संतों ने इस संसार को दु:खालय कहा है। अनेक विद्वानों ने जीवन को परिभाषित करते हुए बताया है, कि “संघर्ष ही जीवन है।”
प्रत्येक व्यक्ति को अपने लाइफ मैनेजमेंट में “समाधान वृक्ष” को जगह अवश्य देनी चाहिए। जीवन में खुशहाली और शांति बनाए रखने के लिए कम से कम आज के दौर में ये नितांत आवश्यक है।
जीवन की सार्थकता सदैव चलते रहने में ही है। हिंदी फिल्मों के मशहूर गायक व अभिनेता..किशोर कुमार ने जिस प्रकार अपनी एक मूवी का नाम ‘चलती का नाम गाड़ी..’ रखकर समस्त ऑडिएंस को एक संदेश दिया था..ठीक वैसे ही, गाड़ी की तरह ‘जीवन’ भी चलने का ही नाम है। क्योंकि ठहरा हुआ तो जल भी दूषित हो जाता है।
हिंदी फिल्म “शोर” का गाना “जीवन चलने का नाम..चलते रहो सुबह शाम..भी कुछ ऐसा ही भाव दर्शा रहा है।
चलो! एक कहानी के ज़रिए बेहतर “जीवन दर्शन” के परिप्रेक्ष में “समाधान वृक्ष” की प्रासंगिकता को समझने का प्रयास करते हैं….
एकबार की बात है..एक कामकाजी महिला, और उसका पति रोजाना सुबह काम पर निकल जाते.. थे। दिन भर पति ऑफिस में अपने टारगेट पूरा करने की जिद्दोजहद में लगा रहता.. जबकि उसके संस्था अध्यक्ष को कार्य के प्रति उसका समर्पण भाव कभी समझ ही नहीं आया। उसकी हौसला अफजाई में कभी कोई प्रशंसा बगैरह..नहीं की। इसके विपरीत यदि उससे कोई ह्यूमन एरर भी हुई.. तो तीखी-नौक झोंक, कटु आलोचनाएं सुनने को और मिलती। उन्हें भी वह चुपचाप सहता रहता था।
वैसे ही पत्नी सरला भी एक प्राईवेट कम्पनी में थी। वह भी अपने ऑफिस में दिनभर व्यस्त रहती। अनेकों परेशानियों से जूझकर सरला घर लौटती, खाना बनाती, घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों पति पत्नी नाकारा होने के लिए डाँटने के आदी हो गए थे। जो एक गलत तरीका था। अर्थात वे दोनों अपनी दिनभर की भड़ास बेचारे बच्चों पर निकलते। फिर पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-कराते सरला कहीं अधिक चिड़चिड़ी होती जा रही थी। तथा घर, बाहर के सारे काम सरला की जिम्मेदारी बनके रह गए थे। उसे बच्चों का तनिक भी सपोर्ट नहीं मिल रहा था। अब वह अपने जीवन से निराश होने लगी थी।
उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा था। बच्चों पर हाथ उठाने के साथ साथ इस स्थिति का ठीकरा बेचारी सरला के ही सिर फोड़ने को आमदा रहता.. उनके ऐसे रवैए से जाहिर है बच्चे भी विद्रोही हो चले थे।
टर्निंग प्वाइंट बिकम्स इन एव्री लाइफ, बट क्वेश्चन इज देट वी मस्ट ट्राई टू अंडरस्टैंड :
एक दिन अचानक सरला के घर का नल खराब हो जाता है। उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया। प्लम्बर ने आने में काफी देर कर दी। पूछने पर बताया कि,” सॉरी मेम! साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई.. घर से लाया हुआ मेरा खाना भी मिट्टी में गिर पड़ा, काम पर ड्रिल मशीन खराब हो गई, शायद मेरी परिस्थिति का लाभ उठाते हुए.. आज किसी ने मेरा पर्स भी साफ कर दिया। ”
नल ठीक करते करते वह ये सब बता रहा था। उसकी बातें सुनकर कामकाजी महिला सरला को उस पर दया आ गई और वह उसे अपनी गाड़ी से छोड़ने उसके घर तक चली गई,ताकि वह समय से खाना खा सके।
घर पहुंचते ही प्लंबर ने खुशी में.. मैडम (सरला) को बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया। उस प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया। घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा एकदम से खिल उठा। बच्चों को प्यार किया,मुस्कराती पत्नी को भी एक प्यार भरी नज़र से देखा और धीरे से चाय बनाने के लिए कह दिया।
सरला एक मिस्त्री के ट्रांसफॉर्म्ड रॉल को देखकर हैरान रह गई। बाद में आते समय बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया.. ये मेरी परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं। और घर में कदम रखने से पहले अपने दिमांग को सारी परेशानियों से मुक्त कर लेता हूँ। मैडम! चिंताओं को मैंने अपने घर के अंदर कभी प्रवेश नहीं दिया।
सुबह जब काम पर जाने के लिए अपना थैला उतारता हूं, तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर मेरी ये कोशिश रहती है कि मेरी पत्नी और बच्चे, तो कम से कम उनसे अलग ही रहें, इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़कर ही घर में प्रवेश करता हूं। अपने इष्ट “राधे गोविंद” से मेरी एक ही प्रार्थना होती है कि दिन प्रतिदिन वे मेरी मुश्किलें कम करते चलिएगा।
प्रारब्धवश मैं गरीब पैदा अवश्य हुआ हूं मगर मुझे अपनी मेहनत,लगन और अपने जीवन प्रबंध पर इतना विश्वास है कि गरीबी में मरूंगा नहीं।
मेरे बच्चे मेरा बहुत सम्मान करते हैं, पत्नी मुझे बहुत प्यार देती है, तो भला मैं, उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ। देखिए ! व्यक्ति का सुव्यवस्थित प्रबंध ही उसका जीवन ‘ दर्शन ‘ होता है
संतों का मत है कि दुनियां में कोई काम या फिर व्यक्ति छोटा नहीं होता। दुनियां में सब अपनी अपनी प्रतिभा लेकर जन्म लेते हैं। एक छोटे से कारीगर की सरल जीवन चर्या ने अनेकों शिक्षित लोगों को “खुशहाल जीवन” का दर्शन न सिर्फ प्रस्तुत कर दिया…! अपितु वह उस दर्शन को बड़े इत्मीनान से जी.. रहा है। वाह!!!
अब सरला जी के भी अनंत: चक्षु खुल गए थे। वह घर लौटते वक्त सारे रास्ते यही सोच रहीं थी..शायद ये हर घर की कहानी है। ये घर गृहस्थी एक तपोभूमि है। इतिहास गवाह है सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें न कभी सुखी रहा है और न कभी रह सकेगा।
जबकि हम सभी जानते हैं जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं होता, हमारी समस्याएं भी नहीं। प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है हम सबको स्ट्रैस आउट या टेंस फ्री करने के लिए।
क्यों न हम सब भी अपने अपने घरों से बाहर ऐसा ही एक “समाधान वृक्ष” निश्चित कर लें। ध्यान रहे घरों से बाहर न कि मकानों से बाहर.. ताकि घर परिवार की दहलीज एंट्री लेनी से पहले अपनी सारी समस्याएं व चिंताएं बाहर उसी को सौंप कर जाया करें। अर्थात घर के अंदर सदैव खुशमिजाज़ ही रहा करें..जिससे हम सब के जीवन में भी प्लंबर महोदय के घर जैसी सुख शांति आ जाए।
पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
युग पचहरा,मुखिया परिवार,नीमगांव से🙏