230- व्यक्तित्व

चलो! आज थोड़ा पर्सनेलिटी अर्थात “व्यक्तित्व” जिसका मानव जीवन में खासा महत्व होता है। उसकी ओर मुखातिव होते हैं।

लोगों पर इसके ‘प्रभाव’ का असर देखते हैं कैसा होता है..??

हमारे आसपास की दुनिया में क्या हो रहा है यह,तो हम सब देख ही रहे हैं। आजकल मेरे ख्याल से सभी पर “अपना प्रभाव चलाना” लोगों के लिए यही दुनिया है।

मैं देख रहा हूं कि हर कोई इसी धुना बुनी में लगा रहता है।

एक और बात.. हमारी शक्ति का कुछ अंश तो हमारे शरीर धारण के उपयोग में अवश्य आ जाता है। और बाकी हमारी ऊर्जा का हर कण दिन रात दूसरों पर अपना प्रभाव डालने में या उसके प्रयास में नष्ट करता रहता है।

हमारा शरीर, हमारे गुण, हमारी बुद्धि तथा हमारा आत्मिक बल ये सब लगातार दूसरों पर प्रभाव डालते आ रहे हैं।

इसी प्रकार इसका उलट दूसरों का प्रभाव हम पर भी कुछ वैसे ही पड़ता चला आ रहा है।

हमारे आसपास यही चल रहा है।

अब हम एक स्कूल के दृष्टांत से इसे समझने का प्रयास करते हैं।

एक मनुष्य तुम्हारे पास आता है वह खूब पढ़ा लिखा है। उसकी भाषा भी सुंदर है वह तुमसे लगभग एक घंटा बात करता है, तो भी वह अपना असर तुम पर नहीं छोड़ पाता।

इसके बाद फिर एक दूसरा व्यक्ति आता है और वह सिर्फ कुछ गिने चुने शब्द बोलता है शायद वे व्याकरण सम्मत और भाषा में ठीक से व्यवस्थित भी नहीं हैं। फिर भी वह ऐसा असर छोड़ जाता है कि हम उसे भुलाए नहीं भूलते।

ये सब क्या है..??

ऐसा “सेंस एक्सपीरियंस” तो हम में से बहुतों ने कई एक बार महसूस किया होगा ..??

इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य पर जो प्रभाव पड़ता है वह सारा प्रभाव “शब्दों” का नहीं होता। और किसी के “विचार” भी हमें शायद एक तिहाई प्रभावित ही कर पाते हैं। शायद प्रभाव का एक तिहाई अंश ही उत्पन्न करते होंगे। परंतु वास्तविकता में शेष दो तिहाई प्रभाव तो “व्यक्तित्व” का ही होता है।

जिसे हम ‘वैयक्तिक चुंबकत्व’ भी कहते हैं। वही प्रकट होकर तुमको प्रभावित कर जाता है। आपने देखा ही होगा..हम लोगों के कुटुंब में मुखिया होते हैं इनमें से कोई कोई अपना घर चलाने में सफल होते हैं परंतु कोई-कोई नहीं भी होते हैं। ऐसा क्यों है..?? जब हमें असफलता मिलती है तो हम दूसरों को पूछते हैं ..ऐसा क्यों हुआ..?? ज्यों ही हमें असफलता मिली, त्यों ही हमने कहना शुरू कर दिया कि, अमुक अमुक मेरी असफलता के कारण है।

असफलता आने पर मनुष्य अपनी दुर्बलता तथा दोष को खुद स्वीकार करना नहीं चाहता। उस वक्त प्रत्येक मनुष्य यह दिखलाने की कोशिश करता है कि वह निर्दोष है। और वह अपना सारा दोष अपने कुटुंब के किसी और व्यक्ति/वस्तु पर अंततः भाग्य पर मढ़ना चाहता है।

जब घर का मुखिया असफल हो तो उसे स्वयं से पूछना चाहिए कि, “कुछ लोग अपना घर कैसे चलाते हैं..?? कुछ बहुत अच्छी तरह से चला सकते हैं और उस प्रकार दूसरे क्यों नहीं चला पाते..??

इसे गंभीरता पूर्वक समझेंगे तब तुम्हें पता चलेगा कि यह अंतर मनुष्य के ही कारण है। यानी उसकी उपस्थिति और उसके व्यक्तित्व के कारण है। यदि मानव जाति के बड़े-बड़े नेताओं की बात ली जाए तो हमें सदा यही दिखाई देगा कि उनका व्यक्तित्व ही उनके प्रभाव का कारण था। अब प्राचीन काल के महान लेखकों वह उनके विचारों को लो सच पूछो तो उन्होंने हमारे समक्ष कितने अच्छे और सच्चे विचार रखे, अतीतकालीन लोकनायकों की जो रचनाएं तथा पुस्तक आज हमें उपलब्ध है, उनमें से प्रत्येक का मूल्यांकन करें,तो कुछ मुट्ठी भर ही असल में नए एवं स्वतंत्र विचार हैं जो अभी तक इस संसार में सोचे गए हैं। उन लोगों ने जो विचार हमारे लिए छोड़े हैं,एक बार पुनः उनको उन्हीं की पुस्तकों में से पढ़ो तो वह हमें कोई दिग्गज नहीं प्रतीत होते। तथापि हम जानते हैं कि अपने समय में ही दिग्गज थे। इसका कारण क्या है वह जो बहुत बड़े प्रतीत होते थे। वह मात्र उनके सोचे हुए विचारों या उनकी लिखी हुई पुस्तकों के कारण नहीं था। और ना ही उनके दिए हुए भाषणों के कारण ही था। वह तो किसी और “बात” के ही कारण था, जो अब निकल गई है अब “वह” हमारे सामने मौजूद नहीं है। ‘वह’ अर्थात उनका “व्यक्तित्व” जैसा मैं पहले कह चुका हूं कि दो तिहाई अंश व्यक्तित्व होता है।और बाकी एक तिहाई अंश मनुष्य की बुद्धि और उसके कहे हुए शब्द होते हैं। सच्चा मनुष्य या उसका व्यक्तित्व ही वह वस्तु है जो हम पर प्रभाव डालते हैं। “कर्म” तो हमारे “व्यक्तित्व” की बाह्य अभिव्यक्ति मात्र है। व्यक्ति न होने पर कम तो होंगे ही कारण के रहते हुए कार्य का आविर्भाव अवश्यंभावी है।

सारी शिक्षा समस्त प्रशिक्षण का एकमेव उद्देश्य मनुष्य का सही निर्माण होना या मनुष्य में उचित गुणों का सृजन करना है। पर हम यह न करके केवल बहिरंग पर ही पानी चढ़ाने का प्रयत्न किया करते हैं। जहां व्यक्तित्व का ही अभाव है वहां सिर्फ बहिरंग पर पानी चढ़ाने का प्रयत्न करने से क्या लाभ..??

सारी शिक्षा का ध्येय है मनुष्य का चहुमुखी विकास करना। वह मनुष्य जो अपना प्रभाव सब पर डालता है। जो अपने संगी साथियों पर जादू सा कर देता है। मनुष्य “शक्ति” का एक महान केंद्र है। और जब उसमें ये मानवता रूपांतरित हो जाती हैं। तब वह जो चाहे कर सकता है।

“व्यक्तित्व” का महत्व समझिएगा!! .. कि “वह” जिस भी वस्तु पर अपना “प्रभाव” डालता है, उसी को क्रियाशील बना देता है।

धन्यवाद

229 – मूल तत्व

जी, हां ऐसा ज्ञान जो तुलनात्मक नजरिए से दुनियां के समस्त ज्ञान में सुपर हो.. और आध्यात्मिक दृष्टि से ‘जीवात्मा’ के लिए परम आवश्यक भी हो ..तो क्या ऐसे वैचारिक ‘ज्ञान’ को सारे ज्ञानों का “मूल तत्व” नहीं कह दिया जाएगा..??

विचार की प्रादुर्भाव अवस्था का “मूल तत्व” अर्थात बीज…

न्याय की कसौटी भी कुछ इसी ओर इशारा करती है कि अवश्य “मूल तत्व” कहा जाना चाहिए। विषय थोड़ा पेचीदा अवश्य है।

मगर विद्वान कहते हैं कि ‘ किसी भी कीमत ‘ पर हम सबको इसे जानने के लिए..थोड़ा चिंतन करना होगा।

देश या अपने प्रदेश की “पाठ्यक्रम निर्धारण समिति” यदि ऐसे विषय को भारतीय शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित कर सके, तो ये बड़ा सराहनीय कदम होगा।

हालांकि, समूचे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां की पब्लिक अन्य देशों की तुलना में काफ़ी हद तक ‘सोल-कॉन्शियस’ अर्थात.. ‘आत्माभिमानी’ है।

क्या आपको नहीं लगता कि, औरों की तुलना में हम भारतीयों का इस तथ्य में फिर भी बहुत विश्वास है कि, हम महज़ “एक शरीर.. नहीं.. ‘आत्मा’ हैं।”

जबकि पश्चिमी देशों के लोगों में ‘बॉडी-कॉन्शियस’ का गुमान झलकता है। लेकिन वहां अब काफी परिवर्तन देखने में आ रहा है।

वास्तव में आंकलन किया जाए, तो समूची दुनियां में ‘देहाभिमानियों’ की जमात कहीं अधिक है। आंकड़े तो यहां तक कहते हैं कि, दुनियाँ की अस्सी फीसदी आबादी ‘डिग्रैस’ मोड पर है। कुल मिलाकर जिंदगी की असल राह से भटकी हुई है।

इस बात का अंदाजा आप ऐसी घटनाओं से लगा सकते हैं कि भारत में “यू पी एस सी” के थ्रू आई ए एस जैसी गंभीर परीक्षा क्रैक करने में प्रतियोगियों को बहुत ‘फोकस्ड’ होकर.. ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाने के बाद.. वर्षों से तैयारी कर रहे एस्पायरेंट में से मात्र दस प्रतिशत ही सलेक्शन ले पाते हैं। वे फिर अपने विभागीय लीडर के प्रेशर में आकर या पारिवारिक गृह क्लेश से तंग होकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ले, तो आप क्या कहेंगे..?? हैं।

जहां तक मैं सोच पा रहा हूं .. ऐसे लोगों में “भौतिकता की प्रचुरता एवं उनका आध्यात्म शून्य” होता होगा। जो उन्हें ऐसा करने को बाध्य करता है।

वरना! तनिक सोचिएगा.. समय से पूर्व खुद अपने स्थूल शरीर को नष्ट कर देने के बाद ..

क्या..उन्हें तुरंत दूसरा शरीर मिल जायेगा..? और मान लो.. मिल भी जाए, तो इस बात की क्या गारंटी है कि आप सूअर,कुत्ता,बंदर बगुला आदि नहीं..बनेंगे..फिर से मनुष्य ही बनोगे.. चलो ! मनुष्य बन भी गए.. क्या जिंदगी को उचित आकार देने के लिए फिर संघर्ष नहीं करना होगा..??

“जिन्दगी हर कदम एक नई जंग है..” वाले..दुनियां के इस दस्तूर से बच जायेंगे.. क्या..?? क्या वे ऐसा सोचते हैं कि वहां बहुत बड़ी अथॉरिटी आपका इंतजार कर रही होगी.? जो जाते ही पदासीन हो जाओगे..??

मांफ कीजिएगा.. इन मूल प्रश्नों का ख्याल न आना ही उनकी “आध्यात्मिक शून्यता” को दर्शाता है।

लेकिन ये बात भी अपनी जगह सही है कि अब दुनियां में स्वत: ही एक ऐसा दौर चल पड़ा है कि लोग अध्यात्म की ओर आने लगे हैं..और कुछ कुछ समझने भी लगे हैं।

इसीलिए कई बार लोगों के मन में अक्सर एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है..

और वो जिज्ञासा कुछ इस तरह के सवालों को जन्म देती है..जैसे;

“जब मां के गर्भ में शिशु के स्थूल शरीर को आकार मिल रहा होता है, तो क्या उस वक्त.. शिशु के शरीर में ‘आत्मा’ होती है..” ??

ये प्रश्न ऐसा है कि इसका रहस्य ठीक से समझ आ जाए, तो मानव जीवन की बहुत सी अनसुलझी गुत्थियां सुलझ सकती हैं।

वर्षों पहले..लोगों के कुछ ऐसे पेचीदा सवालों को सुनने के बाद ही मेरे मन में भारतीय शास्त्रों व श्रीमद्भागवत गीता जैसे महान ग्रंथों का, अध्ययन करने की जिज्ञासा पैदा हुई थी।

जो मैंने अध्ययन के दौरान पाया कि शास्त्रों के अंदर जो ज्ञान है वह वाकई अदभुत है। सारे ज्ञानों का “मूल तत्व” है। उसके आधार पर ही मैं ऐसे जटिल मुद्दे पर एक लेख लिखने की हिमांकत कर रहा हूं।

वरना मेरी क्या बिसात है ऐसे गहन मुद्दों पर कुछ भी कह पाने की।..

श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण कहते हैं, “ममे माक्ष जीव लोके..अर्थात आत्मा” जो ईश्वर का अंश है। मृत्युलोक में आने पर गीता में ‘आत्मा की जर्नी’ अर्थात यात्रा के कुछ गहरे तथ्यों से पर्दा उठाते हुए.. भगवन हमें बता रहे हैं..

यहां मैं एक और बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि, ये आत्मा जब ईश्वरीय अंश है,तो फिर ये दुनियां बिच आती ही क्यों है..??

शास्त्रों में उल्लिखित आत्मा के मृत्युलोक में आने के उद्देश्य को जानकर एकबार को तो आप भी चकित रह जायेंगे….

मगर ईश्वर की सर्वोत्तम रचना कहे जाने वाला मनुष्य अपने जीवन के अमूल्य पलों को आज ‘स्ट्रेस’ में जी.. रहा है। हो सकता है.. उसे इस वृतांत से काफ़ी रिलैक्स महसूस हो।

शास्त्रों के अनुसार “जीवात्मा” अपने द्वारा किए गए कई एक जन्मों के संचित कर्मों में..से चुने गए कुछ खास कर्मों से निर्मित “प्रारब्ध” के वशीभूत दुनियां में अपनी आनंद-वृत्ति (एंजॉयिंग प्रोपेंसिटी) के लिए आती है।

गीता में स्पष्ट कहा गया है कि, “मां के गर्भ धारण करने के बाद ‘डे वन’ से ही आत्मा शिशु के अंदर मौजूद हो जाती है।

जबकि.. अमेरिका जैसे एडवांस देश में एक लंबे अर्से तक लोगों में ये धारणा बनी रही कि “सातवें महीने के बाद शिशु में आत्मा आती है..”

फिर बाद में मेडिकल साइंस ने भी अपना पक्ष रखते हुए कहा, कि “गर्भ में भ्रूण लगभग तीन महीने तक जस्ट ‘अ लोफ ऑफ़ फ्लैश’ यानी केवल “एक मांस का लोथड़ा” होता है।”

मां के गर्भ में शिशु के मूवमेंट करने पर फिर मेडिकल साइंस ने कुछ और अपडेट्स दिए..तब कहा, कि ये ही वो वक्त है जब “शिशु के अंदर आत्मा” आती है।

इसीलिए चिकित्सक लोग तीन-चार महीने के पीरियड तक बेचारी महिलाओं का एवोर्सन करके जाने अंजाने में भ्रूण हत्याएं करते रहे..

जबकि हमारे शास्त्रों व भगवतगीता में हजारों वर्ष पहले से.. स्पष्ट लिखा हुआ कि शिशु में पहले दिन से ही आत्मा विद्यमान रहती है।

शेष अध्ययन जारी है.. वक्त के अधीन अभी “मूल तत्व” पर रिसर्च चल रही है..

धन्यवाद

228 – दीवाली की शाम..

आज दीवाली की शाम “नीरज” जी की उत्कृष्ट रचना के साथ…

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

बहुत बार आई-गई यह दिवाली

मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है

बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक

कफन रात का हर चमन पर पड़ा है

न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे

उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ!

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

सृजन शान्ति के वास्ते है जरूरी

कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाये

तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा,

कि जब प्यार तलवार से जीत जाये,

घृणा बढ रही है, अमा चढ़ रही है

मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के

न वह बंद रहती किसी के भवन में,

किया क़ैद जिसने उसे शक्ति छल से

स्वयं उड़ गया वह धुंआ बन पवन में,

न मेरा-तुम्हारा सभी का प्रहर यह

इसे भी बुलाओ, उसे भी बुलाओ!

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

मगर चाहते तुम कि सारा उजाला

रहे दास बनकर सदा को तुम्हारा,

नहीं जानते फूस के गेह में पर

बुलाता सुबह किस तरह से अंगारा,

न फिर अग्नि कोई रचे रास इससे

सभी रो रहे आँसुओं को हंसाओ!

दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!

; गोपालदास ‘ नीरज ‘

227 – How to kill Democracy

यदि आप आत्मिक स्तर पर जागृत हैं, तो आप कदम कदम पर देख ही रहे होंगे कि न केवल लोकतंत्र पर हमला है बल्कि देश के कई बड़े संस्थानों पर योजना बंद तरीके से निरंतर हमले किए जा रहे हैं। आप समझ रहे होंगे कि यह ब्लैक इंडियन लीडर्स न केवल रंग के काले हैं बल्कि मन के भी बेहद काले हैं। सेवा के पदों पर कई कई पेंशन व मोटे वेतन पेट्रोल, मोबाइल,फॉरेन ट्रिप आदि के लिए भत्ते अपने आप ही बढ़ा लेने की व्यवस्थाएं निश्चित कर रखी हैं।

सिर्फ जन्म से भारतीय कहे जाने वाले इन नेताओं और उन फिरंगियों में कोई अधिक अंतर नहीं है। इन्होंने भी देश पर निरद्वंद शासन करते रहने के लिए देश की भोली भाली जनता को जाति/धर्मों में इस कदर बांट रखा है कि, सारा खेल समझने के बावजूद भी जनता इनके खिलाफ़ एक जुट नहीं हो पाती। क्योंकि ये नेता अपनी फरेब की कुर्सी को बचाए रखने के लिए दिन प्रतिदिन लोगों के बीच नफ़रत फैलाने में बहुत माहिर होते हैं।

इन्हीं के द्वारा व्याप्त महंगाई की मार से त्रस्त होने से..कुछ असहनीय परेशानियों के कारण जनता अब काफी संवेदनहीन होती जा रही हैं।

आपने एक बोध कथा पढ़ी होगी कि अगर एक मेंढक को उबलते हुए पानी में डाला जाए तो वह तुरंत उछल कर बाहर निकल आता है।

लेकिन यदि वही मेंढक पहले सामान्य पानी में डाला जाए फिर उस पानी के नीचे धीरे-धीरे आग जलाई जाती रहे..तो वह मेंढक बाहर नहीं निकलेगा क्योंकि पानी का ताप धीरे-धीरे एक एक डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ने से मेडक को ताप सहने की आदत होती जाएगी..और एक दिन ऐसी स्थिति आएगी कि वह मर भी जाए। मगर छटपटाहट के साथ बाहर आने की जहमत नहीं उठा पायेगा।

इसे दूसरे शब्दों में हम ऐसे भी कह सकते हैं कि मेडक में छटपटाने की सामर्थ्य ही नहीं बचेगी। वह दिन प्रतिदिन बदलती उस स्थिति को अपने जीवन की नियति मानकर ताप सहता हुआ दुनियां से चला जायेगा।

यदि आप देश दुनियां के करेंट अफेयर्स पर अपनी पैनी नज़र रखते हैं,तो दुनियांभर के नेताओं के ऐसे बर्ताव से अच्छी तरह से वाकिफ होगे।

शायद ऐसी ही विकट परिस्थिति पर किसी कवि की ये रचना भी यहां काफी सटीक बैठती है कि, “दर्द सहने की इस कदर आदत सी हो गई है.. दर्द होता है.. मगर होता नहीं है।”

अर्थात आज जनता भी ठीक वैसे ही अपने दर्द की अनुभूति नहीं कर पा रही है। और यदि कर भी रही है,तो उसे लगता है कि ऐसा, तो सभी के साथ होता है।

अब कुछ वैसी ही स्थिति में दुनियाभर की जनता पड़ी हुई है।

जिस प्रकार मेंढक के लिए एक-एक डिग्री टेंपरेचर प्रतिदिन बढ़ाया जाता रहा है ठीक वैसे ही ये सरकारें भी जनता के लिए आए दिन सिकंजे कसती ही चली जा रही हैं। इसे आप किसी भी संदर्भ में देख और समझ सकते हैं..चाहे बेरोजगारी की बात हो या अनलिमिटेड टैक्स, स्वास्थ्य , शिक्षा या फिर और किसी संदर्भ में..

हमारे कुछ राजनीतिक विश्लेषक कभी-कभी ऐसा कहते हैं कि 2024 का चुनाव देश का आखिरी चुनाव हो सकता है। अर्थात अब चुनाव ही नहीं हुआ करेंगे।

मैं उन साथियों से बिल्कुल सहमत नहीं हूं। ठीक है। वह सही हो भी सकते हैं मगर मेरी नजर में यह लोकतंत्र की हत्या का बीसवीं सदी का बहुत ही प्राचीन मॉडल है।

जबकि कि हम अब इक्कीसवीं सदी में हैं, इसलिए किसी भी चीज़ की हत्या करने का मॉडल ही पुराना क्यों होगा। इस नए मॉडल में चुनाव आदि प्रक्रिया काफी नियमित वह व्यवस्थित तरीके से ही कराई जाएंगी।

लेकिन चुनाव में सत्ताधारी दल की विजय जरूर सुनिश्चित रहेगी।

आप ध्यान करें बीसवीं सदी टाइप नेता टीवी पर समाचार पत्रों में रेडियो आदि के माध्यम से सूचनाएं देते थे कि, कल से मार्शल लॉ लगा दिया गया है।, सेंसरशिप हो गई है इसलिए आप देश में ये..नहीं कर सकते वो..नहीं कर सकते। अर्थात आपकी फ्रीडम खत्म हो गई है वगैरा-वगैरा.. जैसे ; उदाहरण के तौर पर इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी के दौरान किया था, बांग्लादेश व पाकिस्तान में हुआ था, अफ्रीका महाद्वीप के पचासों देशो में भी ऐसा ही हुआ था। यह खुले तौर पर लोकतंत्र की हत्या के मॉडल की नजीर हैं।

मगर अब इक्कीसवीं सदी आते-आते दुनिया भर के तानाशाह (डिक्टेटर) भी समझदार हो गए हैं। वे भी जान गए हैं कि, अब सारी..जनता बेहोश नहीं है। कुछ लोग जागृत भी हो गए हैं। आप जानते हो कि, खुले तौर पर हत्या करने से खून हाथ में लग जाता है वह गंदा लगता है..उसे देखकर भोली भाली बेहोश पड़ी जनता कहीं जाग्रत न हो जाए। जिससे क्रांति के हालात तैयार जाएं। इसलिए वे ऐसा नहीं करते। वैसे उसकी अब कोई आवश्यकता भी नहीं है।

आज देश दुनिया में अनेकों मॉडर्न तकनीक विकसित हो चुकी है। फिर हाथ गंदे ही क्यों किए जाएं ??

इसलिए इक्कीसवीं सदी का मॉडल है कि, जो लोकतंत्र की हत्या करता है। वह सबसे पहले जनता का गुणगान करता है वह कहता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हमारा.. है। हम लोकतंत्र के जनक हैं। फिर जनता जनार्दन की जय बोलता है। और उसके बाद चाकू लेकर एक इंच का कट लगा देता है। फिर अगले दिन मंत्र पढ़े जाते हैं.. संसद की जय हो नई संसद नई इमारत, नई इबारत.. बगैरा.. वगैरा। फिर एक इंच काट देता है। फिर एक दिन कहता है कि, मीडिया की स्वतंत्रता बहुत अनिवार्य है। मीडिया को अपनी जिम्मेवारी निभानी चाहिए। उसके बाद एक इंच और काट देता है।

इस तरह धीरे धीरे काटकर और बांटकर हत्या करने का ये इक्कीसवीं सदी का नया मॉडल है।

ये केवल भारत में ही नहीं रूस में पुतिन कर रहा है, तुर्की में एरदोगिन कर रहा है, हंगरी में औरवाम जो कर रहा है। ये हत्या के बिल्कुल टेक्स्ट मॉडल है। ये मेरा मनगढ़ंत विचार नहीं है। इन षड्यंत्रों को उजागर करने के लिए एक पुस्तक भी प्रकाशित कर दी गई है। जिसका नाम है “हाऊ टू किल डेमोक्रेसी” ये दुनियां की वास्तविक तश्वीर से रुबरू कराती ‘पुस्तक’ आज मार्केट में उपलब्ध है।

यद्यपि उसमें किसी के नाम का उल्लेख तो नहीं किया गया है। लेकिन उस पुस्तक को जब आप पढेंगे,तो लगेगा कि ये सारे घटनाक्रम आपके ही इर्द गिर्द घटते चले जा रहे हैं।

पढ़ने के लिए धन्यवाद

जागो भाई.. जागो..

226 – पथ-भ्रष्ट

जी, हां लगभग पिछले एक दशक से देश की ‘जनता’ “सरकार और मीडिया” के इस “आउट ऑफ ट्रैक” या “पथ-भ्रष्ट” वाले खेला को न सिर्फ देख रही है वल्कि इन दोनों के इन नाजायज संबंधों को अच्छी तरह जान भी रही..है।

देश की सत्ता पर काबिज़ “नेताओं और मीडिया” को ट्रैक पर लाने के लिए.. हिंदी फिल्म “रोटी” के गाने की प्रासंगिकता भी अब थोड़ी सी और बढ़ गई है..जिसमें किसी भी स्तर के पथ भ्रष्टों को चेतावनी देने का भाव है।

उसके शुरू के बोल हैं..

“ये पब्लिक है.. सब जानती है..पब्लिक है..

अरे ! अंदर क्या है..?? अरे! बाहर क्या है..??

अन्दर बाहर ये सबकुछ पहचानती है..पब्लिक है..

ये पब्लिक है अपना हक मांगती है..पब्लिक है। पब्लिक है।”

हमारे देश की “सरकार व मीडिया” ने सत्ता की अंधी दौड़ में.. आपस में कुछ ऐसी सौदेबाजी कर ली हैं। कुछ खबरें होती नहीं हैं.. तब भी बना दी जाती हैं..

सच में जो “खबर” जनता के हित की होती हैं वे दबा दी जाती हैं। अर्थात उनको कवरेज देने के बजाय “कवर्ड” कर दिया जाता है। आप भी समझ रहे हो कि, ऐसा खेला देश में लगभग पिछले एक दशक से लगातार चल रहा है।

क्या देश के जिम्मेदार व सक्षम संस्थानों को इसका संज्ञान नहीं लेना चाहिए..??

इससे भी आगे बढ़कर एक और काम हो रहा है.. कि, अगर कोई सच्चा न्यूट्रल पत्रकार ऐसी खबर को कवरेज दे दे..जिसमें सरकार की मनसा नहीं हो। तत्काल उसके पीछे.. ईडी.. सी डी लगा दी जाती है। उसे “एनी हाऊ” जेल में ठूंस दिया जा रहा है।

ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि, बेचारी जनता विश्वास करे भी तो किस पै करे..??

ईडी का मिसयूज करने वाली सरकार पर..या उन फेक चैनल्स पर..जिनकी सरकार के साथ अच्छी सांठ गांठ है।

या फिर जेल में बंद बेचारे न्यूट्रल पत्रकार की सच्ची पत्रकारिता पर..??

क्योंकि इन समाचार प्रसारित करने वाले चैनल्स पर तो खबरों के नाम पर कुर्सी हड़पने की कहानियां गढ़ी जाती रहती हैं।

जहां संजीदा और सच्ची खबरों को छोड़कर टीआरपी के नाम पर सेंसेसनल लिज्म बेचा जा रहा है।

जबकि ये कौन नहीं जानता है कि लोकतांत्रिक देश में सबको अपने भले बुरे के बारे में सोचने की आजादी होती है।

लेकिन तथाकथित मीडिया ने किस हक से.. “निष्पक्ष होकर सच की जुवान” बनने के बजाय सरकार से अपना संपर्क बिठाना शुरू कर दिया है..ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि, शासन का स्वभाव भी ऐसी सेटिंग्स को तरजीह दे रहा है।

आखिर क्यों..?? क्यों बदल दिया है..देश के मीडिया ने अपना किरदार..?? कौन..?? क्या..? खबर किस अंदाज में बताएगा.. अनेकों अखबार न्यूज़ चैनल्स इसी होड़ में जुटे रहते हैं।

यह होड़ सिर्फ ‘खबर के बाजार’ में बने रहने की नहीं है, बल्कि खुद को सबसे तेज.. सबसे आगे.. साबित करने की एक ‘रेट रेसिंग’ है। जिसका लक्ष्य है ‘कामयाबी बनाम पैसा’ इस दौड़ में आगे रहने के लिए चाहिए ‘ ज्यादा से ज्यादा ऊंची टीआरपी’ जो तब्दील होती है ‘ एट रैवन्यू ‘ में। इस ‘एट रैवन्यू’ का मतलब होता है “अपार दौलत”।

कैसी विडंबना है !!! जहां पत्रकारों का “लक्ष्य” होना चाहिए था ‘खबरों’ का। वहां पैसा बन गया है। जबकि ‘पैसा’ किसी भी कार्य को अंजाम देने के लिए सिर्फ माध्यम बताया गया है।।

आज अधिकतर पत्रकारों ने इसका उलट कर दिया है ‘पैसा’ बना लिया है ‘लक्ष्य’ और खबरें बनके रह गई है सिर्फ ‘माध्यम’।

विचारक; योगेंद्र सिंह पचहरा,जैन इंटर कॉलेज,सासनी से..

225- God-habitancy

अपने हिंदी प्रेमी पाठकों की मांग पर.. “God-habitancy” article का हिंदी वर्जन।

“God habitancy” अर्थात “ईश्वर का वास” That is a complicated question..

“Where does The God live..?”

एक बार की बात है कि सृष्टि के शुरू में ईश्वर ने सभी देवी देवताओं की एक सभा बुलाई और पूछा, कि आप सभी बताइए! कि जब दुनियां में ये विधान निश्चित है कि प्रत्येक ‘जीवात्मा’ अपने संचित कर्म संस्कारों के आधार पर बने प्रारब्ध के अनुरूप मृत्युलोक में न केवल जन्म लेती है बल्कि अपने पूर्व और वर्तमान जन्म में किए कर्मों के बाबत मिला, उनका ‘जीवन’ वैसी ही जिंदगी का आकार लेता है,जो उनके पूर्व संचित कर्म संस्कारों, देशकाल परिस्थितियों के गणित के अनुरूप.. हमारी “पूर्व निर्धारण व्यवस्था” जिससे दुनियां संचालित होती है। उसमें नियत हो चुका होता है। वही उनकी ‘ नियति ‘ बन जाता हैं।

फिर भी सांसारिक जीवधारियों में सबसे श्रेष्ठ..

‘मनुष्य-आत्मा’ जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों से अधीर होकर.. मुझे पुकारते हुए.. मेरे प्रतीक चित्रों के सम्मुख अपने दुखड़े रोने लगते हैं।

जिससे मेरी साधना में विघ्न होता है।

अब आप सभी बताइएगा.. मैं, (ईश्वर) आखिर कहां रहूं..?? जिससे अपनी दैनिक साधना व दुनियां के अग्रिम कार्यों को अंजाम दे सकूं..??

इस पर गणेश जी ने उनके प्रश्न का सम्मान रखते हुए कहा, हे भगवन! आप हिमालय की चोटी पर जाकर रहने.. लग जाइए।

भगवन बोले कि हिमालय की चोटी मनुष्य की पहुंच से कितने दिन तक दूर रह सकेगी..??

इंद्रदेव बोले, तो फिर आप महासागर में चले जाइए.. ना!

तभी वरुण देव ने परामर्श किया, “भगवन क्यों न आप अंतरिक्ष में जाकर रहने लगें..

उचित परामर्श के अभाव में ईश्वर एक पल थोड़ा निराश हुए.. वे समझ नहीं पा रहे थे.. कि आखिर, मैं,अब क्या करूं..??

जब ये मंजर सूर्यदेव ने देखा, तो वे बोले,

हे कृपानिधान! आप एक काम कर सकते हैं कि, क्यों न “आप प्रत्येक जीवात्मा के ह्रदय में ही बैठ जाएं..

तब वे आपको पूरी दुनियां में ढूंढते फिरेंगे और आप शांति पूर्वक उन्हीं के “ह्रदय” रूपी मंदिर में सदैव वास करते रहेंगे।

आगे सूर्यदेव ने अपनी तार्किकता के आधार पर सुझाया, मृत्युलोक में आध्यात्मिक श्रेष्ठजन “जीवात्मा” के उद्धार हेतु ज्ञान प्रसार करते हुए मूल मंत्र बताते हैं कि, “सांसारिक जीवन हमेशा ‘मन, बुद्धि और विवेक’ के सही संश्लेषण से चलता है।”

मगर, ये कटु सत्य भी किसी से छुपा नहीं है कि, मन की “चंचलता” और बुद्धि के “भरमाने” की प्रकृति सांसारी मनुष्य के लिए इतनी बड़ी चुनौती है, कि इससे पार पाना हर किसी के बस की बात तो है नहीं..??

हां, कुछ जाग्रत मनुष्य आत्माएं..बड़े प्रयासों से आसक्ति से उभरकर स्वयं को अनासक्ति के दायरे में लाकर.. बहुत अभ्यास के बाद “मन – बुद्धि” को नियंत्रित कर सांसारिकता से ऊपर उठकर जब चेतन्य हो जाती हैं.. तो फिर वे केवल अपने “विवेक” से निर्देशित होने लगती हैं।

लेकिन समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसी श्रेष्ठ आत्माएं होती कितनी हैं..?? कइयों में कोई और करोड़ों में कोई एक या दो!!

भगवन ने कहा! सूर्यदेव जी सही कह रहे हो।

सूर्यदेव ने फिर कहा!, हे भगवन तभी उच्च भाव की स्थिति में “वे (आत्मा) आपको और आप (परमात्मा) उनको सहज भाव से पा जाओगे।

फिर कैसा विघ्न..??

जब आत्मा/परमात्मा का “एकत्व” हो जाए.. अर्थात संसारी आत्मा केवल्य को प्राप्त करने में सफल होकर आप में समाहित हो जाएं.. मानव योनी जो विद्वानों द्वारा “मोक्ष का द्वार” कही जाती है। उसे पालेंगे.. आख़िर यही जीवन का उद्देश्य है।

“संसारी जीवन” के लिए मोक्ष के मार्ग की राह भी तो कुछ इसी तरह बनती है ..??

इसलिए.. हे भगवन ! मेरे विचार से आप के लिए ‘उचित वास’ “जीव के ह्रदय” से अलग कहीं हो ही नहीं सकता। और ये दोनों के हित में भी रहेगा।

ईश्वर को सूर्यदेव का ये सारा तार्किक वृतांत बखूबी समझ आ गया..

वे स्वीकारते हुए बोले! “हां, सूर्यदेव आपकी बात में तथ्य है। वाकई! मेरे लिए उनके ह्रदय से उचित स्थान कहीं हो ही नहीं सकता।”

तब से ईश्वर (परम सत्ता) मनुष्य आत्मा के ह्रदय में विराजमान हैं..

अब विडंबना देखिए!! भौतिक दृष्टि वाले लोग उन्हें पृथ्वी,आकाश, पाताल, ऊपर-नीचे हर जगह ढूंढते फिरते हैं… मगर वे प्रभु को नहीं ढूंढ पा रहे हैं। इस प्रक्रिया से भला कभी ढूंढ भी पाएंगे..??

क्या आपको भी ऐसा ही लगता है..?? खैर..जो भी है।

दरअसल, यही है.. “God-habitancy” का राज.. अर्थात “ईश्वर के वास” का असल तथ्य..इस विचार को पढ़ने वाले महानुभाव को ह्रदय तल से मेरा धन्यवाद 👍

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा पौत्र श्री साहब सिंह मुखिया जी नीमगांव,राया,मथुरा से.. )

224- जाने अंजाने

जी, हां कई बार हम ‘जाने अंजाने’ में वो कर गुजरते हैं, जो नहीं करना चाहिए।

दरअसल; उत्तर भारत के लोगों को गणेश, विसर्जन नही करना चाहिए.. इसके पीछे लॉजिक है, कि गणेश जी केवल एक सप्ताह के लिए उत्तर से दक्षिण भारत, अपने भाई कार्तिकेय जी से मिलने गए थे। जब वे एक सप्ताह बाद वापस आने लगे, तो जैसा कि हमारी भारतीय संस्कृति में मेहमान को पुनः आगमन की कहने का चलन है.. अतः वहां (दक्षिण भारत) के लोगों ने अगले वर्ष पुनः आगमन के आग्रह में निमंत्रण देते वक्त ऐसा कहा या गाया, कि “गणपति बप्पा मोरिया, अगले वर्ष तू जल्दी आ..”

तब से दक्षिण भारत में ये पर्व उसी सुखद स्मृति में परम्परागत तरीके से मनाया जाता रहा है।

जबकि, हमारे उत्तर भारत में तो गणेश जी सदा विराजमान हैं।

आप ज़रा सोचिए, तो अगर आप भी उन दक्षिण भारतीयों की देखा देखी गणेश जी को अपने घर से विसर्जित कर देंगे, तो..बताइए.. इस पर्व के बाद हर वर्ष दीपावली का बड़ा पर्व आता है। यदि अब विसर्जन कर देंगे, तब आप दीपावली की पूजा बिना गणेश जी के कर सकेंगे क्या..??

हमारे उत्तर भारत का बच्चा बच्चा भी जनता है कि, दीपावली पर श्री लक्ष्मी गणेश जी की पूजा का बड़ा महत्व है..??

भाई जी! हमारे भारत में कुछ त्योहारों को “भौगोलिक महत्ता प्राप्त है। ” परंपरागत तरीके से वे सदैव उसी विशेष क्षेत्र में मनाये जाते रहे हैं। जहां उनका महत्व है।

इसलिए..”पूजन” तो देश दुनियां के किसी भी कोने में आप कर लीजिएगा।..मगर “विसर्जन” की परंपरा में शामिल होने पर तो आपको गंभीरता से मनन करना ही होगा।

“जाने अंजाने” किसी अंधी दौड़ में शामिल न हो जाइयेगा..

Thanks

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस से 🙏

223- असल-कमाई

एक शिक्षक व विचारक का अपनी “Teaching & Writing-Skill” के प्रति समर्पित आचरण ही उसकी “असल-कमाई” का स्रोत होता है। जो उसके शिक्षार्थियों व पाठकों के दिमांग की ऊंचाई एवं ह्रदय की गहराई बढ़ाने का द्योतक है। यही वे ग्राउंड्स हैं जिनके आधार पर हासिल किया गया सम्मान ही उनकी “असल-कमाई” है।

जो दुनियां दे जहन बिच हमेशा के लिए स्थापित हो जां दी ए.. अब चाहे आप सशरीर दुनियां में हों या न हों !! इससे कोई फर्क नहीं पैंदा ए।

क्योंकि वे वन्दे जो इनिंग्स खेल गए। वे अपने समया नू खेल गए.. हुंण दी रॉयल्टी इब कहीं होर न जां दी ए।

चलो! पूरा मंज़र समझिए .. कि, ये उण दिनों दी गल्ला ए, जिस वर्ष मेनु टायफाइयड हो जां दा ए। जिससे काफी दिण तक मैं अपणे अंदर वीकनेस महसूस कित्ता.. तब..

इक दिन देवी जी बोल दी ए.. “अजी सुनो! आज किन्नी तारीख हों दी ए..?? आपणी सैलरी कब तक आंदी ए ..? मैंनू पूछा क्यों.? की गल ए..?? अजी दूध वाला पर्चा दे गया सी। अकाउंट से कुछ रुपे निकड़वा लेते। किससे निकलवाऊं..?? मैं ही बैंक जाबंगा, आणे में ज़रा देर,तो हो जागी, तेन्यु परेशान न हों दी ए..बाजार दे होर भी कामों को निपटा लाबंगा। आप अपने कॉलेज के किसी शिक्षा सहायक कर्मचारी नू चैक देके रुपए निकड़वा लो ना। वीक्नेस दे बिच अभी तेनु बाजार जाने दी रिस्क ना लो। अजी, अब हमारे आपके दौर के जैसे युवक थोड़ेना ए..?? आज दे वन्दे नू टैम दी कद्र कहाँ है। छोटे-छोटे कामा नू घंटों लगा देवें ” इस पर देवी जी ने कहा, ” कॉलोनी में कॉलेज के इत्ते सारे विद्यार्थी तो, हेंगे, उन्हीं में से कोन्नू भेज देओ ना।

डाइनिंग हॉल में नाश्ता करते-करते मैंनू , देवी नू कहा..अरे भई ! मणा तो कोई ना करेगा मगर आप समझती ना हो, “ज़माणा बदल गया सी। अब वैसे विद्यार्थी कहाँ?? जो अपणे गुरुओं दे कामों के लिए दिल से आतुर रहवा करे..ए । इसमें दोष आज दे शिष्यों नू कोई ना। शिक्षा के इस व्यवसायीकरण ने उन्ने काफ़ी फॉर्मल बणा दियो सी।”

ये कहते-कहते मैं धीरे-धीरे बैंक दी ओर चल दिया.. महीने दा पहला सप्ताह होण वास्ते बैंक में बड्डी भीड़ थी। इक खाली कुर्सी नू देख कै मैं बैठ गया सी। होर विद ड्रॉल फार्म भर कै कैशियर वाले डेस्क के सामणे लाइण में खड़े होंण लाग रहे वन्दे नू संग मैनू ला गयो। तभी इक बैंक कर्मी नू मुझे बड़े आदर-सत्कार नू कुरसी पर बैठ जाणे कू बोल्या, और स्वयं फ़ार्म लेके कैशियर दी केबिन में चला गया। मैं नू कुछ समझ सकदा तब तक बैंक का एक असिस्टेंट मेरे लिए चाय ले आया। मैंने ये कहकर मना कर दिया कि भैया! डॉक्टर ने अभी कुछ दिण तेज पत्ती दी चाय नू मना कित्ता ए। असिस्टेंट बोला, “साहब ने आपको देख के हल्की पत्ती दी चाय दा आर्डर दिया था।” ये कहकर उसणे मेरे हथ में चाय थमा दी।

मैंनू घड़ी नू देख्या, दस बजकर पाँच मिंट हों ण लागरे थे। मैं नू सोचणे लगा, चाय दे रा ए, लगता है दो एक घंटे नू पहले काम न हो पावेगा।

तभी तकरीबन इक बाइस वर्षीय बंदा नू आक्के मेरे पैर छुए. होर विड्राॅल दी रकम मेरे हथ पै रख दी। इतनी फास्ट काम होते देख मैंनू दंग रह गया। मैंनू उण वन्दे नू धन्यवाद देते हुवे पुछ्या,

उसने बताया, “सर, मैं इस बैंक का नया ब्रांच मैनेजर हूं, एक सप्ताह पहले ही मैंने ज्वाॅइन किया है लेकिन शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए हैं..मैं ‘सुमित’ आपका विद्यार्थी रहा हूँ।”

“कौण से बैच दा सुमित!!” मैं नू आश्चर्य से पूछा। उसने कहा, जो एक बार परीक्षा कक्ष में भी आपने चांटे लगाए थे। सन् 2008 में ही तो मैं आपके कॉलेज से पास आउट होकर गया हूं। सर आपने मुझे अंग्रेजी पढ़ाई है। आप तो जानते ही हैं,अंग्रेजी में..मैं ठीक नहीं था।

घनी दाढ़ी के कारण नए बच्चों में आपका बड़ा खौफ रहता है। वैसे पढ़ते पढ़ते पता चलता है..आप काफी “सॉफ्ट हर्टेड पर्सन” हो। आपको अगर ध्यान हो तो रूम नंबर इक्कीस में आपकी कक्ष निरीक्षक की ड्यूटी थी। ग्यारहवीं की अर्द्ध वार्षिक परीक्षा के दौरान पास होने के लिहाज़ से मैं ना समझी.. से एक छोटी सी पर्ची रख लाया था..जैसे ही मैंने नकल करनी चाही..तभी उस वक्त के चीफ़ प्रॉक्टर श्री डी.पी.उपाध्याय जी के हाथों पकड़ा गया। आपने आकर तुरंत मेरे दो चांटे जड़ दिए..उस वक्त मन ही मन मैं उपाध्याय जी से कम आप से अधिक खफा हो रहा था।

उसने कहा! “प्रिंसिपल साहब और उपाध्याय जी दौनों मुझे रस्टीकेट करने पर आमदा थे..के एल जैन में होम एग्जाम में भी वही रूल्स फॉलो होते हैं जो बोर्ड में होते हैं..मुझे सेकंड कॉपी देने के लिए बोल दिया गया था.. तभी आप एक नए अंदाज में फिल्म “अंधाकानून” में अभिनीत अमिताभ बच्चन वाले डायलॉग..को बोलते हुए.. एकदम आगे आ गए..और कहा.. “नहीं सर!! ये बच्चा तो अभी एक अनसमझ परीक्षार्थी है..

मगर.. “एक, जुर्म के लिए किसी अपराधी को, कोई अदालत भी, दो बार सजा नहीं दे सकती।” उपाध्याय जी ने कहा, क्या मतलब..?? आपने उन्हें ध्यान दिलाते हुए कहा कि, उपाध्याय जी आपके ही सामने मैंने अभी इस बच्चे के गाल पै दो चांटे लगाए हैं। अपनी नासमझी की सजा तो ये पा चुका। That solve..इसीलिए अब इसे रस्टीकेट नहीं किया जा सकेगा..!!”

दूसरी बात ये कि, परीक्षार्थी तो गलती करते ही हैं। हम और आप निरीक्षक के साथ-साथ शिक्षक भी हैं, हमारा काम न केवल उनकी निगरानी है वल्कि उन्हें सही राह दिखाना भी है।

शायद सुमित की यह पहली गलती है,रस्टीकेट कर देने से तो इसका पूरा एक वर्ष बर्बाद हो जाएगा। इसलिए इसे जो सजा मिल गई है मेरे ख्याल से वही काफ़ी है। ”

सर! हम स्टूडेंट्स ने अपनी स्टडी के दौरान आपको कई एक बार ऐसे ही “हीरोइक-अंदाज” में देखा हुआ है। आप सदैव विद्यार्थियों के हित में विद्यालय प्रशासन के समक्ष भी खड़े होते रहे हो।

उस दिन आप एक “स्मार्ट इनविजिलेटर” के साथ-साथ.. मेरे एक वर्ष को बचाने के लिए वहीं तत्काल मुझे एक “पोलाइट गार्जियन” की भूमिका में भी नज़र आए।

आखिरकार सुयोग्य प्राचार्य श्री के एम शर्मा साहब ने आपकी बात को तेवज्जो देते हुए मेरा रस्टिकेशन कैंसिल कर दिया।

मेरे अर्द्ध वार्षिक परीक्षा परिणाम को देखते हुए.. आपने अतिरिक्त समय देकर मुझ जैसे कमजोर बच्चों के लिए कई एक्स्ट्रा क्लासेज भी दी थी। जिससे हम वार्षिक परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो सके.. परिणामस्वरूप आज आपकी सेवा में.. मैं एक ब्रांच मैनेजर की हैसियत से तैनात हूँ।

आपके द्वारा पढ़ाए हुए..मुझ जैसे कई एक शिष्य देश के उच्च पदों पर नियुक्त होकर राष्ट्र एवं राज्यों की सेवाओं में लगे हुए हैं।

उसी ने बताया सर ! मेरे ही नाम राशि सुमित कुमार जी जैन इस वक्त मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में पी सी एस के थ्रू सेलेक्ट होकर प्रशासनिक सेवा में एस डी एम के पद को सुशोभित कर रहे हैं।

उस दिन घर लौटते बखत मेरे “मानस मन” में ये विचार .. आणा लाज़मी था कि ज़माणा चाहे कित्ता भी क्यों न बदल जाए, यू सारी दुणीयां फुल्ली कंप्यूटराइज्ड क्यों ण हो जाए..but पाजी!शिक्षार्थियों व पाठकों के “ह्रदय की गहराइयों” में शिक्षकों व विचारकों का सम्माण, तो हमेशा रहबे गा।

शत श्रीअकाल

आपणा “युग” but इ कोई बंदा ना ए..युग,तो

इक “विचारधारा” दा नाम ए जी..थैंक यू

222 – नज़रिया

“नज़रिए..” का खेल देखिएगा..

“नजरिया” क्या क्या खेल दिखाता हैं??

परिस्थिति आने पर या किसी परिस्थिति की आशंका पर…सामान्यजन के मुंह से,तो ज्यादातर निकल ही जाता हैं.. कि “मैं न होता, तो क्या होता..?” जबकि कौन नहीं जानता..?? कि,”दुनियां बिच घटने वाली हर छोटी बड़ी घटना “विधाता के “पूर्व निर्धारण व्यवस्था” (प्रारब्ध) का ही हिस्सा होती हैं।

और कुछ नहीं ये “अहम भाव” भी गलतफहमी के शिकार होने पर उत्पन्न होता है।

इसलिए हमेशा सावधान! रहें..कई बार देखा गया है कि,ये कभी कभी ईश्वर के अनन्य भक्तों को भी अपने प्रभाव में लेने का प्रयास करता है।

इसे सुंदरकांड में आए एक प्रसंग के नज़रिए से समझने की कोशिश करते हैं।

ये मंज़र उस दौर का है जब “अशोक वाटिका” में रावण क्रोध से भरा हुआ तलवार लेकर, मां सीता को मारने के लिए दौड़ पड़ता है, तब हनुमान जी को लगा, कि इसकी तलवार छीनकर, अब मुझे इसका सर काट ही लेना होगा।

किन्तु, अगले ही क्षण, उन्होंने देखा कि, ख़ुद “मंदोदरी” ने ही रावण का हाथ पकड़ लिया!

यह देखकर हनुमान गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि जल्दबाजी में, मैं आगे बढ़ जाता,तो मैं सदैव इस भ्रम का शिकार बन जाता कि अशोक वाटिका पर यदि ..

“मै, न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?”

शायद इसीलिए जीवन में कहीं कहीं धैर्य रखने..को भी एक असल पहलू बताया गया है।

संसारी व्यक्ति अपनी अधीरता के कारण कई बार स्थिति को बिगाड़ लेते हैं। फिर अहम के शिकार मति भ्रम होने पर लोगों के बीच कहते.. फिरते हैं कि, अमुक वक्त पर.. यदि “मैं,न होता, तो क्या हो..ता।”

मेरा अनुभव कहता है..कुछ नहीं होता..परमसत्ता एवं प्रकृति हमेशा स्वयं संतुलन बना लेती है।

वशर्ते कि हम थोड़ा धैर्य रखें। अब आप सुंदरकांड के प्रकरण पर ही गौर कीजिएगा..

सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये, कि प्रभु आप सद्बुद्धि और दुरबुद्धि के द्वारा जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, उससे.. वही कार्य करा लेते हो। धन्य हैं प्रभो..आप धन्य हैं।

आगे चलकर जब “त्रिजटा” ने कहा कि “लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!” तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है, फिर ये त्रिजटा ऐसा कैसे कह रही है..?? कि उसने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? चलो! देखते हैं.. जो प्रभु इच्छा!

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब “विभीषण” ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने का उपाय प्रभु ने विभीषण को सद्बुद्धि देकर कर दिया!

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण से ही कहलवा दिया, कि “बंदर अर्थात दूत को मारा नहीं जायेगा!!” देखिए! बंदर को अपनी पूंछ से बहुत प्रेम होता है इसलिए इसकी पूंछ मे कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगा दीजिए इसको इतनी ही सजा काफ़ी है, तो हनुमान जी सोचने लगे कि, त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? मगर सारा प्रबन्ध आपने रावण से ही करा दिया! जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो फिर मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब व्यक्ति के कर्म संस्कारों के ताने बाने में बुना हुआ.. विधान है जो पूरी तरह ईश्वरीय है!

हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं!

इसीलिये हमें कभी भी किसी भ्रम में आकर किसी दृश्य को इस नज़रिया से नहीं देखना चाहिए.. कि… “मैं, न होता, तो क्या होता..?”

जी, हां! न मैं श्रेष्ठ हूँ, न मैं ख़ास हूँ,

मैं, तो अपने राधे गोविंद का बस एक छोटा सा दास हूँ॥ 👍 🙏🙏

221 – कर्म-गणित

आओ! आज ये जानने की चेष्टा करते हैं कि जीवन का “कर्म-गणित” क्या कहता है। क्या मनुष्य के भाग्य का “निर्धारण” पूर्व में ही हो जाता है..??

मगर उसके ग्राउंड्स या पैरामीटर्स क्या होते हैं..??

हिंदी में एक कहावत प्रचलित है.. कि, चाहे कोई कितना भी सयाना क्यों न हो मगर..

“कर्मगति” टारे नाहि टरे.. ‘अच्छी हो या बुरी’ व्यक्ति को उसका सामना एक न एक दिन करना ही होता है।

इसे एक सत्य घटना..के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं।

..कहानी में अब वे इस वर्तमान जन्म में ऋषिवर हैं जबकि पूर्व जन्म में एक मछुआरे थे कहानी में जो अब डाकू है, वह पूर्व जन्म में एक शिवभक्त पंडित थे।

हां तो सुनिएगा, आई मीन पढ़िएगा.. कहानी कुछ इस प्रकार से है..

एक ऋषिवर नगर से दूर जंगल में स्थित शिव मंदिर में भगवान् शिव की पूजा में लींन रहते थे।

कई वर्षो से यह उनका अखंड नियम चल रहा था। उसी जंगल में एक नास्तिक डाकू भी डेरा डाले हुए था। उस डाकू का भय आसपास के क्षेत्र में दूर दूर तक व्याप्त था।

वह मंदिरों में भी चोरी करने से नहीं चूकता था।

एक दिन उस डाकू की नजर उस ऋषि पर पड़ गईं। उसने सोचा यह ऋषि वीरान जंगल में बने इस एकांत मंदिर में ही क्यों पूजा करता है, हो न हो इसने मंदिर में कुछ माल छुपा रखा हो,

चलो ! आज इसे ही लूटता हूं।

‘अस्थिमाल’ नाम के डाकू ने उन ‘ प्रकृत्य ‘ नामक ऋषिवर से कहा! कि, जितना भी धन छुपाकर रखा है.. चुपचाप मेरे हवाले कर दो।

ऋषि उसे देखकर तनिक भी विचलित हुए बिना बोले- कैसा धन ? मैं तो यहाँ बिना किसी लोभ के एकांत में शांति से पूजा करने चला आता हूं।

डाकू को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने क्रोध में ऋषि को जोर से धक्का मारा.. ऋषि ठोकर खाकर शिवलिंग के पास जाकर गिरा और उसका सिर फट गया.. रक्त की धारा फूट पड़ी।

इसी बीच एक आश्चर्य की बात ये हुई कि ऋषि के गिरने के फलस्वरूप शिवालय की छत से सोने की कुछ मोहरें डाकू के सामने जा गिरीं।

अब तो डाकू अट्टहास करते हुए बोला तू ऋषि होकर झूठ बोलता है। वो भी मुझ से..

अरे झूठे ! तू तो कहता था, कि यहाँ कोई धन नहीं, बता, ये सोने के सिक्के कहां से गिरे..??

अब अगर तूने मुझे सारे धन का पता नहीं बताया तो मैं यहीं पटक-पटकर तेरे प्राण ले लूंगा।

ऋषि का ह्रदय करुणा से भर गया..वह दु:खी मन से बोला- हे शिवजी! मैंने पूरा जीवन आपकी सेवा/अर्चना में समर्पित कर दिया..फिर आज मेरे सामने ये कैसी विपत्ति आन पड़ी है ?

हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए..

जब जब भक्त सच्चे मन से पुकारते हैं तो ईश्वर किसी न किसी रूप में सहायता अवश्य करते हैं. ??

महेश्वर तत्क्षण प्रकट हुए.. और ऋषिवर से बोले! कि, क्या ऋषिवर आप इस होनी के पीछे का कारण अपने अंत: चक्षुओं से देख पा रहे हो..??

ऋषि भयभीत स्वर में बोले “जी नहीं” अब मेरी कोई साधना काम नही कर पा रही.. है। प्रभु आप ही बताइएगा..ये सब क्या है।

चलो! मैं ही बताता हूं. ये डाकू पूर्वजन्म में एक पंडित था इसने कई कल्पों तक मेरी भक्ति भी की। परंतु इससे प्रदोष के दिन एक भूल हो गई। जबकि यह पूरा दिन निराहार रहकर मेरी भक्ति कर रहा था। लेकिन दोपहर में जब इसे प्यास लगी तो यह जल पीने के लिए पास के ही एक सरोवर पर गया।

संयोग से उसी वक्त एक गाय का बछड़ा भी दिन भर का प्यासा वहीं पानी पीने आ पहुंचा। तब इस ब्राह्मण ने उस बछड़े को कोहनी मारकर भगा दिया था। और स्वयं जल पिया.. इस कारण से वह पंडित इस जन्म में डाकू बना। और हे ऋषिवर! तुम पूर्वजन्म में मछुआरे थे। उसी सरोवर से मछलियां पकड़कर उन्हें बेचकर अपना जीवन यापन करते थे।

उस कोहनी वाली घटना के समय तुम मछुआरे के रूप में वहीं थे। जब तुमने उस छोटे बछड़े को निर्जल प्यास से तड़फते देखा.. तो किसी पात्र में जल लाकर उसे पिला दिया.. उसी पुण्य के कारण तुम्हें फिर से मनुष्य जन्म मिला और तुम एक श्रेष्ठ ऋषिवर बने.. मगर

कर्म गणित पर ध्यान दीजिएगा.. पूर्व जन्म में पंडित के रूप में अर्जित किए गए कुछ श्रेष्ठ संचित कर्मों के आधार पर आज इस जन्म में डाकू का राजतिलक होना था।

परंतु वर्तमान में डाकू के जन्म मिलने के बाद न जाने कितने निरपराध लोगों को मारा व देवालयों में चोरियां तक की, और तुम

डाकू के रूप में स्थापित होने से तुम्हारे पूर्वजन्म के पुण्य कर्म सीमित होते चले गए.. और आज राजतिलक की जगह सिर्फ कुछ मुद्रायें ही नसीब हुई हैं।

और हे! ऋषिवर तुमने पिछले जन्म में अनगिनत मछलियों का शिकार किया था, जिसके फलस्वरूप आज तुम्हारी मृत्यु तय थी। मगर वर्तमान जन्म में ऋषि के रूप में किए गए तुम्हारे श्रेष्ठ संचित कर्मों के फलस्वरूप मृत्यु सिर्फ एक हल्की सी चोट में तब्दील हो गई..है। समझ आया ! जीवन का “कर्म-गणित” !!

शिक्षा;– दुनियां में वह नहीं होता, जो हमें अच्छा लगता है, बल्कि वह होता है, जो हमारे अपने ही कर्मों के लेखा जोखा अर्थात “कर्म-गणित” के आधार पर पूर्व में ही “निर्धारित” हो चुका होता है। जिसके लिए प्रत्येक जीव खुद जिम्मेदार होता है।

वर्तमान में जब व्यक्ति को मानव जीवन की मर्यादाओं में रहते हुए भी कुछ कष्ट प्राप्त हो रहे हो.. तो फिर आप समझ जाइयेगा कि, इस तरह ब्रह्मांड को संचालित करने वाली परमसत्ता ने आपके कुछ श्रेष्ठ संचित कर्मों के फलस्वरूप कुछ बड़े कष्ट हर कर उन्हें कम कर दिया है।

दरअसल, हम मनुष्यों की दृष्टि सीमित होती है,परंतु परमसत्ताधारी तो लोक-परलोक सब देखता है, वह ये सारा हिसाब हमारे कर्मों के ग्राउंड्स पर अपने पैरामीटर्स द्वारा पूर्व में ही निर्धारित कर लेता है।

आज मैंने डाकू ‘अस्थिमाल’ व ऋषिवर ‘प्रकृत्य’ की इस सच्ची घटना के ज़रिए..प्रत्येक जीवात्मा के “कर्म-गणित” पर प्रकाश डालने का एक प्रयास किया है। इसे समझना संसार के हर प्राणी के लिए लाजमी है।

धन्यवाद