260 “मार्शल कौम”

अंतरराष्ट्रीय जाट दिवस [13 अप्रैल] आज का दिन आत्मावलोकन और चिंतन के साथ साथ अपनी कौम के कुछ नशे की लत के शिकार होते बंधुओं जिनकी हरकतें पूर्वजों के सारे किए धरे पर पानी फेर दे रहीं..हैं। आए दिन होती दहेज आदि की घटनाओं में नामित होते.. उन भटके हुए कदमों को रोकने के लिए भी कौम के मजबूत संगठनों द्वारा अब इस दिन को संकल्प लेने का दिन बनना होगा।

समझें कि हमारा इतिहास क्या था..और आज हम कहां पर खड़े है ..??

नि:संदेह हमारा इतिहास स्वर्णिम रहा है जिसपर हमें और हमारी संततियों को गौरवांवित होने के साथ साथ उसे सदैव मेंटेन रखने का प्रयास करना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे पूर्वजो का देश के निर्माण में अभूतपूर्व योगदान रहा है।

हम अपने नज़रिए से देख रहे हैं.. तब ऐसा दिख रहा है। अन्यथा मेरे विचार से देश की दूसरी जातियों का योगदान भी कम नहीं रहा था। जिसकी जितनी सामर्थ्य थी लगभग सबने भरपूर योगदान दिया था। तब कहीं ये आजादी नसीब हो सकी थी।

क्योंकि आज हमें दिमांगों में अंग्रेजियत लिए इन देशी नेताओं ने जाति,उपजाति,धर्म,संप्रदाय के छोटे छोटे पीसिज में इस कदर काटकर रख दिया है कि हम मनुष्य अपना “मानव धर्म” भूलकर जाति,धर्मों के लेंसिज से देखने के आदी हो चुके हैं। वही देखते हैं,वही कहते हैं जो ये मौका परस्त नेता हमें दिखाना या कहलवाना चाहते हैं।

चलो में अब मुख्य बिंदु पर आता हूं..

हमने किसान रूप में अन्न उगा कर देश के अन्न के भंडारों को भरा है, तो दूसरी ओर देश के सजग प्रहरी बन अपने प्राणों की भी परवाह न करते हुए पूरी मुस्तैदी से देश की सीमाओं की रक्षा की है। देशकाल परिस्थितियों के अनुसार हमारे पूर्वजों ने मुगलो से न सिर्फ लोहा लिया वल्कि दिल्ली को फतेह कर उसके असधाती फाटक तक को उखाड़ कर अपने साथ ले आए।

स्वतंत्रता संग्राम मे अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलन मे बाबा शाहमल व सरदार भगतसिंह जैसे कई एक कद्दावर देश भक्तों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं से देश को आजाद करवाने में अपना योगदान दिया।

किंतु तुच्छ मानसिकता के इतिहासकारो ने गंदी राजनीति के शिकार नेताओं की सह पर इतिहास को लिखते समय न सिर्फ जाट कौम के प्रति अन्याय किया, अपितु देश की अन्य कौमों के सच्चे स्वतंत्रता सैनानियों को भी नजर अंदाज कर दिया गया।

जबकि ऐसे ऐसे लोगों को इतिहास में जगह दी गई है,जिन्होंने कभी दिल्ली की दहलीज पर कदम तक नहीं रखा। फिर भी तमाम विरोधों और भ्रांतियों का सामना करते हुए ,अपनी मेहनत और लगन के बल पर दुनिया के प्रत्येक क्षेत्र में इस मार्शल कौम ने अपनी अलग छाप छोड़ने में कभी भी कसर नहीं छोड़ी है।

हमारे जाट समाज के महान गौरव सर छोटूराम जैसे किसान नेता भी हुए जिन्होंने किसानो को एकत्र कर उनको हक के लिए संघर्ष करना अपनी फसलों का सही मूल्य कैसे लिया जाए, ये सब भी सिखाया।

सभी देशवासियों के आशीर्वाद से भारत रत्न महान किसान नेता स्व. श्री चौधरी चरणसिंह जी ने प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री और कृषि मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया।

हरियाणा से त्याग की प्रतिमूर्ति ताऊ देवीलाल जी उप प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री रहे, उनके पास प्रधानमंत्री बनने का अवसर था,लेकिन बताया जाता है कि उस वक्त देश पर हुकूमत चलाने का उनका अपना निजी “होम वर्क” कंप्लीट नहीं था।,तो उन्होंने वी पी सिंह जी को न केवल आगे बढ़ाया..अपितु प्रधानमंत्री बनवाया और आखिर तक साथ दिया। स्वयं सब के ताऊ की हैसियत से उप प्रधानमंत्री बन परामर्श करते रहे।

पंजाब मे अधिकतर मुख्यमंत्री हमारे ही लोग बनते रहे हैं।

हां, राजस्थान एकलौता ऐसा राज्य अवश्य है, जहाँ सभी प्रदेशों से हमारी संख्या अधिक होते हुए भी हम प्रदेश के शीर्ष पद मुख्यमंत्री नहीं बन पाए हैं। राजस्थान के प्रबुद्ध लोगों को इस पर गंभीर चिंतन मनन करना होगा।

इसके अतिरिक्त देश और और प्रदेशों की मंत्रीमंडल के हिस्से भी हम रहे हैं।

आज हम देश की सभी सेनाओ के सेनाध्यक्ष भी बन रहे है, प्रशासनिक सेवाओ के उच्च पदों पर बैठकर देश के नीति निर्धारण मे भी अहम भूमिका में हैं।

हमारे भाई – बहन भी खेलों मे अपनी विलक्षण प्रतिभा से मेडलों की बौछार करते हुए देश की 140 करोड़ जनता को कभी निराश नही होने देते।

हम विश्वविद्यालयों के कुलपति और शिक्षक बन वर्तमान पीढी का मार्गदर्शन भी पूरे इत्मीनान से कर रहे है, हमारे भाई बहन चिकित्सा के क्षेत्र में तैनात होकर देश की जनता की सेवा कर रहे है।

आपको जानकर खुशी होगी कि हम अब पारंपरिक व्यवसायों के साथ साथ व्यापार मे भी दो दो हाथ कर रहे हैं। और तकनीक के क्षेत्र मे भी हम अपना योगदान देने में सक्षम हैं। इसके साथ साथ निर्भीक पत्रकारिता भी कर रहे है।

हमारी कौम सदैव अपने पूर्वजों के इतिहास पर गर्व करती है। ये सौभाग्य आगे भी बना रहे..

लेकिन वर्तमान मे जब हम नाशाखोरी, दिखावा, गुंडागर्दी और दहेज़ जैसी गंभीर सामाजिक समस्या में लिप्त होते अपनी कौम के बंदों को देखते हैं तो समाज में लोगों के समक्ष शर्म से हम सबकी नजरें नीचे देखने को बाध्य हो जाती हैं।

हमें उन भटकते कदमों को पुर ज़ोर रोकने की तरफ भी ध्यान देना होगा। आज अंतरराष्ट्रीय जाट दिवस पर हम सभी अपने पूर्वजों के योगदान को याद करते हुए उनको कोटि कोटि नमन करते हैं। और आप सभी को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं धन्यवाद राधे गोविंद 🙏🙏

259 “रुपांतरण”

ट्रांसफॉर्मेशन अर्थात वैचारिक “रूपांतरण” के मूल से जुड़ा हुआ लेख.. ये ..लेख क्या !! ग्रामीण अंचल की भाषा में मनुष्य के मन के उदगार हैं। और यदि भागवतिक नज़रिए से देखें, तो अपने इष्ट से एक भक्त के “मन की गुहार” भी कह सकते हैं।

विचार मंथन के लिए,तो सभी स्वतंत्र होते हैं। लेकिन ध्यान दीजिएगा केवल सार्थकता के दायरे में।

दरअसल, इस लेख का ‘थॉट ऑफ़ द थीम’ एक पुण्य आत्मा की स्मृति में भावुक मन के अर्पित कुछ “श्रद्धासुमन” हैं।

एक अंतर्मन की गुहार इसलिए भी है.. कि औपचारिक दुनिया से दूर.. अपने राधेगोविंद के चरणों में हर वर्ष इस अमुक दिन अपनी अर्धांगिनी की आत्मशांति के लिए अपने इष्ट को प्रसन्न करने का भाव मन में लिए हम पर..’राधे गोविंद’ की कृपा दृष्टि बनी रहे.. ऐसी चाह लिए महज़ एक अरदास है।

और यदि भौतिकवादी नज़रिए से..देखा जाए,तो अमुक तिथि सांसारिक जीवन में हुई अप्रत्याशित घटना की सिर्फ एक तारीख़ मात्र है।

कहना न होगा कि, सनातन इस तारीख को हमेशा मेरी “श्रीमतीजी” की ‘पुण्य तिथि’ के रूप में देखेगा।

पूर्व निर्धारित व्यवस्था (नियत नटी) के अनुरूप कर्मों के गणित के आधार पर शायद एक व्यक्ति के सुकृत्यों के सिमटने से अच्छी भली तारीख की परिणित इस रूप में हुई होगी।

इसे मानव मन का स्वभाव ही कहेंगे कि वो एक ऐसा मंज़र है जो मेरी आंखों के सामने बार बार आने को विवश रहता ही है,और श्रीमती जी के इलाज के दौरान अठारह वें दिन की शाम को उनकी सारी रिपोर्ट ठीक बताते.. बताते आगरा स्थित हॉस्पिटल में डॉ. पुरी दावा करते रह गए.. कि, सर! डोंट वरी आप इन्हें स्ट्रेचर पर लाए अवश्य थे, पर आज मैं ये कहने की स्थिति में हूं कि, नीरज चौधरी इसी सप्ताह यहां से अपने पैरों पर “चलकर”अपने घर जाएंगी। मगर उन्नीस वें दिन “कार्डियक अरेस्ट” ने उन्हें कौन से घर पहुंचा दिया..?? मेरे मन में उभरता ये प्रश्न अभी भी उत्तर की तलाश में रहता हैं। भौतिक नज़रिए से देखें,तो अचानक लगभग सब ध्वस्त हो गया था।

जबकि उनके दाह संस्कार से त्रयोदशी होने तक उन बारह तेरह शोक संतृप्त दिनों में मातम पोर्शी में आए लोगों के अध्यात्म से ओत प्रोत विचार सुने, तो कई एक बुजुर्गों द्वारा कहा गया कि, बेटा ! क्यों परेशान हों दे ओ, आपणा जीवन आपणे बच्चे नू लाइफ मा देखो, सदियों से चलता हुआ “जीवन चक्र” तो ऐसे ही घूमता चला आ रहा है।

सभी जीवात्माएं इस धरा पर अपना नियत समय लेकर आती हैं। और अपने शरीर रूपी वस्त्र को त्यागकर एक दिन चली जामें हैं। कुछ स्थाई रूप से अपने सुकृत्यो की अच्छी गुणवत्ता के आधार पर मोक्ष को प्राप्त हो जाती हैं, तो कुछ अपने कर्म विकर्मों का गणित बिगड़ जाने से पुनः किसी योनि में आकर इसी धरा पर हिचकोले खाने को बाध्य हो जाती हैं।

जो भी है.. इस पावन दिन श्रीमदभगवद के ग्यारह वें अध्याय का पाठ करने पर मैं,तो यही समझ पाया हूं कि..

भौतिकदृष्टि से इस दिन (छह मार्च) को मनहूस घड़ी कहूं, या नहीं ये तो पता नहीं..इस दिन मैं दुनियादारी से दूर आठों पहर “राधे गोविंदमय” वातावरण में कहीं खो सा अवश्य जाता हूं.. अपनी देवी जी के पसंदीदा ब्रज क्षेत्र के तीर्थों में जैसे; राधारानी,वृंदावन,गोकुल,नंदगांव,बरसाना,गोवर्धन आदि में से किसी भी जगह जाकर राधेगोविंदमय अनुभूति में… उनकी आत्मशांति का, तो पता नहीं.. लेकिन मुझे अपने मन में तो शांति महसूस होती है। जैसे; राधे किशोरी के गोरे चरणारबिंद में अपने सारे मोह के बंधनों से दूर.. अपनी जीवन संगिनी के साथ जीए.. लगभग उन बत्तीस वर्षों की सुखद स्मृति देखते ही देखते विरक्त जीवन में तब्दील गई।

“राधे गोविन्द मय” हो जाने से लगभग पिछले तीन वर्षों से मेरी अवस्था विरक्त जैसी होती जा रही है। परंतु राधे गोविंद के आश्रय से मानसिक सुकून के साथ साथ अपने सांसारिक दायित्वों को निभाने में पुनः नई ऊर्जा, एक रिचार्ज जैसा अनुभव करता हूं।

मेरे “ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ कंडक्ट” की आधारशिला हैं, दो महामानवों के विचार..

पहला : कवि जयशंकर प्रसाद जी ने कहा था, कि,” साहित्यिक व आध्यात्मिक स्वभाव वाले व्यक्ति का प्रारब्धवश दुनियां के प्रपंचों से ‘अकेला’ हो जाना, कभी अभिशाप नहीं सदैव एक ‘वरदान’ है।”

दूसरा: न सिर्फ वृंदावन में अपितु आज समस्त दुनियां में लोकप्रिय महान संत श्री प्रेमानंद जी के एकांतिक वार्ता में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में कि,”भगवत प्राप्ति के लिए व्यक्ति का “एकांत शुद्ध” होना नितांत आवश्यक है।”

शायद इन दोनों विचारों का संश्लेषण ही मेरे ब्रह्मचर्य की आधारशिला है। वरना आज हर पॉकेट में विराजमान कलयुगी महा दानव मोबाइल के रूप में “एंड्रॉयड सेट” के दौर में किसी व्यक्ति की क्या बिसात है, अपने आचरण में इतना शुद्ध रूपांतरण कर पाने की।

हो न हो ये सब “नियत नटी” के खेल के ही पार्ट्स ऑफ लाइफ हैं। “जब आंख खुली तभी सवेरा” वाले भाव से जो जब हो जाए तभी सही..

इंसान है ही क्या.. वह सिर्फ God द्वारा संचालित होने वाली एक कठपुतली ही,तो है। विचार कीजिएगा

राधे गोविन्द ..राधे गोविंद 🙏🏻🙏🏻

258- ट्रैक-ऑन

आने वाली पीढ़ी को वक्त रहते “ट्रैक-ऑन” हो ही जाना चाहिए..

इस संदर्भ में समस्त जनमानस से नैतिक एवं मानवीय मूल्यों के हवाले से.. एक अपील है।

“अभिभावक लोग अवश्य ध्यान दें.. आपके बच्चों की गलती पर स्कूल में शिक्षक द्वारा डांटने पीटने पर बुरा मानना बंद करें.. इस बात की गहराई समझें कि, बच्चे की प्रारंभिक अवस्था में होने वाली गलतियों पर स्कूल/कॉलेज में थोड़ी बहुत डांट फटकार एवं पिटाई उन्हें “ट्रैक-ऑन” रखती है।

अन्यथा आप देख ही रहे हो.. जब से अभिभावकों की शिकायतें सुनकर सरकार ने बच्चों को डांटने पीटने पर रोक लगाई है, तब से वेअक्ल बड़े होते बच्चे निरंतर “आउट ऑफ ट्रैक” होते चले जा रहे हैं..और परिणाम स्वरूप वे ही बच्चे बालिग या नाबालिग अवस्था में किसी न किसी अपराध में लिप्त होकर पुलिस की तगड़ी पिटाई-ठुकाई खा ने को मजबूर हो जाते हैं।

जहां कोई भी अभिभावक कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता। खर्च खराबी अलग।

अनुशासन के लिए प्रतिष्ठित स्कूल /कॉलेजों में विद्यार्थियों के हेयर स्टाइल और उनके टपोरी चाल-ढाल को देखते हुए कभी कभी थोड़े बहुत दिशा निर्देश अवश्य दिए जाते हैं। मगर उनके व्यवहार में सुधार कम ही नजर आता है। ऐसे रवैए पर बेचारे शिक्षक निराश होकर केवल देखते ही रह जाते हैं, लेकिन अभिभावकों की बिना सोची समझी शिकायतों के सामने कुछ कर नहीं पाते।

जबकि इसके एकदम विपरीत अभिभावक कहे जाने वाले उन माता-पिताओं का बच्चों पर ध्यान और नियंत्रण बिल्कुल भी नहीं रहा है।

कुछ निश्छल अभिभावक अपने बच्चों के रवैए से परेशान होकर भवावेश में कई बार कॉलेज/स्कूलों में आकर बोल भी देते हैं कि, गुरु जी हम तो आपकी डांट के डर से खूब पढ़ते थे। अब आप इन बच्चों को क्यों नहीं डांटते हो..??

अब उनको कौन समझाए..?? कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी आप लोगों ने स्वैम ही तो मारी है। ऐसे मासूम अभिभावकों को यहां “वृद्धि और विकास” का अंतर अब कौन समझाए.. ??

“कि बच्चों की शारीरिक वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन मस्तिष्क का विकास और ह्रदय की गहरियां,चरित्र निर्माण आदि.. अवस्थाओं का क्रियान्वयन उनके जीवन में अनुशासित होकर पढ़ाई के प्रति पूर्ण समर्पण एवं परिश्रम करने से होगा।”

शिक्षक के कार्यों में हस्तक्षेप करके अभिभावकों ने जाने अंजाने में अपने नौनिहालों के लिए .. “पथ भ्रष्ट” होने के सारे दरवाजे खोल दिए हैं।

ज़रा चिंतन के साथ साथ अपनी नज़रों को विस्तार दीजिएगा..नैतिकता एवं मानवता के नजरिए से देखकर समझिएगा कि अनुशासन केवल बातों से नहीं आता है। इसके लिए थोड़ा बहुत “साइको फियर” अर्थात मन में थोड़ा सा डर होना आवश्यक माना गया है।

अभिभावकों के अधिक हिमायती होने के दुष्परिणाम..देखिए..

आज बच्चों को स्कूल का डर रहा नहीं,

स्कूल टाइम में घर लौटने पर भी उन्हें कोई डर नहीं

, ऐसे हालातों में समाज का भयभीत होना लाज़मी है।

क्योंकि वही बच्चे आज गुंडे बनकर लोगों पर हमला कर रहे हैं।

उनके दुर्व्यवहार से कई लोग अपनी जान तक गंवा देते हैं।

परंतु अंततोगत्वा ऐसे लोगों के व्यक्तिगत जीवन की बहुत भयंकर तश्वीर बनती है। बदमांशियों की सारी हदें पार करते कराते साल छह महीने के बाद जब वे पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं,तो फिर शुरू होता है उनके अभिभावकों का वर्षों कोर्ट कचहरी की धूल फांकने व रुपए की बेशुमार बरबादी का सिलसिला….और अदालत से सजा वगैरह।

ये अखंड सत्य है कि, “गुरु का सम्मान न करने वाला समाज नष्ट हो जाता है।”

गुरु का न भय है, न सम्मान। ऐसे में पढ़ाई और संस्कार कैसे आएंगे?

अभिभावकों की शिकायतों के आधार से निकले सरकारी आदेश..

“मत पीटो! मत डांटो! जो खुद नहीं पढ़ना चाहता उससे सवाल ही क्यों करते हो..? उसे उसी के हाल पर छोड़ दो। फिर भी यदि पढ़ाने पर जोर दिया गया या काम कराया गया तो गलती शिक्षकों की होगी!”

पांचवीं कक्षा से ही अजीब हेयर स्टाइल, कटे हुए जींस, दीवारों पर बैठना और आते-जाते लोगों का मजाक उड़ाने की आदत बन जाती है। यदि कोई कहे, “अरे सर आ रहे हैं!” तो जवाब होता है, “तो क्या हुआ..आने दो!” कुछ माता-पिता तो यहां तक कहते हैं, कि “हमारा बच्चा न भी पढ़े तो कोई बात नहीं, लेकिन शिक्षक उसे हाथ न लगाएं।”

बच्चों के पास पढ़ने की आवश्यक सामग्री तक नहीं होती। पेन है, तो पुस्तक नहीं, पुस्तक ले आए हैं,तो पेन नहीं।

बिना डर के शिक्षा कैसे संभव है? बिना अनुशासन के शिक्षा का कोई परिणाम नहीं। एक हिंदी कहावत है.. कि “डर न रखने वाली मुर्गी मार्केट में अंडे नहीं देती।”

आज के बच्चों को गंभीरता से समझाया भी नहीं जा सकता। आज के माता-पिता चाहते हैं कि सबकुछ दोस्ताना माहौल में कहा जाए। क्या यह संभव है? क्या घर पर ऐसे बच्चों के अभिभावक उनके आचरण से संतुष्ट रहते हैं..??

अब शिक्षकों के अधिकार नहीं बचे हैं। यदि शिक्षक सीधे बच्चे को सुधारने की कोशिश करें, तो वह अपराध बन जाता है। लेकिन वही बच्चा बड़ा होकर गलती करे तो उसे मृत्युदंड तक दिया जा सकता है।

माता-पिता से एक विनती: बच्चों के व्यवहार को सुधारने में शिक्षक मुख्य भूमिका निभाते हैं। कुछ शिक्षकों की गलती के कारण सभी शिक्षकों का अपमान न किया जाए।

ये भी एकदम सच है कि,90% शिक्षक केवल बच्चों के सर्वांगीण विकास एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। इसलिए गार्जियन कभी भी हर छोटी बड़ी गलती के लिए शिक्षकों पर आरोप न लगाएं।

जब हम पढ़ते थे, तब कुछ शिक्षक बच्चों से गलती होने पर कभी कभी थोड़ा सा पीट भी दिया करते थे। फिर भूल सुधार होने पर वही शिक्षक बड़े प्यार से पेश आते थे। लेकिन हमारे समय के माता-पिताओं ने शिक्षकों से कभी शिकायत या कोई सवाल नहीं किया क्योंकि तब ये रिश्ता विश्वास का था। छात्रों और अभिभावकों का अर्थात दोनों पर अटूट विश्वास था।

सच तो ये भी है कि उस दौर में शिक्षक भी सदैव अपने छात्र कल्याण की ही सोचते थे।

इसलिए सुधार की शुरुआत करें…पहले माता-पिता अपने अपने घरों पर बच्चों को गुरु के महत्व को समझाने की जिम्मेदारी उठाएं।

बच्चों के भविष्य के बारे में एक बार अवश्य सोचें।

बच्चों की बर्बादी के 50% कारण हैं –मौका परस्त दोस्त, मोबाइल और मीडिया।

लेकिन 40% में बच्चों पर माता-पिता का नियंत्रण न होना भी है..शेष कारण शिक्षक या विद्यालय के हिस्से में रह जाता है वह मात्र 10% ही है।

आज के 70% बच्चे –

👉 माता-पिता यदि कार या बाइक साफ करने की कह दें, तो बस…और बिना प्रयोजन की चीजें वो भी महंगी महंगी खरीदने का वातावरण बनाते रहते हैं,

👉 बाजार से सामान लाने के लिए तैयार नहीं होते। अब तो ऑनलाइन ही मंगा लेते हैं। खरीददारी का तजुर्बा भी नहीं है।

👉 स्कूल का पेन या बैग सही जगह नहीं रखते। 👉 घर के कामों में मदद नहीं करते। और टीवी में कुछ से कुछ देखते रहते हैं।

👉 रात 10 बजे तक सोने की आदत नहीं और सुबह 6-7 बजे जागते नहीं।

👉 गंभीर बात कहने पर पलटकर जवाब देते हैं। 👉 डांटने पर चीजें फेंक देते हैं।

👉 पैसे मिलने पर दोस्तों के लिए खाना, आइसक्रीम और गिफ्ट्स पर खर्च कर देते हैं।

👉 नाबालिग लड़के बाइक चलाते हैं, दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं और फिर केस में फंस जाते हैं।

👉 लड़कियां दैनिक कार्यों में मदद नहीं करतीं।

👉 मेहमानों के लिए पानी का गिलास तक देने का स्वत: मन नहीं होता।

👉 20 साल की उम्र में भी कुछ लड़कियों को खाना बनाना नहीं आता।

👉 सही ढंग से कपड़े पहनना भी एक चुनौती बन गया है।

👉 फैशन, ट्रेंड और तकनीक के पीछे भाग रहे हैं। विचार कीजिएगा..इस सबका कारण हम ही हैं। हमारा गर्व, प्रतिष्ठा और हमारे खुद के प्रभाव बच्चों को जीवन के पाठ नहीं सिखा पा रहे हैं।

“कष्ट का अनुभव न करने वाला व्यक्ति जीवन के मूल्य को नहीं समझ सकता।”

आज के युवा 15 साल की उम्र में प्रेम कहानियों, धूम्रपान, शराब, जुआ, ड्रग्स और अपराध में लिप्त हो रहे हैं। दूसरे आलसी बनकर जीवन का कोई लक्ष्य नहीं रखते। बच्चों का जीवन सुरक्षित रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। यदि हम सतर्क नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी बर्बाद हो जाएगी। बच्चों के भविष्य और उनके अच्छे जीवन के लिए हमें बदलना ही होगा।

ध्यान रहे.. आपके शिक्षक एक बार को रहम कर भी सकते हैं, लेकिन पुलिस नहीं।

धन्यवाद 🙏

257 अदभुत रचना

आज के इंसान को दुनियां के प्रपंच से फुर्सत मिले तब.. ही तो जानें, कि ये “मानव देह” वास्तव में प्रभु की एक “अद्भुत रचना” है।

संतों के जगाने पर कुछ गुणी मनुष्यों के मन मस्तिष्क में जगह बनाने वाली ये बात कि “मानव देह” न सिर्फ दुर्लभ होती है,अपितु ये मानव शरीर ही एकमात्र वह साधन है जिसे पाकर इंसान भगवत प्राप्ति कर सकता है।

स्वाभाविक है माइंड ओवर मैटर होने के नाते इसमें आपका थोड़ा चिंतन तो लगेगा..

देखिए! न कोई आवेदन, न कोई सिफारिश. फिर भी हमारे करुणामय राधे गोविंद की दया दृष्टि ही है कि, नवजात शिशु को मानव देह के रूप में एक ऐसा “शरीर” प्रदान किया है।

जिसमें सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक हर क्षण “रक्त” प्रवाह रहता है….

जिसके अंदर ऐसे ऐसे स्वचालित “यंत्र” लगे हैं कि, सजीव होने का प्रतीक “हृदय” निरंतर धड़कता रहे ऐसी व्यवस्था की गई!! …

हजार-हजार मेगापिक्सल वाले किसी कैमरे को भी फेल करती हुई.. दो-दो आँखे जो प्रतिपल संसार के हर दृश्य को मन रूपी मेमोरी में संजोए रहती हैं।

दस-दस हजार तरह के अलग अलग स्वाद चखने की सामर्थ्य रखने वाली रसेंद्री यानी जीभ भी है।

सेंकड़ो संवेदनाओं का अनुभव कराने वाली त्वचा है जो किसी सेंसर से कम नहीं है।

“स्वर प्रणाली” तो ऐसी कि बस आप देखते ही रह जाए, अलग-अलग फ्रीक्वेंसी की आवाज निकाल दे।

दूसरे उन सब फ्रीक्वेंसीज का कोडिंग-डीकोडिंग करने वाले कान रूपी यंत्र इस शरीर की सबसे बड़ी विशेषता है।

ताज्जुब देखिए!!! पचहत्तर प्रतिशत जल से भरा हुआ ये मानव शरीर जिसकी त्वचा में लाखों रोमकूप होने के बावजूद भी मजाल हैं कहीं से लीक हो जाए..

इस मानव देह में हर एक चीज़..चकित कर देने वाली है।

देखिए!! ये “मानव देह” बिना किसी सहारे के दो पैरों पर न सिर्फ सीधा खड़ा रह सकता है,अपितु हरपल न जाने कितने अजीबो गरीब करतब करता है।

मनुष्य निर्मित गाड़ी के टायर चलने पर घिसते हैं, और कितनी ही बार बदल दिए भी जाते हैं। परंतु इस मनुष्य शरीर के पैर के तलवे जीवन भर चलने के उपरांत भी भला कभी घिसे हैं।

है न !! “अद्भुत रचना” !!

हे परमात्मा ! इसके संचालक, निर्माता जो भी हैं आप ही है। स्मृति, शक्ति, शांति हमको ये सब सामर्थ्य भी आप ही देते है।

आप ही भीतर बैठ कर “शरीर की संरचना” को सुचारू रूप से चलाते हैं।

जबकि, दुनियां का अस्सी फीसदी मनुष्य “कस्तूरी कुंडल बसे,मृग ढूंढे बन माहीं” की तर्ज पर राधे गोविंद को कहीं अन्यत्र समझकर अपने जीवन को संसार के प्रपंचों में ऐसा उलझा लेता है कि,ये तो ये अपना परलोक भी बिगाड़ ले रहा है।

ये मानव देह “अविश्वसनीय।” है। ये कौन नहीं जानता है कि, इस “शरीर रूपी” यंत्र में हमेशा आप ही है, इसकी सजीवता का अनुभव कराने वाला “आत्मा” भी तो भगवन आप का ही अंश है।

न जाने क्यों मुझे तो ये समूचा जीवन आपका एक खेल भर लगता है।

मैं आपके इस खेल का निश्छल, निस्वार्थ आनंद का एक हिस्सा हूं… ऐसी सद्बुद्धि मुझ में निरन्तर बनी रहे.!! “सब कुछ आप ही संभालते हैं ये भान भी हमेशा बना रहे।”

प्रतिदिन पल-पल हर मनुष्य शरीरधारी में कृतज्ञता से आपका ऋणी होने का स्मरण एवं चिंतन भी उत्पन्न हो। ऐसी शुभकामना के साथ, मैं परम प्रभु श्री राधे गोविंद के चरणारबिंदो में सदैव के लिए समाहित हो जाने की चाह रखता हूं ..। धन्यवाद .

256 – भगवत प्राप्ति

Do you think so..??

अर्थ की दृष्टि से “भगवत प्राप्ति” का अभिप्राय है जी.. ते जी ईश्वर की प्राप्ति या उनसे मिलन की आनंदपूर्ण अनुभूति.. जब जीव (आत्मा) को अपना मूल उद्देश्य समझ में आने लगता है, तब वह धीरे धीरे सांसारिक व्यक्ति या वस्तुओं में से अपनी आसक्ति कम करते हुए.. दिन प्रतिदिन अपने इष्ट की सेवा में लीन होने लग जाता है। ये “भगवत प्राप्ति” के संकेत है।

जैसे; सोते समय देखे गए स्वप्न में होने वाली पीड़ा बिना जागे नहीं मिटती। ठीक वैसे ही संसार के भोगों में लिप्त “जीव” की मुक्ति “भगवत प्राप्ति” के बिना नहीं हो सकती।

क्योंकि मूल रूप से हम हैं,तो “सोल कॉन्शियस” ही। लेकिन एक लम्बे समय तक जीवन में भौतिक व्यवस्थाओं के सहारे रहने से मनुष्य की आत्मा पर दुनियादारी की ‘ कार्मिक लेयर ‘ इस कदर जम जाती है कि वह सिर्फ बॉडी कॉन्शियस होकर रह जाता है। उसकी परेशानियों का मूल कारण भी यही है।

ईश्वरीय विधान के अनुरूप स्थूल शरीर (Gross body) छूटने के बाद..तत्काल जीव आत्मा अपने मूल स्वरूप अर्थात सूक्ष्म शरीर (subtle body) में रूपांतरित हो जाती है।

मेरा अनुभव कहता है, वे पल उस “सूक्ष्म शरीर” के लिए काफ़ी परेशानी भरे होते हैं। क्योंकि तेरहवीं तक उसका अपने “स्थूल शरीर” के रिश्तों में लगाव भी बना रहता है। इस दौरान आत्मा स्वयं को बहुत असहाय महसूस करती है। वह अपने परिजनों को रोता बिलखता देख..वह बार बार अपने परिजनों को ये बताने का प्रयास करती है कि, “मैं ठीक हूं। आप परेशान क्यों हो रहे हैं।” मगर उस समय सूक्ष्म शरीर की दूसरी परेशानी ये भी होती है.. कि इस अवस्था में आत्मा के पास किसी को “स्पर्श या संपर्क करने की सामर्थ्य” नहीं होती है। जी,बिल्कुल ये बात उसे बड़ी देर से समझ आती है।

जिस प्रकार हमारे बुजुर्ग सदैव बताते आए हैं कि, “वक्त हर परेशानी का मरहम होता है।” सूक्ष्म शरीर की परेशानी लगभग बारह या तेरह दिन में जब स्थूल शरीर का विधि विधान से “अंतिम क्रिया कर्म सारे संस्कार” विधिवत हो जाते हैं। तब उस अमुक आत्मा का सांसारिक रिश्तों से जुड़ाव लगभग खत्म सा हो पाता है।

तब वह सूक्ष्म शरीर (subtle body) अपने “कर्म” खाते के अनुसार उन चौदह लोकों (सात पृथ्वी से ऊपर और सात नीचे होते हैं।) में से उस लोक की यात्रा पर निकलना होता है। दुनियां में की गई कमाई का उसके पास बैलेंस होता है।

लेकिन.. सांसारिक भाषा में लोकों की यात्रा के दौरान हर्डल्स या ब्रेकर्स भी बहुत मिलते हैं। कारण है..विकर्म अर्थात दुष्कर्म जो संसार में रहते समय उसके स्थूल शरीर द्वारा किए गए होते हैं।

दरअसल भौतिकवादी नज़रिए से देखें,तो वहां .. “कारण शरीर” के लिए “कर्म,अकर्म, विकर्म” की मैरिट / डिमेरिट पहले से ही चस्पा की हुई होती हैं। तब उनको आधार मानते हुए “कारण शरीर” “यातना शरीर” में कन्वर्ट कर दिया जाता है।

कुछ पुण्य आत्माओं को छोड़कर ऐसा अधिकतर आत्माओं के साथ होता ही है। क्योंकि अज्ञानतावश अहम के कारण जीवधारी द्वारा दुनियां बिच खेली गई अपनी सारी धमा चौकड़ियों का फल .. उसको भुगतना ही होता है। जिसमें कोड़ों की मार, गर्म तेल की कढ़ाईयों में डाले जाना..जैसी भयंकर दंड प्रक्रिया से गुजरने के बाद..फिर अगली व्यवस्था “आत्म शुद्धिकरण” की प्रक्रिया में जाना है।

जीवात्मा की सांसारिक व्यक्ति या वस्तुओं में आसक्ति/अनाशक्ति के ब्यौरे जो शरीर छोड़ने के समय दुनियां में उसकी मन: स्थिति रही होगी..को आधार मानकर ..नए जन्म से पहले.. “योनि निर्धारण” होता है।

उस दौरान हर जीवात्मा को धरती पर बिताया गया एक लंबा “जीवन” भी एक स्वप्न जैसा ही प्रतीत होता है।

इसीलिए हम अगर ध्यान दें,तो संतों की एकांत वार्ता में सतसंगों में सदैव “जगत मिथ्या” वाली थ्योरी को प्रोत्साहन दिया जाता है। जो कटु सत्य है। लेकिन वह इतनी आसानी से समझ नहीं आती।

शिक्षा;-

अतः मानव देह मिलने पर समय रहते “जीव” को दुनियां के सारे प्रपंच छोड़कर..अपने प्रारब्ध रूपी स्थायी खाते में गुरू प्रदत्त “मंत्र” जप एवं “नाम जप” का बैलेंस बढ़ाने के ध्येय से जितना हो सके निरंतर जप करते रहना चाहिए।

भगवत प्राप्ति के लिए..मानव जीवन में “मौन साधना” एवं शुद्ध भाव में “एकांतवास” को वरीयता देना श्रेयष्कर है।। इसीसे हमारा भगवत मार्ग प्रशस्त होगा।

कहना न होगा कि, इस “भव सागर” को पार करने के लिए.. “भगवत प्राप्ति” ही एकमात्र उद्देश्य है। जिसे हम सदैव भूले रहते हैं।

धन्यवाद

255- अनुकरणीय तथ्य

मेरे देश में विद्वानों की न पहले कमी थी, न आज है, और न भविष्य में रहेगी।

यदि तनिक भी संदेह हो,तो इतिहास उठाकर देख लीजिएगा ..हम जिस “भारत” नाम के भू खंड पर हैं उस पर रहने वाली इंटेलेक्चुअल लॉबी की सदैव से ही जितनी प्रशंसा की जाए कम ही होगी।

सम्पूर्ण महाभारत का निचोड़ मात्र नौ पंक्तियों में समेट के रख दिया है।

पृथ्वी पर रहने वाली मानव.. जाति

चाहे वह जिस धर्म से बिलोंग करती हो।

स्त्री हो या पुरुष,

गरीब हो या अमीर,

दुनियां जहांन में कहीं भी क्यों न रहती हो।

ये तथ्य सब के लिए अनुपम,तो है ही मेरे विचार से अनुकरणीय भी है।

जो मानव के मार्गदर्शन हेतु इतने वृहद महाभारत में से खंगाल कर निकाले गए हैं

दरअसल, ये मसला ऐसे अनुपम विचारों को न सिर्फ पढ़ने का है अपितु ठीक से समझकर अपने व्यक्तिगत जीवन में अनुकरण करने का भी है।

चलो! देखते हैं…

. 1. यदि आप समय रहते अपने बच्चों की अनुचित माँगों और इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखते, तो आप जीवन में असहाय हो जाएँगे… जैसे; “कौरव”

2. आप कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, यदि आप अधर्म का साथ देंगे, तो आपकी शक्ति, शस्त्र, कौशल और आशीर्वाद सब बेकार हो जाएँगे…जैसे; “कर्ण”

3. अपने बच्चों को इतना महत्वाकांक्षी न बनाएँ कि वे अपने ज्ञान का दुरुपयोग करके सर्वनाश कर दें…जैसे; “अश्वत्थामा”

4. कभी भी ऐसा संकल्प न करें..और न किसी को ऐसा वचन दें कि आपको अधर्मियों के सामने समर्पण करना पड़ जाए…जैसे; “भीष्म पितामह”

5. धन, शक्ति, अधिकार और सत्ता का दुरुपयोग और गलत काम करने वालों का साथ अंततः पूर्ण विनाश की ओर ले जाता है… जैसे; “दुर्योधन”

6. सत्ता की बागडोर कभी भी अंधे व्यक्ति को न सौंपे, हमारा आशय यहां आंखों के अंधे से नहीं है। अर्थात ऐसे अंधे से है जो स्वार्थ, धन, अभिमान, अज्ञान, आसक्ति या वासना आदि में लिप्त होने से अंधा हो, क्योंकि इससे विनाश होगा…जैसे; “धृतराष्ट्र”

7. यदि ज्ञान के साथ बुद्धि भी हो, तो आप अवश्य विजयी होंगे…जैसे; “अर्जुन”

8. छल-कपट से आपको हर समय सभी मामलों में सफलता नहीं मिल सकती..जैसे; “शकुनि”

9. यदि आप नैतिकता, धर्म और कर्तव्य का पूरे मनोयोग से पालन करते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको नुकसान नहीं पहुँचा सकती…जैसे; “युधिष्ठिर”

ध्यान रहे..यहां नुकसान से आशय आर्थिक नुकसान से नहीं था।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः – सर्वे सन्तु निरामयाः।”

धन्यवाद

254- घमंड

जी, हां प्राणी में “घमंड” या “अहंकार” किस बात का.. ??

एक बार की बात है.. महाकवि कालिदास को जंगल में चलते चलते बीच रास्ते बड़ी तेज प्यास लगने लगी.. उन्होंने देखा.. कि, कुएं पर एक पनिहारन पानी भर रही है। कालिदास ने.. कहा, मुझे जल पिला दो।

पनिहारन बोली, “बेटा! मैं तुम्हें जानती तक नहीं, पहले अपना परिचय तो दो, अरे! आप महाकवि कालीदास को नहीं जानती। तो फिर जानती ही क्या हैं..?? खैर छोड़ो, मुझे एक मेहमान समझकर जल पिला दो।

इस पर पनिहारन ने कहा, ” तुम मेहमान कैसे हो सकते हो..?? इस दुनियां बिच दो ही तो मेहमान हैं..पहला ‘धन’ और दूसरा ‘यौवन’ जो जाने में कभी वक्त नहीं लगाते।..

अचानक चल देते हैं।

पहले बताओ, तो तुम हो कौन ..?? जवाब सुनकर.. अहंकार से युक्त कालीदास दंग रह गए!!

विचार करके बोले हे देवी! मैं “सहनशील” हूं। अब तो जल पिला दो.. पनिहारन ने कहा, बिल्कुल नहीं..तुम सहनशील भी कैसे हो सकते हो..?? सहनशील तो संसार में दो ही हैं ..एक – धरती माता जो बिना उफ किए..पापी और पुण्य आत्माओं का बोझ सहती है। जबकि लोग उसकी छाती चीर चीर कर कुछ दाने डाल देते हैं, और मां उनके लिए भी अनाज के भंडार लगा देती हैं।

दूसरे सहनशील होते हैं “पेड़” लोग उन्हें पत्थर मारते हैं और वे उन्हें सदैव मीठे मीठे फल देते रहते हैं।

सच कहो, तुम कौन..हो ??

कालीदास की प्यास बहुत तीव्र होती जा रही थी जिसके कारण उन पर मूर्छा सी छाने लगी। और वे तर्कों से परेशान होकर झल्ला उठे..

फिर काफ़ी विचार कर बोले! मैं “हठी” हूं। जल पिला दो..

पनिहारन बोली, तुम झूठ बोल रहे हो। कोई इंसान हठी कैसे हो सकता है..?? दुनियां में हठी तो दो ही हैं.. एक नाखून और दूसरे केश (बाल) जो काटने पर बार बार निकल आते हैं।

सच सच कहो! तुम कौन हो..??

अब तो कालीदास का सारा घमंड जाता रहा.. गुरुर के घोड़े से उतर कर कालिदास अपने आपको अपमानित व पराजित देख कहने लगे, हे माते! मैं निरा मूर्ख हूं कृपया मुझे जल पिला दीजिए..

कालिदास के अंतस में समाये अहंकार को पूर्णत: निकालने के उद्देश्य से ..पनिहारन के रूप में प्रकट मां सरस्वती ने फिर कहा, तुम मूर्ख भी भला कैसे हो सकते हो..?? लोगों की बनाई दुनियां में दो मूर्ख होते हैं। पहला मूर्ख “राजा” जो अयोग्य होते हुए भी लोगों पर शासन करने की हिमांकत करता है।

दूसरा मूर्ख राजा का “दरबारी पंडित” या मंत्री होता है जो अपनी चमचा गिरी से राजा को खुश करने के लिए गलत बातों को सिद्ध करने के तर्कों में झूठ सांच बोलने में अपना बहुमूल्य जीवन खपा देता है। जिससे उस मंत्री या पंडित का ये तो ये परलोक भी खराब हो जाता है।

कालिदास अब कुछ कहने की स्थिति में न रहे, और उस वृद्ध महिला पनिहारन के पैरों में गिर ही पड़े।और जल की याचना में गिड़गिड़ाने लगे..

एकदम से उस पनिहारन की आवाज भारी सी होती गई। और बोली, “उठो वत्स!” कालीदास ने ऊपर की ओर देखा, तो साक्षात मां शारदे सामने खड़ी थीं।

अब तो कालीदास अपना सारा घमंड छोड़ उनके सामने नतमस्तक हो गए.. मां ने मुस्कराते हुए..कहा, ” शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। लेकिन अहंकारी जीव शिक्षा से प्राप्त “मान एवं प्रतिष्ठा” को स्वयं की उपलब्धि समझ अहंकार कर बैठता है। और पतन की राह पकड़ लेता है।

जबकि शिक्षा से प्राप्त ज्ञान कहता है कि,

“अन्न के एक एक कण को और आनंद के प्रत्येक क्षण को कभी भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।”

वैसे थोड़ा गहनता से सोचिए! तो प्राणी को “घमंड” होता किस बात का है..??

क्योंकि,

“दुनियां में प्राणी निर्वस्त्र आता है

निर्वस्त्र ही जाता है।

न कुछ लाता, न ले जाता है।

जन्म एवं मृत्यु दोनों ही वक्त वह बेहद निरीह अवस्था में होता है।

यहां तक है कि वह अपना पहला और अंतिम स्नान तक भी स्वयं नहीं कर पाता।”

उल्लिखित तथ्य की सच्चाई ..को देखते हुए..शरीर की क्षणभंगुरता के बावजूद भी मनुष्य दुनियां बिच इतनी असहाय अवस्था में जीता है कि बस! कुछ कहते नहीं बनता।

तभी, तो ये सवाल बनता कि, “घमंड किस बात का”..?? न सिर्फ इसका जवाब सोचिएगा, अपितु सोचने के बाद उसका अपने जीवन में अनुपालन भी कीजिएगा।

धन्यवाद

253 आत्मबोध

!! आत्मबोध!!

रिटायरमेंट के बाद सेवानिवृत्त सचिव (IAS) राजीव यदुवंशी को हुआ आत्मबोध..

हां, तो देखिए!

रिटायरमेंट के बाद ये उनकी पहली दिवाली थी।

जबकि, दिवाली से एक हफ़्ते पहले, लोग तरह-तरह के उपहार लेकर आना शुरू हो जाते थे। उपहार इतने ज़्यादा होते थे, वे बताते हैं कि उनका वह कमरा किसी उपहार की दुकान से कम नहीं लगता था। बाद में या त्योहार के ही वक्त अधिकतर ये उपहार अनजान रिश्तेदारों को दे दिए जाते थे। सूखे मेवे इतने ज़्यादा हो जाते, कि अपने रिश्तेदारों और दोस्तों में बाँटने के बाद भी बहुत सारे बचते थे।

लेकिन वे कहते हैं इस बार उनकी दिवाली बिल्कुल अलग थी। उपहारों की तो बात छोड़िए.. दोपहर के दो बज गए थे, लेकिन कोई भी उन्हें दिवाली की शुभकामना देने तक नहीं आया था। वे अचानक उसे भाग्य का उलटफेर समझ.. अपने अंतर मन से बहुत उदास हो गए थे।

विचलित होते अपने मन को संतुलन में लाने के लिए, उन्होंने समाचार पत्र खोला और उसमें रूटीन वे में छपने वाले “आध्यात्मिकता” के कॉलम को पढ़ना शुरू कर दिया..

शिक्षा:- जिसे सामान्य लोग सहज स्वभाव में “सौभाग्य या दुर्भाग्य के मत्थे मढ देते हैं।

मेरे विचार में दुनियां बिच होने वाली हर छोटी या बड़ी घटना.. सब “नियति” के खेल में सुमार होती है। जीव के “कर्म” खाते के अनुरूप वह सब ईश्वर की “पूर्व निर्धारित व्यवस्था” का ही पार्ट कहलाता है।

व्यक्ति द्वारा पूर्व में किया हुआ “कर्म” जीवन के धरातल पर जैसे जैसे घटना शुरू होता है.. समीकरण भी ठीक वैसे ही बनते चले जाते हैं। और प्राणी मात्र एक कठपुतली की तरह वो सब करता चला जाता है। जो “निर्धारण व्यवस्था” के अनुरूप उसके प्रारब्ध में लिखा होता है।

अच्छा चलो! अब मुद्दे पर लौटते हैं..

राजीव जी यदुवंशी को समाचार पत्र के “आध्यात्म” वाले कॉलम में एक दिलचस्प कहानी मिल गई। जो उन्हें “आत्मबोध” कराने के लिए पर्याप्त थी। वह कहानी एक गधे के बारे में थी, जो किसी धार्मिक समारोह के लिए देवताओं की मूर्तियों को अपनी पीठ पर लादकर ले जा रहा था।

रास्ते में जब वह गांवों से गुजर रहा था..तो स्वाभाविक सी बात है लोग मूर्तियों के आगे अपना सिर झुकाते ही हैं। हर गांव में यही हो रहा था.. ऐसा देख, गधे को लगने लगा कि गांव वाले उसके सामने नतमस्तक हो रहे हैं। अब तो गधा अपने इस नए सम्मान और आदर से रोमांचित हो उठा। और गधे में असीमित अहम पनपने लगा.. कहानी में ऐसा मंजर पढ़कर ..सेवा निवृत आई.ए.एस. राजीव जी के मन मस्तिष्क पर पिछले तीस वर्ष से जमी हुई “पद प्रतिष्ठा” की सारी कार्मिक लेयर एक झटके में उतर गई.. और उन्हें ऐसा “आत्मबोध” हुआ.. कि वे अपना ये “आत्मबोध” लोगों के बीच शेयर करते हुए लिखते हैं.. कि बिल्कुल गधे जैसी ही गलतफहमी हो जाती है देश दुनियां की व्यवस्था में सेवा दे रहे हर पदासीन व्यक्ति को चाहे वो जिस स्तर पर तैनात हो…

कहानी के अनुरूप गधे की पीठ पर लदी उन मूर्ति रूपी.. जिम्मेदारियों एवं पद पर आसीन होने के बाद व्यक्ति की कर्मठता वाली भूमिका के आगे दुनियां झुकती है न कि किसी अमुक व्यक्ति के आगे। क्योंकि..

कहानी के अनुसार जब वही गधा मूर्तियों को पहुंचा कर वापस उसी रास्ते से पुनः गुजरा.. तो कोई भी उसके आगे नहीं झुका.. क्योंकि अब उसकी पीठ पर उसके मालिक की निजी चीजें लदी हुई थीं। मगर हद से ज्यादा सम्मान पा कर गधे का अहम चर्म पर जो पहुंच गया था, जिसकी उसे आदत सी हो गई थी..तो गधे ने ढेंचू..ढेंचू .. बोल कर अपनी भाषा में उनसे सम्मान करने के लिए कहा, तो इस पर उसे अपने मालिक की डांट और डंडे दोनों खाने पड़े।

अर्थात सेवानिवृत हो जाने के बाद किसी भी स्तर के पद पर आसीन रहे..प्रत्येक व्यक्ति को समय रहते अपने समाज में सामंजस्य बनाकर रहना अवश्य सीख लेना चाहिए।

शायद इसीलिए, श्रीमान राजीव जी यदुवंशी (सेवा निवृत आई ए एस) ने उसी वक्त से सारी ताम झाम और लोगों से पाली हुई अपनी सभी अपेक्षाओं को छोड़कर, एक सादा..सरल “जीवन-शैली” अपनाने का सबक लिया.. और वे आनंद से रहने लगे..

धन्यवाद..

अनुकरणीय 🙏🏻😊

252 “ढाई अक्षर..”

जी, हां! काफी बरसों पहले पढ़ा था..!

“पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय। ढाई अक्षर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय॥”

एक दिन यूं ही बैठा.. बैठा..कुछ सोच ही रहा था कि मां शारदे की ऐसी कृपा हुई कि.. ढाई ढाई अक्षर के शब्द न जाने क्यों …??

मेरे मानस पटल पर एक के बाद एक गंभीर शब्द आते चले गए.. तब इन ढाई अक्षरों वाले शब्दों का हमारी देव नागिरी लिपि हिंदी में कितना वर्चस्व .. एवं वजूद है..एकदम से सारी तश्वीर स्पष्ट होती चली गई।

जैसे;

“` 2½ अक्षर के ‘ब्रह्मा’ और, ढाई अक्षर की ‘सृष्टि’.

“` “` ढाई अक्षर के ‘विष्णु’ और ढाई अक्षर की ‘लक्ष्मी’.

“` ढाई अक्षर के “कृष्ण” “` ढाई अक्षर की ‘दुर्गा’

और ढाई अक्षर की ‘शक्ति’.

“` “` ढाई अक्षर की ‘श्रद्धा’ और ढाई अक्षर की ‘भक्ति’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘त्याग’ और ढाई अक्षर का ‘ध्यान’.

“` “` ढाई अक्षर की ‘इच्छा’ और ढाई अक्षर की ‘तुष्टि’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘धर्म’ और ढाई अक्षर का ‘कर्म’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘भाग्य’ और, ढाई अक्षर की ‘व्यथा’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘ग्रन्थ’ और ढाई अक्षर का ‘सन्त’.`

“ “` ढाई अक्षर का ‘शब्द’ और ढाई अक्षर का ‘अर्थ’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘सत्य’ और ढाई अक्षर की ‘मिथ्या’.

“` “` ढाई अक्षर की ‘श्रुति’ और ढाई अक्षर की ‘ध्वनि’.

“` “` ढाई अक्षर की ‘अग्नि’ और ढाई अक्षर का ‘कुण्ड’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘मन्त्र’ और ढाई अक्षर का ‘यन्त्र’. `

“ “` ढाई अक्षर की ‘श्वांस’ और ढाई अक्षर के ‘प्राण’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘जन्म’ और ढाई अक्षर की ‘मृत्यु’.

“` “` ढाई अक्षर की ‘अस्थि’ और ढाई अक्षर की ‘अर्थी’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘प्यार’ और ढाई अक्षर का ‘युद्ध’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘मित्र’ और, ढाई अक्षर का ‘शत्रु’.

“` “` ढाई अक्षर का ‘प्रेम’ और ढाई अक्षर की ‘घृणा’. `

“ “` ‘जन्म’ से लेकर ‘मृत्यु’ तक हम, बंधे हैं ढाई अक्षर में.

“` “` हैं ढाई अक्षर ही ‘वक़्त’ में और ढाई अक्षर ही ‘अन्त’ में.

“` “` समझ न पाया कोई भी, रहस्य क्या है ढाई अक्षर में.

“` हमारे देश के ऐसे महापुरुषों की गूढ़ रहस्यों से भरी हिंदी भाषा को मेरा शत-शत नमन..है।

पढ़ने के लिए

धन्यवाद

251- Your Right to be Rich

Yes ..

You have a fundamental right to be rich.

You are here. to lead the abundant life and be happy, radiant, and free.

You should, therefore, have all the money you need to lead a full, happy, and prosperous life.

You are here to grow, expand,and unfold spiritually,mentally,and meterially. You have the inalienable right to fully develop and express yourself in all your potentials.

An important aspect of that is the ability, should you so choose,to surround yourself with beauty and luxury.

Why be satisfied with just enough to go around when you can enjoy the riches of your subconcious mind?

In this matter,you will learn to make friends with money.

Once you do, you will always have all you need and more. Don’t let anyone make you feel doubtful or ashamed of your desire to be rich.

At it’s deepest level,It is a desire for a fuller,happier more wonderful life.It is a cosmic urge.

It is not only good thought but very good.

Thanks for Readers👍