250 – संकल्प दी गड्डी

आज चलो! “इंसान” को केंद्र में रखकर एक छोटे से बिंदु पर कुछ चिंतन करते हैं..मगर उसमें थोड़ा पुट अध्यात्म का लगा कर देखेंगे,तो और भी आनंददायक लगेगा।

लेकिन पाजी! मांफ कर णा आज मैनू “माणव जाति” दे इक इंसान दी टेक्निकली कंपैरेटिव स्टडी करके दिखायासी.. जैसे;

जब हम कौनू गड्डी चलांदे ऐं.. ना! यू तो बड़ी सिंपल सी गल है गी कि इक निर्धारित समय पर उस गड्डी नू सर्विस करान वास्ते गैराज भी ले जां दें ऐं,

क्योंकि सफाई दे संग संग गड्डी ने कल,पुर्जे भी चैक हो जां दे ऐं.. जिससे मशीनरी भी लंबे वक्त तक मेंटेन रहंदीं ए।

But..do You think so..anyway..??

ठि..क वैसे ही इस “माणव जाति” दे इंसान नू “संत-समागम” भी गैराज की तरह ही हो वे। जहॉ हमारे “मन मस्तिष्क” में जमीं दुनियांदारी दी कार्मिक लेयर बड़ी असानी दे साफ हो जां दी ऐ।

It would be your belief..too.. I think so..

दरअसल, यू जिन्दगी भी ना! इक गड्डी दी तरहा ही होवे सी। वो भी ऐं मे ई ना “संकल्प दी गड्डी”🚖।

अगर इस गड्डी नू होंसले दे पहिऐ,

🛞 धर्म दा इंजण ,

कर्म दा ईंधण

संयम दा स्टेयरिंग,

मर्यादित एक्सीलरेटर,

अनुशासित ब्रेक

होर.. ज़िंदगी दी इस “संकल्पित गड्डी” के टूल-बाक्स मा “ज्ञान होर चरित्र” के औजा..र हर वक्त संग हो वे सी, तो मैनू दावा नहीं ईब,तो मैनू टोटल विशवास हैगा सी जीवण दी..यू “संकल्प दी गड्डी” निश्चित रूप से इस लोक में, तो बड़े स्मूथली अपणी यात्रा पूरी कर ही ले वे गी ..फिर तो यू अपणे सगे प्रिया प्रीतम “राधे गोविन्द” दे धाम को भी ले जावेगी.. सब लोग इक संग बोल देऊ “राधे गोविंद” 👍🏻

“राधे गोविन्द..राधे गोविन्द” 🦚 🙏🙏🏻

249- बहु-प्रतीक्षित बेरोजगार युवा

उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्य मंत्री जी!आप भी जानते हो कि प्रदेश के बेरोजगार युवाओं एवं युवतियों के साथ ये प्रयोग लगभग तीसरी बार है। “नौकरी के वादे करो” सरकार में आओ फिर सत्र के लगभग चार वर्ष उन्हें दरकिनार करते करते.. चुनाव से 7 या 8 माह पूर्व नियुक्तियों का सिर्फ एक झांसा दो.. (दिखावा करो) फिर ‘आचार संहिता’ या विज्ञप्ति में जानबूझकर कोई वीक पॉइंट छोड़ कर अपने ही किसी बंदे द्वारा कोर्ट में याचिका डलवा कर एक नया पेंच फंसा दो। ताकि नियुक्तियां न करनी पड़े। चुनाव मे जाने वाले नेताओं की इस घटिया चाल को न केवल जनता अच्छे से जान चुकी है। वल्कि उनके रिकॉर्ड 2010 के बाद से ही उठाकर देखलो! पहले सुश्री मायावती जी फिर श्री अखिलेश जी को इसी यूथ ने सिरे से नकार दिया है। हां लगभग एक दशक बाद पुनः श्री अखिलेश जी की ओर अब कुछ युवाओं में एक झुकाव सा अवश्य आने लगा है।

पीछे काफ़ी वक्त से प्रदेश में क्रियान्वित होती रही नीतियों पर यदि ध्यान दें,तो कुछ ऐसा समझ में आता है कि, अगर पूर्व मुख्य मंत्री मायावती से ‘यादव सरकार’ ने सबक लिया होता, तो उनकी सरकार जिसने.. कई एक कार्यों का बेहतरी से आगाज़ किया था..जैसे आम जनता के लिए..100 नंबर की अर्जेंट एवं विश्वसनीय पुलिस सेवा..देकर, बेरोजगार युवाओं व युवतियों को पूरे एक हजार रुपए महीने का बेरोजगारी भत्ता देने की एक बेहतरीन परंपरा..शुरू करके.. जो अबतक लगभग 10,000 रु हो गई होती। वे एक या सिर्फ दो बच्चों वाले सरकारी कर्मचारियों को एक इंक्रीमेंट या एक मुश्त राशि परिवार कल्याण के नाम से भी दे रहे थे, आपने आते ही सब अच्छी योजनाएं बंद करके पॉपुलेशन बढ़ाने.. व मजदूरों को नाकारा बनाने के लिए अनेकों योजनाएं चला डालीं..एक बात बताऊं ये बेरोजगारी भत्ता व पेंशन कोई खैरात नहीं है.. अंतर्राष्ट्रीय देशों में यू बी आई..अर्थात यूनिवर्सल बेस इनकम के रूप में यूथ को नौकरी दे पाने की सरकार की ओर से हो रही देरी के कारण दी जाती है। आपको पता हो तो देश का शिक्षित/प्रशिक्षित होनहार यूथ सरकार की नैतिक जिम्मेदारी होता है। आज देश व प्रदेश के यूथ को इस कमर तोड़ती महंगाई में ऐसी व्यवस्था की नितांत आवश्यकता है।..दुर्भाग्यवश कुछ घटनाओं ने देश व प्रदेश के यूथ को हिंदू/ मुसमान का ऐसा भय दिखाया और वह ऐसा पथ भ्रष्ट हुआ कि युवाओं की हितैसी यादव सरकार को धरासाई होना पड़ा। ठीक उसी तरह अगर आपने भी प्रदेश के युवाओं एवं किसानों की मूल समस्याओं का आत्ममंथन कर कोई ठोस रणनीति क्रियान्वित नहीं की, तो आप पक्का लिख लीजिएगा इस प्रदेश की जनता आपको भी धकियाने में देर नहीं लगाएगी..अंजाम चाहे जो भी हो। इसलिए युवाओं के बारे में ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए.. सरकारी विभागों से दबाव हटाकर.. वेकेंसी आने दीजिए और तत्काल भर डालिए..प्रदेश का यूथ बड़े मन से आपकी ओर मुखातिव है।धन्यवाद..

आपका अपना ‘युग’ पचहरा

248- सम्राट अशोक

क्या आपने कभी गौर किया है कि, “सम्राट अशोक” की जन्म-जयंती भारत देश में क्यों नहीं मनाई जाती है.. ??

बहुत सोचने पर भी, ऐसे बहुत से प्रश्नों के “उत्तर” आसानी से नहीं मिल पाते हैं !! आप थोड़ा चिंतन कीजियेगा।

सम्राट अशोक:

पिताजी का नाम – बिन्दुसार गुप्त

माताजी का नाम – सुभद्राणी

जिस “सम्राट” के नाम के साथ संसारभर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते रहे हैं।

जिस -“सम्राट” का राज चिन्ह “अशोक चक्र” भारत के अपने ध्वज में भी है।

जिस “सम्राट” के राज चिन्ह “चारमुखी शेर” को भारतीय “राष्ट्रीय प्रतीक” मानकर हम भारतीय देशभर में सरकार चलाते हैं।

और हमने “सत्यमेव जयते” को भी अपनाया हुआ है।

जिस देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान, सम्राट अशोक के नाम पर, “अशोक चक्र” तक दिया जाता है।

जिस सम्राट से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ”…जिसने “अखंड भारत” (आज का नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान, और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक-छत्र राज किया हो।

नोट कीजिएगा.. सम्राट अशोक के ही, समय में “23 विश्वविद्यालयों” की स्थापना की गई थी। जिसमें तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, कंधार, आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे। इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से छात्र उच्च शिक्षा पाने भारत आया करते थे।

जिस “सम्राट” के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार, भारतीय इतिहास का सबसे “स्वर्णिम काल” मानते हैं।

जिस “सम्राट” के शासन काल में भारत “विश्व गुरु” था। जिसे लोग “सोने की चिड़िया” कहा करते थे।

समस्त जनता में आपस में कोई भेदभाव नहीं था।इसीलिए बहुत खुशहाल भी थी।

जिस सम्राट के शासन काल में, सबसे प्रख्यात महामार्ग “ग्रैंड ट्रंक रोड” जैसे कई हाईवे तक बने थे। 2,000 किलोमीटर लंबी पूरी “सडक” पर दोनों ओर पेड़ भी लगाये गए “सरायें” अर्थात होटेल्स भी बनाए गए..मानव तो मानव..,पशुओं के लिए भी, प्रथम बार “चिकित्सा घर” (हॉस्पिटल) तक खोले गए

पशुओं को मारना भी बंद करा दिया गया था।

ये सबसे बड़ा सवाल है..? ऐसे “महान सम्राट अशोक” जिनकी जन्म जयंती उनके अपने ही देश भारत में आखिर मनाई क्यों नहीं जाती.. ??

इस पावन दिन न कोई छुट्टी ही घोषित की जाती है।

विडंबना के साथ साथ आप विचार कीजिए कि, कितनी बड़ी साजिश रही होगी कि देश के नागरिकों को इतिहास की असल जानकारी से ही वंचित कर दिया गया। जिससे कि वे अपनी वास्तविक पहचान को भूल जाएं।

जरा चिंतन कीजिए..”जो जीता वहीचंद्रगुप्त” की जगह “जो जीता वही सिकन्दर” कैसे हो गया??

जबकि ये बात सभी जानते हैं, कि सिकन्दर की सेना ने चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभाव को देखते हुए खुद ही लड़ने से मना कर दिया था।

सिकंदर का मनोबल बहुत बुरी तरह से टूट गया था। इसलिए वह “वापस भी लौट गया था”। लेकिन फिर भी..??

शायद आप भी मेरी इस बात के एग्री करेंगे.. कि सब कुछ अपनी आंखों से देखने व कानों से सुनने के बावजूद भी विश्वास नहीं होता.. कि कोई इतनी.. बड़ी गद्दारी अपने ही देश के साथ कैसे कर सकता है..??

क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय नेतृत्व को ऐसी “ऐतिहासिक साजिशों” को जो पकड़े जाने पर प्री प्लान्ड बड़ी चालाकी से “ऐतिहासिक भूल” बोल दे देते हैं।

जनमानस की आवाज है.. कि

वक्त रहते ..देश की ज़िम्मेदार बॉडी को संज्ञान लेना होगा। धन्यवाद

👍👍 पढ़ने के लिए सभी का 🙏🏻 || साभार ||🙏🏻

247- सादगी..

सादगी जब दिन की आखिरी ट्रेन यदि स्टेशन से निकल गई.. तो फिर, कल सुबह ही अगली ट्रेन मिलने की कल्पना करते हुए..।

एक बूढी महिला के पैर तेजी से स्टेशन की तरफ बढ़े जा रहे थे.. किंतु आज भी स्टेशन पहुंचते पहुंचते आखिर ट्रेन फिर छूट गई तो बेचारी महिला निराश होकर एक बेंच पर बैठ गई,,

उसके चेहरे पर चिंता के भाव थे। बाई द वे एक कुली ने इसे देखा..

और माँ समान महिला से पूछा.. “माईजी, आपको कहाँ जाना था?” महिला ने बताया,”मैं अपने बेटे के पास दिल्ली जाऊंगी….”

कुली बोला! पर अब कोई ट्रेन नहीं है माई.. अब, तो कल सुबह ही मिलेगी।। महिला बेबस लग रही थी तो कुली ने सहानुभूति पूर्ण भाव में कहा,,,, माई अगर आपका घर दूर हो तो यहीं प्रतीक्षालय में आपके लेटने का प्रबंध कर दूं और भोजन भी आपको वहीं मिल जायेगा। आपको कोई दिक्कत नही होगी,,,

बाद में फिर कुली ने पूछा ! अम्मा जी वैसे दिल्ली में आपका बेटा काम क्या करता है??? वृद्ध महिला ने जवाब दिया कि उसका बेटा रेल महकमे में काम करता है।

कुली ने उत्सुकता से उस वृद्ध महिला से उसके बेटे का नाम जानना चाहा..माई आप जरा उनका नाम बताओगी, अगर संपर्क संभव हुआ, तो तार.. अर्थात (प्राचीन भारत का टेलीफोनिक सिस्टम) से आपकी बात करवाने का प्रयास करता हूं,,,,,

वृद्ध महिला ने कहा, मैं तो सदैव उसे “लाल” कहकर ही बुलाती हूं। मगर और लोग उसे ज्यादातर लाल बहादुर शास्त्री कहा करते हैं। वृद्ध महिला के मुंह से उनके बेटे का नाम सुनकर कुली के पैरों तले जमीन खिसक गई वो आवाक रह गया,,भागकर स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुंचा और एक ही सांस में ये पूरा वाकया कह सुनाया। स्टेशन मास्टर तुरंत हरकत में आए..

कुछ लोगो से आनन फानन में टेलीफोन से बात की.. और अपने मातहतों के साथ भागकर बूढ़ी महिला के पास पहुंच गए,,,,,,,,

उन महिला को सादर प्रणाम कर स्टेशन मास्टर ने पूछा,,,,,, मां जी आपके बेटे ने कभी आपको बताया नही कि वह रेल महकमे में क्या काम करते हैं????

हां! बताया था ना मुझे,, कि “अम्मा मैं रेलवे के दिल्ली दफ्तर में छोटा सा एक मुलाजिम हूं!!”

मां जी,,आपकी शिक्षा व संस्कारों ने आपके बेटे को बहुत बड़ा एक महान व्यक्ति बना दिया है,,जानना नही चाहेंगी कि, आपके सुपुत्र जी रेल महकमे में कौन सा काम करते हैं???

स्टेशन मास्टर के मुखारविंद से ऐसा सुनके महिला के चेहरे पर विस्मय के भाव दिख रहे थे……

फिर स्टेशन मास्टर ने कहा, “मां जी,,,इस पूरे भारत में जितनी ट्रेन चल रही हैं और मेरे जैसे लाखों रेलवे कर्मचारी हैं ..आपका “लाल” तो उन सबके ऊपर है, उनके मुखिया हैं। यानि वे भारत के माननीय रेलवे मंत्री हैं। स्टेशन मास्टर व वृद्ध महिला के बीच चल रहे.. वार्तालाप के दौरान ही उस स्टेशन का माहौल पूरी तरह बदल चुका था,,,

सायरन की हुंकार के साथ जिले के पुलिस कप्तान जिला कलेक्टर सहित रेलवे पुलिस बल के जवान व अधिकारी स्टेशन पर पहुंच रहे थे। तभी कई एक एंबेसडर कार भी आ चुकी थी।।

सभी लोग उस “वृद्ध मां ” को सलामी देते हुए उनको पूरे सम्मान के साथ रेलवे के सुरक्षा गार्डों के सुपुर्द कर शास्त्री जी के पास दिल्ली के लिए रवाना कर दिया गया।।

जबकि बनारस के छोटे से स्टेशन पर चल रहे इस बड़े घटनाक्रम से दिल्ली दरबार में बैठा वह “छोटे कद का बड़ा आदमी” इस घटनाक्रम से पूरी तरह अनजान था। ऐसे थे भारत मां के सच्चे सपूत श्री लाल बहादुर शास्त्री जी❣️

आज उनकी 120 वीं जन्म जयंती पर.. कृतज्ञ राष्ट्र की विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🙏

246 टीचर या गुरु

शिक्षा के आरंभिक दौर से हर देश अपने विद्यार्थियों को विश्व स्तर की शिक्षा देने का प्रयास करता रहा है..

उसे अच्छे से अच्छा इंजीनियर और डॉक्टर बनाने का प्रयास सदियों से हो रहा है। ये अभी भी जारी है। और सदैव अनवरत रहेगा।

मगर भारत के “गुरु” शब्द का पर्याय पाश्चात्य जगत का प्रोफ़ेसर..या टीचर तो बमुश्किल ही बन पाएगा।

इस बिंदु पर थोड़ा चिंतन करने की आवश्यकता है। भारत के ‘ गुरु ‘ शब्द में जो भाव है। वो फोरिन लैंग्वेज के लेक्चरर, प्रोफेसर,रीडर आदि में नज़र नहीं आता है। क्योंकि “गुरु” शब्द में ‘गुरुत्व’ (Pedagogy) का भाव स्वत: ही समाहित है।

जबकि फौरिन टर्मोलॉजी में “शिक्षक या गुरु” जैसे टर्म (शब्द) के जो पर्याय हैं उनमें सैलरी पर कार्य करने का रूआब,तो नज़र आता है। मगर वे अपने शिक्षार्थी के साथ भारत के “गुरु” की तरह मुश्किल से ही कनेक्ट हो पाते हैं।

दरअसल, यह ‘ गुरु ‘ शब्द प्राचीन काल से ही अर्थ की अपेक्षा किए बिना अपनी शैक्षणिक शैली से बालक के मन की गहराई को बढ़ाने के प्रति पूर्ण समर्पित रहा है।

यह लौकिक शिक्षा से थोड़ा अधिक गहरा है। लौकिक शिक्षा देने की मना,तो नहीं है। स्वभावत:वह,तो देनी ही है।

लेकिन इसके साथ साथ जो शिक्षार्थी के जीवन की दशा एवं दिशा बदल दे, उसके अंत: ज्ञान चक्षुओं को खोल दे.. न सिर्फ प्रकृति एवं जीव, जगत का बोध करा दे,अपितु उन्हें एकात्म अर्थात केवल्य की अनुभूति करा दे.. वस्तुत: सांसारिक जीवन की सफलता के संग-संग ” मानव जीवन की सार्थकता” का भी अनुभव करा पाए मेरे विचार से उसको “गुरु” कहना कहीं तक उचित है।

जो अपने शाब्दिक अर्थ

गु=अंधकार,

रु =प्रकाश..

को चरितार्थ करता हुआ.. सदैव अपने शिष्यों को न सिर्फ तुच्छ ‘ सफलता..’ अपितु ‘जीवन की दिव्यता’ भी प्रदान करने की सामर्थ्य रखता है।

आधुनिक समय में शिक्षक के पर्याय के रूप में गढ़ा गया अंग्रेजी का लोक प्रचलित शब्द..”टीचर” ..जैसे विषय विशेषज्ञ,शिक्षा मित्र, इंस्ट्रक्टर,गेस्ट टीचर आदि देश के सत्ताधारियों की शिक्षा के प्रति अयोग्यता और नीरसता बयां करते हैं।

ये सभी भारतीय शब्द “शिक्षक” या “गुरु” के विकल्प के रूप में प्रयुक्त अवश्य किए गए हैं, मगर  ‘विद आउट स्प्रिट’ हैं। उनमें से किसी शब्द में “गुरु” जैसे पवित्र शब्द के बराबर में खड़े होने तक की सामर्थ्य नज़र नहीं आती। “गुरु” का पर्याय बनना तो बहुत दूर की बात है।

हां, भौतिक जगत में विद्यार्थी को कुछ खाने कमाने लायक तो अवश्य बना देते हैं।

जबकि “गुरु” अपने विद्यार्थी को तेजस्वी बनाता है। और हर एंगल से वह अपने विद्यार्थी के जीवन को सार्थक बनाने में जुटा रहता है। ये कहना न होगा कि सफलता से सार्थकता कहीं बड़ी होती है।

भारत का गुरु अपने गुरुत्व के आधार पर सदैव अपने शिष्य के सर्वांगीण विकास के प्रति समर्पित रहा है। और वह बालक के अंतर्मन में ईश्वरीय बोध की अनुभूति तक करा देता है।

जबकि पाश्चात्य जगत में केवल व्यवसाय के तौर पर ही प्राध्यापक अपने विद्यार्थी के संपर्क में रहता है। इसके अतिरिक्त विद्यार्थी से उसका कोई सरोकार नहीं होता।

वास्तव में, ये अंतर Spirituality का है। क्योंकि यहां का शिक्षक सदैव आध्यात्म की चादर ओढ़े हुए  है।

एक और बात..भारत में गुरु छोटा हो सकता है,बड़ा हो सकता है,डिग्री लेकर हो सकता है, ध्यान रहे..गुरु,तो बिना डिग्री के भी हो सकता है।

जिसने विद्यार्थी के जीवन को दिशा दे दी,धन्यता और दिव्यता दे दी। सच में ये सभी पहलू लौकिक शिक्षा से परे हैं।

शायद इसीलिए वह “गुरु” है। वही उसका “गुरुत्व”है।

अब एक उदाहरण आपके सामने रख रहा हूं.. जो हमें वास्तविक गुरु के दर्शन करा पाएगा..

जैसे; काशी बनारस विश्वविद्यालय में एक शिक्षक मुसलगांवकर जी अध्यापन कार्य कराते थे.. पांच विदेशी विद्यार्थी उनके घर पर भी पढ़ने आया करते थे। वे उन्हें वेदांग, व्याकरण, न्यायदर्शन अलग से पढ़ाते थे।

उनसे एकबार पूछा गया गुरुदेव! आपको इन शिष्यों को पढ़ाते समय कैसी अनुभूति होती है। तो श्रीमान मुसलगांवकर जी ने कहा,” मैं अपने विद्यार्थीयों को सदैव शिव के रूप में देखता हूं। वे साक्षात शिव के रूप में मेरे घर में आते हैं। मैंने अपने घर में बोल रखा है कि, जब विद्यार्थी आते हैं तब मैं जहां कहीं भी होऊं तुरंत मुझे बताइएगा, मैं आऊंगा। मेरे शिव तनिक भी मेरी प्रतीक्षा न करें।

वे अपनी इस अतिरिक्त अध्यापन कक्षा का विद्यार्थियों से कभी एक पैसा दक्षिणा रूप में स्वीकार नहीं करते थे।

जब श्री मुसलगांवकर जी से पूछा गया कि, महोदय! आपकी अंतिम इच्छा क्या है..??

“उन्होंने कहा! मेरी अंतिम इच्छा है कि जब मैं,मेरी अंतिम सांस लूं उस वक्त भी मैं अपने विद्यार्थियों के बीच हो ऊं, या मैं स्वाध्याय जो मेरा स्वभाव है..उसमें तल्लीन रहूं।”

फिर कुछ दिन बाद वे गुजर गए.. उनके परिवार से पूछा गया, कि मुसलगंवाकर जी कैसे गुजरे..?? उनके अंतिम क्रिया कलापों पर थोड़ा प्रकाश डालते हुए हमें कुछ बताइएगा..??

तो परिवारी जनों ने कहा,”बंधुवर! वे जब हॉस्पिटल में थे, तब भी मास्क लगाते हुए अपने बैड के बगल में दो विद्यार्थियों को प्रतिदिन पढ़ाते थे। अपने स्थूल शरीर के अंतिम दिनों तक भी वे दो विद्यार्थियों को निरंतर पढ़ाते रहे..शायद यही शिक्षक एवं गुरु का धर्म है।

अपनी अंतिम सांस तक “मैं शिक्षक हूं..” इस भाव को कंटिन्यू रख पाना आसान काम नहीं है। और अपने विद्यार्थियों में अपने इष्ट को देखना,तो और भी दुर्लभ है।

क्या पाश्चात्य जगत का टीचर इस भाव को कभी अपने अंदर जगह दे पाएगा??

नि:संदेह “कभी नहीं।”

पूर्व में भारत का हर गुरु अपने शिष्यों की पूजा इष्ट रूप में ही करता था।

मगर योजनाबद्ध तरीके से सत्ता लोलुपों की तरफ से कई एक दशकों से कुछ ऐसी रिपोर्ट पेश होती रही हैं। जो न देश हित में हैं और न जनता जनार्दन के ही पक्ष में हैं। जबकि किससे छुपा है कि, देश की सरकारें सरकारी शिक्षक को स्वतंत्र रूप से अपनी कला के प्रतिसमर्पित होकर शिक्षण कार्य करने ही नहीं दे रहीं हैं।

मैं यदि स्पष्ट कह दूं, तो निजीकरण की ओर ले जाने की अपनी षड्यंत्रपूर्ण साजिश के जरिए देश के शिक्षकों को बिना मतलब के कागज पीटने में इंगेज रखा जा रहा है। ताकि वह पढ़ा न सकें फिर बच्चों की धरातल पर जांच आदि कराकर ये साबित किया जा सके, कि देखो! सरकारी शिक्षक इतना वेतन लेने के बावजूद भी बच्चों को कुछ नहीं सीखता है।”

इसीलिए सभी वर्तमान शिक्षकों से विनम्र निवेदन है कि विभागाध्यक्षों के आदेशों के अनुरूप चाहे जो अतिरिक्त कार्य करें, लेकिन अपनी “शिक्षण कला” को जंग न लगने दें। अपना कर्तव्य सदैव प्राथमिकता पर रखते हुए..उम्दा तरीके से शिक्षण कार्य करें….ताकि अपने देश की “गुरु” वाली अवधारणा का निर्वहन होता रहे।

धन्यवाद

योगेंद्र सिंह,

मुखिया परिवार,नीमगांव, राया,मथुरा

245 – जीवन सूत्र

दैनिक जीवन में इन “सूत्रों” का क्रियान्वयन कठिन, तो है परंतु असंभव नहीं।

क्योंकि जीव के चौरासी लाख योनियों में कई कई बार “पुनरपि जनमम.. पुनरपि मरणम..” की कठिन प्रक्रिया से गुजरने के बाद मनुष्य योनि की ये दुर्लभ ‘मानव देह’ अर्थात “मनुष्य जीवन” को गर्त में जाने से.. बचाना है, तो एक परम संत की वाणी से निकले हुए इन “जीवन सूत्रों” पर अमल करना नितांत आवश्यक है।

1 हमारे बात करने का अंदाज़ ऐसा हो कि,भूल से भी अपने मुख से अपनी बड़ाई न हो जाए।

2 हमारे आचरण में किसी भी सांसारिक वस्तु के प्रति कोई लोलुपता (लालच) न हों।

3 हम अपमान सहनीय बनें..ताकि कहीं जाने अंजाने में अपमान हो भी जाए, तो बहुत विचलित न हों।

4 क्रोध व द्वेष कराने वाली बातों का चिंतन कदापि नहीं।

5 आश्रित की रक्षा करने में अपनी जान पर बन आए, तो भी हमें कोई गुरेज न हो।

6 अज्ञानता के वशीभूत निडर व हर्षित होकर शारीरिक बल के मद में कभी हम से कोई पापाचार न हो।

7 कामवासना..आदि के चिंतन से सदैव बचें।

8 एक समान प्राणी, वस्तु आदि के साथ किसी भी प्रकार की विषमता का आचरण न हो।

9 अपने आपको कभी भी “अत्यंत मान प्रीता” अर्थात अति महत्वाकांक्षी न बनने दें।

10 दान सदैव अपनी क्षमता के अंतर्गत ही हो, ताकि दान देने के बाद कभी मन में पश्चाताप का भाव न आए। और यदि दान देने की बात की हो,तो कभी अपनी बात से मुकरना नहीं।

11अति होशियारी में अपनी “कृपणता” को कभी भी “मितव्यता” का जामा मत पहनाइऐगा

धन्यवाद

Some nectar words..

from Saint Vani.

244- पनीर

In the purpose of good health for ever we must know the fact about.. Ayurvedic nature.

🍶आयुर्वेद ज्ञानामृत 🍶 कहता है एक सर्वे के मुताबिक पनीर आधुनिक युग में बीमारियों का सबसे बड़ा कारण साबित होता जा रहा है।

__________जब गहराई से इसकी पड़ताल की गई तो पता चला कि आयुर्वेद में पनीर को सबसे “निकृष्टतम” भोजन बताया गया है, उनकी भाषा में बोले तो कचरा और कचरा भी ऐसा वैसा नहीं, ऐसा कचरा जिसे जानवरों को भी खिलाने से मना किया गया है। ये तो जग ज़ाहिर है कि पनीर दूध को फाड़ कर या दूध का रूप विकृत करके ही बनता है, जैसे कोई सब्जी सड़ जाए तो क्या आप उसे खाएंगे ? क्यों..? इस आधार पर तो खा लेना चाहिए केवल उसका रूप और थोड़ा सा स्वाद ही तो विकृत हुआ है।

दरअसल, पनीर सड़ा हुआ दूध ही तो है, बस बात इतनी सी है कि वह दिखने में सफेद है..और उसका स्वाद लोगों के मुंह लग गया है।

आज भी ग्रामीण अंचल के घरों में महिलाएं अपने हाथ से कभी दूध नहीं फाड़ती!

भारतीय इतिहास में कहीं भी पनीर का उल्लेख नहीं है। ना, ही ये भारतीय व्यंजन में सुमार है। जबकि भारत में तो प्राचीन काल से दूध को विकृत करने की सख्त मना की गई है। भारतीय बुजुर्ग अक्सर “दूध और पूत” को समानता के नजरिए से देखते रहे हैं। शायद इसलिए दूध और पूत का बिगड़ना किसी की सेहत के लिए अच्छा नहीं हो सकता।

पनीर खाने के नुकसान;

आयुर्वेद ने तो शुरू से ही मना किया था कि विकृत दूध लिवर और आंतों को नुकसान पहुंचाता है,

लेकिन अब आधुनिक विज्ञान ने भी अपने नए शोध में साबित किया है कि पनीर खाने से आंतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है जिससे पाचन संबंधी रोग होते हैं।

अगर प्रोटीन की बात करें, तो पनीर से प्राप्त प्रोटीन को पचाने की क्षमता, तो जानवरों में भी नहीं होती। फिर मनुष्य की क्या बिसात है जो उसे पचा सके।

उसी का नतीजा है.. खतरनाक कब्ज, फैटी लीवर और आगे चल कर शुगर, कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लडप्रेशर और यही पनीर पेट की खतरनाक बीमारी IBS को भी पैदा करता है। ज़्यादा पनीर खाने से खून में थक्के जमने की शिकायत होती है, जो ब्रेन हैमरेज और हार्ट फेलियर का कारण बनता है। वहीं ये पनीर हार्मोनल डिसबैलेंस का कारण बनता है जिससे हाइपोथायरायडिज्म या हाइपरथायराइडिज्म पनपता है।

महिलाओं में गर्भ धारण करने की क्षमता कम होती है पुरुषों में नपुंसकता आती है।

कुल मिला कर यदि देखा जाए, तो पनीर से थोड़ा सा लाभ या स्वाद दो एक सैकंड के लिए जीभ को तो मिलता है, लेकिन हानि पूरे शरीर को होती है।

पर कढ़ाई पनीर, शाही पनीर, मटर पनीर, चिली पनीर और भी न जाने क्या क्या पनीर….समोसे में पनीर, पकौड़ी में पनीर, पिज्जा में पनीर, बर्गर में पनीर, मतलब जहां देखो वहां पनीर, पनीर पनीर।

आप सर्वे की रिपोर्ट पढ़कर देख लीजिएगा, भारत में जितना दूध पैदा नहीं होता उससे कहीं ज़्यादा पनीर बनकर बिक जाता है।

भारतीय लोग तो पनीर के इतने दीवाने हो चुके हैं कि इन्हें जब पनीर मिल जाता है बहुत ही मजे से चाप लेते हैं, होटल में गए तो बिना पनीर खाये एक भी निवाला इनके गले से नीचे नहीं उतरता।

चिकित्सा विज्ञान में सबसे प्राचीन विधा आयुर्वेद में दूध,दही,घी का जिक्र हर जगह मिलता है किन्तु इस नामुराद पनीर का जिक्र कहीं भी नहीं मिलता, आखिर क्यों ?

यदि पनीर इतना ही अच्छा है तो इसके बारे में किसी ऋषि-मुनि ने कभी कुछ लिखा क्यों नहीं ..??

पनीर के दीवाने तो फिर भी खाएंगे..वैसे भी आज सही बात की अवहेलना करने का एक दौर सा चल पड़ा है। इसलिए किसी पर कोई जोर है भी नहीं।

लेकिन जो लोग सेहत को सर्वोपरि मानते हैं और थोड़ा बहुत बेवजह की बीमारियों से भी डरते हैं, कम से कम ऐसे महानुभाव अगली बार पनीर खाने से पहले एकबार सोचिएगा अवश्य ।

धन्यवाद “आयुर्वेद ज्ञानामृत”

🙏🙏🪴🪴

243- परिस्थिति

ज़नाव “चुप” हैं तो जरूर कोई बात है..??

‘वरना ! क्या ‘बात’ कहनी नहीं आती!!’

जी,बिल्कुल

नि:संदेह ! कभी कभी ऐसा भी होता है।

क्योंकि, संसार का हर प्राणी “परिस्थितियों का दास” तो है ही।

इस बात को जो इंसान जितनी जल्दी समझ जायेगा, उतनी जल्दी वह इस दुनियां में मानसिक तौर पर,तो सुखी हो ही जायेगा। अर्थात

वह जीवन में आने वाली परिस्थितियों से तालमेल बिठा सकेगा।

लोगों के जीवन में “परिस्थिति” वश आने वाली स्थितियों को किसी लेख में कवर करना संभव तो नहीं है परंतु कुछ परिस्थितियों की विवशता व्यक्ति दर व्यक्ति अलग अलग भी हो सकती है। ये ‘माइंड मेक अप’ सभी का होना चाहिए।

समझदारों के लिए सदैव इशारा ही काफ़ी होता है।

इस संदर्भ में आम आदमी की तो बात छोड़िए..चाहे राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय किसी पर पटल पर देख लीजिएगा.. अपने आपको सिकंदर समझने वाले भी जनता जनार्दन के आगे अक्सर हतप्रभ होते पाए गए हैं।

जैसे; कई एक संस्था प्रधान व विभागाध्यक्ष अपने ही कर्मों के अधीन “परिस्थितियों” के ऐसे दास होते देखें हैं, कि..कुछ पूछिएगा मत। जो गुरुर में सारी हदें पार करते चले जा रहे थे, वे ऐसे थम जाते हैं कि वश..वश..

देश के कुछ ही ‘समझदार नागरिक’ उन्हें “बगलें झांकने” को मजबूर कर देते हैं। आम जनता भी गर इन मौका परस्त लोगों के फेंके जाति,धर्म के मकड़ जाल से निकल आए, और अपनी ताकत का ठीक से उपयोग करने लगे, तो आप देखते जाइयेगा.. व्यवस्था सुदृढ़ होने में कोई बहुत ज्यादा वक्त लगता नहीं है। लेकिन अफसोस अधिकतर जनता लोगों के तुष्टिकरण के फॉर्मूला के अधीन कई बार कठपुतली बन जाती है।

हालांकि लोग अपनी झेंप मिटाने के लिए जनता के सामने थोड़ी बहुत बहरुपियागिरी,तो अवश्य दिखाते हैं।

अति “महत्वाकांक्षी व्यक्ति” होना भी एक अभिशाप है।

ये कहावत आपने भी सुनी होगी कि, “बिगड़ेल घोड़ों को सदैव “परिस्थिति” नामक चाबुक ही नियंत्रण में ले पाता है।”

यद्यपि ये कहावत सभी सांसारिक प्राणियों पर लागू होती है।

जब जब किसी ने तानाशाही से अपने अधीन भोले भाले लोगों को मद में आकर “आम को बबूल” कहल वाने का दंभ भरा है, वक्त ने तब तब ऐसी करवट बदली है कि, फिर सब उस तानाशाह की चाहत के परे ही हुआ है।

कई बार वक्त लोगों को अपने आंख,मुंह और कानों पर इसी तरह पट्टी बांधने को बाध्य कर देता है। सब कुछ देखते-सुनते और समझने के बावजूद भी ऐसे रहना होता है कि जैसे कुछ जानते ही नहीं।

हालांकि, इस दुनिया बिच सारी स्थिति/परिस्थिति के लिए व्यक्ति स्वेम ही जिम्मेदार होता है। क्योंकि सारी परिस्थितियों की जड़ में उसके अपने कर्म ही होते हैं।

ध्यान रखिएगा!! समस्त यूनिवर्स को हैंडल करने वाली अथॉरिटी.. परम सत्ता यानी “ईश्वर” कभी भी परिस्थिति जनक नहीं हो सकते.. क्योंकि वे सदैव “मंगल भवन अमंगल हारी.. हैं।” उनका रॉल तो जीव के अमंगल अर्थात परिस्थिति को हरने का है, न कि देने का। धन्यवाद

242- चेतना

ह्यूमन ग्रॉस बॉडी अर्थात “मानवीय स्थूल शरीर” को मन, बुद्धि, चेतना (विवेक) की कठपुतली कह दिया जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मन,बुद्धि चेतना में से अमुक व्यक्ति के अधिकतर निर्णयों पर किसका प्रभाव झलकता है।ये ही वो मानक हैं जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं।

यदि किसी की “चेतना” जागृत हो जाए, तो फिर कहने ही क्या हैं!!! इसके बाद व्यक्ति की मानवीय संवेदनाएं ..अपनी सुसुप्ता अवस्था से निकल कर व्यक्ति के दैनिक लोक व्यवहार में अभिव्यक्त होने लगती हैं।

दरअसल, आध्यात्मिक नजरिए से ये सांसारिक जीवन, ईश्वर प्रदत्त “पूर्व निर्धारित नियत नटी”का एक खेल भर है।

” राजा, राणा,छत्रपति हाथिन के असवार।

जाना सबको एक दिन अपनी-अपनी बार।।”

क्षति,जल,पावक,गगन,समीरा।

पंचतत्व मिलि बना शरीर।।

कहना न होगा.. कि, विद्वानों ने अधिकतर पद्य,श्लोक आदि विधाओं के जरिए अपने शोध से “गागर में सागर” वाले अनुकरणीय विचार हमारे लिए सदैव कहीं न कहीं प्रस्तुत किए हैं। वो बात अलग है कि नई पीढ़ी उन तथ्यों को तवज्जो नहीं देती। क्योंकि आजकल छात्रों को ही नहीं अपितु सामान्यत: लोगों को भी “रीडिंग” करने की आदत कम ही है।

दूसरे प्रत्येक जीव का स्थूल शरीर शुभ अशुभ कर्मों के साथ साथ प्रकृति जनित “पांच तत्वों” से निर्मित होता है। जिसे जन्म के समय मृत्युलोक में आते वक्त दो खातों से नवाजा गया हैं..

खाता नंबर 1 सांसों का ..निश्चित अमाउंट

खाता नंबर 2 कर्मों का..हिसाब किताब..”प्रारब्ध” जीव के कई जन्मों के संचित कर्मों को अपने अंदर स्टोर रखता है।

ऐसा अक्सर देखा गया है कि लोगों की सांसारिक जिम्मेदारियां,जीवन की भागमभाग लगभग पूरी हो गई है। मगर विस्तर पर लेटे लेटे “सांसों” का हिसाब पूरा करने के बाद ही दुनियां से जाना हो पाता है।

किसी किसी की सांसें जीवन की भगमभाग के दौरान रास्ते में ही टूट जाती हैं। सवाल वही है..?? खाता खाली होने पर.. प्रत्येक स्थूल शरीर (युवा/वृद्ध) जिस भी अवस्था में है..फिर से “पंच तत्व” में विलीन होकर “मृत्यु” को प्राप्त हो जाता है। फिर चाहे आप कुछ भी कर लीजिएगा..ये सच ही है, “टूटी को बूटी ” नहीं है।

जबकि हम गंभीरतापूर्वक सोचें.. , तो इस प्रक्रिया में मृत्यु होती किसकी है..??

आध्यात्मिक कैलकुलेशन कहता है; “किसी की भी तो नहीं।”

समझिए!!

पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश,वायु

ये सभी तत्व अपनी अपनी जगह वापस ही, तो चले जाते हैं। मरता कौन है फिर मृत्यु किसकी हुई ..??।आप कहेंगे स्थूल शरीर की तो भई! वही तो पंचतत्व का बना हुआ था। उसी में समाहित हो गया।”

ईश्वर के विधान में स्थूल शरीर को हिंदू रीति से यदि अग्नि के हवाले किया जाता है,तो जलकर उसके पांचों तत्व “बैक टू पवेलियन” हो जाते हैं।

ठीक वैसे ही अन्य रीतियों से यदि जमीन में दबाने या दफनाने से भी वह खाके सुपुर्द हो कर पंचतत्व को ही प्राप्त हो जाता है।

लेकिन..लेकिन

मृत्युलोक में माया के वशीभूत इंसान ने अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपरता के चश्मे से ऐसे मंजर को सदैव दुःखद रूप में ही देखा है।

मगर विद्वानों का एक सर्वे दुनियां के लोगों को तीन टुकड़ों में बांटकर देखता है।

नंबर एक “भौतिक जगत” की श्रेणी में आने वाले संसार के 80% लोग..अक्सर “माया” के प्रभाव में अपना जीवन जीते हैं। उनके लिए तो ये दु:खद ही है।

दूसरे नंबर “मानसिक जगत”..के जीव जो केवल 12% हैं वे मानसिक स्तर से अपनी जीविका को आगे बढ़ाते हैं।,

जबकि नंबर तीन “आत्मिक जगत” जो मात्र 8% ही है। वे सदैव आत्मा को सर्वोपरि मानकर ही प्रत्येक के साथ आचरण करते हैं।। ये श्रेणी स्थूलता के घटने /बढ़ने से कम ही विचलित होती है।

सामान्यतः किसी के स्थूल शरीर छोड़ने का समाचार सुनकर ..मानव मन का आहत हो जाना संभाव्य है..

लेकिन इस मृत्युलोक में आने के बाद इंसान की उचित सूझ बूझ, सदाचार उस अमुक जीवात्मा की भूमिका के अनुसार ही इंसान की पारिवारिक एवं सामाजिक छबि को आकार देते हैं, फिर वही पहचान संपर्क में आए लोगों के ज़हन में एक संस्मरण बन जाती है। जो बाद में ताउम्र वक्त वक्त पर उस अमुक व्यक्ति की याद दिलाने का फिनोमिना बनती है।

भारतीय सामाजिक व्यवस्था द्वारा गांव गांव शहर शहर प्रचिलित इन “शोक संतृप्त” (12/13) दिनों में लाज़मी है हमें उस अमुक जीवात्मा के सम्पूर्ण जीवन में से केवल उसके सकारात्मक कृतित्व पर एक सरसरी नज़र ..डालते हुए मौजूदा पीढ़ी के सामने,उसके बचपन, जवानी एवं वृद्धावस्था पर एक हैल्दी चर्चा-परिचर्चा.. कर लेनी चाहिए।

जीवात्मा प्राप्त “जीवन” को किस प्रकार की “ज़िंदगी” का आकार देने में कामयाब रही..?? ऐसे वक्त की बातें लोगों के लिए प्रेरणादायक या “Eye-Opener” का काम कर सकती हैं।

क्योंकि स्थूल शरीर से निकल कर जाने वाली प्रत्येक आत्मा.. हमारे लिए कई एक सवाल छोड़ जाती है। उदाहरण के तौर पर “रामायण” के एक निगेटिव चरित्र ‘रावण’ विद्वान एवं शक्तिशाली होने के बावजूद भी जीवन राह से भटक कर बहुत से आवश्यक कार्यों को अधूरे छोड़कर चला जाता है। जो इस बात का प्रतीक है कि हमें जीवन की राह पर चलते हुए भटकने से बचना होगा..और “समय एवं ऊर्जा” के रूप में प्राप्त अपनी प्रतिभा का उचित प्रयोग कर के अपना अध्यात्म स्तर बढ़ाना होगा।

दरअसल, पद्म पुराण के एक श्लोक ..के अनुसार..

“जलज नौ लक्षाणी, स्थावरा लक्ष विसंति,

कृमियां रुद्र संख्य काय।

दस लक्षाणि पक्षीणाम,

पशुणाम तीस लक्षाणी

चतुर लक्षाणी मानुष: ।।”

भावार्थ: आत्मा “नौ लाख” जलीय जीवों की योनियों में जन्म लेती है।, “बीस लाख” पेड़ पौधों की योनियों में।, “ग्यारह लाख” कीट पतंगों के रूप में..।, “दस लाख” पशुओं की योनियों में।, “तीस लाख” पक्षियों की योनियों में ये “अस्सी लाख” योनियां अन्य कही जाती हैं ।

..( तपहुं कर मानव तन पावा..) मनुष्यों की मात्र “चार लाख” योनियां ही होती हैं।

कहा जाता है सभी अस्सी लाख योनियों में कई एक जन्म लेने के उपरांत ही ये “मानव देह” प्राप्त होती है इसीलिए दुर्लभ कही गई है।

चौरासी लाख योनियों में कई एक बार जन्म मरण का विचरण करने के बाद आत्मा इस दुर्लभ “मानव देह” को प्राप्त कर लेने पर अपने आप को सफल मानती है।

उपरोक्त विवरण से विषय की गंभीरता को देखते हुए.. क्या आपको नहीं लगता!! “मनुष्य शरीर” में आने बाद एक बेहतर पारी खेली ही जानी चाहिए।

इसीलिए कर्मों से “भले लोग” बनिए…क्योंकि भले लोग “कभी नहीं मरते” वे अपनी अच्छाइयों से लोगों के मन मस्तिष्क में सदैव जिंदा रहते हैं।

धन्यवाद 🙏

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा, के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस।

(मूल निवासी : नीमगांव,राया,मथुरा)

241- उफ ये गर्मी..!!

जी, हां गर्मी में “लू लगना” और “लू” लगने से मृत्यु तक हो जाना..!! चलो! आज इस तथ्य को बारीकी से समझने का एक प्रयास करते हैं…

पहले जानें आखिर “लू” से मृत्यु क्यों होती है..? करेंट अफेयर्स पर पैनी नज़र रखते हो, तो आपको पता ही होगा कि, दिल्ली से आंध्रप्रदेश तक….सैकड़ो लोग आजकल “लू” लगने से मर रहे हैं।

धूप में,तो हम सब घूमते हैं फिर आजकल कुछ लोगो की ही धूप में जाने के कारण अचानक मृत्यु क्यों हो जा रही है? विचारणीय है..ध्यान से समझिएगा..

👉 हमारे शरीर का तापमान हमेशा 37° डिग्री सेल्सियस होता है, इस तापमान पर ही हमारे शरीर के सभी अंग सही तरीके से काम कर पाते है।

F 👉 पसीने के रूप में पानी बाहर निकालकर शरीर 37° सेल्सियस टेम्प्रेचर मेंटेन रखता है, लगातार पसीना निकलते वक्त भी पानी पीते रहना अत्यंत जरुरी और आवश्यक है।

👉 पानी शरीर में इसके अलावा भी बहुत कार्य करता है, जिससे शरीर में पानी की कमी होने पर शरीर पसीने के रूप में पानी बाहर निकालने को टालता है। अर्थात बंद कर देता है।

👉 जब बाहर का टेम्प्रेचर 45° डिग्री के पार हो जाता है और शरीर की कूलिंग व्यवस्था लगभग ठप्प हो ने लगती है, तब शरीर का तापमान 37° डिग्री से ऊपर पहुँचना लाज़मी है।

👉 शरीर का तापमान जब 42° सेल्सियस तक पहुँच जाता है तब शरीर का रक्त गरम होने लगता है और हमारे खून में उपस्थित प्रोटीन पकने लगता है ( जैसे उबलते पानी में अंडा पकता है )

F 👉 स्नायु कड़क होने लगते है इस दौरान सांस लेने के लिए जरुरी स्नायु भी काम करना बंद करने लगते हैं।

👉 शरीर का पानी कम हो जाने से रक्त गाढ़ा होने लगता है, ब्लडप्रेशर लो हो जाता है, महत्वपूर्ण अंग विशेषतः ब्रेन तक की ब्लड सप्लाई रुक जाती है।

👉 व्यक्ति कोमा में चला जाता है और उसके शरीर के एक- एक अंग कुछ ही क्षणों में काम करना बंद कर देते हैं, और इस प्रकार उसकी मृत्यु हो जाती है!!!

क्या करें;–

👉गर्मी के दिनों में ऐसे अनर्थ को टालने के लिए लगातार थोडा थोडा पानी अवश्य पीते रहना चाहिए, और हमारे शरीर का तापमान 37° मेन्टेन किस तरह रह पायेगा इस ओर ध्यान देना चाहिए।

चेतावनी!!! के रूप में..

मौसम विज्ञान द्वारा ऐसा पूर्वानुमान लगाया जा रहा है कि, Equinox phenomenon: इक्विनॉक्स प्रभाव अगले 5 -7 दिनों मे एशिया के अधिकतर भूभाग को प्रभावित करेगा।

कृपया 12 से 3 बजे के बीच ज्यादा से ज्यादा घर, कमरे या ऑफिस के अंदर ही रहने का प्रयास करें।

मेरे आर्टिकल के थ्रू आप ऐसा मान सकते हो तापमान अभी कुछ दिन विचलन की अवस्था में रहेगा।

ज़ाहिर है ये परिवर्तन शरीर मे निर्जलीकरण और सूर्यताप की स्थिति उत्पन्न कर देगा।

भौगोलिक ज्ञान रखने वाले अच्छी तरह समझते हैं कि ये प्रभाव भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर सूर्य चमकने के कारण पैदा होते ही हैं।

कृपया स्वयं को और अपने जानने वालों खास कर बच्चों को पानी की कमी से ग्रसित न होने दें।

किसी भी अवस्था में सामान्य लोग कम से कम 3 ली. पानी जरूर पिएं।

किडनी की बीमारी वाले प्रति दिन कम से कम 6 से 8 ली. पानी जरूर लें।

जहां तक सम्भव हो ब्लड प्रेशर पर नजर रखें। किसी को भी हीट स्ट्रोक हो सकता है।

सभी ठंडे पानी से नहाएं।

नौन वैज वाले लोग अभी कुछ दिन मीट आदि का प्रयोग न ही करें तो बेहतर रहेगा।

फल और सब्जियों को अपने भोजन में ज्यादा स्थान दें।

ध्यान रहे “हीट वेव ” कोई मजाक नहीं है!!!

एक बिना प्रयोग की हुई मोमबत्ती को कमरे से बाहर या खुले मे रखकर देख लें, यदि मोमबत्ती पिघल जाती है तो ये स्थिति गंभीर है।

शयन कक्ष और अन्य कमरों में दो आधे पानी से भरे मगर ऊपर से खुले पात्रों को रख कर भी कमरे की नमी बरकरार रखी जा सकती है।

अपने होठों और आँखों को नम रखने का प्रयत्न करें।

भले ही आप “सोशल एक्टिविस्ट” न हों तो भी जनहित मे इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित कर सकते हैं। पूरा पढ़कर अमल करने वालों को पचहरा सर का ह्रदय से धन्यवाद

योगेंद्र सिंह पचहरा, जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस से..