“मैं, समय हूं.. मेरा प्रादुरभाव सृष्टि के निर्माण के साथ ही हुआ है। अतः मैं,पिछले युगों में था, इस युग में हूं और.. आने वाले हर युग में रहूंगा।”
ये डायलॉग बी.आर. चौपड़ा के लोकप्रिय टी वी सीरियल “महाभारत” की याद ताज़ा कर देता है। है।
अपनी बुलंद आवाज से “समय” का किरदार..निभाने वाले अदृश्य..लेकिन महत्वपूर्ण कलाकार..श्रीमान हरीश भिमानी जी एक ऐसे सूत्रधार बनकर उभरे..जो अपनी भारी भरकम आवाज़ से महाभारत में घटित हुई घटनाओं की सारी बिखरी हुई कड़ियों को न सिर्फ जोड़ते चले गए,अपितु हर घटना के पीछे के सारे राज लोगों के सामने इतने उम्दा तरीके से रखे.. कि एक राह चलता आम इंसान भी महाभारत की बातों को अच्छे से समझ पाया।
“समय” की बलिहारी है..तभी तो.. बिधना ने अपनी पूर्व निर्धारण व्यवस्था में पहले से तय नियम के अंतर्गत “परिवर्तन” को दुनियां के लिए अवश्यंभावी रूप में स्थापित किया हुआ है। व्यक्ति की कर्मगति के अनुरूप संसार के घटनाक्रम अपने समय से स्वत: परिवर्तित होते चले जाते हैं।
इसलिए किसी पूर्वाग्रह के प्रभाव से अपने “मन” को व्यथित होने से बचाये रखने को.. मनुष्य के शिक्षित होने का एक प्रमाण बताया गया है।
जीव के ‘ स्थूल शरीर ‘ छूट जाने के बाद आत्मा अर्थात ‘सूक्ष्म शरीर’ या सूक्ष्म प्राण के साथ “चेतना और प्रारब्ध” अंतरंग होते हैं लगभग कुछ वैसा ही रिश्ता सृष्टि के साथ मेरा (समय) भी है।
अपने स्वभावतः.. दुनिया के भूखंड पर किसी परिवार,समाज,संस्था में या फिर देश दुनियां के किसी भी कौने में यदि कुछ “असहज” घटित होता है.., उस पर प्रतिक्रिया करना मेरा नैतिक दायित्व बन जाता है।
क्योंकि मैं,वो सब भी देखने की सामर्थ्य रखता हूं..जिसे आम लोग कई बार प्रकट रूप में देखकर भी नहीं देख पाते।
हर युग में “समय” ने अपने पूर्वानुभव से नई पीढ़ी के लिए सदैव.. संकेत दिए हैं.. अब वो उन लोगों की अपनी कर्मगति है, कि वे संभल पाते हैं या फिर यूं ही काल के गाल में समाते चले जाते हैं।
जैसे; दुनियां में इंसान किसी न किसी पूर्वाग्रह का शिकार अवश्य होता है। जिससे वह अपने मानवीय गुणों से गिरता चला जाता है।
ये मनुष्य जाति के लिए चिंता का विषय है। मगर कौन नहीं जानता है..?? कि पूर्वाग्रह से पीड़ित व्यक्ति आउट ऑफ ट्रैक होता ही चला जाता है।
मुद्दा ऐतिहासिक हो या समसामयिक…दुनियां के पवित्र भूखंड पर जब-जब प्रोफाउंड स्कॉलर्स की डिबेट होती है..तो पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता वालों के उठाए गए कदमों पर अनुचितता के सवाल, खड़े होते ही हैं।
जब जब “निष्पक्ष और विवेकशील” पुरुष आपस में कहीं मिलते हैं,तो अपरिपक्व निर्णयों पर लगे सवालिया निशानों की ओर भी मुखातिब होते हैं। परंतु विडंबना देखिए! ऐसे मंज़र देखकर उनका भी अंतरमन बेहद दुःखी होता है। जबकि आप ये समझ पा रहे होंगे कि, इन निर्णयों से उनका व्यक्तिगत, तो कोई नुकसान हुआ नहीं है,फिर भी..??
केवल पूर्वाग्रहों से ही क्यों..मुझसे पूछो,तो मानव देह में आने के बाद हमें इन “वादों” से भी कोई सरोकार नहीं रखना चाहिए.. जैसे; जातिवाद, धर्मवाद,व्यक्तिवाद,परिवारवाद,मुहल्लावाद वगैरा वगैरा। ये सब संकीर्णता के ही संकेत हैं। और यदि “वादी” ही बनना है,तो फिर “मानवता वादी” बनिए ना..?? जो स्वागत योग्य भी है।
किसी घर के सामने एक खुला स्थान..अर्थात प्राचीन शब्दावली में “चौपाल” या अहाता मॉडर्निटी में कोर्टयार्ड या पार्क एरिया किसी किले का हो या किसी मकान का वह उस अमुक इमारत की एक शान होता है। ऐसे आलीशान मंजर हमारे पड़ोसी राज्य.. राजस्थान में बहुत देखने को मिलते हैं। ऐसे पवित्र स्थान में पूर्वजों द्वारा पंच परमेश्वर का वास बताया गया है।
किसी कार्य को लेकर कभी “किंकर्तव्य विमूढ ..” की स्थिति बने, तो हमें भगवद्गीता पढ़नी चाहिए या हम लोगों को अपने गांव या परिवार के इतिहास में झांक लेना चाहिए। कभी कभी पुराने मंजरों में बहुत बड़ी “सीख” छुपी होती हैं। जो नई पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन की सामर्थ्य रखती है।
जिससे व्यक्ति अपने पूर्वजों के आत्मीय भाव और संस्कारों की एक बानगी या उनकी एक झलक जैसी, तो महसूस कर ही लेता है।
हमारे भारतीय समाज में कई बार कुछ ऐसे अच्छे व्यक्तित्व होते हैं जो न सिर्फ़ एक परिवार के लिए अपितु अपनी पूरी बस्ती के लिए अच्छे संरक्षक की छबि लेकर उभरते हैं।। जैसे; हमारी नौ बाखर कही जाने वाली संतति के लिए..
हम सबके परम पूज्यनीय सुपर दादा श्री चिरंजीसिंह मुखिया जी, जो नीमगांव ग्राम पंचायत की जनता के चहेते श्री भूपेंद्र सिंह प्रधान जी के सुपर दादा जी थे। वाकई! वे एक अच्छी छबि के संरक्षक थे। हम सबके प्रातः स्मरणीय श्री चिरंजी बाबा इस क्षेत्र के रौबीले लेकिन गांव के लिए एक कर्मठ मुखिया थे ..
इसीलिये गांव देहात के पीड़ित लोग हमारे पूर्वजों के पास अपनी समस्याओं की गुहार..लेकर आया करते थे।
समाज के सभ्रांत / लोगों के बीच में पंचों की चौपाल पर बैठकर अपनी “न्याय प्रियता” के लिए उज्जैन नगरी के लोकप्रिय राजा विक्रमादित्य के जैसे; अंदाज़ में..सब लोगों से उचित सलाह मशविरा करके हर हालत में “न्याय” को स्थापित करना ही उनका ध्येय होता था।
कुछ वर्ष बाद न जाने क्यों..??
शायद अंग्रेज और दुभाषिया, (लैंग्वेज ट्रांसलेटर) जो अंग्रेज की सहूलियत के लिए साथ रहता था।,पूज्य बाबा चिरंजी सिंह जी की चौधराहट और उनके रौबीले अंदाज से कुछ खार क्या खा गए.. होंगे।
उन दोनों ने पूर्व नियोजित तरीके से “डिवाइड & रूल” अंग्रेजों वाली राजनैतिक चाल.. चल डाली.. अचानक गांव में ड्योंडी पिटवाकर..एक सभा बुलाई गई और लोगों से उनका एक हाथ उठवा कर आनन फानन में बिना किसी पूर्व घोषणा के मुखिया पद का चुनाव कर डाला..और तब गांव की जनता ने मेरे रीयल बाबा पूज्य श्री साहब सिंह जी को गांव का “मुखिया” चुन दिया।
मगर वो अंग्रेज क्या जाने.. कि हम हिंदू लोग प्रभु श्री राम जी के वंशज हैं..सनातनी हैं। उसी परम्परा के अंतर्गत.. आपसी पारिवारिक आत्मीयता और संस्कारों की पवित्रता का निर्वहन करते हुए..पूज्य दादाजी ने श्री भरत जी की तरह मुखिया पद पर आसीन होना, तो दूर की बात थी.. सुसंस्कारवश बड़ों के सामने कोई छोटा भाई, भतीजा या कोई परिवारीजन बहुत अदब के साथ मुंह खोल पता था। सदाचार प्रतिष्ठित घरों का एक महत्वपूर्ण लक्षण होता है।
इस घटना के बाद भी वर्षों तक मुखिया गिरी के सारे काम काज की अगुआई पहले की तरह पूज्य बाबा श्री चिरंजीसिंह जी ही करते रहे..।
फिर एक दिन उचित मौका पाकर पूज्य बाबा श्री चिरंजी सिंह जी ने उसी अंग्रेज को सुनाते हुए कहा, कि “तुमने अचानक चुनाव कराकर सोचा होगा.. कि हमारे घर में फूट डाल..लोगे.. गांव में अपनी मनमानी कर लोगे.. इरादतन ऐसी कुटिल चाल से ही आपने “साहब सिंह” को गांव का “मुखिया” बनाया है.. ना?? लेकिन सुन लो! वो “मेरा ही भतीजा” है। .. गांव की समस्याओं के निपटारे के लिए हमारी एक परंपरा है..हमेशा पहले विचार विमर्श होता है। यथा योग्य सभी अपने सुझाव रखते हैं,तब निर्णय लेने के अपने अधिकार की मुहर लगता है पदासीन व्यक्ति। आप क्या कोई भी हमारे परिवार से गलत की उम्मीद कभी करना मत।
ऐसे थे “हमारे पूर्वज.. हमारे संस्कार..!!”
मगर क्या कहें..? “समय” की बलिहारी है। जो अब हो रहा है.. अपने अपने कर्मवश हम सब उसे भी देखने के लिए विवश हैं।
ये कटु सत्य है कि समाज में एक लम्बे अर्से तक खानदान के हमारे सुपर दादा लोगों की भलमन साहत बरकरार है, सौभाग्य से लगभग पांचवीं, छठवीं जेनरेशन तक हम उनकी ही भलमनसाहत को भुनाते चले जा रहे हैं। शायद इसी से हमारा अपना विजन या दृष्टिकोण पनप ही नहीं पाया।
क्योंकि होश संभालते ही दादा जी के समय में रजवाड़े जैसा वातावरण देखने को जो मिला।
ये कहना न होगा.. वर्तमान हालात कई एक दशकों से बहुत चिंतनीय और विचारणीय विषय का आकार लेते जा रहे हैं।
अभी आर्थिक पतन,तो नहीं कहा जाएगा, लेकिन सुपर दादा लोगों की चौथी पीढ़ी की नीरसता से ऐसा बिखराव होता चला जा रहा है कि, एक लंबे वक्त से ऐसा कोई व्यक्तित्व उभरकर सामने नहीं आ सका, जिसमें “हेड ऑफ़ द फैमिली” की झलक नज़र आए..?? जो निःस्वार्थ अर्थात त्यागपूर्ण भाव से पारिवारिक सदस्यों को अपने कॉन्फिडेंस में लेकर सभी नौ घरों को एक सूत्र में बांधकर रख सके..??
परिणामस्वरूप समूचे खानदान की छबि स्वत: ही धीरे धीरे..पहले रिलेटिव्स फिर आमजन के हिरदय में दिन प्रतिदिन कुछ गिर सी रही है। इस संदर्भ में..मैं, बहुत कन्फर्म होकर नहीं कह सकूंगा क्योंकि नौकरी पेशा होने से..गांव किन्हीं खास मौकों पर ही आना हो पता है। जो अधिकतर गांव में मौजूद रहते हैं..इस संदर्भ में उनकी समझ बेहतर होगी।
घर के विवेकशील सदस्यों के लिए ये असहनीय स्थिति है। परंतु कई दशकों से ऐसी आपाकूती मची हुई है कि आज किसी भी सदस्य में “इस घर” को सामान्य जनता की दृष्टि से देख पाने की सामर्थ्य तक नहीं बची है??
इसीलिए इस बिंदु पर लेख लिखे जाने की दरकार महसूस की गई। ताकि चौथी या पांचवी जेनरेशन के किसी सदस्य में ही कोई सामर्थ्य जगे..और वे आत्ममंथन करें, तो शायद वक्त रहते स्थिति संभल जाए। अन्यथा तीसरी,चौथी जेनरेशन से तो कोई उम्मीद अब है नहीं। वो तो लगभग सरेंडर कर चुके हैं।
अगर कभी सुधार की सोच बने,तो पहले सभी लोग. शपथ लें.. ऐसी एक शपथ लेंगे..
“गंगा जली उठाकर अपने इष्ट व पूर्वजों को हाज़िर, नाजिर मानकर..ये संकल्प लेना ही होगा कि,
“आज के बाद हम अपने सभी पूर्वाग्रहों से बाहर निकलकर एकदम निश्छल स्वभाव, साफ ह्रदय से बात करेंगे। और यदि कहीं आगे पीछे मेरी किसी बात में कोई लाग लपेट पाई जाएं, तो घर का जिम्मेदार ग्रुप या रेस्पॉन्सिबिल पर्सनेलिटी मेरे बारे में, जो निर्णय लेंगे, वो मुझे सहर्ष स्वीकार होगा।”
तो फिर सदैव हर परिस्थिति में बेहतर परिणामों की संभावना होगी।
वरना! हर स्तर पर दिन प्रतिदिन कलयुग हावी होता चला जा रहा है। किसी भी स्तर पर वर्तमान में होती हरकतों को देखकर लगता है अब लोगों ने भारतीय ग्रंथ भगवद्गीता से सीख लेना बंद कर दिया है।
मजबूरी की सहनशीलता :
भारतीय समाज में पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर आपसी विघटन बढ़ने लगे हैं। जिससे.. आज हर ऊंच नीच को सहन करना लोगों की नियति बनती जा रही है।
मांफ कीजिएगा..आज के दौर में तेजी से गिरते मानव मूल्यों को देखकर जब कभी मेरा “मन” बहुत व्यथित हो जाता है,तो मैं, भगवद्गीता, अपने पिताजी या ताऊजी से सुने हुए पूर्वजों के किस्से..अपने इस टेक्निकल प्लेटफॉर्म पर शेयर कर लेता हूं।
स्टूडेंट लाइफ से ही “कागज” की सहनशीलता मुझे भा गई थी। और तभी से मैंने इन “कागज – कलम” को अपना सच्चा साथी बना लिया है। मेरा अनुभव कहता है कि व्यक्ति में यदि “कागज” के बराबर सहनशीलता हो जाए, तो ये भी एक “भगवत प्राप्ति” का ही लक्षण है।
कागज पर या आज लैप टॉप पर अपने मन के उदगार आप फ्रैंकली लिखते चले जाते हो..
वैसे ही टेक्नोलॉजी के दौर में आज ऐसे प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं जहां कोई भी विचारक अपने विचार शेयर कर सकता है। इस टेक्नोलॉजी की ही मदद से सौभाग्यवश देश विदेश में मेरे लेखों को पढ़ने वाले काफी लोग उपलब्ध हैं।
जहां पांच लोग बैठकर न्याय हिसाब की बातें करते थे। उसे पुराने समय में लोग पंचों की जगह बोला करते थे। कौन नहीं जानता..?? ऐसी जगह कभी किसी व्यक्ति विशेष की होती हैं क्या..??
इसीलिए सूझ बूझ वाले परिवारों में इन जगहों को पारिवारिक बंटवारे से हमेशा अलग रखा जाता है। ये पवित्र स्थान लोगों की “आओ बैठना” के ज़रिए अपने प्रिय जनों को सम्मान देने के लिए होते हैं।
न कि “चौका, चूल्हे और संडास के लिए..??”
पूर्वजों की सूझ बूझ से..व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिए प्रतिष्ठित परिवारों पर समुचित जगह की कभी कोई कमी न थी न आज है।
जगह उपलब्ध हो..?? तब ऐसे सवालों की डेंसिटी और भी अधिक गहरा जाती है..??
मैं, समय हूं ..इसलिए बेवाक हूं। मैंने तो उन्हें भी आइने दिखाये थे। जो अधर्म करके धर्म के हाथों नप गए..और इतिहास में सदैव के लिए अपने मुंह पर अधर्मी होने की कालिख भी लगवा गए। और उन्हें भी दिखाए थे, जो वक्त रहते संभल गए। और समूचे विश्व में हमेशा के लिए मिसाल बनकर छा गए।
धन्यवाद
विचारक: मैं,समय हूं..