ढोल = बेसुरा ढोलक गवार = गवांर व्यक्ति क्षुब्ध पशु = आवारा पशु जो लोगो को कष्ट देते हैं रार = कलह करने वाले लोग

चौपाई का सही अर्थ है कि जिस तरह बेसुरा ढोलक, अनावश्यक ऊल जलूल बोलने वाला गवांर व्यक्ति, आवारा घूम कर लोगों की हानि पहुँचाने वाले.. (अर्थात क्षुब्ध, दुखी करने वाले पशु और रार अर्थात कलह करने वाले लोग जिस तरह दण्ड के अधिकारी हैं.! उसी तरह मैं भी तीन दिन से आपका मार्ग अवरुद्ध करने के कारण दण्ड दिये जाने योग्य हूँ।

स्वामी राम भद्राचार्य जी के अनुसार श्रीरामचरितमानस की मूल चौपाई इस तरह है और इसमें ‘क्षुब्ध’ के स्थान पर ‘शूद्र’ कर दिया और ‘रारी’ के स्थान पर ‘नारी’ कर दिया गया है। भ्रमवश या भारतीय समाज को तोड़ने के लिये जानबूझ कर जो भी है गलत है। जिस तरह से ये प्रकाशित किया जाता रहा है।

इसी उद्देश्य के लिये उन्होंने अपने स्वयं के द्वारा शुद्ध की गई अलग रामचरित मानस प्रकाशित कर दी है।रामभद्राचार्य कहते हैं। धार्मिक ग्रंथो को आधार बनाकर गलत व्याख्या करके जो लोग हिन्दू समाज को तोड़ने का काम कर रहे है उन्हें सफल नहीं होने दिया जायेगा।

आप सबसे से निवेदन है , इस लेख को अधिक से अधिक share करें। और तुलसीदास जी की चौपाई का सही अर्थ लोगो तक पहुंचायें हिन्दू समाज को टूटने से बचाएं, हमारे धर्म को तोड़ने में तथाकथित हमारे धर्म के ही लोग है अन्य किसी में इतनी हिम्मत नही,जो हमें मिटा दे।👍

“वसुधैव कुटुम्ब कम”

पचहरा सर 🙏

197-सत्य की ओर पार्ट 1

एक कदम सत्य की ओर..

आओ चलें इस तथ्य को जानने का प्रयास करते हैं..जिसे एक लंबे अर्से से भारतीय समाज के समक्ष तोड़-मरोड़ कर परोसा जाता रहा.. है।

छेड़छाड़ करने वालों ने इतिहास तो इतिहास भारतीय ग्रंथों को भी अपनी छेड़छाड़ से अछूता नहीं रखा !!!

देखिए एक सामान्य सी बात है जहां एक ओर किसी का महिमामंडन हो रहा हो वहीं फिर दूसरी ओर तिरस्कार किया जाना, गले से नहीं उतरता।अर्थात विश्वास नहीं होता!!

एक दिन काफ़ी लोकप्रिय मैग्जीन में एक प्रसंग पढ़ने को मिला जिसे मैं आज आपके साथ साझा कर रहा हूँ:-

(जैसा मिला वैसा ही “As it is” शेयर कर रहा है)

❌ “ढोल, गवार, शूद्र, पशु, नारी.!”~❌

आज तक इसे गलत प्रचारित किया गया है

सही शब्द हैं ✅

👇🏿 “ढोल, गवार, क्षुब्ध पशु, रारी, सकल ताड़ना के अधिकारी!!”

श्रीरामचरितमानस मे, “शूद्रों और नारी” का अपमान कहीं भी नहीं है।

भारत के राजनैतिक शूद्रों को पिछले 450 वर्षों में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हिंदू महाग्रंथ ‘श्रीरामचरितमानस’ की कुल 10902 चौपाईयों में से आज तक मात्र एक ही ऐसी चौपाई पढ़ने में आई है, जो अपने तथ्य पर सत्य नहीं है।

और वह अंश है..जब भगवान श्री राम का मार्ग रोकने वाले समुद्र द्वारा भय वश किया गया अनुनय-विनय..

जो कि सुंदर कांड में 58 वें दोहे की छठी चौपाई है ..

“ढोल, गँवार, क्षुब्ध, पशु नारी.! सकल ताड़ना के अधिकारी”

इस सन्दर्भ में चित्रकूट में मौजूद तुलसीदास धाम के पीठाधीश्वर और विकलांग विश्वविद्यालय के कुलाधिपति “श्री राम भद्राचार्य जी” जो नेत्रहीन होने के बावजूद ‘संस्कृत, व्याकरण, सांख्य, न्याय, वेदांत,’ में इन पाँचों में कई एक बार GOLD Medal जीत चुकें हैं।

श्री राम भद्राचार्य जी का कहना है कि बाजार में प्रचलित रामचरितमानस में तीन हजार से भी अधिक स्थानों पर अशुद्धियां हैं जिन्हें सुधारने की आवश्यकता है।”.. उन्ही अशुद्धियों में से एक ये चौपाई भी है जिसे अशुद्ध तरीके से प्रचारित किया जा रहा है। उनका कथन है कि.. हम सभी अच्छी तरह जानते हैं तुलसीदास दुष्प्रचारक नहीं थे, विचार करें..

यदि तुलसीदास जी की मंशा सच में ‘शूद्रों और नारी’ को प्रताड़ित करने की रही होती, तो क्या रामचरित् मानस की 10902 चौपाईयों मे से इस एक चौपाई में ही वह ऐसी ओच्छी बात करते..? मुझे तो ये सम्भव नहीं लगता!!

आगे का शेष प्रकरण भी बहुत शीघ्र.. पार्ट 2 में पब्लिश किया जायेगा👍

196-ओह! ये ठंड!

If you like to see it in comparatively..the old leaders & today’s leaders, you would understand..the character of today’s leaders well..

आज के नेताओं की बिना ‘सिर-पैर’ की बातें जिन्हें लोग “राजनीति” समझते हैं..वह राज्य चलाने की नीति नहीं ये तो इन वाहियात नेताओं की उच्छ्रंखलता है। इसे हम आजकल पड़ रही ठंड को चित्रांकित करते हुए एक व्यंग्य के द्वारा इनके स्तर को रेखांकित करने का प्रयास.. करते हैं।

“ओह! ये ठंड!”

महज़ एक व्यंग

😜😜

देश भर में पड़ रही, कंपकपाती ठण्ड पर विभिन्न दलों के आजकल के नेताओं के चरित्र को देखते हुए राय कुछ इस प्रकार हो सकती हैं।🤣🤣

भाजपा:- ये कंपकपाती ठण्ड “सबका साथ, सबका विकास” का बहुत अद्भुत उदाहरण हैं। ये ठण्ड किसी जाति, धर्म का भेदभाव किए बिना सभी पर समान रूप से पड़ रही हैं। हम इस सद्भावनापूर्ण ठण्ड का स्वागत करते हैं। ये ठंड मोदी सरकार के अथक प्रयासों की देन है।

कांग्रेस:- ऐसा नही हैं कि, ये ठण्ड हमारी सरकार में नही पड़ती थी, पड़ती थी किन्तु ऐसी भेदभावपूर्ण, विद्वेषपूर्ण ठण्ड आज से पहले कभी नही पड़ी। हम मोदी सरकार से पूछना चाहते हैं..अल्पसंख्यक इलाकों में ही अधिक ठण्ड क्यों पड़ रही हैं?..लोकतंत्र में इतनी ठण्ड बर्दाश्त नही की जा सकती। हम संसद में इस कंपकपाती ठण्ड पर एक बहस चाहते हैं।

केजरीवाल:- हम पूछना चाहते हैं, मोदी जी से.. आखिर लोकसभा चुनाव 2024, के ऐनवक्त पहले ही इतनी ठण्ड क्यों पड़ वाई जा रही है?… पिछले सीज़न में इतनी ठण्ड क्यों नही पड़वाई थी..?.. मोदी सरकार अधिक ठण्ड पड़वाकर वोटरों को डराना चाह रही हैं। ये मौसम और मोदी जी आपस में मिले हुए हैं। हम विधानसभा का विशेष सत्र बुलवाकर इस षड्यंत्र का पर्दाफाश करेंगे। 🤣🤣

मायावती:- इतनी ठण्ड भीम क्षेत्रों में ही क्यों पड़ रही हैं?.. ये मनुवादी ठण्ड है। ये ठण्ड असंवैधानिक हैं। ये ठण्ड संविधान के खिलाफ है। हम इस ठिठुरती ठण्ड के खिलाफ राष्ट्रपति जी को ज्ञापन सौंपेंगे।

ममता:- हम पूछना चाहता हाय! दिसंबर जनवरी में ही इतोना थोण्ड क्यों..?.. दिवाली पोर क्यों नही?.. ओल्पसंख्यक इलाका में ही इतना थोण्ड क्यों?.. ये थोण्ड सोम्प्रदायीक थोण्ड हाय.. ये थोण्ड सेक्युरिज्म का खिलाफ हाय.. हम इस थोण्ड का बोंगाल में पड़ने पर प्रोतिबन्ध लोगाता हाय.. हम सोमस्त सेक्युलर ताकतों से ओपील कोरता हाय.. इस सोम्प्रदायीक थोण्ड का खिलाफ इकोट्ठा हो। का का छि छि… का का छि छि..

ओबेसी:- संविधान में ये कही नही लिखा, इतनी कंपकपाती ठण्ड पड़नी चाहिए। ये सरकार संविधान के खिलाफ काम कर रही हैं। अगर कोई मेरी गर्दन पर ” बर्फ की सिल्ला” भी रख दे, तो भी मैं गर्म कपड़े नही पहनूंगा। हम इस हिटलर ठण्ड की मज़म्मत करते हैं। घोर विरोध करते हैं।

वामपंथी:- ये ‘ठण्ड’ न चीन में पड़ रही हैं, न रूस में। अतः हमारा इससे कोई लेना-देना नही हैं। और अंत मे,

रविश कुमार:- क्या मोदी सरकार केंद्र के चुनाव चुनाव के ऐनवक्त पहले ऐसी ठण्ड पड़वाकर चुनाव जीतना चाहती है..? पूरे देश मे एक जैसी ठण्ड न पड़वाकर क्या मोदी सरकार देश को बांटना चाह रही हैं?.. क्या सरकार इतनी ठण्ड पड़वाकर बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, CAA से देश का ध्यान भटकाना चाहती हैं?.

. ☺️😊 जवाब दे मोदी सरकार…☺️😊

व्यंग सटीक हो, तो लेख के अंत में दिए गए ‘लाइक ऑप्शन’ पर क्लिक करके आप चाहें,तो एक like भी दे सकते हैं।👍

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा

195-मानसिक-ग़ुलामी

देखिए! कैसी विडंबना है!! हम पर अंग्रेजियत किस क़दर हावी है..

इसे हम भारतीयों की मानसिकता से अच्छी तरह समझा जा सकता है।

अंग्रेजी ‘नववर्ष’ आने के दो एक दिन पूर्व से ही हम भारतीय-नागरिकों के दिलो-दिमांग पर किसी संक्रामक बीमारी की तरह ‘हैप्पी न्यू ईयर’ मनाने और बोलने का एक पागलपन सा सवार हो जाता है। जिससे ‘मानसिक-गुलामी’ की बू आती है। लानत है हमारे शिक्षित होने पर..?

जैसे ; हर वर्ष हिंदी कलेंडर के अनुसार वीर विक्रमी ‘नव संवत्सर’ आता है मगर हममें से कितने लोग हैं जो उसका जश्न मनाते हैं..?? उसके प्रति उनकी उदासीनता और अनभिज्ञता को देखते हुए अगर उसे ‘गुलामी’ की मानसिकता न कहें, तो आप ही बताओ क्या कहें..??

जब श्री मुरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने तो उन्हें एक जनवरी के दिन पत्र द्वारा नववर्ष का पहला शुभकामना संदेश प्राप्त हुआ, तो उन्होंने उसके प्रतिउत्तर में लिखा कि,

” मेरे देश का सम्मान तो ‘वीर विक्रमी नवसंवत्सर’ मनाने में है। मैं उसी को मनाता हूँ.. ये एक जनवरी वाला नवबर्ष तो पराधीनता की याद दिलाता है इसलिए मैं इसे नहीं मना सकता।” मगर सवाल यहां भी है कि हम कितने लोग हैं जो संवत लिखते हैं..?? डालनी तो सन के अनुरूप तारीख ही पड़ती है। क्योंकि प्रचलन में तो हर स्तर पर वह जीसस क्राइस्ट वाला सन ही हैं न..?? ये भी एक मानसिक गुलामी का ही सूचक है कि व्यवहारिक तौर पर देश के सरकारी विभागों आदि में विक्रम संवत प्रचलन तक में नहीं आ सका है..??

स्वामी विवेकानन्द जी ने हमारे देश की शिक्षा-पध्दति और पढ़ाने के तौर-तरीकों को पूरी तरह से ग़लत बताया है। ये तो आप भी जानते हैं जो शिक्षा-व्यवस्था भारत देश में लागू है वह आज से नहीं,1847 से लागू है जिसे अंग्रेजों ने शुरू किया था। जब हम उनके गुलाम थे। जिसमें माध्यमिक स्तर तक का पाठ्यक्रम बच्चों को केवल क्लेरिकल के लिए तैयार करना था। जिससे यदि भारतीय पढ़ जाएं, तो भी सिर्फ क्लर्क बनकर हमारी जी हुजूरी ही करते रहें और हमें ‘Yes Sir’-‘Yes Sir’ बोलते रहें बस। इस ‘एजुकेशन-सिस्टम’ का कोई और मक़सद नहीं था।

यदि विश्वास न हो पा रहा हो तो आप धरातल पर देख लीजियेगा।

माध्यमिक-स्तर तक शिक्षित होने के बाद भी भारत के बच्चे वो भी केवल सम्पन्न-परिवारों के अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपना कैरियर-सेटल करने की तैयारी के लिए देश के प्राइवेट संस्थानों में चल रही कोचिंग्स में जाने के लिए बाध्य होते हैं। तब कहीं जाकर बड़ी मेहनत से अपने आप को कहीं सेटल कर पाते हैं। जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे इस ‘रॉंग-एजुकेशन-सिस्टम’ की बलि चढ़ कर फैक्ट्री,कारखानों, ठेला लगाने या मजदूरी करने को मजबूर होते हैं। मगर भला हो इस “कोरोना” नामक महामारी का चाहे मजबूरी में ही सही जिसने हमें “ऑन लाइन” एजुकेशन प्लेटफॉर्म ईजाद करने के लिए बाध्य किया.. उन्हीं प्लेटफॉर्म की वजह से आज पुअर बैक ग्राउंड के बच्चे देश के नामचीन पदों पर काबिज़ हो पा रहे हैं।

देश में चल रहे इस ‘रॉंग एजुकेशन सिस्टम’ पर होने वाले कीमती ‘समय’ और ‘रुपये’ की बर्वादी का क्या हमें कोई अंदाजा है..??

सन 1847 से लागू होने के ठीक सौ वर्ष बाद 1947 में देश के असंख्य क्रांतिकारियों के बलिदान ने हमें भौतिकरूप से आज़ाद भी करा दिया, मग़र अभी भी उसी शिक्षा-पद्यति को हम ढोये चले जा रहे हैं।

असल में ये हमारे देश की सत्ता पर काबिज़ ‘नीति-नियंताओं’ की ‘मानसिक-गुलामी’ का द्योतक है..??? जनता क्या करे उसकी तो मजबूरी है.. इसे ढोने की।

मेरा तो ऐसा विचार है.. आप भी जरा सोचिएगा..यदि हम आठवीं तक का पाठ्यक्रम मानव-जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से सम्बंधित तथ्यों पर तैयार कर लागू कर दें तो जूनियर के बाद हमारे बच्चे 9,10,11,12 के इन चार वर्षों के पाठ्यक्रम में अपनी-अपनी रुचि के मुताबिक कोई ‘चार-वर्षीय’ बेहतरीन रोजगार-परक प्रोफेशनल कोर्स करके उम्र व अनुभव में मैच्योर होते-होते वे अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं।

देश के युवा नागरिक, जिन्हें सिर्फ एक वोट समझकर जाति, धर्मों में बांटकर लगभग सैकड़ों वर्षों से उन्हें अपनी तमाम उम्र बेरोजगारी से जूझते हुए तनावपूर्ण जीवन जीने लिए मजबूर करते सत्तारूढ़ दल कहें या दलदल नियुक्तियों के नाम पर ड्राफ्ट, पोस्टल ऑर्डर्स आदि लेकर व्याप्त असीमित बेरोजगारी जो इन सरकारों की नाकामी बयां करते करते भी, हर सत्र में सरकार की ही अच्छी खासी कमाई करा देते हैं।

अफसोस तो इस बात का है कि, देश की कुर्सी पर बैठे जिम्मेदार लोगों की इस बाबत अभी भी कोई ठोस नीति बनाने की मनसा नजर नहीं आ रही है।

इसीलिए मैं कहता हूँ काहे का ‘नववर्ष’..???

हिंदी कलेंडर के आधार पर चैत्र माह में शुरू होने वाला नवसंवत्सर न केवल भौतिक रूप से वल्कि प्राकृतिक रूप से सब कुछ नया लेकर आता है।उस वक्त प्रकृति स्वयं अपना रूप सँवारती है..हम कृषि प्रधान देश के नागरिक हैं। उसी वक़्त हमारे अन्नदाताओं के खेत से फसल कटकर उनके घर आती है।

जनवरी के महीने में नया होता क्या है..???

कुछ भी तो नहीं..जागो! भारतीयो जागो! देश का नेतृत्व सम्भाल रहे इन काले अंग्रेजों की बहकाने-भटकाने वाली मानसिकता को समझो। और इनके द्वारा बनाई गई मानसिकता के पूर्वा ग्रहों से बाहर निकलो! आख़िर कब तक हम दूसरों के द्वारा हाँके जाते रहेंगे..???

बिंदु विचारणीय है…आपका हर दिन शुभ हो..👍

आपका

युग पचहरा

194- ‘विश्वसनीय-मित्र’

हिंदी फिल्म ‘खुदगर्ज़’ का ये गाना..

“ज़िंदगी का नाम दोस्ती.. दोस्ती का नाम जिंदगी..”

लोगों को ‘दोस्ती’ के मायने समझाने में काफ़ी सहायक सिद्ध हुआ है।

मग़र अफ़सोस! फिर भी कुछ लोग ‘दोस्त’ या ‘मित्र’ शब्द को बड़े हल्के में लेते हैं। यदि इंसान मित्रता के मानकों पर खरा हो,तो मेरे ख़्याल से ‘मित्र’ एक भारी भरकम शब्द है।

दरअसल, दुनियाँ में ‘विश्वसनीय-मित्र’ न केवल इंसान की ख़ुशनसीब जिंदगी का आकार निर्धारित करता है। अपितु जीवन का सारा दारोमदार इसी रिश्ते पर टिका है।

ये “विश्वसनीय मित्र” का रिश्ता सदैव दुनियां के सारे रिश्तों को पीछे छोड़ सबसे ऊंचे पायदान पर स्थापित है।

लेकिन मित्र के असल मायने जानते हुए भी लोग दैनिक चलन में किसी को भी ‘मित्र’ बोल दे रहे हैं।

क्या आपके जीवन में ‘विश्वसनीय-मित्र’ है..? यदि है, तो वास्तव में आप दुनियाँ के ‘खुशनसीब-इंसानों’ में से एक हैं।

मित्रता के संदर्भ में,मैं सदैव कहता रहा हूँ कि, प्रत्येक के जीवन में एक ऐसा मित्र अवश्य होना चाहिए। जिसे आप जब चाहें ‘कॉल’ कर सकें, ‘कॉल’ से मेरा मतलव किसी दिक्कत में निःसंकोच उसे आवाज दे सकें, ‘पुकार’ सके, आज सोशल-मीडिया के युग में..किसी इमरजेंसी में उसके नाम कोई मैसेज छोड़ सकें, कभी ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ वाली स्थिति बन जाय, तो उससे सलाह-मशविरा कर सकें, और अपने सुख-दुःख भी बाँट सकें।

यदि वह कभी भटके, तो बड़े भाई वाले आत्मीय-अंदाज से निःसंकोच उसे डांट सकें, निष्कपट लड़ सकें, ईश्वर न करे कभी हम विकट-परिस्थितियों में हों, ‘नियति’ के हाथों मजबूर यदि कभी ऐसा हो,भी तो हम उसके कंधे पर सिर रख कर रो सकें,अपना जी हल्का कर सकें।और ठीक वैसे ही एकदम फ्रैंकली खुशहाली में हम उसके साथ खुलकर हँस सकें, जब चाहें मिल सकें, बेझिझक, अपनी हर बात निःसंकोच होकर उसे बता सकें.. बिना इस बात की परवाह किये कि,’ वह ‘ क्या कहेगा…?,क्या सोचेगा..?

मग़र इसके मानकों में असल शर्त है कि, ऐसा तब होगा जब उसके सामने ‘हमारा’ पूरा जीवन और हमारे सामने ‘उसका’ पूरा जीवन विल्कुल एक ‘खुली-किताब’ की तरह होगा।

अगर ऐसा ‘विश्वसनीय-मित्र’ हमारे जीवन में है, तो वाकई हम दुनिया के सबसे ‘खुशनसीब-इंसान’ हैं।

इस बिंदु पर चिंतन कीजिएगा..

हो सके तो किसी के जीवन में एक ‘विश्वसनीय-मित्र’ की भूमिका निभाइयेगा..

जिसका ‘मूल-मंत्र’ है, पहले किसी को आत्मीयता से सु..निएगा। क्योंकि अधिकांश लोग जो अपने अकेलेपन के अवसाद से ग्रसित हैं, वे वही लोग होते हैं जिनके पास ऐसा ‘कान’ नहीं होता जो उन्हें पूरे विश्वास के साथ धैर्यपूर्वक सुनले, और ना हीं ऐसा कंधा होता है, जिस पर वह अपना सिर रखकर अपना जी हल्का.. कर ले।

आये दिन आप देख ही रहे हो दुनियाँ में कितनी आत्महत्याएँ होती हैं, क्या इस पर किसी ने कभी विचार किया, कि..ये क्यों होती हैं..?? इनके पीछे क्या कारण होते हैं ???

मेरे विचार से उनके जीवन में ‘सुनाने वाले’ तो बहुत होते हैं। परन्तु उनकी..’सुनने वाला’ कोई भी नहीं…होता! और ये एक लंबे समय तक होता है तब ऐसी घटनाएं घटती हैं।

शायद इसीलिए वे… ऐसा कर जाते हैं।😢पढ़ने के लिए thanks👍

193-प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ

प्रारंभ से देखा गया है.. कि, आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के बीच इस सिद्धांत पर चर्चाएं कहीं न कहीं होती रही है कि,

“प्रारब्ध / Destiny

पुरुषार्थ/ Free-Will “

इन दोनों में से ‘मानव-जीवन’ किससे चलता है..?

प्रश्न है.. Destiny से या Free-Will से..???

आख़िर, मनुष्य अपने जीवन में “भाग्य” से ‘सुखी’ व ‘सफल’ होता है या अपने द्वारा किए गए.. “प्रयासों” से..???

प्रोफाउंड-स्कॉलर्स का कहना है कि, दुनियाँ के अधिकतर लोग या तो so call इंटेलेक्चुअल हैं या बहुत मॉडर्न..???

उनकी राय में ‘लक’ जैसा कुछ भी नहीं होता..दुनियाँ में। वे सब कुछ efforts से ही करने को तरजीह देते हैं।

अब विचारणीय प्रश्न ये है कि, ‘मानव-जीवन’ में आख़िर ‘लक’ का रॉल है.. तो कितना.???

एकबार अपने कॉलेज की लाइब्रेरी में मैंने ‘द साइकोलॉजी ऑफ मनी’ नामक पुस्तक पढ़ी.. रिकमंड करना चाहूंगा कि, वह अद्भुत पुस्तक आपको भी पढ़नी चाहिए।

उसके एक चैप्टर..’द लक एंड रिश्क’ के हवाले से बताना चाहूंगा कि, इस चैप्टर में ‘माइक्रोसॉफ्ट’ और ‘बिल्गेट्स’ के बारे में एक रोचक सी जानकारी दी गयी है..इस पुस्तक के लेखक मिस्टर मॉर्गन स्वयं बताते हैं कि, उन दिनों पूरी दुनियां में ‘लेक साइट-स्कूल ही एकमात्र ‘हाई स्कूल’ हुआ करता था। जिसमें कि ‘कंप्यूटर’ था। बिल्गेट्स उस में पढ़ते थे।

मैंने वह चैप्टर न केवल गम्भीरतापूर्वक पढ़ा,वल्कि बड़ी गहनता से एक-एक आँकड़े को समझने का प्रयास भी किया।

और क्यों न हो आंकड़ा है ही इतना दिलचस्प ज़रा आप भी पढियेगा..👍

जब 1968 में पूरे विश्व में हाई स्कूल स्टैंडर्ड में पढ़ने वाले कुल 303 मिलियन स्टूडेंट्स थे। उनमें से 18 मिलियन अमेरिका में थे। और एक लाख के करीब यू.एस. के सिएटल एरिया में थे। उनमें से मात्र 300 बॉयज ‘लेक-साइट स्कूल’ में थे, जहां बिल्गेट्स पढ़ते थे। नंबर पर ध्यान दीजियेगा 303 से शुरू हुआ और 300 पर आकर रुका। यानी एक मिलियन पर लगभग एक स्टुडेंट.. था।

क्योंकि उस वक्त 300 हाई स्कूल ऐज-ग्रुप के लड़के ‘लेक-साइट’ स्कूल में पढ़ रहे थे।

आपको पढ़कर या ऐसा सुनकर थोड़ा असहज अवश्य लगेगा..मगर सत्य है.. क्योंकि कि बिल्गेट्स अपनी एक डॉक्युमेंट्री में यहां तक कहते हैं कि,”यदि उन दिनों “लेक-साइट स्कूल” नहीं होता..!!, तो शायद आज दुनियां में माइक्रोसॉफ्ट भी नहीं होता।”

प्रारब्धवश इसी स्कूल में बिल्गेट्स की मुलाकात ‘पॉल-एलन’ से होती है। ये आप जानते ही हैं कि, बिल्गेट्स & पॉल एलन ‘माइक्रोसॉफ्ट’ के सह-संस्थापक हैं। लेकिन प्रारब्ध की असली मज़ेदार कहानी, तो अब शुरू होती है।

बिल्गेट्स और पॉल एलन के साथ उसी स्कूल में एक तीसरा लड़का और पढ़ता था जिसका नाम था ‘ कैंट इवन्ट्स ‘। ये लड़का कम्प्यूटर एवं बिज़निस की बातों में बिल्गेट्स एंड पॉल एलन से भी कहीं अधिक दक्ष (स्किल्ड) था। ये मैं नहीं कह रहा..वहां पर सभी लोगों का ऐसा ही मानना था। बिल्गेट्स भी स्वयं यही मानते थे।

कहना न होगा कि, दुर्भाग्यवश..

वल्कि ‘प्रारब्धवश’ एक पर्वत रोहण ‘माउंटेनिंग’ की घटना में, जिस वक्त ‘कैंट इवन्ट्स’ हाई स्कूल में ही था, तभी वह एक अप्रिय घटना का ग्रास बन जाता है। अर्थात उस बेचारे की ‘मौत’ हो गई।

यदि इस घटना को ‘नियति’ के खेल-निराले’ वाले नजरिए से .. देखा जाए..जैसे; बिल्गेट्स का विश्व के एकमात्र ऐसे विद्यालय में पढ़ना, जहां कंप्यूटर हो..और बाद में ‘कैंट’ नामक लड़के की अचानक मृत्यु हो जाना। ये दोनों ही बातें ये साबित करती हैं कि, ‘प्रारब्ध’ का रॉल हमारे जीवन में बहुत कुछ महत्व रखता है। अर्थात आप भी किसी हद तक मेरी इस बात से सहमत हो रहे होंगे कि, मानव-जीवन में ‘लक’ नामक के फैक्टर का अस्तित्व है,तो अवश्य।

ये विचार फाइनलाइज हो जाने पर कि “मानव-जीवन में ‘लक’ का भी अपना रॉल होता है।” तब आज की मॉडर्न लॉबी के तर्कों को हवा मिल जाना स्वाभाविक है..और ऐसी परिस्थिति में..

‘ह्यूमन-इफ़्फ़र्ट्स’ स्वत: ही सवालों के घेरे में आ जाते हैं ..???

लेकिन बंधुवर! समस्याओं की ऐसी सन्देहात्मक स्थिति में केवल हम सामान्य जन ही नहीं होते, अपितु इस बात के लिए हमारे ग्रंथ भी साक्षी हैं कि ऐसी परिस्थिति से बारह कलाओं से युक्त हम सबके पूज्य श्रीराम जैसे चरित्र भी कई बार गुज़रे थे। उन्होंने ऐसे वक़्त पर अपने धैर्य का परिचय देते हुए..एकबार पूज्य गुरु देव वशिष्ठ जी से अपनी समस्या का समाधान पूछा! तो उन्होंने समझाते हुए कहा कि,

“हमारे जीवन रूपी वन में दो प्रकार के फल देने वाले वृक्ष होते हैं। जिसमें एक का नाम है “प्रारब्ध” और दूसरे का “पुरूषार्थ”। मनुष्य के जीवन में इन दोनों में से जिसका ‘बल’ (फ़ोर्स) यानी तीब्रता अधिक होती है वही प्रभावी होकर हमें परिणाम देने लगता है।

इस बिंदु को एकबार पुनः अपने चिंतन में जगह देते हुए.. विचारिएगा कि, ‘प्रारब्ध’ और ‘पुरुषार्थ’ में से जीवन में जो प्रभावी होगा, उसकी.. सफलता या असफलता भी वही तय करेगा।

इस बिंदु पर यदि रिसर्च की जाए.. और अपने आपको गहराई में उतरा जाय, तो हम पायेंगे कि, “प्रारब्ध एवं पुरुषार्थ” दो अलग-अलग चीजें हैं ही नहीं। वस्तुत: वे दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

इसे और स्पष्ट करने के लिए मैं यही कहुंगा प्रारब्ध और पुरुषार्थ का पूरा आधार इस पर निर्भर करता है कि, कर्म कब..? एवं किन परिस्थितियों में हुआ है..? और विशेषतः किस “भाव” से हुआ है..? यही वह कसौटी है, जिस पर समूचा जगत टिका है।

जो शुभ अशुभ ‘कर्म’ मनुष्य पिछले जन्म में करके आया है। वही “संचित कर्म” वर्तमान जन्म का ‘प्रारब्ध’ होते हैं।

सच तो ये है, जो ‘कर्म’ मनुष्य अब कर रहा है..वह अपने अगले जन्म का ‘प्रारब्ध’ गढ़ रहा है।

उल्लिखित वृतांत के आधार पर यदि मनुष्य को उसके भाग्य का ‘विधाता’ कह दिया जाय, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन..”

‘मानव-जीवन’ में मूलतः कर्मों की प्रधानता है। “

प्रारब्ध और पुरुषार्थ पर से इतना पर्दा उठ जाने के बाद.. नई पीढ़ी के लोग कई बार एक और अहम सवाल करते हैं.. कि

प्रश्न- आखिर “मनुष्य जीवन” के धरातल पर ये “प्रारब्ध व पुरुषार्थ” काम कैसे करते हैं..??

यदि हम थोड़ा बहुत भी अपने प्रोफाउंड स्कॉलर्स को पढ़ने में रुचि रखते हैं, तो अवश्य जानते ही होंगे.. कि डॉ.रजनीश (ओशो) ने अध्यात्म के इस जटिल पहलू को एकदम आम लोगों की भाषा में.. ‘मुहम्मद पैग़म्बर’ और उनके एक ‘अली’ नामक शिष्य के बीच होने वाले एक वार्तालाप के ज़रिए समझाने का बहुत अच्छा प्रयास किया है।

हुआ यूं कि, एकबार अली ने अपने गुरु पैग़म्बर साहब से पूछा..कि, “मनुष्य अपनी इच्छानुसार कुछ कर सकता है..या नहीं?? और यदि ‘नहीं ‘ तो फिर ‘चोरी मत करो,झूठ मत बोलो, हिंसा मत करो..इन उपदेशों का क्या प्रयोजन है..? गुरु जी! बताइए..ये सब व्यर्थ हैं ना??”

पैग़म्बर ने अली की बात का जवाब देने के बजाय अली से कहा, ‘अली! ज़रा इधर आओ..और अपना एक पैर हवा में उठाकर खड़े तो हो जाओ।

अली थोड़ा गुस्से के भाव में आ तो गया, पर वह नहीं समझ सका गुरु ये सब क्यों करवा रहे हैं..?

अली सोच रहा है कि, मैंने इतना गम्भीर सवाल पूछा है। फिर गुरु मुझ से ये क्या करवा रहे हैं। अतः गुरु की आज्ञा “सिरोधार्य के भाव” में वह अपना एक पैर हवा में उठाकर खड़ा हो जाता है।

तब गुरु ने अली से कहा, अब अपना दूसरा पैर भी हवा में उठा लो! अली आश्चर्य के साथ बोलता है !! ये कैसे सम्भव है..? गुरु जी। कोई अपने दोनों पैर भला एक साथ ऊपर कैसे उठा सकता है..?

अब पैग़म्बर विल्कुल गम्भीर मुद्रा में अली को समझाते हैं कि, जिस प्रकार पहली बार में तुम अपने किसी भी पैर को (लेफ़्ट या राइट) हवा में उठाने के लिए स्वतंत्र थे। बस, मनुष्य के पास कर्म करने के लिए सिर्फ उतनी ही ‘फ्री-विल’ (पुरुषार्थ) की चॉइस होती है।

अली ! ठीक से समझिए! जिस प्रकार मेरे आदेश में एक पैर हवा में उठाने के अलावा तुम्हारे लिए दांए / बांए का कोई निर्देश नहीं था। ठीक वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन में किसी अमुक कार्य को करने के लिए बस इतनी सी “स्वतंत्र इच्छा” होती है।

अगले स्टेप में.. दूसरे पैर का जमीन के साथ फिक्स हो जाना.. वैसे ही उसकी ‘नियति’ बन जाती है। जैसे मनुष्य अपने द्वारा किए गए शुभ / अशुभ कर्मों से बने ‘प्रारब्ध’ वश “नियत नटी” के खेल की महज एक “कठ पुतली” बन के रह जाता है। फिर उसे वही करना होता है जो प्रारब्ध उसे करवाता है।

इसे समझने के लिए जीवन के धरातल पर आना लाज़मी है।

ठीक वैसे ही हम सबके जीवन में कुछ चीजें ऐसी होती हैं। वे पहले हमारी ‘फ़्री-विल’ के दायरे में रही होती हैं। मग़र जैसे ही हम अपनी “फ्री-विल चॉइस” यूज कर लेते हैं, तो बाकी की स्थिति फिर स्वतः ही हमारी ‘नियति’ अर्थात प्रारब्ध बन जाती है। अर्थात फिर हमारे दायरे निर्धारित हो जाते हैं।

आज न सिर्फ समझने अपितु जीवन के इस “गहन सिद्धांत” को हमें अपने आचरण में उतारने की महती आवश्यकता है। 👍

विचारक; योगेंद्र सिंह पचहरा ,मुखिया परिवार,नीमगांव….

192- खेल-निराले!!

“किस्मत के ‘खेल-निराले’ मेरे भैया। किस्मत का लिखा कौन टाले मेरे भैया..”

ये हिंदी फिल्म ‘एक फूल दो माली’ का बहुत ही लोकप्रिय गाना है।.. परन्तु ये बात ज़िंदगी के धरातल पर सोलह आना सही है।

मग़र अब सवाल ये है कि आख़िर इस ‘किस्मत’ को लिखता कौन है..? ये जानने के लिए हमें इस लेख को गंभीरतापूर्वक पढ़ना चाहिए👍

एक प्रकरण के माध्यम से मैं इसे अभिव्यक्त करने का प्रयास करके देखता हूँ।

अधिकतर लोग..आजकल ‘युग और नीरू’ की युगल जोड़ी के बिछड़ जाने को लेकर तरह-तरह की बात करते रहते हैं..

जैसे; “उनकी शादी विद्वानों द्वारा लग्न और मुहूर्त सब कुछ देखकर हुई थी..,उनका दैनिक व्यवहारिक,आचरण सब लगभग ठीक था,उन दोनों की ईश्वर में भी अच्छी आस्था थी..वगैरह वगैरह …

मग़र अफसोस! व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, उनका दाम्पत्य जीवन महज़ तीस एक वर्ष ही चल सका..जबकि भारतीय-समाज में कई एक लोग बिना कोई कुंडली-नक्षत्र मिलाए रिश्ता कर लेते हैं। वे आचरण की दृष्टि से भी बहुत अच्छे नहीं होते। लेकिन अपनी पूरी उम्र करते हैं। आख़िर क्या है इसके पीछे..?”

लोगों द्वारा ऐसे आंकलन करना परिस्थिति को गम्भीरता से न समझने जैसा है।

दरअसल,जीवन की खुशहाली के पीछे ‘मनुष्य’ के कर्म-संस्कारों द्वारा निर्मित “प्रारब्ध” का ही सारा खेल है।

इसलिए सवाल कुंडली व गुण-नक्षत्र मिलाने से कहीं अधिक अपने कर्म-संस्कारों का सही होना जरूरी है!! ये ही ‘किस्मत’ या ‘प्रारब्ध’ के आधार होते हैं। जिसमें कई एक जन्मों का लेखा-जोखा अंतर्निहित होता है। जो मनुष्य को जन्म-जन्मांतर तक पूरा करना ही होता है।

अब चलो ! इसे एक कहानी द्वारा समझने की कोशिश करते हैं..

एकबार दो पति-पत्नी अपनी गाड़ी से अपने एक अज़ीज मित्र के घर दावत पर जा रहे थे। जब वे एक गांव से गुज़रे, अचानक अमुक व्यक्ति की पत्नी की नज़र दो महिलाओं पर पड़ी जो अपने घर के सामने वाले अहाते में एक युवक को बड़े प्यार से नहला रही थीं।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं जो पति-पत्नी निमंत्रण में जा रहे थे। उनमें से कार चलाने वाले व्यक्ति की पत्नी में ईश्वर-प्रदत्त एक विशेष गुण था, दूसरे उसकी कुंडली भी जागृत थी। जिससे वह भविष्य में घटने वाली घटनाओं को अपनी अंतर्दृष्टि से पूर्व में ही भांप लिया करती थी।

कार में बैठी महिला को दुनियाँ में घटित किस्मत के ‘निराले खेलों को देख अचानक ‘हंसी’ आ जाती है।.

क्योंकि अपने सामने वह एक मंजर देख रही थी, कि एक व्यक्ति की बहन पानी डाल रही है,और उसकी पत्नी पीठ रगड़-रगड़कर नहला रही है। अतः संस्कारों के ताने बाने में उलझे वे लोग निकट भविष्य में उनके भी संबंधी बनने वाले थे। इस समीकरण को समझते ही उस महिला को हँसी आ गयी..गाड़ी का शीशा खुला था, तो संयोगवश नहाने वाले युवक ने भी समझ लिया कि वह महिला उस पर ही हँस रही है।

उसने तत्काल कार चालक को रुकने के लिए कहा.. वे रुक गए तब उनसे इस तरह हंसने का कारण जानना चाहा, तो उस महिला ने चुटकी लेते हुए उस नहाने वाले युवक से फ्रैंकली कहा..कि, क्यों भई क्यों..? क्या आपके घर के सामने से हंसकर गुज़रना मना है। जो मैं तुम्हें अपने हंसने का कारण बता दूँ..

दूसरी बात..क्या आप मुझे इस बात के लिए आश्वस्त कर पाएंगे कि जो मैं तुम्हें बताऊंगी उसे सुनने के बाद तुम अपना धैर्य नहीं खोओगे, तो चलो मैं बता भी दूँगी।

दरअसल मेरी हंसी का कारण जानने से पहले हर व्यक्ति अपने सब्र से पूछें कि, उनकी और उनके सब्र (धैर्य) की कैसी बनती है..?

क्या उनमें परमसत्ता की निर्धारित-व्यवस्था के अंतर्गत घटने वाली घटनाओं को सहने की सामर्थ्य है…???

यदि हां! ,तो फिर वे अधीर क्यों हैं..?

धैर्यपूर्वक रहें .. वक़्त आने पर उनके ही कर्म-संस्कारों से लिखी गयी ‘किस्मत’ की स्क्रिप्ट सामने आ ही जायेगी।

दूसरे, किसी बात को वक़्त से पूर्व बता देने से ‘घटना’ की अहमियत कम हो जाती है। जो संसार की निर्धारण-व्यवस्था के विरुद्ध भी है।

इस पर नहाने वाले युवक ने विनम्रता पूर्व कहा, हे! देवी यदि आपको कोई तकल्लुफ़ न हो,तो कृपया मैं पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ..आपकी ‘हँसी’ के रहस्य को जानने की इच्छा रखता हूँ। कृपया बता दीजिये👍

उस महिला ने कहा, चलो, मैं बता ही देती हूँ….लेकिन अपना धैर्य मत खोइयेगा!..आप और खासकर मेरे पतिदेव दोनों इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे!! 👍

सुनो! इस वक़्त मेरी ‘अंतर्दृष्टि’ कहती है.. अब से तकरीबन छह महीने बाद मैं एक स्वस्थ और सुंदर पुत्र को जन्म दूँगी.. तब कुआं-पूजन की रश्म के वक्त बैल के सींग के प्रहार से मेरी मौत हो जाएगी..वहां से पांच किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में घना जंगल है। वहां एक हिरनी के गर्भ से एक अदभुत बच्चे के रूप में मेरा पुनर्जन्म होगा। उसके ठीक छह महीने बाद दो कसाई मुझे, यानी उस हिरनी के बच्चे को पकड़कर ले जाएंगे..

आप यदि खुद को सामर्थ्यवान समझते हो, तो आप बचाने का प्रयास करके देख लीजियेगा।

मग़र ‘जीव’ के पूर्व-कर्म संस्कारों पर आधारित ‘नियति’ में जो निर्धारित है। परिस्थितिवश होता वही है।” लेकिन फिर भी फ़र्ज कहता है.. इंसान को अपनी सामर्थ्य के मुताबिक सूझ-बूझ से बेहतर से बेहतर ‘प्रयास’ कर ही लेने चाहिए👍

उस महिला ने नहाने वाले युवक की ओर मुखातिब होते हुए फिर कहा, ” हिरनी के बच्चे के रूप में मरने के बाद मेरा पुनर्जन्म, आपकी बेटी के रूप में, ‘कन्या’ का होगा।

जब वह बड़ी होगी.. तो तुम अपनी बेटी के लिए वर ढूढ़ने निकलोगे.. संयोगवश उसी बिन माँ के बच्चे के साथ रिश्ता तय करके आओगे..जिसे मैं कुआं पूजन के वक्त बैल द्वारा सींग के प्रहार से मरकर अकेला ‘बिन माँ का’ बच्चा छोड़कर आई होऊंगीं.. अर्थात भौतिक दृष्टि से देखा जाय..तो पूर्व में जन्मे मेरे अपने बेटे से ये ‘किस्मत’ के ‘निराले-खेल’ मेरी शादी तक करवा देंगे।

आपको देखते ही ये सब सोचकर मेरी “हँसी निकल पड़ी..अब इसमें मेरी ‘हँसी’ क्या दोष है..? इस दुनियाँ में ‘किस्मत के खेल’ ही जो ‘निराले’ हैं।

मृत्युलोक में गम्भीर से गम्भीर चोट का मरहम केवल ‘धैर्य व वक़्त’ के ही पास है।

‘धैर्य’ और ‘सयंम’ ही प्रत्येक ‘जीव’ का अधिकार है।

इसलिए विकट परिस्थितियों में भी हम ‘धैर्य’ और ‘सयंम’ को नहीं खो सकते।

पूर्व घटनाएं साक्षी हैं जिसने भी धैर्य खोया है स्थितियां और बदत्तर हुई हैं।

यहां मेरा अपना अनुभव कहता है,कि हमें भविष्य के प्रति आशान्वित रहते हुए.. सदैव अपना ‘धैर्य’ व ‘संयम’ बनाये रखना चाहिए।

विचारक ; युग

191- स्वर्ग

क्या आप जानते हैं..? कि, पृथ्वी पर स्वर्ग कहाँ है..?

‘आध्यात्मिक’ दृष्टि से ईश्वर की शरण में रहते हुए शांत चित्त वाले प्राणी के लिए तो धरती के हर भू-भाग पर ‘स्वर्ग’ है।

मग़र शास्त्रों व ऐतिहासिक भू-अभिलेखों के आधार पर ‘उज्जैन’ नगरी “स्वर्ग” है।

प्रश्न है कि, ‘उज्जैन’ स्वर्ग कैसे है..? चलो! कुछ तथ्यों के आधार पर समझने का प्रयास करते हैं..👍

उज्जैन – मध्य प्रदेश (MP) में है। एक मात्र स्थान जहाँ शक्तिपीठ भी है, ज्योतिर्लिंग भी है,यहीं सदैव कुम्भ महापर्व का भी आयोजन किया जाता है ।

यहाँ साढ़े तीन काल विराजमान है। “महाँकाल,कालभैरव, गढ़कालिका और अर्धकाल भैरव।”

यहाँ तीन गणेश विराजमान है। “चिंतामन,मंछामन, इच्छामन” ।

यहाँ 84 महादेव व सात सागर भी हैं।

“ये भगवान कृष्ण की शिक्षा स्थली है।।”

ये मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान है।।

“यही वो स्थान है। जिस नगरी ने हमें महाकवि कालीदास दिए।”

‘उज्जैन’ विश्व का एक मात्र स्थान है जहाँ अष्ट चिरंजीवियों का मंदिर है।

यहीं वे 8 देवता हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है (बाबा गुमानदेव हनुमान अष्ट चरिंजीवी मंदिर)

“राजा विक्रमादित्य ने भी जन्म लेकर इस धरा का मान बढ़ाया है।”

‘विश्व की एक मात्र उत्तर दिशा में बहने वाली ‘क्षिप्रा-नदी’ भी तो है यहां!!’

“इसके शमशान को भी तीर्थ का स्थान प्राप्त है जिसे ‘चक्र तीर्थ’ कहा गया है ।

यहां नो नारायण और सात सागर दोनों मौजूद हैं।

भारत को सोने की चिड़िया का दर्जा यहां के राजा विक्रमादित्य ने ही दिया था। इनके राज्य में सोने के सिक्के जो चलते थे। सम्राट राजा विक्रमादित्य के नाम से ही विक्रम संवत का आरंभ हुआ जो हर साल चैत्र माह के प्रतिप्रदा के दिन मनाया जाता है। जिससे हिन्दू पञ्चाङ्ग का नववर्ष शुरू होता है।

उज्जैन से ही ग्रह नक्षत्रों की गणना होती है कर्क रेखा भी उज्जैन से ही होकर गुजरती है। और तो और पूरी दुनिया का “केंद्र बिंदु” अर्थात Central Point भी यहीं है।

🌹🙏🏻 हर हर महादेव हर हर गंगे नमामि गंगे🙏