210- समाधान वृक्ष

संतों ने इस संसार को दु:खालय कहा है। अनेक विद्वानों ने जीवन को परिभाषित करते हुए बताया है, कि “संघर्ष ही जीवन है।”

प्रत्येक व्यक्ति को अपने लाइफ मैनेजमेंट में “समाधान वृक्ष” को जगह अवश्य देनी चाहिए। जीवन में खुशहाली और शांति बनाए रखने के लिए कम से कम आज के दौर में ये नितांत आवश्यक है।

जीवन की सार्थकता सदैव चलते रहने में ही है। हिंदी फिल्मों के मशहूर गायक व अभिनेता..किशोर कुमार ने जिस प्रकार अपनी एक मूवी का नाम ‘चलती का नाम गाड़ी..’ रखकर समस्त ऑडिएंस को एक संदेश दिया था..ठीक वैसे ही, गाड़ी की तरह ‘जीवन’ भी चलने का ही नाम है। क्योंकि ठहरा हुआ तो जल भी दूषित हो जाता है।

हिंदी फिल्म “शोर” का गाना “जीवन चलने का नाम..चलते रहो सुबह शाम..भी कुछ ऐसा ही भाव दर्शा रहा है।

चलो! एक कहानी के ज़रिए बेहतर “जीवन दर्शन” के परिप्रेक्ष में “समाधान वृक्ष” की प्रासंगिकता को समझने का प्रयास करते हैं….

एकबार की बात है..एक कामकाजी महिला, और उसका पति रोजाना सुबह काम पर निकल जाते.. थे। दिन भर पति ऑफिस में अपने टारगेट पूरा करने की जिद्दोजहद में लगा रहता.. जबकि उसके संस्था अध्यक्ष को कार्य के प्रति उसका समर्पण भाव कभी समझ ही नहीं आया। उसकी हौसला अफजाई में कभी कोई प्रशंसा बगैरह..नहीं की। इसके विपरीत यदि उससे कोई ह्यूमन एरर भी हुई.. तो तीखी-नौक झोंक, कटु आलोचनाएं सुनने को और मिलती। उन्हें भी वह चुपचाप सहता रहता था।

वैसे ही पत्नी सरला भी एक प्राईवेट कम्पनी में थी। वह भी अपने ऑफिस में दिनभर व्यस्त रहती। अनेकों परेशानियों से जूझकर सरला घर लौटती, खाना बनाती, घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों पति पत्नी नाकारा होने के लिए डाँटने के आदी हो गए थे। जो एक गलत तरीका था। अर्थात वे दोनों अपनी दिनभर की भड़ास बेचारे बच्चों पर निकलते। फिर पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-कराते सरला कहीं अधिक चिड़चिड़ी होती जा रही थी। तथा घर, बाहर के सारे काम सरला की जिम्मेदारी बनके रह गए थे। उसे बच्चों का तनिक भी सपोर्ट नहीं मिल रहा था। अब वह अपने जीवन से निराश होने लगी थी।

उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा था। बच्चों पर हाथ उठाने के साथ साथ इस स्थिति का ठीकरा बेचारी सरला के ही सिर फोड़ने को आमदा रहता.. उनके ऐसे रवैए से जाहिर है बच्चे भी विद्रोही हो चले थे।

टर्निंग प्वाइंट बिकम्स इन एव्री लाइफ, बट क्वेश्चन इज देट वी मस्ट ट्राई टू अंडरस्टैंड :

एक दिन अचानक सरला के घर का नल खराब हो जाता है। उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया। प्लम्बर ने आने में काफी देर कर दी। पूछने पर बताया कि,” सॉरी मेम! साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई.. घर से लाया हुआ मेरा खाना भी मिट्टी में गिर पड़ा, काम पर ड्रिल मशीन खराब हो गई, शायद मेरी परिस्थिति का लाभ उठाते हुए.. आज किसी ने मेरा पर्स भी साफ कर दिया। ”

नल ठीक करते करते वह ये सब बता रहा था। उसकी बातें सुनकर कामकाजी महिला सरला को उस पर दया आ गई और वह उसे अपनी गाड़ी से छोड़ने उसके घर तक चली गई,ताकि वह समय से खाना खा सके।

घर पहुंचते ही प्लंबर ने खुशी में.. मैडम (सरला) को बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया। उस प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया। घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा एकदम से खिल उठा। बच्चों को प्यार किया,मुस्कराती पत्नी को भी एक प्यार भरी नज़र से देखा और धीरे से चाय बनाने के लिए कह दिया।

सरला एक मिस्त्री के ट्रांसफॉर्म्ड रॉल को देखकर हैरान रह गई। बाद में आते समय बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया.. ये मेरी परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं। और घर में कदम रखने से पहले अपने दिमांग को सारी परेशानियों से मुक्त कर लेता हूँ। मैडम! चिंताओं को मैंने अपने घर के अंदर कभी प्रवेश नहीं दिया।

सुबह जब काम पर जाने के लिए अपना थैला उतारता हूं, तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर मेरी ये कोशिश रहती है कि मेरी पत्नी और बच्चे, तो कम से कम उनसे अलग ही रहें, इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़कर ही घर में प्रवेश करता हूं। अपने इष्ट “राधे गोविंद” से मेरी एक ही प्रार्थना होती है कि दिन प्रतिदिन वे मेरी मुश्किलें कम करते चलिएगा।

प्रारब्धवश मैं गरीब पैदा अवश्य हुआ हूं मगर मुझे अपनी मेहनत,लगन और अपने जीवन प्रबंध पर इतना विश्वास है कि गरीबी में मरूंगा नहीं।

मेरे बच्चे मेरा बहुत सम्मान करते हैं, पत्नी मुझे बहुत प्यार देती है, तो भला मैं, उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ। देखिए ! व्यक्ति का सुव्यवस्थित प्रबंध ही उसका जीवन ‘ दर्शन ‘ होता है

संतों का मत है कि दुनियां में कोई काम या फिर व्यक्ति छोटा नहीं होता। दुनियां में सब अपनी अपनी प्रतिभा लेकर जन्म लेते हैं। एक छोटे से कारीगर की सरल जीवन चर्या ने अनेकों शिक्षित लोगों को “खुशहाल जीवन” का दर्शन न सिर्फ प्रस्तुत कर दिया…! अपितु वह उस दर्शन को बड़े इत्मीनान से जी.. रहा है। वाह!!!

अब सरला जी के भी अनंत: चक्षु खुल गए थे। वह घर लौटते वक्त सारे रास्ते यही सोच रहीं थी..शायद ये हर घर की कहानी है। ये घर गृहस्थी एक तपोभूमि है। इतिहास गवाह है सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें न कभी सुखी रहा है और न कभी रह सकेगा।

जबकि हम सभी जानते हैं जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं होता, हमारी समस्याएं भी नहीं। प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है हम सबको स्ट्रैस आउट या टेंस फ्री करने के लिए।

क्यों न हम सब भी अपने अपने घरों से बाहर ऐसा ही एक “समाधान वृक्ष” निश्चित कर लें। ध्यान रहे घरों से बाहर न कि मकानों से बाहर.. ताकि घर परिवार की दहलीज एंट्री लेनी से पहले अपनी सारी समस्याएं व चिंताएं बाहर उसी को सौंप कर जाया करें। अर्थात घर के अंदर सदैव खुशमिजाज़ ही रहा करें..जिससे हम सब के जीवन में भी प्लंबर महोदय के घर जैसी सुख शांति आ जाए।

पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

युग पचहरा,मुखिया परिवार,नीमगांव से🙏

209- नैतिक – शिक्षा

“विद्यालय के अस्सी वर्ष की स्मृतियों” के सौजन्य से.. हमारे प्रातः स्मरणीय पूर्व प्रबंधक श्री अजीतकुमार जी जैन, ने विद्यालय में कई एक शिक्षकों के लगातार सेवा निवृत हो जाने से विद्यालय में आई शिक्षकों की कमी के चलते जब कक्षाओं में “नैतिक शिक्षा” का अध्ययन सुव्यवस्थित तरीके से न हो सकने की स्थिति को भांपते हुए न केवल बेहतरीन उपाय बताया,वल्कि तत्काल प्रभाव से लागू भी हुआ… उपाय ये था कि, सुबह विद्यालय की ईश वंदना के बाद वहीं रोजाना दस मिनट “खेल एवं नैतिक शिक्षा” के पाठ्यक्रम से.. एवं पंचतंत्र की कहानियों आदि के माध्यम से सभी बच्चों में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों के निर्माण हेतु प्रधानाचार्य व शिक्षकों द्वारा बारी बारी से बच्चों में नैतिकता का विकास किया जाए। जिससे न केवल शिक्षक व शिक्षार्थियों का नैतिक उन्नयन होने लगा था। वल्कि जानकारी में आने के बाद इसे छात्रों के अभिभावकों द्वारा प्रबंधतंत्र का एक सराहनीय कदम भी बताया।

मगर न जाने किन कारणों से.. ये व्यवस्था विद्यालय में अधिक समय चल न सकी।

और मैं, यदि “विद्यालय के अस्सी वर्ष की स्मृतियों” में कुछ गोते और लगाऊं, तो देश में ऑनरेरी मजिस्ट्रेट के पद को सुशोभित कर चुके..हमारे पूर्व प्रबंधक परम श्रद्धेय श्री सी.एल.जी जैन अर्थात मेरी मान्यताओं के आदर्श बड़े बाबूजी का भी “नैतिकता” के साथ बहुत गहरा रिश्ता था। वे प्रति पल अपने छात्रों व विद्यालय के सर्वांगीण विकास के बारे में न केवल सोचते अपितु विद्यालय के धरातल पर तत्काल उस कार्य को मूर्तरूप भी दे दिया करते थे। इस संदर्भ में एक उत्कृष्ट उदाहरण विद्यालय का विशाल एवं भव्य “पुस्तकालय” है। विद्यार्थियों के बैठकर अध्ययन करने के लिए अनेकों डाइनिंग टेबल्स से युक्त हॉल किसी डिग्री कॉलेज के पास भी उपलब्ध नहीं होगा।

शिक्षा के प्रति उनके इस समर्पित भाव के पीछे उद्देश्य यही था कि, “छात्र हमारे विद्यालय में शिक्षार्थ आएं..और यहां के शैक्षणिक वातावरण में शिक्षकों के प्रयास से वे नैतिक व मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत हों.. तब एक “चरित्रवान नागरिक” बनकर देश व दुनियां की सेवार्थ जाएं..।”

दरअसल, “नैतिक शिक्षा” ही एकमात्र वह विषय है जो छात्र/छात्राओं के अंदर अनेकों ‘चारित्रिक,नैतिक व मानवीय मूल्यों’ को स्थापित करने की सामर्थ्य रखता है।

..मगर विडंबना देखिए! शीर्ष पर बैठे हमारे शिक्षाविद जो माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की नीतियों का निर्धारण करते हैं..उन्होंने हाईस्कूल व इंटरमीडिएट के छात्र-छात्राओं के चरित्र निर्माण में ‘नैतिकता” को आवश्यक मानते हुए “नैतिक शिक्षा” को एक विषय के रूप में मंजूरी तो अवश्य दी, लेकिन आधी अधूरी..

ये विद्यार्थी के लिए एक विषय तो है मगर शासन ने विद्यालय स्तर पर न तो इसके लिए अतिरिक्त शिक्षकों की ही कोई व्यवस्था की है, और न इस विषय के अंक परीक्षार्थी की मैरिट में जोड़े जाने का कोई प्रावधान है।”

स्वाभाविक बात है कि, शैक्षिक पाठ्यक्रम में इस विषय की रेस गणित, विज्ञान व अंग्रेजी जैसे विषयों के साथ करा रखी है।।

मगर इस संदर्भ में.. मैं, एक शिक्षक होने के नाते आपको आश्वस्त करना चाहूंगा, कि, ‘नैतिक शिक्षा’ की विषय सामग्री में वो क्षमता है। कि यदि हमारे प्रदेश भर में कॉलेज-प्रशासन अपने स्तर से नैतिक शिक्षा का ‘शिक्षण कार्य’ ईमानदारी के साथ संपादित करा पाएं, तो न केवल ये विषय गणित,विज्ञान व अंग्रेजी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की क्षमता रखता है, बल्कि प्रदेश में आए.. दिन होने वाली चरित्र हीनता की घटनाओं के आंकड़ों में भी गिरावट ला सकता है।

ये जाहिर सी बात है छात्र/छात्राएं जब इस चारित्रिक और नैतिक विषय को विधिवत् रूप से पढ़ेंगे, और समझेंगे तो निश्चित रूप से उनके आचरण में भी ‘पवित्रता’ आयेगी।

जिस प्रकार श्रीमद् भगवत गीता में प्राणी की समस्त सांसारिक समस्याओं का निदान है। उसी प्रकार भारतीय समाज की काफी समस्याओं का निवारण इस ‘नैतिक शिक्षा’ के नियमित पाठन में निहित है।

मैं पुनः कहूंगा, कि नैतिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय की निरादरी करने के पीछे असल मुद्दा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा इसके अंक परीक्षार्थी की मैरिट में न जोड़ना है।

क्या आपको नहीं लगता .. कि, नैतिक व मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत इस ‘नैतिक शिक्षा’ जैसे विषय के साथ मखौल किया जा रहा है.. ??

देश दुनियां में आए दिन.. होने वाली चरित्र हीनता की घटनाओं को देखते हुए हमारे युवक व युवतियों के लिए “नैतिक शिक्षा” के ज्ञान की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

इस विषय के साथ अनैतिकता की पराकाष्ठा, तो तब और हो जाती है…जब कोई शिक्षक..जिसको ‘नैतिक शिक्षा’ जैसे महत्वपूर्ण विषय के कालांश आवंटित हो जाते हैं वह उनको “राहत कालांश” के रूप में देखता है।

दरअसल, शिक्षा विभाग द्वारा निर्धारित शिक्षकों के साप्ताहिक कालांश 30 और 36 निश्चित किए गए हैं।

नैतिक शिक्षा के कालांश जोड़कर उनकी संख्या टाइम टेबल चार्ट पर पूरी दर्शाने के उद्देश्य से वो भी विज्ञान प्रयोगात्मक कार्य की आड़ में सब चल रहा है।

जबकि विज्ञान में प्रयोगात्मक कार्य कितना होता है इसकी हकीकत भी किसी से छुपी नहीं है??

सच तो ये है कि, इस रवैए से.. शिक्षक स्तर पर उचित रूप से न तो विज्ञान में प्रयोगात्मक कार्य ही हो पाते हैं और न हीं “नैतिक शिक्षा” का अध्ययन।

आप ही बताइए ये “नैतिक संग अनैतिक” कार्य नहीं है..तो क्या है..?? यदि है,तो एक सही चिंतन के बाद उचित निर्णय लेने की दरकार,तो है!!! अब लें या न लें ये ज़िम्मेदार लोगों का काम है।

धन्यवाद

युग पचहरा;

208-‘ ऑफिसर ‘ हो तो ऐसा!!!

जहां अधिकारी में शुद्ध भाव का विचार..होगा वहां न कोई भेद भाव .. ना ही किसी पूर्वाग्रह से…ग्रसित होने की बू..होगी अपितु पूर्ण मानवतावादी रवैये..को अपने कार्य क्षेत्र में समानता का अम्ली जामा पहनाने वाले हर ऑनेस्ट ऑफिसर ऐसे ही नजीर पेश करते हैं।

ये मंजर उस वक्त का हैं जब बांदा जिले में DM साहब के ड्राइवर ‘ इम्तियाज़ उद्दीन ‘ का रिटायरमेंट हो रहा था..

रोज़ की तरह इम्तियाज़ अपने DM अनुराग पटेल को ऑफ़िस ले गए और वापस लाये।

शाम को DM अनुराग पटेल ने इम्तियाज़ के लिए विदाई समारोह का आयोजन किया..

उन्हें अनुराग जी ने शाल और स्मिर्ति चिन्ह भेंट किये..

विदाई समारोह के बाद इम्तियाज़ उद्दीन जब भीगी आँखों से घर जाने को हुए तब DM अनुराग पटेल स्वयं ड्राइवर सीट पर बैठ जाकर बैठ गए और इम्तियाज़ को अपने बग़ल की सीट पर बैठने को कहा!..

इम्तियाज़ ने मना किया ..नहीं सर !! मैं किसी भी तरह चला जाऊंगा आप परेशान न हों।

मगर DM साहब अनुराग पटेल नहीं माने..आखिर इम्तियाज को बैठना ही पड़ा। जैसे ही इम्तियाज़ बैठे तभी अनुराग पटेल जी ने उनसे पूछा! “तो साहब अब चलें?” ड्राइवर महोदय भाव विभोर तो हो ही रहे थे। बस अब तो ..अपने साहब के मुहँ से ऐसी बात सुनकर इम्तियाज़ रोने लगे,.. और वहां पर मौजूद तमाम कर्मचारियों की आँखें भी इतनी खुशी वरदास्त न कर सकीं नम हो गयीं।

वाकई, DM अनुराग पटेल अपने ड्राइवर इम्तियाज़ को उनके घर तक स्वयं ‘ड्राइवर’ बन कर छोड़ने गए रिटायरमेंट का ऐसा नायाब तोहफ़ा शायद ही किसी DM ने कभी अपने ड्राइवर को दिया हो..

वाह! अनुराग जी वाह!!!

वाकई डी एम साहब आप सच में बधाई के पात्र हैं। ऐसे ऑफिसर्स सदैव अनुकरणीय होते हैं। जिनके हर छोटे बड़े कार्य में सीख का संदेश होता है। आपके ऐसे उच्च एवं ‘समानता’ के विचार को मेरा शत शत नमन

थैंक्स फॉर रीडिंग

पचहरा सर, जैन कॉलेज सासनी वाले

207- कर्मफल

जी हां !!कर्मफल!!

किसी के साथ कुछ गलत करते हो या करने जा रहे हो तो भले ही करिए..परंतु ये भी सुनिश्चित मान लीजिये!! कि, एक दिन नियति के निशाने पर आप भी अवश्य आयेंगे।

क्योंकि ये दुनियां का दस्तूर है कि,”कोई भी “कर्म” बिना फल दिये न आजतक रहा है ना ही कभी रहेगा।”

हो सकता है आज सारी स्थितियां, शक्तियां तुम्हें अपने पक्ष में दिख रही हों.. तो स्वाभाविक ही है तुम रोके से भी ना रुको.. पर कल को जब इन कर्मो का कठोर दंड तुम्हें और तुम्हारी संतान को चुकाना होगा तब तुम जरूर सोचोगे काश! उस समय सबकुछ मेरे पक्ष में ना रहा होता.. तो आज हमें ये मर्मांतक दर्दनांक पीड़ा सहन ना करनी पड़ती!!

किसी को छल, कपट, पाप या किसी भी तरह का अत्याचार करने से पूर्व हजार बार सोचना चाहिए कि, जब भुगतने का वक्त आएगा तब क्या मुझ में या मेरी संतान में इसे झेलने का बूता होगा, क्या उस वक्त हमारे में इतना जिगरा होगा??

क्योंकि नियति किसी को मांफ नहीं करती। प्रत्येक इंसान इतना तो सदैव याद रखें।

चलो! आज एक ताजातरीन उदाहरण आपकी नजरों के सामने पेश करता हूं..

“पुलिस के दावे के अनुसार, अतीक अहमद की जिद पर उसके बेटे असद को उमेशपाल हत्याकांड में जानबूझ कर शामिल किया गया था। उससे गोलियां चलवाई गई। बाद में जब उमेशपाल हत्याकांड में असद का नाम आया था। तब अतीक की पत्नी शाइस्ता ने अतीक़ अहमद को साबरमती जेल में फोन किया था। असद की गोली चलाते हुए सी सी कैमरे की फुटेज सामने आने के बाद शाइस्ता ने अतीक अहमद से रोते हुए कहा था,‘असद हमारा बच्चा है और उसे इस मामले में आपको नहीं डालना चाहिए था।’

पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, शाइस्ता द्वारा नाराजगी जाहिर करने के बाद अतीक ने उसे डांटते हुए कहा था,“असद की वजह से 18 साल बाद चैन की नींद सो पाया हूं. उमेश पाल के चलते मेरी नींद हराम हो गई थी। असद मेरा बेटा है उसने मेरे आदेश का पालन किया है। चिंता की कोई बात नहीं है। मै सब मैनेज कर लूंगा”

एक क्षण जरा सोचिए! अपने हत्यारे बेटे के लिए इनके मन में इतनी ममता है..तभी तो कह रहे हैं कि,’वह तो बच्चा है।’ और उन हजारों मासूमों की पीड़ा अपने पाप और अपराध की कमाई पर आलीशान जिंदगी जीनेवाली औरत ने क्या कभी समझी थी, जिनको स्वयं इसके पति ने खून के आँसू रोने के लिए मजबूर कर दिया था। ना जाने कितनी महिलाओं के साथ अतीक अहमद के गुंडों ने बलात्कार किया, ना जाने कितने ही नन्हे मुन्ने बच्चों के सिर से बाप का साया छीन लिया, ना जाने कितने अरबों की धन संपत्ति हड़पकर..तथा उनके विरोध करने पर बेरहमी से उनकी हत्या करदी। उन बेचारों के आंसू इस औरत को तनिक भी नहीं दिखाई दिए थे। फिर आज अपने बेटे के लिए अपने मन में इतनी करुणा कहां से ले आई..?

किसी ने सच ही कहा है कि, “खुद की संतान की लाश ही दुनियां का सबसे भारी बोझ है।”

आज शायद निष्ठुर शाइस्ता और अतीक अहमद को उन हजारों निर्दोष लोगों का दर्द समझ में आ रहा हो.. जिनके गोद के लाल इन्होंने अपनी हैवानियत से छीन लिए थे।

ये उदाहरण अतीक के साथ साथ उन के लिए भी ‘ Eye-Opener 👁️ का काम कर सकता है जो कर्मफल को नहीं मानते..या विधि के विधान की..या दुनियां के ‘पूर्व निर्धारित व्यवस्था वाले’ कार्यक्रम में विश्वास नहीं करते!!

सभी को ध्यान रहे आज यदि किसी के साथ आप रंचमात्र भी छल,कपट अर्थात एक पैसे की भी चालाकी या किसी भी तरह की कोई धांधली कर रहे हैं,किसी की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं..तो अभी भी वक्त है..तुरंत रुक जाइए!!

जितनी जल्दी हो सके..अपने आपको एकदम बदल डालिए..!! ट्रांसफॉर्म हो जाइए

वरना!! ये कर्मफल का चक्र एक दिन इसी प्रकार आप तक भी अवश्य पहुंचना है, इसमें किंचित मात्र भी कोई संदेह नहीं है।

क्योंकि हमारे बड़े बुजुर्ग सदैव कहते रहे हैं कि, “दुनियां में देरी है..मगर अंधेरी कतई नहीं है।” आर्टिकल पढ़ने के लिए धन्यवाद🙏🏻

पचहरा सर, जैन कॉलेज,सासनी वाले

206- मानव बना दानव

विचार कीजिएगा.. हमें अपनी और अपनों की मृत्यु ही डरावनी क्यों लगती है।

जबकि चतुराई में दम भरता मानव अन्य की मौत को तो enjoy करता है।

सही मायने में आज उसे आदमी …मानव या इंसान कहना बेमानी लगता है।

लेकिन ये भी तो एक सवाल है आखिर उसे फिर क्या कह कर अभिव्यक्त किया जाय..?

मैं जानता हूं आपका वक्त बेशकीमती है। मगर plz. थोड़ा समय निकाल कर एकबार पूरा पढ़ ही लीजिएगा 🙏

✍️ मौत के ‘स्वाद’ का चटखारे लेता …”मानव बना दानव”

थोड़ा कड़वा तो लगेगा..पर दुर्भाग्य से आपके मानस-पटल पर दुनियां की वास्तविक तस्वीर उकेरता..’विचार….’

“किसी को मौत देने से डर नहीं, वो,तो हमारा ‘स्वाद’ है”

बकरे का,

गाय का,

भेंस का,

ऊँट का,

सुअर,

हिरण का,

तीतर का,

मुर्गे का

हलाल का,

बिना हलाल का,

ताजा बकरे का,

भुना हुआ,

छोटी मछली,

बड़ी मछली,

हल्की आंच पर सिका हुआ।

न जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद हैं मौत के।

क्योंकि वह मौत किसी और की है, ‘स्वाद’ हमारा….है।

‘स्वाद’ से शुरू होकर..धीरे-धीरे ‘मौत’ एक दिन इतना बड़ा कारोबार का आकार ले लेगी किसी ने सोचा भी नहीं होगा…

मुर्गी पालन, मछली पालन, बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म्स।

नाम ‘पालन’ और मक़सद ‘हत्या’ ❗

स्लाटर हाउस तक खोल दिये लोगों ने। वो भी ऑफिशियल। गली गली में खुले नॉनवेज रेस्टॉरेंट, मौत का कारोबार नहीं तो और क्या हैं ये..??

मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नही दूसरों की है,बेजुबानों की है। जो हमारी तरह बोल नही सकते, अपनी परेशानी अभिव्यक्त नही कर सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हैं, शर्म आनी चाहिए..उनकी असहायता को हमने अपना बल कैसे मान लिया ?

कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होतीं ? या उनकी आहें नहीं निकलतीं ?

जबकि जगदीश चंद्र बसु जिन्होंने बहुत समय पूर्व ‘क्रेस्कोग्राफ’ नामक यंत्र से पौधों तक के बारे में यह सिद्ध कर दिया..है कि, ‘पौधे’ न केवल हमारी तरह सांस लेते हैं, बल्कि अच्छा या बुरा भी महसूस करते हैं क्योंकि उनमें भी ❤️ हार्ट होता है। और हम अपनी आंखों से साक्षात चलते-फिरते,जीते-जागते बेचारे निरीह प्राणियों को सजीव देखने के बावजूद भी बेरहमी से मार-मार कर बड़ी शान से कारोबार चला रहे हैं। धिक्कार है!! मानव होने पर..

डाइनिंग टेबल पर हड्डियां नोचते बाप बच्चों को सीख देते है, बेटा कभी किसी का दिल नही दुखाना ! किसी की आहें मत लेना ! किसी की आंख में तुम्हारी वजह से आंसू नहीं आना चाहिए !

बच्चों में झुठे संस्कार डालते बाप को, अपने हाथ मे वो हडडी दिखाई नही देती, जो इससे पहले एक चलता फिरता शरीर थी, जिसके अंदर इससे पहले एक आत्मा थी, आपकी तरह उसके भी मां-बाप थे …??

जिस जीव को काटा गया होगा ? जो कराहा होगा ? जो तड़पा होगा ? जिसकी आहें निकली होंगी ? जिसकी आत्मा ने क्या बददुआ नहीं दी होगी ?

हमने कैसे मान लिया कि जब जब धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे तो भगवान सिर्फ तुम जैसे मानव के भेष में दानवों की रक्षा के लिए अवतार लेंगे ..❓ क्या मूक जानवर उस परमपिता परमेश्वर की संतान नहीं होते..❓

क्या ईश्वर को उनकी रक्षा की चिंता नहीं होती ..❓

धर्म की आड़ में उस परमपिता के नाम पर अपने स्वाद के लिए कभी ईद पर बकरे काटते हो, कभी दुर्गा मां या भैरव बाबा के सामने बकरे की बली चढ़ाते हो। कहीं तुम अपने स्वाद के लिए मछली का भोग लगाते हो । क्या कभी सोचा …!!! ईश्वर का स्वाद क्या होता है ? ….क्या है उनका भोजन ?

किसे ठग रहे हो ? भगवान को ? अल्लाह को ? जीसस को? या खुद अपने आपको ?

लोग बड़ी बेशर्मी से बोलते हैं मंगलवार को मैं नानवेज नही लेता …!!! आज शनिवार है इसलिए नहीं …!!! अभी रोज़े चल रहे हैं ….!!! नवरात्रि में तो सवाल ही नही उठता ….!!!

झूठ पर झूठ…. …झूठ पर झूठ ..झूठ पर झूठ ..

दरअसल, ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि सिर्फ इसलिए दी, ताकि तमाम योनियों में भटकने के बाद मानव योनि में तुम जन्म मृत्यु के चक्कर से निकलने का रास्ता ढूँढ सको।

लेकिन तुमने इस मानव योनि को पाते ही स्वयं को भगवान समझ लिया। तुम्ही कहते हो, कि हम जो प्रकति को देंगे, वही प्रकृति हमे लौटायेगी

ये संकेत है ईश्वर का। प्रकृति के साथ रहो। प्रकृति के होकर रहो। तो फिर पालन क्यों नहीं करते हो..?? भई!!

🙏 जय श्री राम 🙏 ईश्वर आपको सद्बुद्धि दें ताकि आपका जीवन मंगलमय हो

आपके ;

🙏

पचहरा सर,

205- सत्कर्म

सत्कर्म तभी संभव हैं जब व्यक्ति को आत्मज्ञान हो जाय, यदि आत्मज्ञान नहीं होगा, तो हमारे कितने भी अच्छे कर्म क्यों न हों..उनसे अहंकार या लोकप्रियता पाने की बू आयेगी ही।

चलो! आज इसे हम गीता के एक प्रकरण के जरिए समझने का प्रयास करेंगे..

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन साथ साथ टहल रहे थे। उस वक्त अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु: मेरे मन में एक जिज्ञासा है, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ..?

श्री कृष्ण ने कहा: अर्जुन, तुम मुझसे बेहिचक, कुछ भी पूछ सकते हो।

तब अर्जुन ने कहा: कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई कि, दान तो मै भी बहुत करता हूँ, परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी कहते हैं..क्यों..??

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले: चलो! आज मैं तुम्हारी ये जिज्ञासा शांत कर देता हूं।

श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित ‘दो पहाड़ियों’ को पूरी तरह सोने का बना दिया। इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे! अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।

अर्जुन प्रभु से आज्ञा लेकर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया। अर्जुन ने सभी गाँव वालों को बुलाया। उनसे कहा कि सभी लोग पंक्ति बना लें अब “मैं, आपको सोना बाटूंगा..”

गाँव वालों ने अर्जुन की जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।

लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे। उनमें ये सब करते कराते अहंकार आ चुका था। जैसी कि कुछ लोगों की आदत होती है गाँव के कुछ लोग वापस आ..आ.. कर दोबारा से लाईन में लग रहे थे।

अब अर्जुन काफी थक चुके थे। जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई। वे वैसी ही थीं। वहां अभी भी भरपूर सोना था।

उन्होंने थक हारकर श्री कृष्ण से कहा कि अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।

प्रभु ने कहा कि ठीक है, चलो! तुम विश्राम कर लो।

तभी उन्होंने कर्ण को बुलवाया। और कहा कि, कर्ण! इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।

कर्ण तुरंत सोना बांटने चल दिये।

उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा: यह सोना आप लोगों का है, जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ख़ुद ले के जा सकता है। ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देखकर अर्जुन ने कहा कि ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया..?

श्री कृष्ण ने अर्जुन को शिक्षाप्रद भाव में जवाब दिया कि, तुम्हे ‘सोने’ से मोह,तो था ही। दूसरे तुम अपनी हाकिमगिरी दिखाते हुए गांव वालों की नज़रों में लोकप्रिय होने की लालसा से भी सोना वितरण करते रहे।

सखा! तुम में दाता होने का भाव जो आ गया था..वो कभी ठीक नहीं है।

जबकि, कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। कर्ण गांव वालों द्वारा होने वाली अपनी जयजयकार..या प्रशंसा को सुनना नहीं चाहता!! उसके पीठ पीछे लोग क्या कहते हैं उससे कर्ण को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये है कर्ण की विशेषता।

प्रिय पाठको! यहां मेरी अपनी रिसर्च ये कहती है.. कि, ऐसा एक ‘आत्मज्ञानी-व्यक्ति’ ही कर सकता है। विद्वानों द्वारा ऐसी स्थिति को..”नेकी कर दरिया में डालना..” कहा गया है। ‘Do good & forget..’ यानि ‘अच्छा करो और भूल जाओ..’ दाएं हाथ से भलाई करो,तो बाएं को पता भी न चले। ताकि अहंकार व लोकप्रिय होने का भाव व्यक्ति के मन में उत्पन्न न हो पाए..

क्योंकि यदि ऐसा हुआ, तो हमारे जीवन का हश्र ..”नौ दिन चले अढ़ाई कोस..” ही हो के रह जायेगा। अर्थात जीवन के सारे किए धरे पर पानी फिरने में देर नहीं लगेगी।

यही वो कारण है जिससे व्यक्ति के अच्छे कर्म अक्सर उसके प्रारब्ध में जुड़ने से रह जाते हैं।

इस तरह श्री कृष्ण ने एक खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर तो दिया ही परंतु साथ ही एक नसीहत भी दी।

शिक्षा;

दान देने के बदले में..धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना..हमारे ‘उपहार’ को महज एक व्यवहारिक ‘सौदा’ बनाके रख देता है।

व्यक्ति अज्ञानतावश यहां-वहां अपने नाम के शिला पट लगवाता फिरता है।

यदि व्यक्ति किसी को कुछ दान या कोई मदद करता है, तो उसे इसके बदले किसी भी तरह की उम्मीद या आशा नहीं करनी चाहिए, ताकि उसका कर्म सत्कर्म बन सके, कहीं ऐसा न हो कि वह केवल उसका अहंकार बनके रह जाय।

धन्यवाद..

आपके पचहरा सर

204-नई शिक्षा नीति एक समीक्षा..

नई “शिक्षा नीति” अर्थात NEP,2020..

समस्त भारत में जब नई शिक्षा नीति को लागू करने की केन्द्रीय कैबिनेट ने अपनी मंजूरी दी, तो आमजन के लिए ये एक हर्ष का विषय है। क्योंकि ऐसा निर्णय एक लंबे अर्से के बाद लिया गया है।

“के एल जैन” जैसी प्रदेश की नामचीन शिक्षण संस्था जब अपने ” विद्यालय के अस्सी वर्ष की स्मृतियां ” विशेषांक निकाल रही है, और उसमें “नई शिक्षा नीति की समीक्षा न की जाय ऐसा हो नहीं सकता।

इसलिए अपने छात्र एवं छात्राओं के हित को ध्यान में रखते हुए..एन.ई.पी.,2020 की बिंदुवार समीक्षा.. होनी ही चाहिए।

आइए.. एक नज़र डालते हैं कि, 34 साल बाद भारतीय शिक्षा नीति में आखिर क्या-क्या बदलाव किए गए हैं:

देश की शिक्षा नीति में हुए बदलाव को समझना न केवल शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के लिए जरूरी है अपितु “नई शिक्षा नीति” को जानना.. देश के प्रत्येक नागरिक के लिए नितांत आवश्यक..हैं। तभी तो हम अपने नौनिहालों को शिक्षा के क्षेत्र में सही दिशा दे पाएंगे।

जैसे; अब

10वीं बोर्ड एवं एम फिल.. खत्म ==================

माननीय मंत्री , शिक्षा विभाग , भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित नई शिक्षा नीति 2020 को केन्द्रीय कैबिनेट ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है। केन्द्रीय सरकार की कैबिनेट स्वीकृति के बाद 2023 से देश में नई शिक्षा नीति लागू होने से ठीक 36 साल बाद ऐसा सम्भव हो सका है।

कैबिनेट ने नई शिक्षा नीति (New Education Policy, 2020) को आखिर हरी झंडी दे ही दी।

वैसे 34 साल बाद शिक्षा नीति में आमूल-चूल परिवर्तन किये गये हैं।

नई शिक्षा नीति की उल्लेखनीय बातें एकदम सरल तरीके से इस प्रकार हैं:

5 Years Fundamental ;

1.  Nursery    @4 Years

2.  Jr KG        @5 Years

3.  Sr KG        @6 Years

4.  Std 1st     @7 Years

5.  Std 2nd    @8 Years 3 Years

Preparatory;

6.  Std 3rd     @9 Years

7.  Std 4th     @10 Years

8.  Std 5th     @11 Years 3 Years Middle

9.  Std 6th     @12 Years

10.Std 7th     @13 Years

11.Std 8th     @14 Years 4 Years

Secondary ;

12.Std 9th     @15 Years

13.Std SSC    @16 Years

14.Std FYJC  @17Years

15.STD SYJC @18 Years खास बातें केवल 12वीं क्‍लास में होगा बोर्ड, MPhil होगा बंद, कॉलेज की डिग्री चार साल की।

■10वीं बोर्ड खत्‍म, MPhil भी होगा बंद,

◆अब 5वीं तक के छात्रों को मातृ भाषा, स्थानीय भाषा और राष्ट्र भाषा में ही पढ़ाया जाएगा, बाकी विषय चाहे वो अंग्रेजी ही क्यों न हो, एक सब्जेक्ट के तौर पर ही पढ़ाया जाएगा,

● गौर कीजिएगा पहले 10वी बोर्ड की परीक्षा देना अनिवार्य होता था, जो अब नहीं होगा,

9वींं से 12वींं क्लास तक सेमेस्टर में परीक्षा होगी.।

स्कूली शिक्षा को 5+3+3+4 फॉर्मूले के तहत पढ़ाया जाएगा।

■ वहीं कॉलेज की डिग्री 3 और 4 साल की होगी। यानि कि ग्रेजुएशन के पहले साल पर सर्टिफिकेट, दूसरे साल पर डिप्‍लोमा, तीसरे साल में डिग्री मिलेगी.।

◆3 साल की डिग्री उन छात्रों के लिए है जिन्हें हायर एजुकेशन नहीं लेना है. वहीं हायर एजुकेशन करने वाले छात्रों को चार साल की डिग्री करनी होगी। चार साल की डिग्री करने वाले स्‍टूडेंट्स एक साल में एम. ए. कर सकेंगे।

●MA के छात्र अब सीधे Ph.D. कर सकेंगे।

स्‍टूडेंट्स बीच में अब दूसरे कोर्सेज भी कर सकेंगे।

हायर एजुकेशन में 2035 तक ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो 50 फीसदी हो जाएगा। वहीं नई शिक्षा नीति के तहत कोई छात्र एक कोर्स के बीच में अगर कोई दूसरा कोर्स करना चाहे तो पहले कोर्स से सीमित समय के लिए ब्रेक लेकर वो दूसरा कोर्स कर सकेगा।

■हायर एजुकेशन में भी कई सुधार किए गए हैं। सुधारों में ग्रेडेड अकेडमिक, ऐडमिनिस्ट्रेटिव और फाइनेंशियल ऑटोनॉमी आदि शामिल हैं।

इसके अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में ई-कोर्स शुरू किए जाएंगे। वर्चुअल लैब्स विकसित किए जाएंगे। एक नैशनल एजुकेशनल साइंटफिक फोरम (NETF) शुरू किया जाएगा।

आपको बता दें कि देश में 45 हजार कॉलेज हैं।

मगर अब सरकारी, निजी, डीम्‍ड सभी संस्‍थानों के लिए होंगे समान नियम।

धन्यवाद

समीक्षक ; योगेंद्र सिंह पचहरा,

शिक्षक,के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस

203- निर्माण/प्रलय

जो.. जो..हम जानते हैं, क्या वे सब अपने रोज-मर्रा के जीवन में हम मानते भी हैं..? अर्थात पालन भी करते हैं।

सवाल; अनुपालन करने का है। क्या हम वे सब अनुपालन कर पाते हैं????

जैसे;

परिवार में “पिता”

घर में “नारी”

समाज में “गुरु”

संस्था में “अधिकारी”

एवं

देश की सत्ता पर काबिज़ “राजा”

भले ही शारीरिक – संरचना से ये हमें मानव दिखते हों..

मगर ये कभी भी “साधारण-मानव” नहीं होते..

दरअसल,ये होते हैं “महामानव”

इसीलिए इनके साथ हमेशा तहज़ीब से पेश आना चाहिए..

क्योंकि,

“निर्माण” और “प्रलय” का धरती पर जब भी क्रियान्वयन हुआ है..

सदैव इन में से ही किसी के हाथों हुआ है।

(मेरे विचार पर संदेह हो.. तो इतिहास में झांक लीजिएगा।)

पचहरा सर, नीमगांव वाले

राधे गोविंद..राधे गोविंद..

202- कटी-पतंग

एक बार एक पुत्र ने अपने पिता से पूछा!

पिता जी!.. अक्सर लोग ‘सफल जीवन’ सफल जीवन करते रहते हैं..

आख़िर जीवन में “सफलता” के मानक हैं क्या..??

पिता ने कहा; बेटा! अंग्रेज कवि ‘बैन जॉनसन’ के मुताबिक “Perfect Life” का long life से,तो कोई सरोकार होता ही नहीं। मगर..

Theme of the poem..” A short and meaningful life is far better than life that is long but uneventful.”

कवि के अनुसार,तो दुनियां बिच जब तक भी रहो प्रसन्नता पूर्वक एवं अपने परिवार, समाज या देश दुनियां के लिए उपयोगी रहो।

मगर ये बताते हुए उस पिता को लगा कि बच्चा जीवन की सफलता का फलसफा अभी भी जान नहीं पा रहा है,तो अमुक पिता अपने बेटे को सही से समझाने के लिए एक खुले मैदान में पतंग 🔶 उड़ाने के लिए ले गया..

मैदान पर बेटा अपने पिता को पतंग उड़ाते हुए बड़े ध्यान से देख रहा था…

थोड़ी देर बाद बेटा बोला- पापा.. मुझे लग रहा है कि इस धागे की वजह से पतंग की उमंग पूरी नहीं हो पा रही.. पतंग अपनी पूरी आजादी से ऊपर की ओर उठ भी नहीं पा रही है, क्यों न इस धागे को तोड़ दें !! धागे से आजाद होते ही ये बहुत ऊंची जा सकती है।….

पिता को तो आज उसे सबक सिखाना ही था.. इसलिए उसके कहते ही, पिता ने तुरंत पतंग को धागे से मुक्त कर दिया ..

जैसे ही वह धागे से कटी, एकबार तो थोड़ा सा ऊपर जाती हुई दिखी…मगर तभी घुमेड सी खाने लगी..फिर,तो ऐसी नीचे गिरी … कि वह “कटी-पतंग” उनकी आंखों से ओझल होती ही चली गई..।

तभी पिता ने कहा, बेटा यही हाल इंसान का होता है..परिवार व समाज से कट होते ही वो भी कहीं खोता सा चला जाए.. उसकी हालत भी “कटी-पतंग” जैसी ही हो जाए।

इसी के सहारे..एक पिता अपने बेटे को जीवन के वास्तविक ‘दर्शन’ को समझाने का प्रयास करते हुए कहता है कि, बेटा.. ‘जिंदगी में हम जिस ऊंचाई या जिस किसी मुकाम पर होते हैं..हमें अक्सर यही लगता है कि, कुछ चीजें, जिनसे हम जुड़े हुए हैं, वे हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं।..तभी अनमेंच्योर-लोग ऐसा सोचते हैं..क्यों न हम इन बेवजह के बंधनों से अपने आपको मुक्त कर लें..??

अर्थात

इनसे आज़ाद हो जाएं!! …

वास्तव में, जिन्हें लोग बंधन मानते हैं वही वे पतंग रूपी धागे हैं जो पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों के रूप में भारतीय समाज की व्यवस्था को ‘सुदृढ़’ बनाए रखते हैं।

अतः ये धागे हमें उस ऊंचाई पर बनाये रखने के लिए परम आवश्यक हैं.

-घर-⛪ -परिवार-👨‍👨‍👧‍👦 -अनुशासन-🏃🏼 -माता-पिता-👪 -गुरूवर,👵🏻 -समाज उसके बाद देश फिर ये सारी दुनियां।

. ध्यानपूर्वक समझ लें ..

हो सकता है..’इन संबंध रूपी धागों से अलग होने पर..शुरू शुरू में कुछ समय के लिए आपको लगे, कि आपने ठीक किया। और आप कुछ सुकून सा भी महसूस करें, जैसे पतंग धागे से कट होने पर एक पल के लिए राहत की सांस लेते हुए ऊपर की ओर उठना चाहती है परंतु कोई आधार या सहारा न होने के कारण दूसरे ही पल घूमेड़ खाकर गिरते हुए धूल चटाने को मजबूर हो जाती है।

इसी प्रकार कुछ ही समय बाद इंसान को भी संकेत मिलने लग जाते हैं। कई बार समझदार लोग समय रहते स्थिति को संभाल लेते हैं..और वहीं अपनी अज्ञानता में मदहोश लोग ईगो के चलते “कटी पतंग” की तरह दिन प्रतिदिन गर्त में चलते चले जाते हैं।

“अतः जीवन में यदि अच्छाई रूपी ऊंचाई पर जाना और फिर उस ऊंचाई पर बने रहना चाहते हो,तो उस ऊंचाई को मेंटेन रखने के लिए अपने पूर्वजों द्वारा बनाए गए इन धागे रूपी रिश्तों के ताने बाने के साथ हमेशा संतुलन बनाए रखियेगा। क्योंकि कोई भी “रिश्ता” कभी छोटा नहीं होता।

नोट;- इसलिए भूलकर भी किसी रिश्ते को पतंग की तरह “झटकर कभी तोड़िएगा..नहीं।” यदि कभी कोई रिश्ता असहज लगने लगे,तो कुछ दिन धैर्य पूर्वक थोड़ा शांत रहिएगा..वक्त पुनः उस अमुक व्यक्ति को रिश्ते तरजीह समझा देगा।

“धागे का पतंग से जो सम्बन्ध है। वैसा ही कच्चा सा हम इंसानों का हर रिश्ते के बीच संबंध होता है। उसके सही संतुलन से प्राप्त ऊंचाई को ही विद्वानों द्वारा “सफल-जीवन” अनुकरणीय.. या एक आदर्श जीवन की संज्ञा दी गई है। जिसे न केवल सब देखें बल्कि ऐसा जीवन जिसे हर कोई जीना चाहे। उस जीवन को ही “सफल जीवन” कहा जाता है। 👍

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा फ्रॉम नीमगांव 🙏🙏

201.. धैर्य

एक बार ईश्वर का एक सच्चा भक्त अकेला उदास बैठा हुआ कुछ सोच रहा था..उसको दुखी देख..भगवन उसके पास आये।अचानक भगवान को अपने सामने देख भक्त ने पुछा! हे प्रभो!

मुझे ज़िन्दगी में बहुत असफलताएं मिलीं हैं, जिनसे मैं अब निराश हो चूका हूँ। आप ही मुझे बताओ कि मेरे इस जीवन का अब क्या प्रयोजन है..? और इसकी क्या कीमत है..??

भगवान ने अपने उस अनन्य भक्त को एक लाल रंग का चमकदार पत्थर देते हुए, कहा “जाओ दुनियां में इस पत्थर की कीमत का पता लगाओ, इसके साथ ही तुम्हें अपनी ज़िन्दगी की कीमत का भी पता चल जाएगा..

लेकिन ध्यान रहे कि इस पत्थर को बेचना नहीं।”

वो भक्त उस लाल चमकदार पत्थर को लेकर सबसे पहले एक फल वाले के पास गया और कहा “भाई.. ये पत्थर कितने में खरीद लोगे?” फल वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा “मुझसे 10 संतरे ले जाओ और ये पत्थर मुझे दे दो।”

उस व्यक्ति ने कहा कि, नहीं मैं, इसे बेच तो नहीं सकता..

फिर वो आदमी एक सब्ज़ी वाले के पास गया और उसे कहा “भाई… ये लाल पत्थर कितने का खरीद लोगे?” सब्ज़ी वाले ने कहा कि मुझसे एक बोरी आलू ले जाओ और ये पत्थर मुझे बेच दो।

लेकिन भगवान् के कहे अनुसार उस भक्त ने कहा कि नहीं मैं ये बेच ही तो नहीं सकता।

फिर वो व्यक्ति उस पत्थर को लेकर एक सुनार की दूकान में गया जहाँ कई तरह-तरह के आभूषण पड़े हुए थे। उस व्यक्ति ने सुनार को वो पत्थर दिखाया और उस सुनार ने बड़े गौर से उस पत्थर को देखा और फिर कहा “मैं तुम्हें 1 करोड़ रुपये दूंगा, ये पत्थर मुझे बेच दो।” फिर उस व्यक्ति ने सुनार से माफ़ी मांगी और कहा कि ये पत्थर मैं बेचने नहीं केवल इसकी कीमत ही जानने आया हूं।

सुनार ने फिर कहा “अच्छा चलो ठीक है, मैं तुम्हें 2 करोड़ दे दूंगा, ये पत्थर मुझे दे दो।” सुनार की बात सुनकर अब वो भक्त चौंक गया।

लेकिन सुनार को मना करके वो आगे बढ़ गया और अब वह एक हीरे बेचने वाले की दूकान में पहुंचा, हीरे का व्यापारी उस लाल चमकदार पत्थर को पूरे 10 मिनट तक देखता ही रहा.. और फिर एक मलमल का कपडा लिया और उस पत्थर को उस पर रख दिया. फिर उस व्यापारी ने उस पत्थर पर अपना माथा टेका और कहा “तुम्हें ये वेश कीमती चीज कहाँ से मिली!!, मेरे भाई ये तो इस दुनिया का सबसे “अनमोल रत्न” है। अगर दुनिया की सारी दौलत भी लगा दी जाए तो भी इस लाल पत्थर को नहीं खरीदा जा सकता।

ये सुनकर..तो वो भक्त बहुत ही हैरान हुआ और दौड़ा.. दौड़ा.. सीधा भगवान के पास गया और उन्हें सारी घटनाएं बताई और फिर उसने भगवान से पुछा “हे प्रभो! अब मुझे बताईये कि मेरे इस जीवन की क्या कीमत है?” भगवान ने कहा “फल वाले ने, सब्ज़ी वाले ने, सुनार ने और हीरे के व्यापारी ने। तुम्हें जीवन की वास्तविक कीमत बता तो दी। बड़े भोले हो नहीं समझे!!

हे मनुष्य, किसी के लिए तुम एक पत्थर के टुकड़े के ही सामान हो, तो किसी के लिए बहुमूल्य रत्न समान। हर किसी ने अपनी अपनी क्षमता व जानकारी के अनुसार तुम्हें उस पत्थर की कीमत के रूप में तुम्हारी कीमत बता दी है। लेकिन उस हीरे के व्यापारी ने जिस प्रकार इस पत्थर को पहचान कर..वास्तविक कीमत लगाई है। ठीक वैसे सभी लोग तुम्हारी अर्थात किसी भी सांसारिक ‘व्यक्ति’ की असल कीमत नहीं जान पाते.. अतः वे अंडर एस्टीमेट करते हैं..

इसीलिए अब ज़िन्दगी में कभी निराश मत होना, बस त्यागपूर्ण भाव में जीते.. हुए ‘धैर्य’ से अपना कर्म करते चले जाइयेगा। इसी में “जीवन” का सार है।

शिक्षा:

इस दुनिया में हर मनुष्य के पास कोई ना कोई ऐसा हुनर अवश्य होता है जो सही वक़्त पर निखर कर आता ही है। लेकिन उसके लिए परिश्रम और धैर्य की ज़रूरत पड़ती है।

सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, मेरे ख्याल से वही पर्याप्त भी है।। 👍 पचहरा सर