270 – सोच बदलो..

जी, हां! ये कोई कहानी नहीं.. ये एक आध्यात्मिक चिंतन है.. यदि हम अपनी “सोच बदलें, तो “मानव देह” में आना सार्थक होने के साथ साथ हमारा “लोक” भी बदल जाएगा”

चलो! इस आध्यात्मिक रहस्य से आज पर्दा उठाने का एक प्रयास करते हैं। हमने अक्सर सुनते हैं कि हमारे ब्रह्मांड में चौदह भुवन या “चौदह लोक” हैं।

ये सत्य भी है। जिस ब्रह्मांड में हम रहते हैं उसमें कुल चौदह लोक हैं। सात लोक ऊपर वाले और सात लोक नीचे वाले।

संसार में व्याप्त माया..या दुनियां भर के प्रपंचों से बचकर..अध्यात्म के ज़रिए जो आत्मा अपने उत्थान की ओर अग्रसर होती हैं,तो वे सदैव ऊर्ध्व यानी ऊपर के सात लोकों की ओर अपना रुख करती हैं।

संख्या में जाओगे तो मध्य में है.. पृथ्वी लोक या भू लोक भू लोक को

गिनती के नज़रिए से No.1 रखते हैं.. जिसमें हम मनुष्य स्थूल शरीर में विचरण करते रहते हैं। संतों की वाणी में इसे मृत्युलोक या दु:खालय भी कह दिया जाता है। क्योंकि यहां जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है।

2- भूव: लोक – ये लोक ‘भू लोक’ और ‘स्वर्ग लोक’ के बीच स्थित है। ये ऊर्जा रूपों का क्षेत्र है जो भौतिक और दिव्य लोकों को जोड़ता है।

3- स्वर्ग लोक – ये देवताओं का लोक है जहां इंद्र आदि देव निवास करते हैं।अच्छे कर्म करने वालों को इसी लोक में स्थान मिलता है। सुख,संपत्ति और आनंद की अनुभूति इस स्वर्ग लोक में ही होती है।

4- महर्लोक – ये दिव्य ऋषि, तपस्वियों और महान आत्माओं का निवास स्थान है जहां वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे तपस्वी तपस्या करते रहते हैं।

5- जन लोक – इस लोक में वे आत्माएं तपस्या करती हैं जिन्होंने ज्ञान और ध्यान में परम सिद्धि प्राप्त की होती है। यहां के वासी ब्रह्मा जी की लीलाओं में लीन रहते हैं।

6- तप लोक – ये लोक शक्ति शाली तपस्वियों का स्थान है जो शरीर से परे.. सूक्ष्म रूप में हर पल केवल अपनी चेतना में स्थित रहते हैं।

7- ब्रह्म्म लोक – अंतिम लोक के साथ साथ ये ऊंचाई का अंतिम लक्ष्य वाला लोक है।

जहां केवल “सत्य” है “मोक्ष” है और प्रतिपल “ईश्वर का साक्षात्कार” है। ये ब्रह्म लोक है। इन ऊर्ध्व लोकों में आत्मा के जाने का मतलब है सदैव शुद्ध और पवित्रता में बने रहना।

चलो! अब चर्चा करते हैं..नीचे के उन सात लोकों की। जहां भोग, मोह और भ्रम का राज रहता है।

नीचे की ओर पहला लोक है ..

1- अतल लोक – ये राक्षसों और मायावी शक्तियों का घर जैसा है।

2- वितल लोक – यहां लोगों में कामना और भोग हावी रहता है।

3- सुतल लोक – राजा बली का लोक..हालांकि वे बहुत दानवीर थे मगर उनमें अहंकार की पराकाष्ठा होने से सुतल लोक के वासी थे।

4- रसातल लोक – भ्रम,लालच और अज्ञान के घने अंधेरे वाला लोक।

5- तलातल लोक – छल,धोखा और झूंठ से लवालव भरा हुआ लोक।

6- महातल लोक – ऐसा लोक जहां अंधकार और अहंकार का सदैव बोलवाला हो।

7- पाताल लोक – सबसे नीचे का लोक तामसिक ऊर्जा और इच्छाओं का लोक।

लेकिन इस सबका मतलब सिर्फ बाहरी दुनियां के वे चौदह भुवन या चौदह लोक ही नहीं है।

यदि हम अपने आध्यात्मिक नज़रिए को थोड़ा एक्सप्लोर करें..तो पाएंगे कि ये सभी लोक हमारे अंदर हमारी सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से स्वयं निर्मित और विखंडित होते रहते हैं।

जब व्यक्ति सच्चाई,भक्ति और सेवा के मार्ग पर चल पड़ता है,तो वह यहीं रहते हुए आत्मिक स्तर पर निरंतर ऊपर के लोकों से जुड़ता चला जाता है।

मगर दुर्भाग्यवश जब व्यक्ति अपने लालच, मोह और गुस्से पर काबू नहीं कर पाता है,तो वह धीरे धीरे नीचे के लोकों की तरफ गिरता चला जाता है। अर्थात ऐसी आत्माओं का उत्थान होने के बजाय निरंतर पतन होता रहता है।

संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी एक चौपाई के माध्यम से लोगों को जगाने का प्रयास किया है जैसे..

“बिनु सत्संग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।”

अर्थात अच्छे लोगों का संग करने से व्यक्ति अपने मन की चंचलता और बुद्धि भरमाने जैसी परिस्थितियों से बचकर अपने विवेकपूर्ण निर्णय से..सही लोकों की तरफ मुखातिब होता चला जाता है।।

इसीलिए. पहले हम “सोच बदलें..तो लोक भी बदले जा सकेंगे।” धन्यवाद

269- मैं,समय हूं

“मैं, समय हूं.. मेरा प्रादुरभाव सृष्टि के निर्माण के साथ ही हुआ है। अतः मैं,पिछले युगों में था, इस युग में हूं और.. आने वाले हर युग में रहूंगा।”

ये डायलॉग बी.आर. चौपड़ा के लोकप्रिय टी वी सीरियल “महाभारत” की याद ताज़ा कर देता है। है।

अपनी बुलंद आवाज से “समय” का किरदार..निभाने वाले अदृश्य..लेकिन महत्वपूर्ण कलाकार..श्रीमान हरीश भिमानी जी एक ऐसे सूत्रधार बनकर उभरे..जो अपनी भारी भरकम आवाज़ से महाभारत में घटित हुई घटनाओं की सारी बिखरी हुई कड़ियों को न सिर्फ जोड़ते चले गए,अपितु हर घटना के पीछे के सारे राज लोगों के सामने इतने उम्दा तरीके से रखे.. कि एक राह चलता आम इंसान भी महाभारत की बातों को अच्छे से समझ पाया।

“समय” की बलिहारी है..तभी तो.. बिधना ने अपनी पूर्व निर्धारण व्यवस्था में पहले से तय नियम के अंतर्गत “परिवर्तन” को दुनियां के लिए अवश्यंभावी रूप में स्थापित किया हुआ है। व्यक्ति की कर्मगति के अनुरूप संसार के घटनाक्रम अपने समय से स्वत: परिवर्तित होते चले जाते हैं।

इसलिए किसी पूर्वाग्रह के प्रभाव से अपने “मन” को व्यथित होने से बचाये रखने को.. मनुष्य के शिक्षित होने का एक प्रमाण बताया गया है।

जीव के ‘ स्थूल शरीर ‘ छूट जाने के बाद आत्मा अर्थात ‘सूक्ष्म शरीर’ या सूक्ष्म प्राण के साथ “चेतना और प्रारब्ध” अंतरंग होते हैं लगभग कुछ वैसा ही रिश्ता सृष्टि के साथ मेरा (समय) भी है।

अपने स्वभावतः.. दुनिया के भूखंड पर किसी परिवार,समाज,संस्था में या फिर देश दुनियां के किसी भी कौने में यदि कुछ “असहज” घटित होता है.., उस पर प्रतिक्रिया करना मेरा नैतिक दायित्व बन जाता है।

क्योंकि मैं,वो सब भी देखने की सामर्थ्य रखता हूं..जिसे आम लोग कई बार प्रकट रूप में देखकर भी नहीं देख पाते।

हर युग में “समय” ने अपने पूर्वानुभव से नई पीढ़ी के लिए सदैव.. संकेत दिए हैं.. अब वो उन लोगों की अपनी कर्मगति है, कि वे संभल पाते हैं या फिर यूं ही काल के गाल में समाते चले जाते हैं।

जैसे; दुनियां में इंसान किसी न किसी पूर्वाग्रह का शिकार अवश्य होता है। जिससे वह अपने मानवीय गुणों से गिरता चला जाता है।

ये मनुष्य जाति के लिए चिंता का विषय है। मगर कौन नहीं जानता है..?? कि पूर्वाग्रह से पीड़ित व्यक्ति आउट ऑफ ट्रैक होता ही चला जाता है।

मुद्दा ऐतिहासिक हो या समसामयिक…दुनियां के पवित्र भूखंड पर जब-जब प्रोफाउंड स्कॉलर्स की डिबेट होती है..तो पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता वालों के उठाए गए कदमों पर अनुचितता के सवाल, खड़े होते ही हैं।

जब जब “निष्पक्ष और विवेकशील” पुरुष आपस में कहीं मिलते हैं,तो अपरिपक्व निर्णयों पर लगे सवालिया निशानों की ओर भी मुखातिब होते हैं। परंतु विडंबना देखिए! ऐसे मंज़र देखकर उनका भी अंतरमन बेहद दुःखी होता है। जबकि आप ये समझ पा रहे होंगे कि, इन निर्णयों से उनका व्यक्तिगत, तो कोई नुकसान हुआ नहीं है,फिर भी..??

  केवल पूर्वाग्रहों से ही क्यों..मुझसे पूछो,तो मानव देह में आने के बाद हमें इन “वादों” से भी कोई सरोकार नहीं रखना चाहिए.. जैसे; जातिवाद, धर्मवाद,व्यक्तिवाद,परिवारवाद,मुहल्लावाद वगैरा वगैरा। ये सब संकीर्णता के ही संकेत हैं। और यदि “वादी” ही बनना है,तो फिर “मानवता वादी” बनिए ना..?? जो स्वागत योग्य भी है।

किसी घर के सामने एक खुला स्थान..अर्थात प्राचीन  शब्दावली में “चौपाल” या अहाता मॉडर्निटी में कोर्टयार्ड या पार्क एरिया किसी किले का हो या किसी मकान का वह उस अमुक इमारत की एक शान होता है। ऐसे आलीशान मंजर हमारे पड़ोसी राज्य.. राजस्थान में बहुत देखने को मिलते हैं। ऐसे पवित्र स्थान में पूर्वजों द्वारा पंच परमेश्वर का वास बताया गया है।

किसी कार्य को लेकर कभी “किंकर्तव्य विमूढ ..” की स्थिति बने, तो हमें भगवद्गीता पढ़नी चाहिए या हम लोगों को अपने गांव या परिवार के इतिहास में झांक लेना चाहिए। कभी कभी पुराने मंजरों में बहुत बड़ी “सीख” छुपी होती हैं। जो नई पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन की सामर्थ्य रखती है।

  जिससे व्यक्ति अपने पूर्वजों के आत्मीय भाव और संस्कारों की एक बानगी या उनकी एक झलक जैसी, तो महसूस कर ही लेता है।

हमारे भारतीय समाज में कई बार कुछ ऐसे अच्छे व्यक्तित्व होते हैं जो न सिर्फ़ एक परिवार के लिए अपितु अपनी पूरी बस्ती के लिए अच्छे संरक्षक की छबि लेकर उभरते हैं।। जैसे; हमारी नौ बाखर कही जाने वाली संतति के लिए..

हम सबके परम पूज्यनीय सुपर दादा श्री चिरंजीसिंह मुखिया जी, जो नीमगांव ग्राम पंचायत की जनता के चहेते श्री भूपेंद्र सिंह प्रधान जी के सुपर दादा जी थे। वाकई! वे एक अच्छी छबि के संरक्षक थे। हम सबके प्रातः स्मरणीय श्री चिरंजी बाबा इस क्षेत्र के रौबीले लेकिन गांव के लिए एक कर्मठ मुखिया थे ..

इसीलिये गांव देहात के पीड़ित लोग हमारे पूर्वजों के पास अपनी समस्याओं की गुहार..लेकर आया करते थे।

समाज के सभ्रांत / लोगों के बीच में पंचों की चौपाल पर बैठकर अपनी “न्याय प्रियता” के लिए उज्जैन नगरी के लोकप्रिय राजा विक्रमादित्य के जैसे; अंदाज़ में..सब लोगों से उचित सलाह मशविरा करके हर हालत में “न्याय” को स्थापित करना ही उनका ध्येय होता था।

कुछ वर्ष बाद न जाने क्यों..??

शायद अंग्रेज और दुभाषिया, (लैंग्वेज ट्रांसलेटर) जो अंग्रेज की सहूलियत के लिए साथ रहता था।,पूज्य बाबा चिरंजी सिंह जी की चौधराहट और उनके रौबीले अंदाज से कुछ खार क्या खा गए.. होंगे।

उन दोनों ने पूर्व नियोजित तरीके से “डिवाइड & रूल” अंग्रेजों वाली राजनैतिक चाल.. चल डाली.. अचानक गांव में ड्योंडी पिटवाकर..एक सभा बुलाई गई और लोगों से उनका एक हाथ उठवा कर आनन फानन में बिना किसी पूर्व घोषणा के मुखिया पद का चुनाव कर डाला..और तब गांव की जनता ने मेरे रीयल बाबा पूज्य श्री साहब सिंह जी को गांव का “मुखिया” चुन दिया।

मगर वो अंग्रेज क्या जाने.. कि हम हिंदू लोग प्रभु श्री राम जी के वंशज हैं..सनातनी हैं। उसी परम्परा के अंतर्गत..  आपसी पारिवारिक आत्मीयता और संस्कारों की पवित्रता का निर्वहन करते हुए..पूज्य दादाजी ने श्री भरत जी की तरह मुखिया पद पर आसीन होना, तो दूर की बात थी.. सुसंस्कारवश बड़ों के सामने कोई छोटा भाई, भतीजा या कोई परिवारीजन बहुत अदब के साथ मुंह खोल पता था। सदाचार प्रतिष्ठित घरों का एक महत्वपूर्ण लक्षण होता है।

इस घटना के बाद भी वर्षों तक मुखिया गिरी के सारे काम काज की अगुआई पहले की तरह पूज्य बाबा श्री चिरंजीसिंह जी ही करते रहे..।

फिर एक दिन उचित मौका पाकर पूज्य बाबा श्री चिरंजी सिंह जी ने उसी अंग्रेज को सुनाते हुए कहा, कि “तुमने अचानक चुनाव कराकर सोचा होगा.. कि हमारे घर में फूट डाल..लोगे.. गांव में अपनी मनमानी कर लोगे.. इरादतन ऐसी कुटिल चाल से ही आपने “साहब सिंह” को गांव का “मुखिया” बनाया है.. ना?? लेकिन सुन लो! वो “मेरा ही भतीजा” है। .. गांव की समस्याओं के निपटारे के लिए हमारी एक परंपरा है..हमेशा पहले विचार विमर्श होता है। यथा योग्य सभी अपने सुझाव रखते हैं,तब निर्णय लेने के अपने अधिकार की मुहर लगता है पदासीन व्यक्ति। आप क्या कोई भी हमारे परिवार से गलत की उम्मीद कभी करना मत।

ऐसे थे “हमारे पूर्वज.. हमारे संस्कार..!!”

मगर क्या कहें..? “समय” की बलिहारी है। जो अब हो रहा है.. अपने अपने कर्मवश हम सब उसे भी देखने के लिए विवश हैं।

ये कटु सत्य है कि समाज में एक लम्बे अर्से तक खानदान के हमारे सुपर दादा लोगों की भलमन साहत बरकरार है, सौभाग्य से लगभग पांचवीं, छठवीं जेनरेशन तक हम उनकी ही भलमनसाहत को भुनाते चले जा रहे हैं। शायद इसी से हमारा अपना विजन या दृष्टिकोण पनप ही नहीं पाया।

क्योंकि होश संभालते ही दादा जी के समय में रजवाड़े जैसा वातावरण देखने को जो मिला।

ये कहना न होगा.. वर्तमान हालात कई एक दशकों से बहुत चिंतनीय और विचारणीय विषय का आकार लेते जा रहे हैं।

अभी आर्थिक पतन,तो नहीं कहा जाएगा, लेकिन सुपर दादा लोगों की चौथी पीढ़ी की नीरसता से ऐसा बिखराव होता चला जा रहा है कि, एक लंबे वक्त से ऐसा कोई व्यक्तित्व उभरकर सामने नहीं आ सका, जिसमें “हेड ऑफ़ द फैमिली” की झलक नज़र आए..?? जो निःस्वार्थ अर्थात त्यागपूर्ण भाव से पारिवारिक सदस्यों को अपने कॉन्फिडेंस में लेकर सभी नौ घरों को एक सूत्र में बांधकर रख सके..??

परिणामस्वरूप समूचे खानदान की छबि स्वत: ही धीरे धीरे..पहले रिलेटिव्स फिर आमजन के हिरदय में दिन प्रतिदिन कुछ गिर सी रही है। इस संदर्भ में..मैं, बहुत कन्फर्म होकर नहीं कह सकूंगा क्योंकि नौकरी पेशा होने से..गांव किन्हीं खास मौकों पर ही आना हो पता है। जो अधिकतर गांव में मौजूद रहते हैं..इस संदर्भ में उनकी समझ बेहतर होगी।

घर के विवेकशील सदस्यों के लिए ये असहनीय स्थिति है। परंतु कई दशकों से ऐसी आपाकूती मची हुई है कि आज किसी भी सदस्य में “इस घर” को सामान्य जनता की दृष्टि से देख पाने की सामर्थ्य तक नहीं बची है??

इसीलिए इस बिंदु पर लेख लिखे जाने की दरकार महसूस की गई। ताकि चौथी या पांचवी जेनरेशन के किसी सदस्य में ही कोई सामर्थ्य जगे..और वे आत्ममंथन करें, तो शायद वक्त रहते स्थिति संभल जाए। अन्यथा तीसरी,चौथी जेनरेशन से तो कोई उम्मीद अब है नहीं। वो तो लगभग सरेंडर कर चुके हैं।

अगर कभी सुधार की सोच बने,तो पहले सभी लोग. शपथ लें.. ऐसी एक शपथ लेंगे..

“गंगा जली उठाकर अपने इष्ट व पूर्वजों को हाज़िर, नाजिर मानकर..ये संकल्प लेना ही होगा कि,

“आज के बाद हम अपने सभी पूर्वाग्रहों से बाहर निकलकर एकदम निश्छल स्वभाव, साफ ह्रदय से बात करेंगे। और यदि कहीं आगे पीछे मेरी किसी बात में कोई लाग लपेट पाई जाएं, तो घर का जिम्मेदार ग्रुप या रेस्पॉन्सिबिल पर्सनेलिटी मेरे बारे में, जो निर्णय लेंगे, वो मुझे सहर्ष स्वीकार होगा।”

तो फिर सदैव हर परिस्थिति में बेहतर परिणामों की संभावना होगी।

वरना! हर स्तर पर दिन प्रतिदिन कलयुग हावी होता चला जा रहा है। किसी भी स्तर पर वर्तमान में होती हरकतों को देखकर लगता है अब लोगों ने भारतीय ग्रंथ भगवद्गीता से सीख लेना बंद कर दिया है।

मजबूरी की सहनशीलता :

भारतीय समाज में पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर आपसी विघटन बढ़ने लगे हैं। जिससे.. आज हर ऊंच नीच को सहन करना लोगों की नियति बनती जा रही है।

मांफ कीजिएगा..आज के दौर में तेजी से गिरते मानव मूल्यों को देखकर जब कभी मेरा “मन” बहुत व्यथित हो जाता है,तो मैं, भगवद्गीता, अपने पिताजी या ताऊजी से सुने हुए पूर्वजों के किस्से..अपने इस टेक्निकल प्लेटफॉर्म पर शेयर कर लेता हूं।

स्टूडेंट लाइफ से ही “कागज” की सहनशीलता मुझे भा गई थी। और तभी से मैंने इन “कागज – कलम” को अपना सच्चा साथी बना लिया है। मेरा अनुभव कहता है कि व्यक्ति में यदि “कागज” के बराबर सहनशीलता हो जाए, तो ये भी एक “भगवत प्राप्ति” का ही लक्षण है।

कागज पर या आज लैप टॉप पर अपने मन के उदगार आप फ्रैंकली लिखते चले जाते हो..

वैसे ही टेक्नोलॉजी के दौर में आज ऐसे प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं जहां कोई भी विचारक अपने विचार शेयर कर सकता है। इस टेक्नोलॉजी की ही मदद से सौभाग्यवश देश विदेश में मेरे लेखों को पढ़ने वाले काफी लोग उपलब्ध हैं।

जहां पांच लोग बैठकर न्याय हिसाब की बातें करते थे। उसे पुराने समय में लोग पंचों की जगह बोला करते थे। कौन नहीं जानता..?? ऐसी जगह कभी किसी व्यक्ति विशेष की होती हैं क्या..??

इसीलिए सूझ बूझ वाले परिवारों में इन जगहों को पारिवारिक बंटवारे से हमेशा अलग रखा जाता है। ये पवित्र स्थान लोगों की “आओ बैठना” के ज़रिए अपने प्रिय जनों को सम्मान देने के लिए होते हैं।

न कि “चौका, चूल्हे और संडास के लिए..??”

पूर्वजों की सूझ बूझ से..व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिए प्रतिष्ठित परिवारों पर समुचित जगह की कभी कोई कमी न थी न आज है।

जगह उपलब्ध हो..?? तब ऐसे सवालों की डेंसिटी और भी अधिक गहरा जाती है..??

मैं, समय हूं ..इसलिए बेवाक हूं। मैंने तो उन्हें भी आइने दिखाये थे। जो अधर्म करके धर्म के हाथों नप गए..और इतिहास में सदैव के लिए अपने मुंह पर अधर्मी होने की कालिख भी लगवा गए। और उन्हें भी दिखाए थे, जो वक्त रहते संभल गए। और समूचे विश्व में हमेशा के लिए मिसाल बनकर छा गए।

धन्यवाद

विचारक: मैं,समय हूं..

268- Cosmic Dialogue

Dialogue of Universe अर्थात “ब्रह्मांड के संवाद” क्या आप विश्वास करते हैं कि ब्रह्मांड आपको बहुत गंभीरता पूर्वक बड़े ध्यान से सुनता है..??

वह आपकी भावनाओं को महसूस करने के साथ साथ..जब से धारा पर ब्रह्मांडीय प्रादुर्भाव हुआ है, तब से ..वह अपने तरीके से जीवों के साथ निरंतर संवाद में है।

ये बात इस पर कहीं अधिक निर्भर करती है कि अमुक जीव या फिर सब योनियों में श्रेष्ठ माने जाने वाले मनुष्य में “वॉइस ऑफ़ यूनिवर्स” के प्रति “सजगता” कितनी है..??

आपकी व्यक्तिगत अनुभूतियों से जमीं हुई दुनियांदारी की कार्मिक लेयर को थोड़ा कम करने के संदर्भ में यदि कहा जाए, जैसे कि, आपको कोई विशेष नंबर 11, 22 बार बार दिखते हैं, और इसी तरह कोई शब्द या फिर कोई घटना बार बार रिपीट होती है..ये सब ब्रह्मांड की ओर से हमको उसकी अपनी सांकेतिक भाषा में कुछ संदेश जैसे हैं और कुछ नहीं।

इसे “सिंक्रोनिसिटी”(Synchronicity) भी कहा गया है।

ये सच है कि ब्रह्मांड हमारी भावनाओं, विचारों और इच्छाओं को अपने अंदर ऊर्जा के रूप में ग्रहण करता है। जब हमारी भावनाएं और इरादे स्पष्ट होते हैं,तो यूनिवर्स उसी फ्रिक्वेंसी पर हमें अपनी प्रतिक्रियाएं भेजता है।

आपने अपने जीवनकाल में कई एक बार ऐसा अनुभव किया,तो होगा!! हम लोगों के जहन में कोई सवाल या फिर समस्या चल ही रही होती है.. कि तभी कोई अजनबी उसी से संबंधित यकायक कुछ जाता है। या कभी कोई दृश्य किसी स्क्रीन पर या दुनियां के किसी भौतिक पटल पर ऐसा घटित होता.. दिख जाता है।

अगर हम सजग हैं,तो उस वक्त वह हमारे लिए “आई ओपनर” हो सकता है।

गौर कीजिएगा, तो आप पाइएगा कि, ब्रह्मांड के ये “संवाद” व्यक्ति के अवचेतन मन, उसके सपनों, इंट्यूशंस और कुछ घटनाओं के माध्यम से यदाकदा घटते रहते हैं।

क्योंकि “ब्रह्मांड संवाद” वह प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति की चेतना,भावनाएं और विवेकशील विचार यूनिवर्स की ऊर्जा से जुड़कर संकेत, संयोग और जीवन के अनुभवों के रूप में व्यक्ति को मार्गदर्शन करते रहते हैं।

विज्ञान मुख्यत: प्रत्यक्ष,दोहराए जा सकने वाले प्रमाणों पर आधारित रहता है। जबकि ये ‘डायलॉग ऑफ़ यूनिवर्स’ अक्सर व्यक्ति के अनुभव पर आधारित है। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के अपने निजी अहसास अलग अलग अनुभूति कराते हैं।

ध्यान, मौन और सजगता के माध्यम से इन संकेतों को समझना व्यक्ति को अपने भीतर और ब्रह्मांड के साथ गहरे स्तर पर कनैक्ट करता है, जिससे कि वह अपने सच्चे पथ पर आगे बढ़ सके।

जैसे; किसी कठिन समय में अचानक मार्गदर्शन मिलना या किसी निर्णय लेने से पूर्व कुछ साइकिक डॉट्स (Psychic dotts) जिन्हे एक समय.. हम जोड़ नहीं पा रहे थे, फिर अचानक उनका बड़ी स्पष्टता से स्वत: मिलान हो जाना।

यह सब “कॉस्मिक डायलॉग” ही है। आवश्यकता है व्यक्ति को इनके प्रति थोड़ा सचेत और गंभीर रहने की।

धन्यवाद

युग पचहरा,

मुखिया परिवार,नीमगांव,मथुरा।

267 – भंडारा

भंडारा यानी community feast.. एक धार्मिक या सामाजिक आयोजन होता है जिसमें लोगों को बड़ी श्रद्धापूर्वक भोजन कराया जाता है।

अब, “भंडारा या लंगर…..कैसे करें…??” आम व्यक्ति के लिए, ये सवाल अपने आप में पहली दृष्टया लगभग दुर्लभ सा ही प्रतीत होता है..क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में अर्थ यानी पैसा लगता है। जब किसी के पास पर्याप्त पूंजी न हो, तो अन्नदान के प्रतीक जो लंगर या भंडारे.किए जाते हैं। कोई आमजन बेचारा अपने मन के भाव पूरे करे भी तो कैसे..??

ब्रज में स्थित बरसाना धाम में तीन भावुक युवाओं द्वारा “भंडारा” एवं “लंगर” को लेकर हुए वृतांत को भक्ति के धरातल पर हम भावना से ओतप्रोत एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।

एकबार तीन दोस्त बरसाना के एक भंडारे में भोग पा रहे थे।

उनमें से एक बोला….” काश..हम भी कभी ऐसा भंडारा कर पाएं.!!

दूसरा बोला…. हां यार..हर माह ऐसा ही कुछ होता है हमारी ‘ सैलरी ‘ आती बाद में है। अपने जाने के रास्ते पहले बना लेती है।

तीसरा बोला….जी, बिल्कुल दिन प्रति दिन पारिवारिक खर्चे इतने बढ़ते जा रहे हैं कि कोई धार्मिक अनुष्ठान या भंडारा.. करना,तो दूर भंडारे के बारे में सोच भी नहीं सकते ..???

पंगति में उन तीनों मित्रों के पास बैठे एक “संत” भंडारे का भोग पाते पाते.. उन युवाओं को बड़े ध्यान से सुन रहे थे।

तभी संत जी उन युवकों से बोले..बेटा! भंडारा करने के लिए बहुत अधिक धन नहीं परंतु अच्छे मन एवं भाव की जरूरत अवश्य होती है।

वे तीनो युवक आश्चर्यचकित होकर संत जी के चमकते हुए मुखारबिंद की ओर देखने लगे..!!!

संत जी ने उनकी उत्सुकता को देखकर हंसते हुए कहा, बच्चों..!!! आवश्यक नहीं है कि, हम जिस योनि में हैं और व्यावहारिकता के बोझ तले केवल संपर्क में आए लोगों के लिए भंडारा करने पर अपने आप को सक्षम समझें जो हमारी अपनी योनि के है।

ऐसा करना, तो अपना व्यक्तिगत रीति, चलन एवं व्यवहार हुआ ना..?? “भंडारा” कब हुआ..??

मान लो! यदि किसी अमुक नागरिक की सामर्थ्य कम है,और भंडार करने का आनंद या सुकृत्य लेने का भाव उसके मन में बन रहा है.., तो वह ऐसा करके..भी सुकृत कमा सकता है जैसे;

वह बिस्किट का एक पैकेट ले और उन्हें चीटियों के स्थान पर तोड़कर उनके खाने के लिए रख दे, तो आप अनुभव कीजिएगा कि, उस जगह की चीटियां उतना ही खुश होकर खाएंगी जैसे हम मनुष्य प्रसन्न हो होकर भंडारे की प्रसादी पाते हैं।

और भाव बने,तो..दाल,चावल या अनाज के कुछ दाने लेकर किसी मकान की छत पर बिखेर दिया करो,तो.. चिडिया, कबूतर और अन्य पक्षी आकर खा जाया करेंगे। लो बस हो गया भंडारा..।

बच्चों..आपने बुजुर्गों को ये कहते अक्सर सुना होगा कि ईश्वर ने जीवों के लिए जन्म के साथ ही अन्न का प्रबंध भी किया होता है।

भंडारे,लंगर आदि में बैठकर रोटी,पूड़ी सब्जी या पुए आदि पाते हैं। पूर्व निर्धारित ब्रह्ममंडीय व्यवस्था ने जिन अन्न के दानों पर जिस जिस का नाम अंकित कर दिया होता है..हर हालत में वही उसे पाने का भागीदार होता है।

इंसान चाहे,तो इन निरीह जीव जन्तुओं के लिए उनके नाम के भोजन का प्रबंध करने में अपना योगदान दे सकता है।

हालांकि ऐसे योगदान किसी न किसी के माध्यम से हमारे यूनिवर्स में व्याप्त दृश्य/अदृश्य “ब्रह्ममंडीय संवाद” के अंतर्गत ही संभव हो पाते हैं।

जाने कौन कहां से आ रहा है..? कहां को जा रहा है..? संस्कारवश जीव के कर्मों द्वारा बुना हुआ एक ताना बाना समूचे ब्रह्मांड में फैला हुआ है। परंतु देहाभिमानियों को लगता है कि, वे कर रहे हैं जबकि सब स्वत: ही घटित हो रहा है।

संत जी द्वारा ये सुनकर..तीनों युवकों के चेहरे पर एक सुकून देने वाली खुशी साफ़ झलक रही थी.. वे अब सोच रहे थे..ऐसे अच्छे दान पुण्य के काम करते रहने से हमको भी अपने जीवन में अपार प्रसन्नता मिल सकती है..!! साभार

🙏🏼राधे गोविंद 🙏

266-White-Lies

We know exactly ‘White lies’ is not so good for human being. Now the question is.

. Q. How can we start catching ourselves from ‘White-Lies’ in our daily conversations??

Ans. 1-Examine our triggers:

Notice when and why we lie.Ask ourselves where we are, who we are with,how we feel and what we hope to achieve by this ‘Lying’.

This awareness helps identify patterns and moments prone to dishonesty.

2- Practice setting clear boundaries:

Often white lies arise from difficulty saying.. ‘No’. Or avoiding conflict. Practice giving honest but respectful answers to requests or invitations.

3- Keep a lie journal:

Write down when we catch ourselves lying,even about small things.This helps increase self-awareness and motivates change.

4- Reframe our mindset:.

Accept that our being truthful even if uncomfortable,builds deeper connections and self-respect. Remind ourselves that our true feelings and experiences have value.

5-Start Small:

Tell the truth our miner things first,our actual arrival time or feelings and notice the relief and trust it builds..

By combining these steps ,we create habits that help us, recognize and reduce “White Lies” leading to more honest daily interactions. Thanks 👍

265 वृक्ष मित्र

वृक्ष स्वयं जीवधारी हैं नि: स्वार्थ भाव से वे अन्य सभी जीवधारियों के “सच्चे मित्र” हैं। जो अनेक जीवों को सर्दी,बरसात में शरण देने के साथ साथ गर्मी से बचाते हैं। ऑक्सीजन देते हैं। उनकी कमी का ही नतीजा है कि.. जनता जनार्दन के जिम्मेदार विभाग “नागरिक सुरक्षा महानिदेशालय” को हाई अलर्ट जारी करके लोगों को सचेत करना पड़ रहा है।

लेकिन ये सुनकर या पढ़कर घबराएं नहीं जो सावधानी बरतने को कहा जाए, उनका अनुपालन करें।

`20 मई से 2 जून तक सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक कोई भी व्यक्ति बाहर (खुले आसमान के नीचे) नही निकलेगा क्योंकि मौसम विभाग ने यह बताया है कि तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से 55 डिग्री सेल्सियस तक जायेगा,`

जिससे अगर किसी भी व्यक्ति को घुटन महसूस हो या अचानक तबियत खराब हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं रूम के अंदर दरवाजा खोल कर रखे ताकि विंटीलेशन बना रहे,मोबाइल का प्रयोग कम करे, मोबाइल फटने की संभावना जताई जा रही है,कृपया सावधान रहें और लोगो को सूचित करें,

दही , मट्ठा, बेल का जूस आदि ठंडे पेय पदार्थ का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करें। अत्यधिक महत्वपूर्ण सूचना नागरिक सुरक्षा महानिदेशालय नागरिकों और निवासियों को निम्नलिखित के प्रति सचेत करता है।

आने वाले दिनों में 47 से 55 डिग्री सेल्सियस के बीच बढ़ते तापमान और क्यूम्यलस बादलों की उपस्थिति के कारण अधिकांश क्षेत्रों में दमघोंटू माहौल होने के कारण, यहां कुछ चेतावनियां और सावधानियां दी गई हैं। कारों में से इन्हें हटा दिया जाना चाहिए

1.गैस सामग्री 2 लाइटर 3. कार्बोनेटेड पेय पदार्थ 4. सामान्यतः इत्र और उपकरण बैटरियाँ 5. कार की खिड़कियाँ थोड़ी खुली (वेंटिलेशन) होनी चाहिए 6. कार के फ्यूल टैंक को पूरा न भरें 7.शाम के समय कार में ईंधन भरें 8.सुबह के समय कार से यात्रा करने से बचें 9. कार के टायरों को ज़्यादा न भरें, ख़ासकर यात्रा के दौरान।

बिच्छुओं और सांपों से सावधान रहें क्योंकि वे अपने बिलों से बाहर निकलेंगे और ठंडी जगहों की तलाश में पार्क और घरों में प्रवेश कर सकते हैं।

खूब पानी और तरल पदार्थ पियें,सुनिश्चित करें कि गैस सिलेंडर को धूप में न रखें, सुनिश्चित करें कि बिजली मीटरों पर अधिक भार न डालें और एयर कंडीशनर का उपयोग केवल घर के व्यस्त क्षेत्रों में करें, विशेषकर अत्यधिक गर्मी के समय में। और दो तीन घंटे के बाद 30 मनिट्स का रेस्ट ज़रूर दे।

बाहर 45-47° घर पे AC 24-25° पर ही चेलाएँ,सेहत और तबियत ठीक रहेगी सूरज की रोशनी के सीधे संपर्क में आने से बचें, खासकर सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच।

शिक्षा: अपने वृक्ष मित्रों की अहमियत समझें.. जहां जहां संभव हो सोच विचार कर वृक्ष लगाने को अपनी जरूरत के साथ साथ ..अपनी आदत में शामिल करें। जब देश का हर नागरिक समझेगा कि वृक्ष का मानव जीवन में क्या महत्व है,तो वह “वृक्ष मित्र” अवश्य बढ़ाने लगेगा,तो फिर हमारे देश के सुरक्षा विभाग “नागरिक सुरक्षा निदेशालय” को इस प्रकार के अलर्ट जारी क्यों करने होंगे। इसीलिए सम्पूर्ण भारत में धरातल पर “वृक्षारोपण” का कार्य न सिर्फ क्रियान्वित हो, बल्कि पौधे को पेड़ बनने तक पूरी सुरक्षा देने का संकल्प लें। धन्यवाद

अंत में: कृपया इस जानकारी को साझा करें क्योंकि अन्य लोग नहीं जानते होंगे और हो सकता है कि वे इसे पहली बार पढ़ रहे हों। सादर, नागरिक सुरक्षा महानिदेशालय

264 – मन

मन को परिभाषित करना असंभव,तो नहीं मगर कठिन जरूर है। एक मत कहता है.. “मैं” नही कोई दूसरा है..बालक के “शिक्षा जगत” में पहला कदम रखने के समय “मन की चंचलता” को अभिव्यक्त करते हुए.. परमसंत स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि, जो “मन पर नियंत्रण” पा लेगा वह स्वयं को,तो पा ही लेगा..अपितु उसमें समूची दुनियाँ को भी पाने की सामर्थ्य हो जायेगी। ✍️

हां,भटके हुए ‘ मन ‘ को कभी भी एकांत पसंद नहीं होता। क्योंकि वह हमेशा दूसरों के बारे में ही, सोचता है,और यदि ऐसे मन को सोचने के लिए कोई बिंदु न मिले तो वह बेचैन हो उठता है,इस अवस्था में फंसे मन का वजूद दूसरों में निहित नजर आता है। अगर दूसरे नहीं होंगे तो ऐसा मन स्वयं को शक्तिहीन पाएगा..

जो उसके स्वभाव में बिल्कुल नहीं है। यही वो कारण है जिससे भटका हुआ मन हमेशा एकांत से दूर… दुनियां के प्रपंच की ओर भागता है।

ऐसा मन हमेशा लोगों को बाहर की दुनिया में लगाए रखता है,ताकि उसका अपना वजूद बना रहे। और इस तरह सामान्य जन जीवन “मन” के इस जाल से बमुश्किल ही मुक्त हो पाता है।

सदैव स्मरण रखें..स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार..मन को वश में करने का नाम ही “साधना” है। पहले मन वश में हो जाए, तो दूसरों के बारे में अनर्गल चिंतन भी स्वत: बंद हो जायेगा। फिर व्यक्ति सिर्फ अपने इष्ट के रुप लीला धाम और गुंण यशगान और नाम जप में तल्लीन हो जाने से एकांत उसके लिए चिर आनंददायी हो जाता है..!!

राधे गोविंद राधे गोविंद 🙏🏻 🙏

263- Safe zone

दिन प्रतिदिन चारों ओर तेजी से बदलती व्यवस्थाओं को देखते हुए ..आज की दुनियां बिच “सेफ जोन” (Safe-zone) की महत्ता और बढ़ जाती है।

हमें अपने आचरण के माध्यम से राक्षस जैसी बीमारियों से निजात पाने के लिए अपनी दैनिक क्रियाओं में कुछ अमूल चूल परिवर्तन करने होंगे।

जैसे; सुबह की शुरुआत, चाय,दूध और कॉफी से न करके , हल्दी जल /नींबू जल या अर्जुन की छाल के जल से करें।

एक घंटा.. घूमने, व्यायाम,योग आदि करने के बाद लगभग छह बजे ..बादाम,अखरोट,किसमिस चबाते चबाते न्यूज पेपर देखें।

तब स्नान आदि के बाद..प्रातः वंदन सूर्यदेव को जल आदि अर्पित करके.. सात बजे.. ब्रेकफास्ट में ओट्स/दलिया/खिचड़ी आदि लें। और समय से अपनी कर्मभूमि की ओर चल पड़े..

लंच में .. सलाद: खीरा,टमाटर, मूली,गाजर नींबू आदि भरपूर मात्रा में लें.. दही मट्ठा में काला नमक,भुनी हुई अजवाइन या जीरा वगैरह डालकर उचित रहता है। फिर एक या दो रोटी जौ/ज्वार/बेसन आदि मिक्स करके स्वाद बतौर हरी सब्जी, के साथ खाएं।

शाम को संध्या वंदन आदि से निवृत होकर..डिनर छह से आठ बजे के बीच कर लें। लेकिन हल्का ..दाल / सत्तू या कोई फल..(केला को छोड़कर) और थोड़ी देर बाद कम से कम एक गिलास दूध अवश्य लें।

यदि किसी दिन ऑफिस से रिलेटेड कोई आवश्यक कार्य आ जाने पर लेट नाइट जागना पड़े,तो काम के बीच चाय/कॉफी के स्थान पर गर्म पानी के साथ..एनर्जी के लिए मखाने,काजू और बादाम आदि तबे पर बिना घी के हल्के नमक में भून कर ले सकते हैं।

नोट;- 1 वैसे देर रात्रि में जगने पर कुछ ना ही लें तो स्वास्थ्य की दृष्टि से ज्यादा सही रहता है।

2- हां! शयन कक्ष में जाते समय.. केवल आधा गिलास जल पीकर दिन भर के सारे कर्म अपने इष्ट “राधे गोविंद” को समर्पित करके उनका नाम जप करते-करते उनकी याद में सो जाएं ..

3- ऐसी दिनचर्या अक्समात नहीं बनती। सही दिनचर्या केवल सदाचार अनुपालन या गुरु कृपा पात्र साधकों को ही नसीब हो पाती है। फिर भी जिन जिन को हो जाए, अहो भाग्य…

मेरा स्वाध्याय व अनुभव कहता है कि प्रारब्धवश थोड़ी बहुत सांसारिक असहजताओं के बीच भी ऐसे व्यक्तियों का जीवन सदैव “आनंदमय” रहता है। धन्यवाद।

262 – “लिपिड प्रोफाइल”

दरअसल “लिपिड प्रोफाइल टेस्ट” ब्लड में वसा आदि का स्तर जांचने के लिए किया जाता है।

इन द सेंस ऑफ मेडिकल टर्मोलोजी लिपिड बोले तो “चिकनाई,चर्बी,वसा,फैट” आदि का ब्लड में स्तर जांचने का टेस्ट जो व्यक्ति के बाजू से ब्लड लेकर लगभग 600 या 800 रुपए की फीस में टेस्ट हो जाता है।

ह्यूमन बॉडी के ब्लड में लिपिड की मात्रा बढ़ जाने से डाइबिटीज,ब्लड प्रेशर,ओबेसिटी,सिर चकराना, सीने में कभी कभी बाई ओर दर्द महसूस होना आदि की स्थिति में ये टेस्ट अवश्य कराया जाना चाहिए।

हालांकि इस टेस्ट के छह पैरामीटर्स होते हैं।

“एच डी एल” है..”हाई डेंसिटी लाइपो” – प्रोटीन।,

उसी प्रकार “एल डी एल” है..”लो डेंसिटी लाइपो” – प्रोटीन।

एक मशहूर डॉक्टर महोदय ने किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हमें एक सुंदर सी कहानी के रूप में इस टेस्ट को शेयर किया हुआ है। क्षमा कीजिएगा सर्वजन हिताय की दृष्टि से हमने इसे अपने ब्लॉग के रूप में आपको साझा कर दिया है। आप देखेंगे कि डाक्टर साहब ने “लिपिड प्रोफाइल” को एक अनोखे अंदाज में बहुत ही सरल तरीके से समझाया है।

वे लिखते हैं इसे समझने के लिए हम अपने मन में एक कल्पना करें कि हमारा शरीर एक छोटे शहर की तरह है। इस शहर के मुख्य अपराधी हैं.. ‘कोलेस्ट्रॉल’, ट्राइग्लिसराइड। जो सिराओं और धमनियों नाम की सड़कों पर जाम लगाकर शरीर नाम के शहर में अराजकता फैलाने का काम करते रहते हैं।

ट्राइग्लिसराइड, कोलेस्ट्रॉल का सबसे बड़ा सहयोगी है। जिनका काम होता है सड़कों पर विचरण करना, अराजकता फैलाना और रास्तों पर जाम लगाना।

व्यक्ति के “हृदय” को इस तथाकथित शहर का केंद्र बताया गया है। और ऐसा सोचिएगा कि सभी सड़कें हृदय की ओर जाती हैं।

जब अपराधियों की संख्या बढ़ती है, तो वे अपराधी हृदय के कार्य को बाधित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन हमारे शरीर रूपी – शहर में एक पुलिस बल भी तैनात रहता है। जो सदैव एक अच्छे पुलिस वाले की भूमिका में ही रहता है। जिसका नाम है।

“एच डी एल” (HDL) जो अपराधी तत्वों को पकड़कर यकृत (LIVER) रूपी जेल में डाल देता है। फिर लिवर उन अराजक तत्वों को शरीर से बाहर निकाल फैंकने के काम में लग जाता है।

मगर कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब हमें पता चलता है कि यहां अर्थात ब्लड में विलेन के रूप में एक भ्रष्ट पुलिसवाला भी रहता है। जिसे –वैज्ञानिक भाषा में एल डी एल (LDL) के नाम से जाना जाता है। एल डी एल इन अपराधी तत्वों को जेल से बाहर निकालकर अराजकता फैलाने के लिए वापस फिर से सड़कों पर छोड़ देता है। क्योंकि वह अराजकता में ही आनंदित होता है। अमुक ह्यूमन बॉडी में स्थित भटका हुआ ‘मन’ अर्थात..

जब व्यक्ति के आराम तलब हो जाने पर उसके अंदर आलस्य घर कर जाता है। तब एच डी एल / HDL के रूप में डॉक्टर साहब के अनुसार बताए गए “गुड मैनर्स पुलिस ऑफिसर्स” की संख्या निरंतर घटती चली जाती है, जिससे व्यक्ति का शरीर रूपी “शहर” अराजकता में डूबने लगता है। मींस व्यक्ति को बीमारियां जकड़ने लगती है।

फिर आप ही बताइएगा कौन ऐसे शहर में रहना चाहेगा.?? जहां हर तरफ़ अराजकता का बोलबाला हो।

अब अच्छे स्वास्थ्य की दृष्टि से सवाल बनता है कि,”क्या आप अपने शरीर के अपराधी तत्वों को कम करके ..अच्छे पुलिसवालों यानी HDL की संख्या बढ़ाने के प्रति इच्छुक हो ..??

यदि ऐसा है, तो फिर आपको अपने शरीर नाम के शहर के हर अंग को किसी न किसी बहाने मूमेंट में रखना होगा। आप अपने शरीर को “डायनेमिक कंडीशन” में रखने की आदत बना लेंगे अर्थात तत्काल चलना/ घूमना, एक्सरसाइज / योग करने को अहमियत देने लगेंगे,तो सबकुछ ठीक होने लगेगा। क्योंकि हमने हजारों बार सुना..या कहीं न कहीं पढ़ा है.. “Health is wealth” लेकिन व्यवहारिक तौर पर हमने कभी स्वास्थ्य को…

“धन/संपत्ति,रुपए/पैसे” के सामने वरीयता तो छोड़िए बराबरी का भी दर्जा नहीं दिया।

नब्बे फ़ीसदी लोगों ने केवल रुपए, आभूषण,जमीन आदि को ही “धन” का पर्याय माना हुआ है। जो निहायत ही गलत है।

हां घर, परिवार में किसी सदस्य या स्वयं के हॉस्पिटलाइज होने पर मन के किसी कोने में एक विचार अंकुरित अवश्य होता है कि अब्बल नंबर का “धन”,तो स्वास्थ्य ही है।। बाकी रुपया,पैसा आदि सब दोयम दर्जे के हैं।

चलो!अब रीयल पॉइंट पर आते हैं

वॉक करते समय व्यक्ति के बढ़ते हुए हर एक कदम के साथ गुड मैनर्स पुलिस ऑफिसर्स आई मीन “एच डी एल” की संख्या का स्तर बढ़ता चला जाता है। और शरीर रूपी “शहर” की शांति व्यवस्था भंग करने वाले..अपराधी तत्व जैसे; कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड और एलडीएल तत्काल घटने लग जाते हैं।

ऐसा नियमित रूप से करने पर हमारे शरीर नाम के शहर में शांति व्यवस्था फिर से बहाल होने लगती है। मानव शरीर फिर से स्वस्थ और ऊर्जावान हो जाता है। हमारा हृदय जिसे इस कहानी में शरीर रूपी शहर के “केंद्र” की संज्ञा दी गई है, अपराधियों के जाम से सुरक्षित हो जाता है। जब हमारा हृदय स्वस्थ होगा, तो हम भी स्वस्थ और मस्त रहेंगे।

इस कहानी से ये शिक्षा..मिलती है कि, हमें जब भी मौका मिले, किसी न किसी बहाने पैदल अवश्य चलना चाहिए। ऐसा करने से न केवल स्वस्थ रहेंगे अपितु अच्छी सेहत के साथ साथ अपने जीवन को आनंदमय बनाकर दिन प्रतिदिन की अपनी हर एक्टिविटीज को शयन कक्ष में नींद आने से पूर्व “राधे गोविंद” के चरणों में समर्पित करके हल्के होकर दिनो दिन मस्त होते चले जायेंगे।

हमारा बढ़ता हुआ हर कदम “एच डी एल” को बढ़ाएगा..वही हमें स्वस्थ बनाएगा। किसी गीतकार की रचना है..” जीवन चलने का नाम चलते रहो सुब हो .. शाम।”

अच्छी “जीवनशैली” के लिए छह आवश्यक आदतें:- अमल में लाने के लिए..चलो इन्हें भी इत्मीनान से पढ़ लेते हैं।

1. प्यास लगने से पहले पानी पिएं।

2. थकान महसूस करने से पहले आराम करें।

3. बीमार पड़ने से पहले अपना मेडिकल चेकअप करवाएं।

4. चमत्कार की प्रतीक्षा न करके सदैव अपने इष्ट “राधे गोविंद” पर पूर्ण भरोसा रखें।

5. अपना विश्वास भी कभी न खोएं।

6. हमेशा सकारात्मक रहें और बेहतर भविष्य की उम्मीद करें..चाहे हो कुछ भी।

पूरा पढ़ने के बाद जीवन में अमल करने वालों को मेरा हिर्दय की गहराइयों से धन्यवाद..है साधुवाद है।

261 – गिरगिट

विडंबना देखिए! हो सकता है.. ऐसा समूची दुनिया बिच चलता हो.. मगर मांफ कीजिएगा मैं,भारत जा एक नागरिक हूं, तो “भारतीय संस्कृति” के मानदंडों को देखता और सुनता हुआ बड़ा हुआ हूं, वे किसी इंसान को इस तरह गिरगिट के जैसा अपना रंग बदलने की अनुमति नहीं करते।

एक पिता जिसकी बेटी शादी के योग्य हो जाती है,तो वह बेहद असहाय अवस्था में एकदम निरीह प्राणी बन कर.. बेटी के लिए लड़का ढूंढने निकलता है। उसकी सोच हो जाती है कि, अधिक से अधिक लिफाफे आजाएं.. ये सोचकर परिचित कम परिचित सभी को ढूढ ढूंढकर निमंत्रण देता फिरता है।

उसका ध्येय शादी को कम से कम में निपटा लेने का जो होता है। ठीक भी है क्योंकि यहां लड़के वाले को संतुष्ट करना बड़ा ही दुर्लभ कार्य है।

अब देखिए.. कुछ वर्षों बाद वही पिता जो बेटी की शादी के दौरान अपने आपको निरीह व असहाय प्राणी दिखाने में लगा रहा।

उसी पिता का दिमाग़ अपने बेटे की शादी करते वक्त, सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। और यदि बेटा कहीं किसी सरकारी विभाग में सलेक्ट हो गया हो, तो फिर तो कुछ पूछिएगा ही नहीं। वही पिता लड़की वालों की नांक में दम करके रख देता है।

बेटे की शादी के समय उसके अपने परिवार,समाज एवं रिश्तेदारों से संबंधित व्यवहार की लिस्ट, बारात की लिस्ट सब सिमटकर रह जाती हैं।

एक ही वक्त में अपनी बेटी के संदर्भ में उसके ससुराल वालों से अपेक्षाएं कुछ..और होती हैं ?? उसी पिता की अपने बेटे की पत्नी अर्थात अपनी पुत्रवधु से और उसके मायके वालों से अपेक्षाएं एकदम विपरीत..उसी पिता के रवैए में इतना दोगलापन कि किसी भी भले मानुष को बड़ी आसानी से समझ में आ जाएगा.. कि वह कितना बड़ा “गिरगिट” है।

आश्चर्य की बात कहें या बेशर्मी की। ऐसे मंजर व्यक्ति का सिर नीचा करते हैं न कि ऊंचा।

There is a Just double standard.. example. Very disgusting.. घोर निंदनीय.. बड़े अदब के साथ सभी से निवेदन कि, ” कम से कम बुद्धिजीवी वर्ग को इस बिंदु पर चिंतन अवश्य करना होगा। धन्यवाद