220 – गेहूं की तोंद

Yes ‘ Wheat Belly ‘ अर्थात ‘ गेहूं की तोंद ‘ अमेरिका में ह्रदय रोग विशेषज्ञ एम डी डॉक्टर विलियम डेविस ने 2011 में एक “व्हीट बैली”..नामक पुस्तक लिखी..जो आज तक फूड हैबिट पर लिखी गई दुनियां की सर्वाधिक चर्चित पुस्तक बन चुकी है। अमेरिका में तो गेहूं से बने हर प्रोडक्ट को त्यागने का एक अभियान चल रहा है।

मैं बिना कोई भूमिका बनाए..सीधे सीधे कहूं,तो यदि जीवन में स्वस्थ एवं फिट रहना है,तो तत्काल गेहूं को अपनी खाने की थाली से दूर हटा दीजिए.. या एकदम नहीं तो धीरे धीरे इसका स्तेमाल कम करते जाइए.. हो सकता है आज की पीढ़ी को ये अप्रत्यासित निर्णय लगे..

लेकिन अब इसकी दरकार है। हमारे लिए अपने पूर्वजों वाला मोटा अनाज..मक्का,बाजरा, जौ, ज्वार,जई , रागी,चना,मटर आदि अनाजों का भोजन ही लाभप्रद है, कहना, न होगा कि हमें अपनी “फूड-हैबिट” में मोटे अनाजों से युक्त भोजन ही लाना होगा।

डॉक्टर विलियम डेविस का कहना है कि यदि हमें खुद व अपनी आने वाली पीढ़ियों को यदि ओबेसिटी, डायबिटीज एवं ह्रदय रोगों से स्थाई मुक्ति चाहिए, तो इस तथ्य पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा।

जबकि, भारत में पहले जौ मटर या चना आदि की मिक्स रोटी बड़ी मशहूर थी। जिसे हमारे परिवारों में दादी अम्मा जी बतातीं थीं कि उस मिक्स अनाज को ‘ बेझर ‘ कहा जाता था..अंग्रेजों से पूर्व यही अनाज हमारी फूड हैबिट में था। जो बहुत सॉलिड यानि ताकतवर भी था। बुजुर्ग बताते हैं कि,गेहूं की रोटियां तो भारतीय घरों में अतिथियों के आने पर ही बनती थीं।

आप गौर कीजिएगा.. हमने अपनी जिन जिन चीजों व आदतों को विदेशी प्रभाव में आकर छोड़ा है, आज वही प्रभाव हमारी बहुत सी परेशानियों का सबब बना हुआ है। आज 77% भारतीय ओवरवेट हैं और लगभग उतने ही प्रतिशत कुपोषित भी। भारत में अधिकतर तीस की उम्र के पार वाला हर व्यक्ति अपनी तोंद के लिए चिंतित हैं। मगर मेरे भाई ! वो “गेहूं की तोंद” है न कि आपकी। आप उसे लटकाए-लटकाए यदि थक गए हो,तो ध्यान रहे! गेहूं से दूरी बनाने के बाद ही तोंद से दूरी बन सकेगी।

कोरोनाकाल के आंकड़े उठाकर देख लीजिएगा.. उस दौरान डायबिटीज, व ह्रदय रोग से पीड़ित लगभग एक लाख लोगों को शरीर में प्रतिरोधक क्षमता की कमी के कारण ही अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। डॉक्टर विलियम डेविस के अनुसार इन बीमारियों की जड़ में आज का ये हाईली केमिकल बेस्ड गेहूं ही है।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि,भारत के फिटनेस आइकन 54 वर्षीय टॉल डार्क हैंडसम (TDH) मिलिंद सोमन बिल्कुल भी गेहूं नहीं खाते हैं।

आपने हिंदी की ये कहावत पढ़ी या फिर सुनी तो अवश्य ही होगी कि, “समझदारों के लिए, इशारा ही काफ़ी होता है।”

कहना न होगा कि आप ‘समझदार’ हैं। आई मीन टू से..,”आप समझदार ही हैं।”

थैंक्स फॉर रीडिंग

219- टीम-स्प्रिट

जिस प्रकार माध्यमिक शिक्षण संस्थानों में किन्हीं अपरिहार्य कारणों से जब कभी दो एक शिक्षक अवकाश पर होते हैं, तो “टीम-स्प्रिट” अर्थात टीम भावना के मध्य ए नज़र विद्यालयों में शिक्षण कार्य बाधित न हो, इसके लिए खाली पीरियड्स वाले शिक्षकों की “अरेंज क्लासेज” लगा दी जाती हैं।

ठीक वैसे ही जब ” देव शयनी एकादशी ” को श्री भगवान विष्णु चार महीने के लिए अपने शयन कक्ष में चले जाते हैं। उन चार महीनों के दौरान सृष्टि के कार्य बाधित न हों..इस उद्देश्य से..

यहां मेरा कुछ ऐसा ही मानना है..शायद इन द सेंस ऑफ “टीम स्प्रिट” ही हमारे सनातन में सृष्टि की व्यवस्था मिल बांटकर कुछ इस प्रकार संभाली जाती रही है।

देव शयनी एकादशी के बाद..सर्वप्रथम चार दिन हमारे “गुरु लोग” सृष्टि की व्यवस्था में अपना योगदान देते हैं.. इसी आदर्श कार्य के लिए.. पूरी दुनिया में गुरु पूर्णिमा पर गुरुओं का सम्मान करने की परम्परा है।

अगले ही दिन श्रावण अर्थात सावन का महीना लग जाता है,तब पूरे एक महीने के लिए सृष्टि शिवमय हो जाती है, अतः भगवान शिव सृष्टि को संभालते हैं।

फिर आता है..भाद्रपद तो भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी आ जाती है, तब भाद्रपद के पूरे 19 दिन सभी कृष्णमय हो जाते हैं।

फिर आती है गणेश चतुर्थी पूरे दस दिन सृष्टि के समस्त प्राणी गणेशमहोत्सव में तल्लीन हो जाती है।

उसके बाद 15/16 दिन हमारे पितृदेवों की पुण्य आत्माएं सृष्टि को संभालने में अपना योगदान देती हैं।

फिर नवरात्रि आ जाती हैं मां अम्बे गौरी दुर्गा पूरे दस दिन दशहरा तक सृष्टि का कार्यभार संभाल लेती हैं।

फिर शुरू होते हैं दीवाली के 20 दिन मां लक्ष्मी सभी घरों में खुशहाली और धन धान्य से परिपूर्ण करके समस्त सृष्टि को न केवल संभालती हैं अपितु खुशहाल कर देती हैं।

दीवाली के साथ ही साथ दस दिन कुबेर जी भी सृष्टि को संभालने में अपना योगदान देव उठनी एकादशी तक देते हैं।

फिर तो.. भगवान विष्णु निद्रा से जाग कर सृष्टि का कार्यभार स्वयं संभाल ही लेते हैं

अब आप ही बताइए..?? हमारा सनातन.. है ना कमाल का धर्म!!

विशेष;– इसमें तो कभी कोई दोराय है ही नहीं कि, शिक्षक समस्त सृष्टि को ज्ञान रूपी ‘ प्रकाशमय ‘ करने में पूर्ण समर्पण भाव से मोमबत्ती की तरह अपना सारा जीवन खपा देता हैं ।

“गुरुओ को “आदर्श शिक्षक” क्यों कहा गया है, इस बात का भान सृष्टि की व्यवस्था में उनके योगदान को देखकर भी हो गया होगा।

बोलो! ॐ श्री हरि.. ॐ श्री हरि.. ॐ श्री हरि

218 – Where are you..??

Yes, I mean to say “Where is our standing..in our Society..?”

Or what type is your Persona among the Society..?? Where you live.

Mostly bright youths of the village, fortunately, after getting the job or for their business.. settlement.They settle in another places or cities. from that place where he/she lives permanantly.

As I think, doing the Job or Business near about for thirty or forty years. If they have to live in another cities very long distance from their native village. Normally, one day, comes that they almost gradually disappear from the map of the village & from the memory of the people’s brain.

By the way.. Sometimes, they are remembered, as in hidden history of the village, by some intellectuals.

After some years, Next generation..& they themselves are unknown eachother due to a long gap,.of their Contact, that is the very big drawback with, out of station service or business persons of the village. Their settlement becomes their destiny where they do job.

Although, the opinion of common people may be person to person differentiate about this matter. Because There are different kind of people in the Indian society. But still, I have searched three types catagory as;

Catagory A ;

Who are social..they always connect with their village continuosly. And Villagers invite & inform them in the functions & another activities. So mostly they become as a familiar figure with all for ever.

Catagory B ;

Who are reserve by nature..plz. forgive me their condition just like pendulam. Or just like the dog of washerman. Who does not watch the house & not the river ghat.

Catagory C ;

C typed is over reserved. They are fully engaged in own life. They are called “So call selfish” by the people of the society.

Nowhere on the Earth, not in their department where they work, not in that society where they live…?? individually & their behaviour is not proper among the society of the village. ??

Everyone should think.. individually about in three questions..

No.1 Who am I..?

No.2 What am I doing..? &

No.3 “Where am I.. ?” .means for all

“Where are You..?? Plz.now observe yourself

Thanks for reading

Bye..

217- खुशफहमी

जाहिर सी बात है कि, आज के मशीनी युग में कंप्यूटरीकृत साधनों के बीच लोगों के काम करने का तरीका काफी आसान हुआ है। जिससे अब शारीरिक परिश्रम भी कम करना होता है।

मगर अपनी ‘जीभ के स्वाद’ के हाथों मजबूर इंसान ने अपने खानपान में कोई बदलाव नहीं किए हैं, फिजिकल लेबर कम होने से आज हम लोगों के शरीर की चर्बी बढ़ रही है। जो आगे चलकर बीमारियों का सबब बन सकती है।

दूसरे हम काफी समय तक ‘ओबेसिटी’ को अपनी हेल्थ मानकर स्वस्थ होने की “खुशफहामी” में रह रहे होते हैं। जो गलत है।

जब तक कि हमारे अंदर कोई बीमारी विकराल रूप नहीं ले लेती। तब तक हम क्या कोई भी भला मानुष ये मानने को राजी नहीं होता।

ठीक उसी प्रकार भौतिकता की चकाचौंद में मानव-जीवन की राह से भटके हुए “भौतिक जगत” में तल्लीन रहने वाले अस्सी प्रतिशत लोग बेवजह की “Rat-racing” में फेयर & फाउल का गेम खेलते खिलते अपनी आय के साधन सेट हो जाने पर लोगों के सामने “खुशहाल” दिखने की शोइंग ऑफ़ एक्टिंग में इतने गहरे उतर जाते हैं कि उनके अपने भी कन्फ्यूज हो जाते हैं कि सच क्या है।

जबकि, समूचा विश्व जानता है, कि जीवन में खुशहाली,प्रसन्नता,आनंद एवं मन के सुकून का ‘आर्थिक सम्पन्नता’ से कभी कोई सरोकार होता नहीं है।

क्योंकि, लोगों की खुशहाली से रिलेटिड चाहे आप मेरे ब्लॉग 38 “अ रिसर्च रिपोर्ट ऑफ़ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी” पढ़ लें या वर्ल्ड “हैप्पीनेस” इंडेक्स के उन सभी छह मानकों की गहन स्टडी कर लें, जो मनुष्य के ‘ नियंत्रित मन ‘ के साथ-साथ ‘ जीवन में एक संतुलन ‘ अर्थात जीवन में “अनुशासन” के महत्व की ओर इशारा करते हैं।

आप ताज़्जुब कर जायेंगे कि, उनके अनुसार व्यक्ति की प्रसन्नता में जीवन की सिर्फ मूलभूत आवश्यकताएं मैटर करती हैं। ‘आर्थिक सम्पन्नता’ का तो व्यक्ति के जीवन की खुशहाली से कोई खास ताल्लुक न पहले कभी रहा है न अब है,और न भविष्य में कभी रहेगा।

हां, इस बाबत प्रसन्नता के मानकों को गंभीरता पूर्वक समझने हेतु आपको नंबर फाइव पर.. 12 नवंबर, 2019 में पब्लिश हुआ “प्रसन्नता” नामक लेख एकबार पुनः देखना होगा।

धन्यवाद

216 – True-Beauty

An English poet Mr.Thomas Carew has also expressed his rational views on this topic by his poem “The true beauty”.

वैचारिक सुंदरता ही सच्ची सुंदरता होती है। अर्थात दुनियां में आरंभ से ही वैचारिक सुंदरता vs शारीरिक सुंदरता की एक रेस जैसी होती रही है..

एक कहानी के ज़रिए देखते हैं कि, आख़िर “विजयश्री” किसके हिस्से आती है..

विशेषत: आपकी जानकारी के लिए बता दूं ये कहानी भी एक सच्ची घटना पर आधारित है। सीन वहां से शुरू होता है.. कि एकबार शारीरिक रूप से काफ़ी सुन्दर सी एक महिला ने प्लेन में एंट्री ली.. और वह अपने स्टाइलिश अंदाज़ में सीट की तलाश के लिए उसने प्लेन में चारों ओर अपनी नज़रें घुमाईं।

उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है। जिसके दोनों हाथ ही नहीं है। शायद उस मनचली महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में अपनी बेइज्जती लगी होगी।

अक्ल की दुश्मन लेकिन ईश्वर प्रदत्त (गॉड गिफ्टिड) शक्ल की ‘सुंदर’ महिला ने तुरंत एयरहोस्टेस से बोला

“मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी।

आदतन उस नाटकीय महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया।

असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, “मैम क्या आप मुझे इसका कारण बता सकती हो..?”

शारीरिक सौंदर्य से दिखावटी उस महिला ने बेहद बेतुका जवाब दिया, कि “मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर मैं यात्रा नहीं कर पाउंगी।”

कागज़ी पढ़ाई वालों के..ही ऐसे तौर तरीके होते हैं। क्योंकि यथार्थ जीवन में व्यावहारिक तौर पर उसका रवैया ठीक नहीं था।

उस महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई।

महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा, कि “मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मुझे कोई दूसरी सीट दे दी जीए ना..!!”

एयरहोस्टेस ने खाली सीट की तलाश में चारों ओर देखा पर कोई सीट खाली न दिखी।

एयरहोस्टेस ने महिला से कहा कि “मैडम इस इकोनोमी क्लास में कोई सीट खाली नहीं है, किन्तु यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखना हमारा दायित्व है।

अतः मैं विमान के कप्तान से बात करती हूँ। कृपया तब तक थोडा धैर्य रखिए।” ऐसा कहकर होस्टेस प्लेन के कप्तान से बात करने चली जाती है।

कुछ समय बाद लोटने पर उसने महिला को बताया, “मैडम! आपको जो असुविधा हुई, उसके लिए बहुत खेद है। इस पूरे विमान में, केवल एक सीट खाली है..मगर वह प्रथम श्रेणी में है।

मैंने हमारी टीम से बात की और हमने एक असाधारण निर्णय लिया है। क्योंकि एक यात्री को इकोनॉमी क्लास से प्रथम श्रेणी में भेजने का कार्य हमारी कंपनी के इतिहास में पहली बार हो रहा है।”

ये सुन.. वह आडंबरी नारी अत्यंत प्रसन्न हुई, किन्तु इसके पहले कि वह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती..या और एक शब्द बोल पाती…

एयरहोस्टेस दौनों हाथों से असहाय व्यक्ति की ओर बढ़ गई और विनम्रता पूर्वक उनसे आग्रह किया..

“सर, क्या आप हमारे साथ प्रथम श्रेणी तक जा सकेंगे..? क्योंकि हम नहीं चाहते कि आप जैसा महान व्यक्तित्व अनकंफर्टेबल फील करें और परेशान हों।

यह बात सुनकर सभी यात्रियों ने ताली बजाकर प्लेन के कप्तान के इस निर्णय का स्वागत किया।

दरअसल, वाहिय रूप से सुन्दर दिखने वाले लोग कई बार दिली तौर पर बहुत निम्न सोच वाले निकलते हैं।

तब उस अपाहिज व्यक्ति ने खड़े होकर कहा, मेरे यात्री साथियों !

मेरा एक छोटा सा परिचय ये है कि, “मैं एक भूतपूर्व सैनिक हूँ। दुर्भाग्य से मैंने एक ऑपरेशन के दौरान कश्मीर सीमा पर हुए एक बम विस्फोट में अपने दोनों हाथ गंवा दिए..थे। सबसे पहले, जब मैंने इन देवी जी की परेशानी सुनी, तब मेरा मन बरबस सोच रहा था। कि मैंने भी किन लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाली थी, कैसे हैं मेरे देश के नागरिक?? जिनके लिए मैंने अपने हाथ खो दिए..??

लेकिन जब आप सभी की प्रतिक्रिया देखी.. तो अब अपने आप पर मुझे गर्व हो रहा है कि मैंने अपने देश और अच्छे देशवासियों के लिए अपने दोनों हाथ खोये हैं, अब कोई गिला नहीं।” और इतना कह कर, वह फरिश्ता प्रथम श्रेणी में बैठने चला गया।

शारीरिक सौंदर्य पर पागल महिला आज वैचारिक व मानसिक सुंदरता के सामने पूरी तरह से पराजित और अपमानित होकर अपना सिर झुकाए सीट पर अकेली बैठी रही ।

मेरा ख्याल भी यही है कि, किसी मनुष्य के अगर विचारों में एंपैथी व सिंपैथी अर्थात उदारता नहीं झलकती है, तो इतिहास साक्षी है..ऐसी ‘वाह्य सुंदरता’ को दुनियां की “इंटेलेचुअल-लॉबी” ने सदैव नकारा है।

धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा

जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस

215 – पत्नी

पत्नी अर्थात “जीवन संगिनी” इस मृत्युलोक की जीवनयात्रा का एक “सच्चा और वफादार” साथी यानी हमसफ़र..जो व्यक्ति के साथ बेहतरीन दोस्तों की फेहरिस्त में नंबर वन के पायदान पर सदैव आत्मीय होता है।

मेरे विचार से तो “पत्नी” को शब्दों में कवर करना लगभग असंभव है। ये अल्फाज काफ़ी गहरा है।

दरअसल, ये मानव जीवन का एक कटु सत्य है। जिसे व्यक्ति किन्हीं कारणों वश दूरी बनने पर..या दुर्भाग्य से “अकेला” हो जाने पर जितना समझ पाता है। मौजूदगी में इस शब्द को तवज्जो ज़रा कम ही देता है।

ये घटना एकदम सामान्य है गृहस्थ जीवन में ऐसा कई एक लोगों के साथ होता है। मगर मेरे लिए अब ये एक बेहतरीन संस्मरण ही है।

हां मेरा ये अनुभव जजवाती लोगों के लिए शिक्षाप्रद भी हो सकता है।

बड़े बुजुर्ग सदैव कहते आए हैं कि,जब घर में चार वर्तन होते हैं, तो आपस में थोड़ा.. बहुत खनकते ही हैं ..

इसीलिए परिवारिक मामलों में किसी भी बात को लेकर ज्यादा माइंड करना कभी उचित नहीं माना गया है।

जीवन में सुकून से रहना हो, तो अमुक बात को “समय की बलिहारी” पर छोड़ देना चाहिए।

  इसी श्रंखला में..  डाइनिंग हॉल में “घर परिवार” से संबंधित टेबल टॉक जो हर घर में एक सामान्य सी बात है। एक बार किसी बात पर बाई द वे मेरा पत्नी जी से डिस्कस शुरू हो गया ! धीरे धीरे बात थोड़ी बढ़ने लगी, खतरेको भांपते हुए फिर मैं ही रणछोर बन .. कुछ बड़बड़ाते हुए नाराजी के अंदाज़ में.. घर से बाहर निकल लिया..खाने के बाद थोड़ा बहुत चहल-कदमी के लिए अक्सर मैं जाता ही था..तो ऐसा करना उनके लिए असहज नहीं था।

बाहर आकर ज़रा सोचा! और सबक भी लिया.. कि, “आज पढ़ी लिखी तर्कशील महिलाओं से केवल सेफ मुद्दों पर ही डिस्कसन करना उचित है,किसी सेंसटिव मुद्दे पर नहीं। “

   पता नहीं, ये नारियां इतनी वाकपटु होती क्यों हैं..??

मौका मिलते ही इनके लैक्चर…शुरू हो जाते हैं। उस वक्त उनके सुनने की सामर्थ्य जानें कहां चली जाती है।

मैंने जाते ही,कॉलोनी की कैंटीन में चाय ऑर्डर की और सामने पड़ी चेयर पर बैठकर कुछ सोच ही रहा था, कि.. तभी पीछे से एक परिचित सी आवाज कानों को सुनाई दी,

“इतनी सर्दी में घर से ‘बाहर’ चाय पी रहे हो..? युग पुत्तर! अज की गल ए ..??

गर्दन घुमा कर देखा तो पीछे की चेयर पर बैठे मेरे एक पड़ोसी,पिता तुल्य बुजुर्ग सरदार जी थे। प्रति उत्तर में मैनू भी बोल दिया,अंकल दी ग्रेट!आप भी तो, इत्थे ही हो..?? आप भी इस टैम घर में ना हो।

बुजुर्ग महोदय ने मुस्कुरा कर कहा :-  अरे लाले दी जान! अपण,तो निपट अकेला ए जीवन दी गड्डी नू मैनू सिंगल इंजन हूं , न कौणू घर गृहस्थी की लाइबिलिटी, न कोई जीवण साथी..

बरखूरदार! तन्ने तो अभी बहुत कुछ करणा सी। तेनु यंग,स्मार्ट एवं तुहाडे जीवन दी गड्डी अभी डबल इंजन दी ए !! बुरा नी मानो, सवाण, बूझणा तो बणता है भई! ” कैंटीन दी चाय क्यों..?? ”

अंकल! जी कम से कम आप तो ऐसी गल्ला ना करो.. मेरे पड़ोसी दे नाते .. तेन्यु सब जांण दे ओ।

मगर आपकी समझ से तो बहु – बेटियां ही सदैव सही होंदी ऐं.. आप तो उनदे ही प्रशंसक हो न??

मगर मैनू इक बात बताइएगा..नारी दा तर्कशील होणा हम मर्दों नू बर्दास्त क्यों नी हों दा ??

अंकल ने कहा ; वो तो है।

  अंकल !! आज हुआ यूं कि, देवी जी को..नारी जाति के एक संवेदनशील मुद्दे पर मैने जान बूझकर थोड़ा सा छेड़ क्या दिया.. उनका तो लैक्चर.. शुरू हो गया जी।

सिचुएशन को समझ.. मैं इत्थे चला आया..

और कई बार हम मर्द ये समझते हुए भी कि वे सही कह रही हैं,तो भी उनके विचार नू इकदम से स्वीकार नी कर दे ऐं क्यों..?? 

बुजुर्ग : बस पुत्तर! इत्ती सी गल! ए।

यू तो हर मर्द दी “ईगो” हों दी ए.. होर कुछ नहीं हों दा ए।

बरखुरदार! “ज़िन्दगी” शबद दा असल मीनिंग केवल पत्नी सु शुरू हों दा ए,परिवार दे होर किसी मेंबरा दे.. ना हों दा ए।

अब देख! आठ बरस हो गए तुआडी आंटी नू अपना स्थूल शरीर छोड्डे। जब मेरे साथ थी, मेन्यु कभी उसकी सुणी ना। इब कम्बख़्त दुनियां से चली गयी, तो भूले से भी भुलाई नी जांदी ए, ऐसा कौण दा पल ए जब उसकी याद ना आंदी ए। घर जांवा तो लग दा ए काटने नू दौड रा ए। इसलिए बाहर ही घूमता रे वा.. यूं।

हालांकि, बच्चे मेरी देखभाल भी अच्छी तरह कर दे ऐं..दोनों बच्चे फाइनेंशियली सेटल्ड हैं। और वे अपने अपने काम में मस्त भी हैं, उं दे आलीशान घर,धन-दौलत गड्डी सड्डी सब कुछ बढ़िया से है…,

पर पुत्तर! अब अपणी जिंदगी दे बिच कोनू मज़ा नी रह गया है।

संयम नियम से रहते हुए.. यूँ ही, अपणे आप नू गुरुवाणी आदि में व्यस्त रख दे ऊ।

अब पुत्तर वाहि गुरु दी गल्ला ही जिंदगी दा सार लग दीं ऐं होर कोई गल्ला अच्छी नी लग दी ऐं,।

उसके जाणे दे बाद मेन्यु पता चलिया,” पत्नी तो हर मर्द दी धड़कन हों दी ए, जब धड़कन ही रुक जां दी ए..तो जीवणा कैसा..??

घर भी उसके बिण मकाण बन दे रेह गया ए

अब तो बेटा युग! सब कुछ बेजाण हों दा ए.. 

लेकिन सोणे पुत्तर तेनु तो काफ़ी समझदार हों दे ओ.. शिक्षक भी लगे हों, बेटा, घर जाओ !! वाहि गुरु दी किरपा ए आप नू अपणी जिंदगी में खुशी दे जीम ते रहो।

    वरना! बाद में पछताणे दे इलावा जीवण बिच कुछ ना रें दा ए।

उस बखत मैनू अंकल दी आंख्या में दर्द व आंसु दा समंदर देख्या, तो चाय के पैसे दे ते ही नज़र भर उस बुजुर्ग फरिस्ते नू देखया,एक भी मिंट गंवाए बिण घर दी ओर चल पड़ा…।

मैन्यू गली दे मोड़ से ही देख लिया था, डबडबाई आँखो से वह मेरी ही वाट जोह रही..थी। मेरे घर दी लक्ष्मी मेरी प्रिय पत्नी, मेरी देवी..चिंतित सी दरवाजे पर ही ख़डी मिली…तुरंत उसने अपने चिर परिचित से शालीन अंदाज में सदैव की तरह कहा..”कहाँ चले गए थे..? जैकेट भी नहीं डाला, ऐसी शीत लहर में। पता है बाहर कितनी ठंड है। आपको ठंड लग जाती तो..?, “

मैनू भी उसी लय में बोल दिया, तुम भी तो “बिना स्वेटर के दरवाजे पर खड़ी हो!, अंदर चलो हवा लग जाएगी..” कुछ यूँ ही दोनों की आँखों ने ,एक दूजे के प्यार नू पढ़ लिया!

कई बार हम लोग अपने जीवन में इसी तरह की गलतियां कर बैठते है। सिर्फ पत्नी ही नही,परिवार के हर सदस्य माँ-बाप, चाचा-ताऊ,भाई-बहिन या अज़ीज़ दोस्तोँ के साथ ऐसा क्रोध, नाराजगी करना, सिर्फ हम को ही नही, उनको भी कष्ट पहुंचाता है।

शिक्षा;- वैसे भी यू छोटा सा जीवण है..  दोस्तो!! कहीं क्षमा करके.. कहीं क्षमा मांग के.. कभी हँस कर, तो कभी चुपके से अपने गम छुपाकर..जीवण गुजार दें। किसी व्यक्ति या वस्तु की कीमत यदि उनके बाद समझी, तो क्या समझी..?? उचित है कि उनके सामने ही उन्हें वो सम्मान मिले जिसके वे हकदार होते हैं।

इसलिए जीवन में कभी भी जजवाती बनकर ऐसी हिमांकत मत कर बैठिएगा।

मशहूर गायक किशोर जी ने अपने अंदाज में ऐसी किसी सिचुएशन को कवर करते हुए गाया होगा ..

   “जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं, जो मकाम, वो..फिर नही आते, वो.. फिर नहीं, आ..ते वो फिर नहीं आ.. ते..” वाकई वे पल सिर्फ यादों में सिमट कर रह जाते हैं। कभी नहीं आते।

पढ़ने के लिए धन्यवाद पूर्ण आनंद के साथ सदैव प्रसन्न रहिये। इस मृत्युलोक में जो प्राप्त है, दरअसल, उसे पर्याप्त समझने को ही “नियति” कहा गया है।।। 🙏🙏

आपका युग पचहरा,

जैन इंटर कॉलेज,सासनी, हाथरस से

214-वृक्ष ही जीवन है

ये तो वैश्विक जलवायु में कुछ उथल पुथल के कारण हफ्ते दस दिन के अंतराल पर इस वर्ष कुछ बूंदा बांदी होती रही है..

वर्ना आज के इंसान पर न गर्मी / ठंड सहन हो पाती हैं,और ना ही वर्षा।

क्योंकि आज खाने की हर चीज केमिकल बेस्ड है। एक सवाल ये भी बनता है कि जब हमारे आचरण में ही शुद्धता नहीं रही, तो हमें चीजें शुद्ध मिल कहां से जाएंगी..??

दरअसल, हमें ये भी जानना होगा कि, इंसान में अधिक मुनाफे के लालच के पीछे वास्तविकता क्या है..??

इसका साधारण सा जवाब हम सभी जानते हैं..अधिक जनसंख्या ही इसका असल कारण.. है।उसी की पूर्ति के लिए इंसान को कैमिकल्स और हाइब्रिड सीड्स की खोज करनी पड़ी..देश दुनियां बिच बहुत सी समस्याओं के मूल में आप जाइयेगा,तो “जनसंख्या घनत्व” को ही पाइयेगा।

देश में त्वरित गति से बढ़ता हुआ ये ‘जनसंख्या-घनत्व ‘ ही है जो देश में सत्ता पर काबिज़ लोगों ने वोट को सबकुछ मानकर “तुष्टिकरण” जैसी घिनौनी नीतियों को इतना बढ़ावा दिया.. कि देश की मध्यम वर्गीय असल जनता को उपेक्षित करते चले गए।

केमिकल बेस्ड “फूड” सदैव मनुष्य की शरीरिक प्रतिरोधक क्षमता को घटाता है।

इसी से आज के लोगों को लगता है कि गर्मी बहुत हैं ..

दूसरे ये भी बात अपनी जगह सही है कि, एक निश्चित सीमा तक ही आप ऐ.सी.,कूलर आदि कृत्रिम साधनों के सहारे जी..सकते हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं एक सर्वे के आधार पर आज हिंदुस्तान में लगभग 500 करोड़ और नए पेड़ों की आवश्यकता हैं l

जबकि अभी तो ये शुरूआत हैं..

भारत की क्लाइमेट फिगर ये कह रही है कि, 45°C से 49°C डिग्री को 55°C से 60°C होने में देर नहीं लगेगी,

वैज्ञानिक लोगों की चेतावनी… 56°C पर इंसान जीवित नहीं रहेगा!!!!!!

युवा पीढ़ी का इनकी अहमियत न समझने में कोई बहुत बड़ा दोष नहीं है।

वो इसलिए कि, उन्हें अपने वरिष्ठ लोगों के दैनिक व्यवहार में प्राकृतिक संसाधनों की रेस्पेक्ट करने वाला “चरित्र” कहीं नज़र आता ही नहीं।

हां वे दिखावा वाले चरित्रों को तो हर संस्थान व सरकारी महकमों में हर वर्षा ऋतु में देखते रहे हैं।

फिर युवा इन संसाधनों का सम्मान करें..भी तो कैसे??

नहीं समझे..मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि,

जब हम लोग पानी,पेट्रोल,डीजल,बिजली,गैस, खनिज और वन संपदा आदि का सम्मान करते हुए उन्हें दिख ही नहीं रहे हैं। तो बताइए वे सीखेंगे किन से..??

..और कुछ लोग तो ..अकारण ही चीजों को नष्ट करने में लगे पड़े हैं..अब आप ही बताइए.. कि, युवा इनका सम्मान करना कहां से और किससे सीखेंगे..?? वे जैसा देख रहे हैं वैसा ही तो करेंगे।

थोड़े लिखे को अधिक समझकर अब समय रहते हमें ये लोक कल्याण के लिए पौधे लगाने वाला मिशन शुरू करना ही होगा,

क्योंके एक पौधे को बड़ा होने में भी कम से कम 5 से 7 वर्ष लग जाते हैं, अब वर्षा ऋतु भी आने वाली है, कृपया जहां भी संभव हो हम सभी न केवल दो-दो पौधे लगाकर उनके साथ सेल्फी लेकर इतिश्री कर लें, बल्कि उन दो दो पौधों को अपने बच्चों की तरह अपनी देख रेख में सींच कर उन्हें “वृक्ष बनाने तक” का संकल्प लें,तो ही बात बनेगी।

ध्यान दें कि, स्कूल में अध्ययन के दौरान जब हम ईश वंदना में प्रतिदिन प्रातः बड़े विनम्र भाव से बोलते हैं कि,

“वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जावे। पर सेवा, पर उपकार में हम निज जीवन सफल बना जावें।।”

अब फिर सवाल खड़ा होता है कि,हम कितने दिन अपने “कर्तव्य मार्ग” पर डटे हैं.. सोचिए भाई जी!! ?? क्या आपको लगता है कि आज के बाद डट जाएंगे..??

और हम ने अपने अबतक के जीवन में “पर सेवाएं” कितनी की हैं..?? या क्या अब करने लगेंगे..??

विशेष;- “आंख खुली तभी सबेरा ” वाले सिद्धांत से तो सब संभव है। मनुष्य कभी भी और किसी भी अवस्था में ट्रांसफॉर्म हो सकता है।

विद्यालय की प्रेयर, अच्छी पुस्तकें एवं हमारे बड़े बुजुर्ग तो हमें और आने वाली संततियो को जीवन के सारे “नैतिक दायित्व” न केवल सिखाते रहे हैं अपितु सदैव सिखाते भी रहेंगे।

लेकिन हम उन्हें अपने दैनिक जीवन में क्रियान्वित करें तब ना!!!

अच्छी बात के लिए हमें तुरंत सजग हो जाना चाहिए।

सिर्फ बोलने भर से कुछ नहीं होगा। इसलिए बड़े अदब के साथ मेरा सभी (स्वयं) से भी निवेदन है हम सभी देखें कि कहीं हम ही तो इन प्रश्नों के घेरे में नहीं आ रहे हैं..??

सब कुछ सरकारों पर ही मत छोड़िए, स्वयं भी कुछ चीजों की जिम्मेदारी लीजिएगा। और

अन्य लोगो को भी इस बाबत जागरूक करने के लिहाज से बरसात से पूर्व इस सन्देश को आगे बढ़ाते रहिएगा..

कितना ही अच्छा हो, कि हम समय रहते प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करना सीख जाएं.. वृक्षों को लेकर राजस्थान ने समूचे देश में जो मॉडल प्रस्तुत किया है वाकई वह सराहनीय है.. उन लोगों ने न सिर्फ माना है..वल्कि दिल से स्वीकारा हैं .. कि “वृक्ष ही जीवन हैं” धन्यवाद

विचारक ; योगेंद्र सिंह पचहरा, के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस। (मूल निवासी नीमगांव,राया मथुरा)

श्री राधे गोविंद 🙏🏻🌱🙏🏻

213-“सनातन”

विवाह उपरांत संसार में किन्हीं कारणों से जीवन साथी को छोड़ने के लिए दो शब्दों का प्रयोग किया जाता है ..

क्रिश्चियन लोग मैरिज करते हैं तो उनके यहां

1-डाइवोर्स (Divorce) लेने का प्रावधान है।

और मुस्लिम निकाह करते हैं इसलिए जब उनमें नहीं बनती है,तो..

2-तलाक (उर्दू) लेने का प्रावधान है।

हम सनातनियों में ईश्वर न करें कभी किसी के जीवन में ऐसी परिस्थिति आए, वैसे भारतीय संस्कृति में मेरी जानकारी के अनुसार शायद अभी तक तो कोई ऐसा प्रावधान है नहीं।

यदि कोई महानुभाव जानते हों, तो “तलाक” शब्द के लिए हिन्दी भाषा में कोई एक शब्द हो, तो उसे शेयर अवश्य करियेगा।

मेरी नहीं दरअसल, ये कहानी आजतक के Editor… संजय सिन्हा की लिखी हुई है…। मगर मुझे लगा आज की युवा पीढ़ी के लिए “इस तथ्य को समझना” जरूरी है तो इसे अपनी ब्लॉग लिस्ट में शामिल करते हुए आपके साथ साझा कर रहा हूं..कहानी इस प्रकार है..

तब मैं… ‘जनसत्ता’ में… नौकरी करता था…एक दिन खबर आई कि… एक आदमी ने झगड़े के बाद… अपनी पत्नी की हत्या कर दी… मैंने न्यूज के लिए हेडिंग बनाई.. कि…

“पति ने अपनी बीवी को मार डाला”…!

खबर छप गई…,अधिकतर को इस हेड लाइन से कोई आपत्ति नहीं हुई… पर जब शाम को… दफ्तर से घर के लिए निकलते समय… अचानक प्रधान संपादक श्री प्रभाष जोशी जी… सीढ़ियों के पास मिल गए…मैंने उन्हें नमस्कार किया… तो कहने लगे कि… “महोदय!…, पति की…तो ‘बीवी’ नहीं होती…!” “पति की…

‘बीवी’ नहीं होती?”

ये सुनकर.. मैं चौंक गया!!

तब उन्होंने कहा..जी हां! “बीवी” तो… ‘शौहर’ की होती है…, ‘मियाँ’ की होती है।

अरे भाई पति की तो…’पत्नी’ हुआ करती है…! ” भाषा के मामले में… जोशी जी के सामने मेरा टिकना मुमकिन नहीं था…,

हालांकि मैं कहना चाह रहा था कि… “भाव तो साफ है न ?” बीवी कहें… या पत्नी… या फिर वाइफ…, एक ही मतलब तो हैं…, लेकिन मेरे कहने से पहले ही…

उन्होंने मुझसे कहा कि… “भाव अपनी जगह है…, शब्द अपनी जगह होते हैं…! भाई जी कुछ शब्द… कुछ जगहों के लिए… बने ही नहीं होते…! ऐसे में शब्दों का घालमेल बहुत गड़बड़ी पैदा कर देता है…। अभी आप युवा हो जरा सोच समझकर लिखा कीजिए..

” खैर…, आज मैं यहां किसी भाषा की क्लास में लैक्चर दे ने नहीं आया हूं…,

आज,तो मैं रिश्तों के एक अलग अध्याय को जीने के लिए आपके साथ इस बिंदु पर चर्चा कर रहा हूं..

लेकिन इसके लिए… आपको मेरे साथ…” प्राचीलता “के पास चलना होगा… वही ‘ प्राचीलता ‘ जिसे अक्सर सभी ‘प्राची’ बोलते थे…जो मेरी स्कूल की दोस्त हैं…, कल उसने मुझे फोन करके अपने घर बुलाया था…फोन पर उसकी आवाज़ से…ही मेरे मन में खटका हो चुका था कि… कुछ न कुछ गड़बड़ है…! मैं शाम को… उसके घर पहुंचा… उसने चाय बनाई… और मुझसे बात करने लगी…पहले तो इधर-उधर की बातें हुईं…,

फिर उसने कहना शुरू कर दिया कि…आजकल उसकी अपने पति नितिन से नहीं बन रही है और अब उसने उसे तलाक देने का फैसला भी कर लिया है…। मैंने पूछा कि… “नितिन है कहां …?” तो उसने बताया कि… “अभी कहीं निकल गए हैं…, बता कर नहीं गए…।” उसने कहा कि… “बात-बात पर झगड़ा होता है… और अब ये झगड़ा बहुत बढ़ गया है…, ऐसे में अब एक ही रास्ता बचा है कि… अलग हो जाएं…, हम आपस में तलाक ले लें…!”

प्राची जब काफी देर बोल चुकी… तो मैंने उससे कहा कि… “तुम नितिन को फोन करो… और घर बुलाओ…, कहो कि संजय सिन्हा घर बैठे हैं..!” प्राची ने कहा कि… आजकल हमारी आपस में बात कहां होती…हैं, मैं फोन कैसे करूं…?!!! अज़ीब सँकट था…!

प्राची को मैं… बहुत पहले से जानता हूं…। मैं जानता हूं कि… नितिन से शादी करने के लिए… उसने अपने घर में कितना उधम मचाया था…! बहुत मुश्किल से… दोनों के घर वाले राज़ी हुए थे…, फिर धूमधाम से शादी हुई थी…। ढ़ेर सारी रस्म पूरी की गईं थीं… ऐसा लगता था कि… ये जोड़ी.. ऊपर से बन कर आई है…! पर शादी के कुछ ही साल बाद… दोनों के बीच झगड़े होने लगे… दोनों एक-दूसरे को खरी-खोटी सुनाने लगे… और आज उसी का नतीज़ा था कि… मैं,संजय सिन्हा.. प्राची के सामने बैठा था …, उनके बीच के इस टूटते रिश्ते को… बचाने के लिए.. बहुत अजीब लग रहा था!!!

खैर…, प्राची ने नितिन को फोन नहीं किया…। मैंने ही नितिन को फोन लगाया… और पूछा कि… “तुम कहां हो..?? मैं तुम्हारे घर पर हूँ…, आ जाओ…। नितिन पहले तो आनाकानी करता रहा…, पर वो जल्दी ही मान गया और घर चला आया…। अब दोनों के चेहरों पर… तनातनी साफ नज़र आ रही थी…ऐसा लग रहा था कि… कभी “दो जिस्म-एक जान” कहे जाने वाले ये ‘पति-पत्नी’..इतने गुस्सा हैं आंखों ही आंखों में एक दूसरे की जान ले लेंगे…क्या!!

मामला इतना बढ़ गया था कि, दोनों के बीच… कई दिनों से बात तक नहीं हो रही थी…!! नितिन मेरे सामने बैठा था…। मैंने उससे कहा कि… “सुना है कि… तुम प्राची से… तलाक लेना चाहते हो…?!!! उसने कहा, “हाँ…, बिल्कुल सही सुना है…। अब हम एक साथ… नहीं रह सकते…।” मैंने कहा कि… “तुम चाहो तो… अलग रह सकते हो…,

लेकिन “तलाक” नहीं हो सकता…!”

“क्यों…???

“क्योंकि तुमने “निकाह” थोड़े ही किया है…!”

“अरे भाई जी…, हमने शादी तो… की है…!”

“हाँ…, ‘शादी’ की है…! मगर सनातन धर्म में … पति-पत्नी के बीच… इस तरह अलग होने का… कोई प्रावधान होता ही नहीं…है।

अगर तुमने ‘मैरिज़’ की होती, तो… तुम “डाइवोर्स” ले सकते थे…!

और यदि ‘निकाह’ किया होता, तो… तुम “तलाक” ले सकते थे…!

लेकिन मेरे भाई क्योंकि… तुमने ‘शादी’ की है…, इसका मतलब ये हुआ कि… “हिंदू धर्म” और “हिंदी” भाषा में… कहीं भी पति-पत्नी के एक हो जाने के बाद… फिर से अलग होने का कोई प्रावधान होता ही नहीं….!!!”

मैंने इतनी-सी बात… पूरी गँभीरता से कही ही थी…, कि दोनों बड़ी जोर से हँस दिए…! दोनों को… साथ-साथ हँसते देख… मुझे बहुत खुशी हुई …

मैंने समझ लिया था कि… रिश्तों पर जमी गलतफहमी की कार्मिक लेयर रूपी बर्फ… अब कुछ पिघलने लगी है…! वो हँसे…, लेकिन मैं गँभीर बना रहा…

मैंने फिर प्राची से पूछा कि…जरा बताओ तो “ये तुम्हारे कौन हैं…?!!!” प्राची ने नजरें झुकाते हुए कहा कि… “पति हैं…!

मैंने यही सवाल नितिन से किया कि… “प्राची तुम्हारी कौन लगती हैं…?!!! उसने भी नज़रें इधर-उधर घुमाते हुए कहा कि…”बीवी हैं…!”

मैंने तुरंत टोका… “ये… तुम्हारी बीवी नहीं हैं…! ये… तुम्हारी बीवी इसलिए नहीं हैं…. क्योंकि… तुम इनके ‘शौहर’ नहीं हो…! ‘शौहर’ इसलिए नहीं…, क्योंकि तुमने इनके साथ “निकाह” नहीं किया… है। तुमने “शादी” की है…! ‘शादी’ के बाद… लड़की पत्नी बनती है..न कि बीवी।

महोदय! हमारे यहाँ जोड़ी ऊपर से… बन कर आती है…! तुम भले ही ये मानो कि… शादी तुमने की है…, पर ये आधा सत्य है…! तुम शादी का एलबम निकाल कर लाओ…, मैं सबकुछ… अभी इसी वक्त स्पष्ट कर दूंगा…!”

अब बात अलग दिशा में चल पड़ी थी…। मेरे एक-दो बार कहने के बाद… प्राची शादी का एलबम निकाल लाई…, अब तक माहौल काफ़ी ठँडा हो चुका था…, एलबम लाते हुए… उसने कहा कि… कॉफी बना कर लाती हूं…।” मैंने कहा.., “अभी बैठो…, इन तस्वीरों को देखो…।” कई तस्वीरों को देखते हुए… मेरी निगाह एक तस्वीर पर गई…, जहाँ प्राची और नितिन शादी के जोड़े में बैठे थे…। और कन्यादान के समय सभी बंधु बांधवों द्वारा कुछ भेंट करने के साथ साथ “वर वधु” के पाँव~पूजन की रस्म चल रही थी…। मैंने वो तस्वीर एलबम से निकाल ली… और उनसे कहा कि… “इस तस्वीर को गौर से देखिएगा…!” उन्होंने तस्वीर देखी… और दोनो साथ-साथ पूछ बैठे कि… “इसमें ऐसा क्या खास है…?!!!”

मैंने कहा कि… “ये पैर पूजन का रस्म है..” वहां पर मौजूद सभी लोग तुम्हारे पांव छू रहे हैं… जबकि उन सभी लोगों से तुम दोनों छोटे हो”

“हां तो….?!!!” “ये एक रस्म है…

ऐसी रस्म सँसार के… किसी धर्म में नहीं मिलेगी … जहाँ छोटों के पांव… बड़े छूते हों…!

लेकिन हमारे यहाँ सनातन में शादी को… ईश्वरीय विधान माना गया है…, इसलिए ऐसा माना जाता है कि… शादी के दिन पति-पत्नी दोनों… ‘विष्णु और लक्ष्मी’ स्वरूप होते हैं…, उस वक्त दोनों के भीतर… ईश्वर का निवास होता है…!

अब तुम दोनों खुद सोचो कि… क्या हज़ारों-लाखों साल से… विष्णु और लक्ष्मी कभी अलग हुए हैं…?!!! स्वाभाविक है..दोनों के बीच… कई एक बार झिकझिक हुई भी होगी,तो क्या उस आधार पर… क्या कभी तुम सोच सकते हो कि…वे दोनों अलग हो जाएंगे…?!!! नहीं होंगे…,

मैं बार बार शुरू से यही कहे जा रहा हूं कि, हमारे यहां… इस रिश्ते में… ये प्रावधान है ही नहीं।

महोदय ! “तलाक” शब्द… हमारा नहीं है…, और न”डाइवोर्स” हमारा है…!” ये सब पथभ्रष्टों के चोचले हैं

तभी दोनों से मैंने ये सवाल भी पूछ लिया कि… “बताओ कि… हिंदी में… “तलाक” को… क्या कहते हैं…???”

दोनों मेरी ओर देखने लगे उनके पास कोई जवाब था ही नहीं।

फिर मैंने ही कहा कि… “दरअसल हिंदी में… ‘तलाक’ शब्द के विकल्प की कोई गुंजाइश ही नहीं है।

हमारे यहां तो… ऐसा माना जाता है कि…यदि एक बार एक सूत्र में बंध गए, तो… कई.. जन्मों के लिए… एक हो गए.. इसलिए जो हो नहीं सकता…, उसे करने की कोशिश भी मत करिएगा…प्लीज!

या फिर… पहले एक दूसरे से ‘निकाह’ कर लो…, फिर “तलाक” लेने की सोचना …!!”

अब तक रिश्तों पर जमी दुनियादारी की “कार्मिक लेयर रूपी बर्फ… काफी पिघल गई थी…! प्राची चुपचाप मेरी बातें सुन रही थी…। फिर उसने कहा कि… “भैया, मैं अब कॉफी बनाकर लाती हूं…।” वो कॉफी बनाने गई…,

मैंने नितिन से बातें शुरू कर दीं…। बहुत जल्दी पता चल गया कि… बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं…, बहुत ही छोटी-छोटी इच्छाएं हैं…, बेकार की ईगो है ..और कुछ नहीं।जिनकी वज़ह से झगड़े हो रहे हैं…।

खैर…, कॉफी आई मैंने एक चम्मच चीनी अपने कप में डाली… मैं नितिन के कप में चीनी डाल ही रहा था कि… प्राची ने रोक दिया…, “भैया…, रूटीन चेक अप में इनका शुगर बढ़ा हुआ आया है.. ये चीनी नहीं लेंगे…”

अरे वाह!!…, अभी घंटे भर पहले तुम… नितिन से “अलग होने” की सोच रही थीं…। और अब… इनके स्वास्थ्य की बड़ी चिंता हो रही है..! क्या बात है!!

मैं ये कहकर जानबूझकर हंस पड़ा..उस समय मेरा हंसना उन्हें रास्ते पर लाने का ही एक आवश्यक पार्ट था।..मुझे हंसते देख प्राची थोड़ा सकपकाई..मगर कॉफी पीने के बाद मैंने कहा कि… “ऐसा है अब तुम लोग… अगले हफ़्ते निकाह कर लो…, फिर तलाक कराने के लिए.. मैं, तुम दोनों की मदद अवश्य करूंगा…! भाई दोस्त हूं मैं आपके काम नहीं आऊंगा तो कौन आयेगा।

मगर शायद अब दोनों को जीवन की “राम कहानी ” अच्छी तरह समझ आ चुकी थी….

“हिन्दी” मात्र एक भाषा नहीं है- “संस्कृति ” है…! इसी तरह “सनातन” को महज एक धर्म ही मत मान लेना – वह एक “सभ्यता” है…!! जिसे हर कीमत पर हमें अपने जीवन में अपनाना ही होगा।

👆उपरोक्त लेख हमारे सनातन धर्म और संस्कृति से जुड़ा है…। आप सभी से निवेदन है कि… समय निकाल कर एक बार अवश्य पढ़ लीजिएगा। धन्यवाद।

विचारक ; पचहरा सर,

जैन कॉलेज,सासनी 🙏

212- प्रसाद

प्रसाद क्या है..??

” प्रसाद या भोग” को लेकर अधिकतर लोगों में काफ़ी भ्रांतियां हैं.. जैसे ; कि, हमारे द्वारा ईश्वर व पुण्य आत्माओं को उनके निमित्त जो भोग लगाया जाता है…क्या वे उसे..??

विशेषकर आज का युवा वर्ग इसे एक रूढ़िवादी परंपरा या एक धार्मिक पाखंड के नजरिए से देख रहा है,कई बार व्यंग्य भरे अंदाज में सवालिया निशान भी लगाता है.. ??

अभी इसी सत्र 2023-24 की बात है मेरे एक लैक्चर के दौरान क्लास में एक जिज्ञासु शिक्षार्थी ने कई एक सवाल दागते हुए..कहा,

“पचहरा सर! क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग ग्रहण करते हैं ?”

और यदि ग्रहण नहीं करते हैं, तो भोग, प्रसाद आदि सब का फिर क्या प्रयोजन…आज के ‘ टेक्निकल वर्ल्ड ‘ में लोग अभी भी ऐसे ढोंग क्यों करते हैं ..??? “

और यदि ग्रहण करते हैं, तो फिर वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं होती..? अर्थात थाली में भोग उतनी ही मात्रा में क्यों दिखता है? वह खत्म या कुछ कम क्यों नहीं होता..??

शायद इसीलिए समाज की शिक्षित लॉबी एक शिक्षक को सदैव से आदर्श व्यक्तित्व के रूप में देखती आई है।

हालांकि, शिक्षा के व्यवसाईकरण ने आज शिक्षक को सवालों के कठघरे में खड़ा कर रखा है।

एक शिक्षक के नाते.. ये सवाल मेरे विषय से संबंधित तो नहीं थे, मगर शिक्षक महज एक शिक्षक ही नही, वह लोगों के लिए एक “मर्यादित सोशल फिगर” भी होता है।

वैसे भी जहां तक संभव हो अपनी सामर्थ्य के मुताबिक किसी जिज्ञासु की जिज्ञासा शांत करना न केवल शिक्षक अपितु हर इंसान की एक नैतिक जिम्मेदारी में आता है।

मैने मां शारदे को नमन करते हुए एकदम कूल माइंड होकर उस युवक से कहा,” बेटे! सवाल बहुत अच्छा है। लेकिन ऐसा है आप हमें “णमाेकार मंत्र ..” जो सुबह ईश वंदना में बोला जाता है उसे कंठस्थ करके अपने पी.एस.सी.के पीरियड में अर्थात ‘प्रोब्लम सॉल्यूशन क्लास’ जो अतिरिक्त क्लास के रूप में रोजाना होती है उसमें सुनाइएगा..उसी में आपकी जिज्ञासाओं का समाधान भी हो जायेगा।

विद्यालय से बाहर के लोगों की जानकारी के लिए बता दूं, प्रतिदिन मेरे निर्धारित पीरियड्स से ये एक अतिरिक्त पीरियड होता है.. जिसमें अंग्रेजी व हिंदी विषय में पिछड़े विद्यार्थियों को अपनी दिनभर की समस्याओं के निस्तारण हेतु वक्त दिया जाता हैं।

तब हमने तस्सली से ‘प्रसाद’ से रिलेटेड प्रश्न पूछने वाले अमुक शिष्य को कहा, हां,तो जनाब! सुनाइए “णमोकार मंत्र..” वह लड़का पढ़ाई के प्रति काफी सिंसीयर है इसलिए उसने एकदम शुद्धता पूर्वक सुना दिया। वैसे भी ये हमारे यहां के बच्चों के लिए एक सामान्य सी बात है। मगर मुझे तो इस मंत्र के सहारे प्रसाद या भोग वाले सवालों के लिए एक आधार खड़ा करना था।

अपनी रणनीति के अंतर्गत मैंने जानबूझकर सिर ‘नहीं’ के रूप में हिलाया…,

तब शिष्य ने कहा कि” सर आप चाहें, तो मेरे पास कॉलेज मैगजीन है इस मंत्र को मिलान कर लीजिए; इसमें तो मंत्र ऐसे ही लिखा हुआ है। जो मैं बोल रहा हूं।”

मैने कहा दिखाइए..उसने विद्यालय की आशा पत्रिका मेरे हाथ में थमा दी.. मैंने कहा, “क्यों भई! देखना ! मंत्र, तो इसमें अभी भी वैसे ही लिखा हुआ है।, फिर तुम्हारे दिमाग ने इसमें से क्या..ग्रहण किया, जो तुम बिना देखे बोले जा रहे हो..??? .. छात्र चुप था।

मेरे लिए यही वो मौका था, ‘ प्रसाद या भोग ‘ को लेकर उनकी गलत फहमी को दूर करने का। मैं ने वहां पर मौजूद सभी छात्रों को कहा, कुछ समझे..!! इसी मे प्रसाद या भोग से संबंधित प्रश्न का भी उत्तर छिपा है।

ध्यान दीजिएगा, पुस्तक में जो मंत्र हैं, वह स्थूल रूप में है। जो अभी भी हैं। और सदैव रहेगा।

तुमने जब इसे पढ़ा होगा और बार बार पढ़ा होगा, ताकि याद हो जाय,तो इसके मूल ‘भाव’ को तुम्हारे दिमाग ने ग्रहण कर लिया, अर्थात वह तुम्हें कंठस्थ हो गया अब कभी भी आप इसे अपनी स्मृति में स्टोर हो जाने से सुना सकोगे

मगर एक बात बताइए ! कि पुस्तक या इस पत्रिका में स्थूल रूप में लिखे हुए मंत्र में कोई कमी आई है क्या..??

नहीं..ना। आप देख रहे हो वह पत्रिका में अभी भी वैसे ही लिखा हुआ हैं जैसे पहले लिखा हुआ था, अमुक छात्र ने सहमे हुए अंदाज में कहा..: “जी, सर।”

तो ठीक इसी प्रकार विश्व में व्याप्त ‘परमात्म’ नाम की शक्ति व पुण्य आत्माएं जिस भी रूप में आप उन्हें जानते या मानते हैं, जिनके सामने लगाए व चढ़ाए गए भोग का सूक्ष्म रूप जैसे ; उसकी खुशबू या महक.. मात्र को ग्रहण कर अपनी तृप्ति कर लेते हैं। जिससे थाली में स्थूल रूप में रखी हुई वस्तु लौकिक रूप से हमें वैसी ही नजर पड़ती है, जैसी थी। मगर चूंकि स्थूल भाग से सूक्ष्मरूप सुगंध इष्ट द्वारा ग्रहण कर ली गई है जिससे वह स्थूल वस्तु “प्रसाद” बन जाती है। जिसे सभी लोगों के बीच ‘प्रसाद’ के रूप में बांटने का चलन भी हैं।

इसलिए मेरे विचार से हम रोजाना खाने पीने में जो भी ग्रहण करें ..पहले अपने इष्ट व पुण्य आत्माओं को समर्पित करके अर्थात भोग लगाकर ही ग्रहण करना उचित माना गया है।।

इस प्रकरण को लेख का रूप देने से..

मेरे ख्याल से उस शिष्य के साथ साथ हम जैसे अनभिज्ञ लोगों को भी “प्रसाद” या “भोग” से संबंधित भ्रम लगभग दूर हो गये होंगे। धन्यवाद

जय जिनेंद्र

विचारक: पचहरा सर, के.एल.जैन इंटर कॉलेज, आगरा-अलीगढ़ रोड, सासनी, हाथरस।

211- मानव चरित्र

जी, हां! मानव जीवन का आधार होता है उसका अपना चरित्र अर्थात “ह्यूमन कैरेक्टर”

मनुष्य के चरित्र को यदि सही से परिभाषित किया जाय..तो कम से कम इन तीन मानकों पर तो उसे खरा होना ही चाहिए।

पहला – मानक सर्व विदित है कि लोगों का ‘नारी शक्ति’ के प्रति नजरिया एकदम शुद्ध होना चाहिए।

दूसरा – दुनियां में कुछ जीव, वैज्ञानिक कारणों से या अपनी कर्म गति के आधार पर जन्म से या बाद में दिव्यांग या असहाय हो जाते हैं उनके प्रति हमारा आचरण सदैव सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए..?

तीसरे – न केवल अपने पारिवारिक या चिरपरिचित बुजुर्गों के प्रति बल्कि प्रत्येक जीव मात्र के साथ लोगों का रवैया “सहयोगी स्वभाव” का होना भी नितांत आवश्यक है..??

इन तीनों मानकों पर आधारित चरित्र है, तो आपका चरित्र सुपर.. है। और यदि इन तीन में से किसी एक मानक को लेकर भी आपका मन असहज हो,तो आपका चरित्र प्रश्न चिन्ह के दायरे में है।

यहां मेरा अपना आंकलन ये है कि, इन तीन मानकों की कसौटी पर यदि मानव अपने “आचरण की सत्यता” को खरा रख पाता है..अर्थात वह अपने व्यवहार पर किसी भी तरह का प्रश्न चिन्ह नहीं लगने देता तो वह अवश्य “मानव-चरित्र” की श्रेणी में है।

चलो ! इसे एक वृतांत के ज़रिए थोड़ा आसान करके समझते हैं।

एक बार एक जिज्ञासु व्यक्ति ने किसी संत से पूछा,

कहना न होगा कि,”मानव देह” दुर्लभ है। इस मृत्युलोक में “पुनरपि जन्मम पुनरपि मरणम..” वाले जाल से मुक्ति दिलाने के लिए “मानव-जीवन” को मुक्ति का द्वार बताया गया है। लेकिन यदि उसमें चारित्रिक गुण न हों, तो “ऐसा मानव-जीवन” पशुवत अर्थात धरती का बोझ माना गया है।

“महाराज ! रंग, रूप, प्रकृति एवं शारीरिक संरचना से हम एक जैसे होते हुए भी, केवल कुछ ही लोग क्यों ईश्वर प्रदत्त जीवन को एक जिंदगी का आकार देने में सफल हो पाते हैं। जबकि पदम पुराण के अनुसार अस्सी लाख योनियों की एक लंबी यात्रा के बाद मनुष्य आत्मा के लिए मात्र चार लाख योनि बताई गईं हैं।

जबकि अध्यात्म के नजरिए से दुनियां में एक बहुत बड़ी भीड़ हमारे देखते ही देखते पतन के गर्त में दिन प्रतिदिन डूबती चली जा रही है। इसके बारे में आपकी साधना क्या कहती है..??

संत ने मुस्कराते हुए कहा,

“जाहिर है कि, सामान्य लोगों का अध्यात्म ज्ञान कम होता है। क्योंकि वे भौतिकता में ही रचे बसे रहते हैं।”

इसे जानने के लिए “तुम कल प्रातः मुझे तालाब के किनारे मिलो।

जीवन दर्शन को केवल सैद्धांतिक तौर पर ही नहीं, हमें इसे एक प्रयोग विधि द्वारा यथार्थ में समझना होगा।

अगले दिन जिज्ञासु व्यक्ति सुबह तालाब के किनारे पहुंचा। उसने देखा कि संत अपने दोनों हाथों में एक एक कमंडल लिए खड़े हैं।

जिज्ञासु ने उत्सुकता पूर्वक पास जाकर देखा तो पाया कि, एक कमंडल तो सही है। दूसरे कमंडल की पेंदी में एक छेद है।

उसके सामने ही संत ने दोनों कमंडल तालाब के जल में फेंक दिए। सही वाला कमंडल तो तालाब में तैरता रहा। लेकिन जिसकी पेंदी में छेद था वह कमंडल थोड़ी देर तैरने के पश्चात..जैसे जैसे उसके छेद से पानी उसके अंदर भरता गया.. कमंडल डूबने लगा और अंत में पूरी तरह डूब गया।

जिस प्रकार दूसरे कमंडल में एक छेद था। जिसके कारण वह डूब गया। ठीक उसी प्रकार मनुष्य का “चरित्र” ही है जो उसे इस ‘संसार सागर’ में न केवल जीवित रखता है, बल्कि वही उसे सांसारिक परिस्थितियों से तार (तैरा) सकता है। और जब वह एक दिन दुनियां में स्थूल रूप में नहीं भी होगा, तब भी देश दुनिया, समाज, परिवार या उसके संपर्क में आए लोगों के जहन में मौजूद उसकी सार्थकता उसे सदैव जीवंत रखेगी। जैसे कि कई एक वैज्ञानिक, महापुरुष या संत आज स्थूल शरीर से हमारे मध्य नहीं हैं लेकिन एडिसन,स्टीव जॉब,स्वामी विवेकानंद व कबीर, तुलसी आदि को क्या कोई कभी विसरा पाएगा।

संत ने जिज्ञासु व्यक्ति की ओर मुखातिब होते हुए कहा- “जिस प्रकार दोनों कमंडल रूप रंग और आकार में एक समान दिख रहे थे। वैसे ही सभी मानव वाह्य रूप से लगभग एक जैसे दिखते ही हैं, मगर आंतरिक तौर पर उनका वैचारिक स्वभाव, आचरण वगैरह यहां तक है कि सहोदर भाई बहनों के भी एक जैसे नहीं होते।

अनेकों सद्चरित्र वाले संत, महापुरुष,वैज्ञानिक अपने चारित्रिक बल से आज भी लोगों के मन मस्तिष्क में अर्थात ‘संसार सागर’ में इस सही कमंडल की तरह तैर रहे हैं..

वे पूरी दुनियां में चर्चित हैं..संसार के भटकते लोगों की भीड़ में से भी कुछ ही होंगे जो उनके “मनो भाव” समझकर अपने आपको सद्चरित्र की परिधि में ला सकेंगे। वर्ना एक बहुत बड़ी भीड़ के मन में इतने विकार रूपी छेद हैं कि वे सिर्फ डूबने वाले कमंडल हैं।

कमंडल के छेद की तरह जिनके ‘चरित्र’ में दोष रूपी छेद होते हैं। चाहे कोई लाख जतन करले परंतु वे पतन के गर्त में चलते ही जाते हैं। कई बार हम देखते हैं कि,व्यक्ति सांस के आधार पर तो जिंदा है मगर सभ्रांत लोगों में, प्रतिष्ठित स्थानों पर उसकी उपस्थिति सदैव नदारद ही रहती है। ऐसे चरित्रों की कहीं कोई उपस्थिति नहीं होती।

इसलिए ये कहा गया कि “दुष्चरित्र बेहयाई से भले ही पशुवत जी.. रहा हो..मगर वास्तविकता में तो जीते जी ही उसकी सामाजिक मौत हो चुकी होती है।

अब जिज्ञासु को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।

निष्कर्षत: एक सच्चरित्र मानव ही इस संसार में आत्मोंन्नति को प्राप्त करता है।

शिक्षा:- ध्यान रहे चरित्र एक ‘हीरा’ है इसलिए जीवन में ‘चरित्र’ का महत्व ही सर्वाधिक है।

अतः चाहे जो परिस्थिति हों हर कीमत पर हमें यत्नपूर्वक अपने “चरित्र” की रक्षा करनी ही चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त हो, उसी को पर्याप्त समझिए।

“संतोषम परम सुखम”

पढ़ने के लिए धन्यवाद

योगेंद्र सिंह पचहरा,

जैन इंटर कॉलेज,सासनी से..

🙏🙏