240 – अफ़वाह

ये हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में अफ़वाह प्रेमी सदैव अपने ही रंग में मस्त रहते हैं,वे कभी सोचते तक नहीं कि, सामान्य लोगों को ऐसी बे सिर पैर की अफ़वाहों का खामियाजा किस हद तक भुगतना पड़ता है।

सभी प्रबुद्ध लोग इस पर गंभीरता से विचार कीजिएगा।

ये आप भी जानते हैं हमारा समाज अफवाह प्रेमी,तो है ही।

मैं पिछले कई दिनों से कई लोगों की पोस्ट पढ़ रहा हूॅं। टिप्पणियां भी बहुत की जा रही हैं। वैक्सीन बनाने वाली कंपनी ने पलीता लगाकर कह दिया कि इतने समय बाद अत्यंत दुर्लभ है साइड इफेक्ट्स!

लेकिन हो सकता है। “अत्यंत दुर्लभ” नेपथ्य में चला गया, “खतरा” मंच पर प्रकट हो गया। जैसा माहौल अफ़वाहों ने तैयार कर दिया है।

अब जिन युवा लोगों की असामान्य मृत्यु इस कालखंड में हुई, उन सबके संबंधियों ने मान लिया कि मृत्यु का कारण एकमात्र वैक्सीन ही है। जबकि अभी तक इसका कोई पैथोलॉजिकल या वैज्ञानिक आधार नहीं है। बहुत सारे लोगों को इस समाचार के बाद से थकावट और सांस फूलने की बीमारी का भी अनुभव होने लगा है। अब जिस किसी की सांस बाई दा वे किन्हीं कारणों वश फूल भी जाती है या थकावट महसूस होती है,तो अब उसका कारण केवल कोविशील्ड वैक्सीन ही होके रह गया है। ये बात एकदम प्रामाणिक रूप से सबके अंदर घर कर गई है।!!!

माना कि “युवा” मृत्यु अत्यंत पीड़ादायी है। किन्तु डेढ़ सौ करोड़ की जनसंख्या वाले देश में उन मौतों का अनुपात निकालिएगा जिनकी पूरी जीवनचर्या दूषित है। हवा पानी भोजन सब कुछ विषाक्त हैं। छोटे-छोटे बच्चों के पेट निकल रहे हैं। लड़कियां बेडौल और भयंकर मोटी हो रही हैं। पिज्जा बर्गर कोक दारू सिगरेट धकाधक चल रही। रोज देखता हूॅं। दसवीं तक की लड़कियां भी सिगरेट पी रहीं हैं। धुआं भीतर खींचने का दम नहीं लेकिन दिखाना है कि सिगरेट हम भी पीती हैं।

कोई बताएगा..?? कि छोटी आयु में होने वाली अकाल मृत्यु का कारण वह जीवनचर्या नहीं है? कोई वैज्ञानिक प्रमाण दे सकेगा??

अब आप कल्पना कीजिए कि उस महामारी के विकराल समय में अगर यह वैक्सीन न दी गई होती तो क्या हुआ होता। तब भी आप वैक्सीन के अभाव में लाखों मौतों के लिए मौजूदा सरकार को ही कोसते। कि वैक्सीन नहीं दिलवा सके। वर्ना लोग बे मौत नहीं मरते।

चैनल पर कई एक डाक्टर लॉजिकल तरीके से समझा भी रहे हैं कि, रेयरेस्ट आफ दी रेयर है वैक्सीन का साइड इफेक्ट्स।

लेकिन आजकल पत्रकार से बड़ा ज्ञानी तो कोई पूरे ब्रह्माण्ड में पैदा ही नहीं हुआ। न कभी हो सकता है। इसलिए पत्रकार हमेशा आपको संदेह व प्रश्न चिन्ह की खबरों के साथ छोड़ जाते हैं।

आप देखते रहिए…। वैक्सीन का दूसरा डोज़ लगे हुए दो वर्ष से अधिक हो चुके हैं। डाक्टर कह रहे कि साइड इफेक्ट्स इतने लंबे समय तक नहीं हो सकते। एक छोटे समय में उनका खतरा अधिक है। लेकिन इतने लंबे समय के बात साइड इफेक्ट्स का की कोई औचित्य ही नहीं है।

मगर अफ़वाह प्रेमियों ने अब तो इस समाचार को अच्छी तरह फैला दिया है। अब ये हर जगह चर्चा का विषय और भय के केन्द्र में है।

आम भारतीय इस समाचार और वृहत्तर परिदृश्य में हुई नगण्य असमान्य मृत्यु की घटनाओं पर विचार नहीं करेगा। वह तो बस दोष देना शुरू कर देगा। कहेगा एक बड़ा कांड कर दिया गया है। जबकि सत्य यह है कि कोविशील्ड बनाने वाली कंपनी ने ब्रिटिश कोर्ट में कई स्वतंत्र अध्ययनों के परिणाम रखे हैं जो बताते हैं कि यह वैक्सीन कोविड से बचाव में बहुत प्रभावी सिद्ध हुई।

कुछ हमारे यहां हर मुद्दे पर राजनैतिक रोटियां सेंकने का भी बड़ा चलन है।

दरअसल, यह लोकसभा चुनाव के समय एक विशेष पार्टी को कटघरे में खड़े करने की विदेशी कंपनियों की एक साजिश सी लगती है क्योंकि भारत अब स्वदेशी और आयुर्वेदिक दवाई पर आत्मनिर्भर होने लगा है…… शेष आप सब समझदार हैं।

🙏 राधे गोविन्द. राधे गोविन्द 🙏

239- प्रथम सीढ़ी

जी हां, अहंकार छोड़ने के बाद ही कोई कुछ सीख सकता है। हमें ज्ञान की प्रथम सीढ़ी को..अवश्य जान लेना चाहिए। क्योंकि धरती पर जन्म लेने के साथ ही सीखने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है ज्यों ज्यों हम बड़े होते जाते हैं, सीखने की प्रक्रिया भी विस्तार लेने लगती है, जल्द ही हम उठना, बैठना, बोलना, चलना आदि सीखते चले जाते हैं। इस बड़े होने की प्रक्रिया के साथ ही जाने अनजाने में हमारा अहंकार भी हमसे कहीं अधिक बड़ा हो रहा होता है। और फिर हम सीखना छोड़.. गलतियां करने में लग जाते हैं।

यह अंहकार हमारे विकास मार्ग को अवरूद्ध कर देता है इस बात की चर्चा करते हुए मुझे एक वाकिया याद आ रहा है जिसकी चर्चा यहाँ करना शायद उचित ही होगा।

एक बार की बात है रूस के “ऑस्पेंस्की” नाम के महान विचारक एक बार संत “गुरजियफ” से मिलने उनके घर गए। दोनों में विभिन्न् विषयों पर चर्चा होने लगी।

ऑस्पेंस्की ने संत गुरजियफ से कहा, यूं तो मैंने गहन अध्ययन और अनुभव के द्वारा काफी ज्ञान अर्जित किया हुआ है, किन्तु गुरदेव ! मैं कुछ और भी जानना चाहता हूं। आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं..क्या..? गुरजियफ को मालूम था कि ऑस्पेंस्की अपने विषय के प्रकांड विद्वान हैं, जिसका उन्हें थोड़ा घमंड भी होने लगा है।

अतः सीधी बात करने से कोई काम नहीं बनेगा। इसलिए उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद एक कोरा कागज उठाया और उसे ऑस्पेंस्की की ओर बढ़ाते हुए बोले- ”यह अच्छी बात है कि तुम कुछ सीखना चाहते हो। लेकिन मैं कैसे समझूं कि तुमने अब तक क्या-क्या सीख लिया है और क्या-क्या नहीं सीखा है। अतः तुम ऐसा करो कि जो कुछ भी जानते हो और जो नहीं जानते हो, उन दोनों के बारे में इस कागज पर लिख दो। जो तुम पहले से ही जानते हो उसके बारे में तो चर्चा करना व्यर्थ है और समय अभाव को देखते हुए जो तुम नहीं जानते, अब उस पर ही चर्चा करना उचित रहेगा।”

बात एकदम सरल थी, लेकिन ऑस्पेंस्की के लिए कुछ मुश्किल थी। अब तो उनका “ज्ञानी” होने का अभिमान धूल-धूसरित होने लगा.. ऑस्पेंस्की “आत्मा और परमात्मा” जैसे विषय के बारे में तो काफी कुछ जानते थे, लेकिन “तत्व-स्वरूप” और “भेद-अभेद” के बारे में उन्होंने कभी सोचा तक नहीं था।

गुरजियफ की बात सुनकर वे सोच में पड़ गए.. काफी देर सोचने के बाद भी जब उन्हें कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने वह कोरा कागज ज्यों का त्यों गुरजियफ को थमा दिया और बोले- श्रीमान मैं तो कुछ भी नहीं जानता। मगर आज आपने मेरी आंखे खोल ही दीं।

ऑस्पेंस्की के विनम्रतापूर्वक कहे गए इन शब्दों से गुरजियफ बेहद प्रभावति हुए और बोले – ”ठीक है, अब तुमने जानने योग्य पहली बात को अच्छे से जान लिया है कि,” तुम कुछ नहीं जानते।” यही ज्ञानार्जन की “प्रथम सीढ़ी” है। अब तुम्हें अवश्य कुछ सिखाया और बताया जा सकता है। अर्थात खाली बर्तन को ठीक से भरा जा सकता है, किन्तु अहंकार से भरे बर्तन में बूंदभर ज्ञान भरना भी संभव नहीं होता।

हम “ज्ञान प्राप्त” के लिए ख़ुद को सदैव तैयार रखे, वही ज्ञानार्जन की पात्रता है। शायद यही ज्ञानी बनने का मूल मंत्र भी है कि, “मनुष्य ज्ञान पा लेने का संकल्प ले और वह न केवल किसी एक क्षेत्र से ही स्वयं को बांध ले, बल्कि उसे जहां कहीं.. और जिससे भी अच्छी बात पता चले, उसे अपने अंतःकरण में आत्मसात करने के साथ साथ जीवन के धरातल पर क्रियान्वित अवश्य किया करे।

धन्यवाद

; योगेंद्र सिंह पचहरा , नीमगांव

राधे गोविन्द

238- “देखा-देखी”

मुझे ऐसा लगता है कि, दुनियां में “देखा-देखी” के धरातल पर आधुनिकता की आड़ में सारी मर्यादाओं को ताक पै रखकर ..हाई पिच पर चल रही..एक अंधी दौड़ जिसे संत “रैट 🐀 रेसिंग” की संज्ञा दे ते हैं। इससे किसी भी तरह हमें बचना चाहिए। लेकिन ये बात..आसान नहीं है एक बहुत बड़ी चुनौती है..??

क्योंकि यही वो फिनोमिना है जिसके कारण जाने अनजाने में..लोग दु:ख एवं बीमारियों को खुद ब खुद निमंत्रण दे रहे हैं।

चलो! इसे एक घटना के हवाले से समझने का प्रयास करते हैं।

कुछ दिन पूर्व मेरे एक चिरपरिचित व्यक्ति द्वारा अपने शो रूम के उद्घाटन में मुझे आमंत्रित किया गया।

कार्यक्रम के बाद..उसने मुझसे कहा कि, भाई जी! हमारे शो रूम में विक्री के लिए छोटे बड़े लगभग ढाई हज़ार तरह के प्रोडक्ट हैं। आप उनमे से अपने इस्तेमाल के लिए कुछ प्रॉडक्ट चुन लीजिएगा,ताकि हम एक “गिफ्ट-पैक” बनाकर आपको भेंट कर सकें।

तब मेरे मन ने फ्रैंकली बोल दिया कि, महोदय! आप बुरा तो मानियेगा मत मुझे आपके शोरूम में रखी चीजों में से एक भी प्रोडक्ट व्यक्ति के “जीने के लिए बहुत जरूरी नहीं लगता” बल्कि मुझे तो इस बात का ताज्जुब हो रहा है कि आज का इंसान इन गैर जरूरी चीजों का प्रयोग आखिर करता ही क्यों है..?? मगर क्या कहें ये दुनियां है।

अब देखिए! और समझिएगा..

• एयर फ्रेशर के बिना क्या कभी किसी की सांस रुकी है।..??

• फेस वॉश इस्तेमाल न करने वालों में से कितनों के चेहरे काले हो गये हैं।

• होम थिएटर लगाकर कितने लोग कलाकार बन गए हैं..??

• क्या कंडीशनर लगाने वालों के बाल हमेशा काले रहते हैं

• क्या डाइनिंग पर खाने बालों के घुटने कभी नहीं दु:खते??

आप जरा ध्यान करके बताइएगा, कि हैंड वॉश के बिना किसके दादा,परदादा के पेट में कीड़े हो गए थे।

दरअसल,ये एक “देखा-देखी” का खेला है।

न जाने क्यों मुझे, तो ये “प्रकृति” को चुनौती देने जैसा लगता है।

वरना! आप ही बताइए!

• बगुला कौन सा शैंपू इस्तेमाल करता है जिससे सदैव इतना सफेद और चमकदार बना रहता है..?

• मोर अपने पंखों के रंगों को बचाने के लिए कौन सा प्रोडक्ट इस्तेमाल करता है..?

• क्या आपने कभी किसी जानवर के मोतियाबिंद होते सुना है..?

• क्या किसी खरगोश को कभी हेयर लॉस हुआ है..?

बताइए

• मधुमक्खी का शुगर लेवल बिना कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल किए कैसे कंट्रोल रहता है..?

मुझे,तो ऐसा लगता है, इंसान का पैसा फिजूल खर्च कराके उसे दु:खी और बीमार बनाकर अपने मार्केट की कठपुतली बनाए रखने की, एक बहुत बड़ी साजिश है इन कंपनियों की और कुछ नहीं।

जैसे;

• नेट बंद,तो इंसान दु:खी।

• लाइट जाने पर… दु:खी।

• किसी इलेक्ट्रिक डिवाइस में अचानक कोई तकनीकी खराबी आ गई..तो दु:खी।

• केवल टी वी कट गया.. दु:खी।

• मच्छर मारने की दवा खत्म हुई,तो ..इंसान दुःखी।

• महिलाओं की मेक अप किट में कोई प्रोडक्ट खत्म होते ही ..मैडम भी दु:खी।

• और तो और कुछ लोग तो अपने कपड़ों की मैचिंग न मिल पाने पर भी दुःखी हो जाते हैं।

क्या आपको नहीं लगता.. आज के व्यक्ति को ‘दस मिनट में बीस’ तरह से दुःखी और परेशान होने की लत लग गई है।

पहले लोग,तो गुड या नमक रोटी खाकर..खुद के एक बाजू को तकिया बनाकर अपने सच्चे मित्र पेड़ पौधों की छांव में कहीं भी आराम से सो जाया करते थे।

लेकिन यहीं इसी धरा पर कुछ आध्यात्मिक लोगों के ऐसे “सादगी” वाले चरित्र भी हैं जिन्हें दुःखी करने के लिए..फरिस्तों को ख़ुद ही नीचे आना पड़ेगा। मैंने देखा है वे विकट परिस्थितियों में भी दुःखी नहीं होते!!

इसलिए, मैं फिर कहुंगा, कि ये सब सिर्फ एक “देखा-देखी” का खेला बना हुआ है,और कुछ नहीं। हो सके तो हमें इससे बचने का प्रयास करना चाहिए।

दुनियां की एक सच्चाई,ये भी है कि, “सुखी-रहने” के लिए बहुत कम खर्च लगता है।

दूसरों को “सुखी-दिखाने” के लिए.. कि “मैं कितना.. सुखी हूं..?” आपको नहीं लगता सारा खर्चा हम लोग इस पाखंड में करते रहते हैं।

जैसे-जैसे.. साइंस एंड टेक्नोलॉजी उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होकर..हम इंसानों को सुविधा प्रदान करती जा रही है..यदि आपका नॉलेज विजडम में कन्वर्ट हो पाया हो, तो उसी उन्नति में इंसान के लिए दुःख के रास्ते खोलने वाले राज़ भी छुपे होते हैं। जो आपको स्पष्ट रूप से दिख जाते हैं।

यदि मेरा ये कैलकुलेशन किसी की समझ आ रहा है, तो फिर कहना न होगा कि, आप जागृत अवस्था में हैं। अन्यथा दुनियां की अस्सी फीसदी आबादी “भटकाव मोड” पर अपनी फिजूल खर्ची की लत में इस बहुमूल्य “जिंदगी” को जहन्नुम बना ले रही है।

क्यों न हम कर्मयोग के इस मूल मंत्र को आत्मसात करके..पहले कमाएं..और खर्च भी करें..परंतु “सुख की अनुभूति ” के लिए न कि “सुखी दिखने” के लिए..वैसे मुश्किल तो है मगर..

दुनियां में व्याप्त इस “देखा-देखी” के खेल से बचने का एक प्रयास कीजियेगा अवश्य।

धन्यवाद

योगेंद्र सिंह पचहरा,

मुखिया परिवार, नीमगांव से

237-The Secret of “Youth”

Do you know..??

‘The secret of Youth’

Yes, It is To recapture the days of your youth,feel the miraculous, “Healing, self-renewing power of your subconscious mind moving through your whole being.

Know the feel that you are inspired,lifted up, rejuvenated, revitalized and recharged spiritually. You can bubble over with enthusiasm and joy,as in the days of your youth,for the simple reason that you can always mentally & emotionally recapture that joyous state.

The candle that shines upon your head is divine intelligence. It reveals to you everything you need to know.

It enables you to affirm the presence of your good, regardless of appearances. You walk by the guidance of your subconscious mind, because you know that the dawn appears and the shadows flee.

Thanks for reading..

236-Welcome The Changes

Yes,we should ready to accept the changes. Because Changing is ‘the rule’ of this universe.

Second thing..old age is not a tragic occurrence. What we call the aging process is really change. It is to be welcomed joyfully and gladyly.

Each phase of human life is a step forward on a path that has no end.We have enormous powers that transcend the limits of our bodily powers.

Do you know..?? that we have marvelous senses that transcend the limits of our five physical senses.

Life is spiritual and eternal. We need never grow old, for life,or God, cannot grow old . The Bible says that God is life. Life is self-renewing, eternal,indestructible,and is the reality of all people.

Thanks for reading

235-How can Stay Young in Spirit Forever..

Do you know your subconscious mind never grows old..??

Yes, it is timeless,ageless and you can say endless. Perhaps it may be a mind over matter for some common people. But in fact, It is a part of the universal mind of God.Which was never born and will never die. Fatigue or old age does not have an impact on any spiritual quality / power.

Patience, kindness,veracity, humility, goodwill,peace, harmony and brotherly love are attributes and qualities that never grows old. If you continue to generate these qualities here on this planet of life,you will always remain Young in Spirit.

Thanks for reading

234- लज्जा

दुनिया में कुछ डबल स्टैंडर्ड सोच वाले लोगों ने ऐसा माइंड-सेट बना रखा है कि, ”लज्जा” तो सिर्फ महिलाओं का गहना है। इस पर मुझे आपत्ति है..??

क्योंकि, “लज्जा, हया,शर्म एक दूसरे के पर्याय होते हुए भी इन शब्दों में से किसी को भी जब भाषा में पिरोया जाता है,तो उस शब्द का अर्थ, उस शब्द की प्लेस वैल्यू लेखक की शैली पर भी बहुत कुछ निर्भर करती है, कि उस अमुक शब्द को उसने अपनी लेखनी से किस भाव में प्रयुक्त किया है।

इसलिए सभी को मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि शब्दों के जाल में न फंसते हुए.. आप हमेशा भावात्मक पक्ष को ही फोकस किया कीजिएगा।

इस आधार पर मेरा कहने का आशय सिर्फ इतना है कि, लज्जा भाव सेवा,सत्कार जैसी कुछ अनुभूतियां हिंदी भाषा में ऐसी हैं जिन्हें कभी भी ‘जेंडर’ के चश्मा से देखा ना ही देखा जाए, तो ही ठीक है।

क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि, हर स्वाभिमानी.. व्यक्ति को अनुचित रवैए पर “लज्जा” महसूस होती है।

इतिहास साक्षी है कि, “नारी-शक्ति” ने “पुरुष बल” की तुलना में सदैव हर स्तर पर खुद को सेंसटिव प्रूव किया है। इसलिए कुछ साहित्यकारों ने अपने अलंकारिक दृष्टिकोण से “लज्जा” को उनका गहना क्या बोल दिया..दोहरी सोच की मानसिकता वाली लॉबी ने अक्सर इस “लज्जा” शब्द को महिलाओं के पल्लू से ही बांध दिया है.!!! जो सरासर गलत है।

मेरे विचार से यही वो बातें हैं जो दुनियां में “पुरुष-प्रधान” समाज की अवधारणा को बल देती हैं। जो कदापि ठीक नहीं हैं।

हो सकता है ऐसी मानसिकता वाले बंदों को कहीं भी समाज में हो रहे.. अनैतिक क्रिया कलापों पर “लज्जा” न आती हो !!!!

दरअसल, ऐसे लोगों को “लज्जा” न आने के पीछे एक और बड़ा कारण ये भी हो सकता है कि, दुनियां में सामाजिक स्तर पर कुछ सेल्फिश लोग,अपना स्वार्थ साधने की..फितरत में ऐसे दुराचारियों को अक्सर सपोर्ट.. करते रहे हैं। शायद इसी कारण से दुनियां के हर समाज में घोर असामाजिकता, जिसे यदि “सामाजिक प्रदूषण” कह दिया जाए..तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, आज पूरी तरह व्याप्त है।

जरा सोचो !!

जब कहीं किसी असहाय जनमानस / किसी निरीह प्राणी के साथ किसी के द्वारा दुराचार या अन्याय होता है, तो उस कृत्य पर “स्वस्थ मानसिकता” वाले लोगों को “लज्जा” आना स्वाभाविक है। और आनी क्यों नहीं चाहिए। लज्जा आनी भी चाहिए।

इतिहास के पन्नों को उलटिए.. दुनियाँ में कितने जघन्य अपराध व वीभत्स कांड होते रहे हैं !! दुनिया के समाज में यदि “लज्जावान” चरित्र नहीं होते,तो क्या दुनिया की हस्ती अब तक बरकरार रह पाती..?? कभी नहीं.. ज़रा सोचो! तो..??

• इसलिए मैं फिर कहूंगा ऐसी सिचुएशन के समय कम से कम जागृत लोगों को,अवश्य सार्थक भूमिका में होना चाहिए।

• जब कोई महिला या पुरुष अपने किसी अन्य रिश्ते के साथ..जैसे; सास-बहू, ननद-भाभी, जेठानी-देवरानी..ठीक वैसे ही पुरुष; पिता-पुत्र,बड़ा भाई-छोटा भाई,मालिक-नौकर वस्तुत: किसी भी रिश्ते में..जब अन्यायपूर्ण आचरण करते हैं, तो ऐसे दुर्व्यवहार पर भला किसे ‘लज्जा’ नहीं आएगी..?? और कब तक नहीं आएगी..??

बिल्कुल, लज्जा आती है, और उसका आना लाज़मी है।

लेकिन असल पहलू ऐसी घटनाओं से आगे के लिए सबक लेने का और सचेत रहने का होता है।

“समय” साक्षी है.. दुनियां के इतिहास में ऐसे कई एक मंजर हैं .. जब जब जिम्मेदार बॉडी ने उचित प्रतिक्रिया नहीं दी है। एवं वहां अपना पक्ष तक भी नहीं रखा है, तो इतिहास के पन्नों पर नामचीन व्यक्तित्व भी महज़ “एक सवाल” बनकर रह गए हैं। जिन्हें बाद की पीढियां.. नीची नजरों से देखती हैं और हमेशा देखती रहेंगी। चाहे कुछ जानकार लोग उनकी परिस्थिति के पक्ष में कितने ही तर्क क्यों न दें..?? विचारकों के लिए ऐसे व्यक्तित्व सदैव “सवालों के घेरे” में ही रहेंगे।

अच्छा! आप ही बताइए ऐसी स्थिति में चेतन व्यक्ति को “लज्जा” नहीं आयेगी…??

शायद इसीलिए आज हम सबको अपने आचरण को लेकर सजग होने की महती आवश्यकता है।

एक आंकड़े के मुताबिक पूरी दुनियां में लगभग अस्सी प्रतिशत लोगों का एक बहुत बड़ा जमावड़ा है, जो ज्यादातर जीवन के असल पहलू से दूर ही रहा है। यहां तक है कि वह जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से भी अनजान अपनी तमाम उम्र यूं ही गुजार देता है। अतः यही वो जमावड़ा है,जो मृत्युलोक के जीवन चक्र में चौरासी लाख योनियों में बार बार हिचकोले खाने को मजबूर है।

दूसरे “भौतिक चका चौंद” में रहने वाले लोग ताउम्र एक अजीब खुशफहमी का शिकार भी रहते हैं कि, अन्याई, दुराचारी के विरुद्ध अपना पक्ष न रखकर..इंसानियत के सामने नजरें झुकाकर हम दुनियां में बने रहेंगे..अर्थात जीवंत रहेंगे

मैं उनसे ये पूछना चाहता हूं?? कि, ऐसे चरित्रों के लिए दुनियां में बने रहना .. “जीवन” हो सकता है क्या..?? मेरा मतलब “ऐसा जीना भी कोई जीना है.??.

बताइए!! क्या ऐसे चरित्रों पर आप लज्जित नहीं होंगे..??

जरा! मानवता के दायरे में..खड़े होकर सोचिएगा!! कि, हमने किसी अन्याई चरित्र को अन्याय करने से नहीं रोका या तत्काल उसे अपना रुख भी महसूस नहीं कराया, तो क्या हमारा ऐसा रवैया “अन्याय की मौन सहमति” नहीं कह लाएगा..??

कहना न होगा कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हम भी ऐसे अनेक पापों के भागीदार हो जाते हैं।

अब बोलिए! हमारे ऐसे ढुलमुल रवैए पर किसे ‘लज्जा’ नहीं आएगी।

इन द सेंस ऑफ स्प्रिचुअलिटी.. ‘जीवआत्मा’ दो रूपों में होती है।

एक “सूक्ष्म शरीर” (Subtle body), जो अदृश्य (invisible) होता है। किसी को नज़र नहीं आता।

दूसरा “स्थूल शरीर” (Gross body) जो सबको दिखता है।जिसे सजाने, संवारने में हम अपने जीवन के कीमती पलों को भी खपा दे रहे हैं। खैर..

“अध्यात्म” एक ऐसा दृष्टिकोण है जो स्थूल शरीर में केवल सांसों के आवागमन को “जिंदा” होना नहीं मानता।

ये नज़रिया कहता है, कि जीवन में किए गए क्रिया-कलापों अर्थात कर्मों का “मानवता” की कसौटी पर खरा होना..ही किसी को ‘जीवंत’ बनाता है।

निष्कर्षतः कोई भी इस गुमान में न रहे कि अत्याचार,अनाचार आदि का हिस्सा होने के बावजूद भी वह ठीक है.. मजे में.. हैं,उसकी लाइफ तो सही चल रही है।

ज़रा जीवन के सही कैलकुलेशन को समझिएगा..! कोई दोराय नहीं है कि, अच्छे कर्मों के फल हमें ही मिलते हैं, तो उसी प्रकार बुरे कर्मों के परिणाम भी कोई दूसरा नहीं भुगतेगा। वो सब हमारे संचित कर्मों से निर्मित “प्रारब्ध” के वशीभूत आगे पीछे हमें ही भुगतने होते हैं। ये कौन नहीं जानता है कि, गोविन्द के दरबार में दिन देरी है..मगर अंधेरी न थी और न कभी होगी।

शायद लोगों के ज्ञान चक्षुओं को खोलने के उद्देश्य से ही श्रीकृष्ण “कर्मयोग” में बड़े स्पष्ट रुप से कहते हैं कि,

“कोई भी जीव किसी प्रकार की खुशफहमी में न रहे! कि हमारे द्वारा किए गए कर्म/विकर्म किसी उपाय (भंडारे करना या गंगा स्नान) आदि से नष्ट हो जाएंगे, या फिर हमारे पाप धुल जाएंगे। जी,नहीं कर्मयोग में इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। वह इसकी अनुमति कदापि नहीं देता है।

एक और बात यदि हम चाहें,तो वैचारिक प्लेटफॉर्म पर या दैनिक व्यवहार..के अपने सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों के चलन के ज़रिए भी उस “अमुक दुराचारी व्यक्ति” से दूरी बनाकर या उपेक्षा करके उसे खुद के अन्यायपूर्ण रवैए पर पुनः सोचने और सुधार लाने को बाध्य कर सकते हैं।

ऐसा करना न केवल उसके लिए.. अपितु उसके समाज एवं सम्पूर्ण जगत के लिए बेहतर होगा।

धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा,

जैन इंटर कॉलेज,सासनी से

233-अनपढ़ जाट..

“अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा, पढ़ा हुआ जाट खुदा जैसा”

यह घटना सन् 1270-1280 के बीच की है । दिल्ली में बादशाह बलबन (1266–1287) का राज्य था । उसके दरबार में एक अमीर दरबारी था जिसके तीन बेटे थे । उसके पास उन्नीस घोड़े भी थे । मरने से पहले वह वसीयत लिख गया था कि इन घोड़ों का

आधा हिस्सा… बड़े बेटे को,

चौथाई हिस्सा मंझले को और

पांचवां हिस्सा सबसे छोटे बेटे को बांट दिया जाये।

बेटे उन 19 घोड़ों का इस तरह बंटवारा कर ही नहीं पाये और बादशाह के दरबार में इस समस्या को सुलझाने के लिए अपील की गई। बादशाह ने अपने सब दरबारियों से सलाह ली पर उनमें से कोई भी इसे हल नहीं कर सका।

उस समय प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो बादशाह का दरबारी कवि था । उसने जाटों की भाषा को समझाने के लिए एक पुस्तक भी बादशाह के कहने पर लिखी थी जिसका नाम “खलिक बारी” था । खुसरो ने कहा कि मैंने जाटों के इलाक़े में खूब घूम कर देखा है और पंचायती फैसले भी सुने हैं और सर्वखाप पंचायत का कोई पंच ही इसको हल कर सकता है।

नवाब के लोगों ने इन्कार किया कि यह फैसला तो हो ही नहीं सकता..!

परन्तु कवि अमीर खुसरो के कहने पर बादशाह बलबन ने सर्वखाप पंचायत में अपने एक खास आदमी को चिट्ठी देकर

गांव- सौरम (जिला- मुज़फ्फरनगर ) भेजा (इसी गांव में शुरू से सर्वखाप पंचायत का मुख्यालय चला आ रहा है। और आपकी जानकारी के लिए बता दूं.. आज भी मौजूद है)।

चिट्ठी पाकर पंचायत ने प्रमुख पंच चौधरी श्री रामसहाय सूबेदार जी को दिल्ली भेजने का फैसला किया। चौधरी साहब अपने घोड़े पर सवार होकर बादशाह के दरबार में दिल्ली पहुंच गये और बादशाह ने अपने सारे दरबारी बाहर के मैदान में इकट्ठे कर लिये। वहीं पर 19 घोड़ों को भी लाइन में बंधवा दिया।

चौधरी रामसहाय ने अपना परिचय देकर कहना शुरू किया – “शायद इतना तो आपको पता ही होगा कि हमारे यहां राजा और प्रजा का सम्बंध बाप-बेटे का होता है और प्रजा की सम्पत्ति पर राजा का भी हक होता है । इस नाते मैं जो अपना घोड़ा साथ लाया हूं, उस पर भी राजा का हक बनता है । इसलिये मैं यह अपना घोड़ा आपको भेंट करता हूं और इन 19 घोड़ों के साथ मिला देना चाहता हूं, इसके बाद मैं बंटवारे के बारे में अपना फैसला सुनाऊंगा।” बादशाह बलबन ने इसकी इजाजत दे दी और चौधरी साहब ने अपना घोड़ा उन 19 घोड़ों वाली कतार के आखिर में बांध दिया, इस तरह कुल बीस घोड़े हो गये।

अब चौधरी ने उन घोड़ों का बंटवारा इस तरह कर दिया-

आधा हिस्सा (20/2 = 10) यानि दस घोड़े उस अमीर के बड़े बेटे को दे दिये।

चौथाई हिस्सा (20/4 = 5) यानि पांच घोडे मंझले बेटे को दे दिये।

पांचवां हिस्सा (20/5 = 4) यानि चार घोडे छोटे बेटे को दे दिये।

इस प्रकार उन्नीस (10 + 5 + 4 = 19) घोड़ों का बंटवारा हो गया।

बीसवां घोड़ा चौधरी रामसहाय का ही था जो बच गया। बंटवारा करके चौधरी साहब ने सबसे कहा – “मेरा अपना घोड़ा केवल बटवारे के हिसाब किताब में केवल एक सहायक की भूमिका के रूप में ही था। इसलिए बच गया। बादशाह सलामत की इजाजत हो तो मैं अपने घोड़े को ले जाऊं ?”

बादशाह ने हां कह दी और चौधरी साहब का बेहद सम्मान और बड़ी तारीफें की ।

चौधरी रामसहाय अपना घोड़ा लेकर अपने गांव सौरम की तरफ कूच करने ही वाले थे, तभी वहां पर मौजूद कई हजार दर्शक इस पंच के फैसले से गदगद होकर नाचने लगे ..

और कवि अमीर खुसरो ने जोर से कहा – “अनपढ़ जाट पढ़ा जैसा, पढ़ा हुआ जाट खुदा जैसा”।

इसके बाद सारी भीड़ इसी पंक्ति को दोहराने लगी । तभी से यह कहावत हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उत्तर प्रदेश तथा दूसरी जगहों पर लोकप्रिय हो गई।

यहां यह बताना भी जरूरी है कि यह वृत्तांत का प्रमाण सर्वखाप पंचायत के अभिलेखागार में आज भी मौजूद है ।।

पूरा पढ़ने के लिए धन्यवाद

232- गुनना..

Do you know the fact..?? Multiplied with Experiences यानी “गुनना”

जीवन के अनुभवों से प्राप्त जानकारियां ‘बुद्धिमानी पूर्वक’ जब “जिंदगी को संवारती” हैं। उसी को शायद हमारे बड़े बुजुर्गों की जुबान से “गुनना” कहा गया है।

चलो! एक सत्य घटना के सहारे आज इस तथ्य की गहराइयों में उतरते हैं..

ये मंज़र उस दौर का है। जब श्री टी.एन.शेषन जी भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे।

एकबार वे अपनी देवी जी अर्थात पत्नी के साथ यूपी की यात्रा पर आए थे..

जब गाड़ी कहीं सड़क के किनारे रुकी,तो उनकी पत्नी ने सड़क के किनारे पेड़ पर लटका एक घोंसला देखा.. यूपी में पाई जाने वाली एक बहुत ही सुयोग्य चिड़िया जिसे हम लोग ‘बैया’ के नाम से जानते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि वह घोंसला उस चिड़िया की कलाकारी और परिश्रम का एक नायब नमूना है। देखते ही वे, श्री टी एन शेषन साहब से माता सीता जी की तरह.. प्रभु श्रीराम से सोने का हिरण मांगने जैसी जिद करते हुए, .. कहतीं हैं.. कि, “तुम ये “घोंसला” मुझे ला के दो..??” मैं इसे अपने घर में सजाकर रखना चाहती हूं।

किसी हद तक ये किन्हीं अमुक लोगों के स्तर भर के ही विचार होते हैं जैसे; अपनी खुशी के लिए किसी जानवर या पक्षी को बंधन में रखना..आदि। ये आदमी की फितरत या सनक भर हैं.. मगर ऐसी फितरत या फिर सनक जैसी हरकतों को ‘विवेकपूर्ण विचार’ ने कभी मान्य नहीं किया है।

श्री टी एन शेषन साहब ने भी शायद अपनी पद प्रतिष्ठा के आवेश में आकर अपने साथ में चल रहे सुरक्षा गार्ड से उस घोंसले को पेड़ की डाली से उतार लाने को बोल दिया..

सुरक्षा गार्ड शरीर से ज़रा भारी था। उसने वहीं पास में भेड़-बकरियां चरा रहे एक अनपढ़ से दिख रहे लड़के से पहले आदेशित भाषा में फिर नजदीक आने पर थोड़ा लालच देते हुए कहा कि, अगर तुम ये घोंसला उतार कर दोगे तो मैं तुम्हें दस रुपये का नोट दूंगा।

लेकिन लड़के ने तुरंत मना कर दिया। फिर श्री शेषन साहब स्वयं उसके पास गये..और उस लड़के को पचास रुपये का नोट देने की पेशकश करने लगे..

लेकिन अब उस लड़के ने घोंसले को पेड़ से उतार कर न लाने के अपने इनकार का रहस्य बताते हुए कहा कि..

“बाबू जी पेड़ से घोंसला उतारना मेरे लिए कोई बड़ा काम नहीं है। लेकिन चाहते हुए भी मैं ऐसा कर नहीं सकूंगा.. क्योंकि, घोंसले कोई खेलने की चीज़ नहीं होते..वल्कि ये पक्षियों व उनके बच्चों के लिए हम इंसानों की ही तरह ‘घर’ होते हैं। जिनमें छिपकर तेज हवा,धूप,ताप, बारिस आदि से ये लोग खुद को बचा लेते हैं।

और दिनभर अपने बच्चों के लिए दाने चुनने के बाद शाम को जब वह चिड़िया अपने घोंसले (घर) पर वापस आएगी तब वह अपने बच्चों को घोंसले से बाहर रोते-बिलखते देख बड़ी उदास होंगी।

इसलिए तुम मुझे कितने भी रुपए क्यों न दो, मगर मैं कोई भी घोंसला, तो नहीं उतार पाऊंगा।”

इस घटना का जिकर श्री टी.एन. शेषन साहब ने एक जगह अपनी बुक में भी किया है। वे लिखते हैं कि,

“मुझे जीवन भर इस बात का अफ़सोस रहा.. कि न सिर्फ पढ़े-लिखे बल्कि एक आई ए एस ऑफिसर में वो विचार और भावनाएँ क्यों नहीं आ सकीं.. जो गांव के देहाती, अनपढ़-गंवार, कहे या हम लोगों द्वारा समझे जाने वाले एक अदना से लड़के ने वे भावनाएं महसूस करलीं..??”

उन्होंने आगे लिखा है कि- “मेरी आई ए एस की डिग्री, पद, प्रतिष्ठा, पैसा.. उस अनपढ़ बच्चे के “उच्च विचार एवं स्वच्छ भावनाओं” के सामने सब मिट्टी में मिल गए।”

इसी को गांव की भाषा में हमारे बड़े बुजुर्ग सदैव “गुनना” अर्थात मल्टीप्लाई विद क्वालिटीज & एक्सपीरियंस कहते हैं।

दरअसल, कोई भी जीवन तभी आनंददायक बनता है जब व्यक्ति में ” बुद्धि और धन के साथ-साथ संवेदनशीलता” भी होती है।

बंधुवर! टी एन शेषन साहब के वैचारिक रूप से ट्रांसफॉर्म हो जाने के साथ-साथ…

आज मैं भी परमसत्ताधारी से प्रार्थना करता हूं कि क्या ही अच्छा हो..कि, इस लेख को पढ़ने के बाद उस अनपढ़ बच्चे जैसी पवित्र भावनाएं हम सभी के दिलों में भी ‘ घर कर ‘ जाएं..??

धन्यवाद

विचारक : योगेंद्र सिंह पचहरा,नीमगांव, राया,मथुरा।

231- The SOUL

A Journey ..

( Long walk to be Human soul)

दरअसल देखा जाए,तो “आत्मा” के लिए ये काफ़ी लंबी यात्रा है। गौर करने वाली बात ये है कि, सभी अस्सी लाख योनियों को पार करने के बाद ही जीवात्मा को मनुष्योनि नसीब होती है।

मनुष्य योनि मिलने पर भी यदि किसी “जीवात्मा” में बेहोशी बरकरार रहती है..वह खुद को जागृत नहीं हो पाता है, तो संभव है कि मृत्युलोक के इस ‘जीवन-चक्र’ से ऐसी जीवात्माएं कभी निकल भी न पाएं।

ज़ाहिर सी बात है कि, वे अपनी बेहोशी के कारण बार बार निम्न योनियों में जन्म मरण के हिचकोले खाने को विवश,तो रहेंगी ही।

हम सभी अपने बुजुर्गों से सुनते आए हैं… कि ‘जीवात्मा’ संसार में आकर चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने के लिए बाध्य होती है।

हालांकि उसका निर्धारण भी जीवात्मा” के संचित कर्मों के आधार पर ही होता है। वो एक अलग तथ्य है उस पर किसी अन्य लेख में चर्चा करेंगे।

मैं इस जटिल तथ्य को “पद्मपुराण” के एक श्लोक की सहायता से आपके समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूं।

अ जर्नी ऑफ “द सॉल”..

यानी सरल शब्दों में कहा जाए, तो ‘मनुष्य’ का चोला ग्रहण करने के लिए “आत्मा” को एक लंबी यात्रा से गुजरना होता है।

(वॉकिंग आफ्टर अ लॉन्ग रनवे..”द सॉल” गैट अ “ह्यूमन-बॉडी”)

श्लोक है..

” जलज नव लक्षाणी,स्थावरा लक्ष विसंति। पक्षिणाम दस लक्षणाम,कृमियां रुद्र संख्यकाय, तीस लक्षाणि पशव:, चतुर लक्षाणी मानुष:।”

जिस प्रकार प्रथम पंक्ति में ‘जलज नव लक्षाणी’ अर्थात नौ लाख योनियां जल में रहने वाले जीवों की बताई गईं हैं..

इस पॉइंट को मैं विशेषरूप से आज की युवा पीढ़ी की ओर मुखातिब होकर लिख रहा हूं.. कि हमें नौ लाख टाइम बर्थ जल में भी लेने होते हैं।

जैसे; कभी हम डॉल्फिन बने हैं,तो कभी सार्क या झींगा मछलियां,तो कभी कैंकडा..फेफड़ा आदि।

स्थावरा लक्ष्य विसंती.. संसार में बीस लाख प्रकार की योनियां पेड़-पौधों की होती है।

दूसरी पंक्ति में ‘पक्षीणाम दस लक्षणाम’ अर्थात दस लाख योनियां पक्षियों (बर्ड्स) की होती हैं..

‘कृमियाँ रूद्र संख्यकाय.. ‘ और दुनियां में जो कीट,पतंगे,मक्खी,मच्छर (इंसेक्ट्स) आदि..की योनियां भी ग्यारह लाख उल्लिखित की गई हैं।

तीसरी पंक्ति में ‘तीस लक्षाणि पशव:’ तीस लाख योनियां पशुओं व जानवरों (एनिमल्स) की होती हैं। जो चार पैरों पर चलते हैं। जिन्हें वेदों में तिर्यक कहा गया है वे आदतन कभी सीधे नहीं चलते। सदैव तिरछे ही चलते हैं।

तब कहीं जाकर ‘चतुर लक्षाणी मानुष:’

तब हूंक “नर” करुणा कर “देही” अर्थात तब प्रभु की कृपा से जीवात्मा को ‘नर देही’ नसीब हो पाती है।

खेल प्रेमियों को इस युग में धरातल पर यदि किसी उदाहरण के ज़रिए बताया जाए, तो आज के युवाओं का एक जुनूनी खेल “क्रिकेट” है.. उसके हवाले से यदि मैं उपमा देने की हिमांकत करूंगा.. जबकि ये उसके बराबर तो नहीं..है। परंतु कुछ कुछ..लगभग.. में समझने के लिहाज से चलो मान लेते हैं।

आत्मा सारे जन्मों / शुरू की अस्सी लाख योनियों में अपने जन्म मरण की प्रक्रिया पूरी करके एक लंबी यात्रा के उपरांत चार लाख प्रकार की जो मनुष्य योनि बताई गईं हैं। उनमें ‘जन्म’ ले पाती है।

शायद इसीलिए विद्वान लोग इस “मनुष्य योनि” को सर्वश्रेष्ठ यानी “मोक्ष का द्वार” तक बताते हैं।

ये “मानुष तन” मिलना तो दुनियां में सबसे अधिक दुर्लभ है।इसकी उपमा तो किसी से की ही नहीं जा सकती। फिर भी युवाओं के लिए

जैसे ; क्रिकेट के प्लेयर्स को फील्डिंग व बॉलिंग के अपने ओवर्स पूरे डालने..अर्थात काफ़ी पसीना बहाने के बाद जब किसी खास प्लेयर को “बैटिंग” का जौहर दिखाने का अवसर टीम के कैप्टन द्वारा दिया जरूर जाता है..लेकिन वो उसकी कार्य कुशलता को देखते हुए..वैसे ही मिलता है..जैसे ईश्वर जीव के कर्मों का खाता देखकर अन्य योनियों में विचरण के बाद ‘ मनुष्य ‘ बनाता है। तब उस बैट्समैन को भी लगभग वैसी ही सुखद अनुभूति होती है..,जैसे अन्य अस्सी लाख योनियों में विचरण के बाद “मनुष्य आत्मा” को होती है।

Comparative study..

जिस प्रकार बैट्समैन एक बहुत बड़ा कीर्तिमान स्थापित करने के अपने सपने को साकार करने के लिए पूरी सूझ बूझ से खेलता है। ठीक वैसे ही हर मनुष्य आत्मा को अपने जीवन के एक एक पल को बेहद संजीदगी एवं प्रसन्नता के साथ अनाशक्त होकर जीना चाहिए।

निष्कर्षत: अन्य योनियों की तुलना में ‘मानव देह’ में रहकर “ईश्वर भक्ति” करना काफी सुगम है। इसलिए सारे भटकावों से दूर हम सभी मनुष्यत्माओं को हमेशा सदमार्ग पर ही रहना

होगा।

वरना ध्यान रखिए फिर से वही ‘जीवन चक्र’ अस्सी लाख योनियों की डगर आपके लिए पुनः तैयार है। मगर बहुत कठिन हैं ये “डगर”

धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा,

के एल जैन इं का.सासनी,हाथरस।