170 – परिवार की “शान”

हर परिवार में वरिष्ठजन यानी बुजुर्ग सदैव उस परिवार की “शान” होते हैं।

आओ एक प्रेरणादायक कहानी के द्वारा इस सत्य को आज की युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

एक बहुत बड़ा विशाल वृक्ष था। उस पर कई एक हंस रहते थे। उनमें एक हंस थोड़ा तेज, बुद्धिमान और काफ़ी दूरदर्शी था। सब उसका आदर करते थे, उसे सम्मान से सभी ‘ताऊ’ कहकर पुकारते थे।

एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को उसी पेड़ की जड़ से ऊपर तने पर नीचे से ऊपर की ओर लिपटकर चढ़ते हुए देखा। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर दिखाते हुए बताया, इस बेल को जहां भी देखो नष्ट करते रहा करो! वरना, एक दिन ये बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।

एक युवा हंस, हंसते.. हुए बोला, ताऊ, ये छोटी-सी बेल हमें कियूं कर मौत के मुंह में ले जावेगी..? थारी बात म्हारी समझ में न आणे की।

बुजुर्ग हंस ने समझाया, अरे अक्कड़ के दुश्मन! आज यू बेल तुम्हें छोटी-सी दिखरी है ना, यू धीरे-धीरे एक दिन पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आ जागी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जावेगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए यू सीढ़ी नु काम करेगी। कोई भी शिकारी चढ़के हम तक पहुंच जावेगा और एक दिन हम सब मारे जावेंगे, नू कहरा था मैं।

मग़र इस बात पर युवा हंसों को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बन जावेगी..? एक और हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींच के कुछ ज्यादा ही लंबा कर रिया..है, एक हंस बड़बड़ाया, यू ताऊ अपनी अक्कड़ का रौब बनाये रखने कू अंट-शंट कहाणी बणा ता रहेवे.. ऐसा कुछ ना होवेगा।

इस प्रकार किसी दूसरे हंसों ने भी ताऊ की बात को तबज्जो ना दी। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल जो ना थी? समय बीतता रिहा.. बेल लिपटते-लिपटते ऊपर बड्डी-बड्डी शाखाओं तक पहुंच गी। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी सी बण गी। जिस पर आसानी से अब कोई भी चढ़के आ सकें।

आज उन सब कू ताऊ की बात सच्ची होती दिखरी.. पर इब कुछ भी न हो सके। क्योंकि बेल इतनी मजबूत जो होगी सै। इब उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात ना थी।

एक दिन जब सब हंस दाना चुगणे बाहर गए हुवे थे, तब मौका पाकर एक बहेलिया उधर आ निकड़ा। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया।

सांझ को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का बोध हुआ। और याद भी आयी। इब तो सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित से होण लाग रहे.. और अपने आपको कोस रहे.. ताऊ सबसे रुष्ट होके एक कोणे में कू चुप-चाप सा बैठ्या था।

एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम तो घणे मूर्ख सै, लेकिन अब हम सु तू! यू मुंह न फेर। दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकाडने की तरकीब तू ही जानें .. ताऊ तू हमें बता क्यों न दे..? आगे से यूं तेरी कोई बात न टलेगी.. सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया,

ताऊ बोल्या! रे मूर्खो! मेरी बात ध्याण से सुनो। सुबह जब बहेलिया आवे, तब सब के सब मुर्दा होणे का बहान्ना करियों। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जावेगा। वहां भी कुछ देर मरे के समान पड़े रहियो। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजा दूँगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाणा।

सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने सुझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। आखिरी हँस के जमीन पर गिरते ही ताऊ की सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस एकदम उड़ लिए।

बहेलिया, अवाक! टुकुर-टुकुर देखता रह गिया।

जी विल्कुल, वरिष्ठजन घर की धरोहर हैं। वे हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक होते है। जिस तरह आंगन में पीपल का वृक्ष फल नहीं देता, परंतु छाया व कार्बनडाईऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन अवश्य देता रहवे।

ठीक उसी तरह हमारे घर के बुजुर्ग बुढ़ापे में हमे भले ही आर्थिक रूप से सहयोग न कर पाते हों, परंतु हमें अच्छे संस्कार एवं शुभ आशीर्वाद के साथ-साथ उनके अनुभवों की समझ से कई-एक बाते सीखने को मिलती है।

वास्तव में बड़े-बुजुर्ग “परिवार की शान” होते हैं। वो कोई कूड़ा-करकट नहीं हैं, जिसे कि परिवार से बाहर निकाल फेंका जाए।

अपने प्यार से रिश्तों को सींचने वाले इन बुजुगों को ख़ुद के बच्चों से प्यार व सम्मान चाहिए..न कि अपमान एवं तिरस्कार।

अपने बच्चों की खातिर अपना जीवन दाँव पर लगा चुके इन बुजुर्गों को अब अपनों के प्यार की जरूरत है। यदि हम इन्हें सम्मान और परिवार में उचित स्थान देंगे तो नि:सन्देह हम लाभान्वित होंगे ।

ऐसा न करने पर हम अपने हाथों अपने बच्चों को उस प्यार, संस्कार, आशीर्वाद व स्पर्श से वंचित कर रहे हैं, जो उनकी जिंदगी को सँवार सकता है।

याद रखिए किराए से एक बार को प्यार तो मिल सकता है परंतु संस्कार, आशीर्वाद व दुआएँ नहीं।

ये सब हमें सदैव माँ-बाप व बुजुर्गों से ही मिल सकता है..!! अन्यत्र कहीं नहीं।

🙏🏽 🙏🏾राम राम जी🙏🏼🙏🏻

169 – क्लीनबोल्ड

“क्रिस्टोफर ग्रीनवुड” का क्लीन बोल्ड होने का ये न्यूज़ न केवल भारत के लिए वल्कि पूरी दुनियाँ के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय ब्रेकिंग न्यूज है… !!!

ये सुनकर देश के भी कुछ डिज़ाइनर लोग सकते आगए होंगे !!! 

यदि देश-दुनियाँ के कर्रेंट-अफेयर्स पर नज़र रखना आपके स्वभाव में है, तो आपने भी सुन लिया होगा। कि, अंतरराष्ट्रीय-न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का चुनाव हो चुका है!!!

जिसमें भारत ने एक शानदार जीत हासिल की है!!! 

कहना न होगा.. कि देश के नेतृत्व ने अपनी चाणक्य-कूटनीति से विश्व पटल पर ब्रिटेन को न सिर्फ हराया..है, वल्कि पिछले 71 वर्षों से चले आ रहे उसके एकाधिकार को भी खत्म किया है।

आगे भी ऐसे कई एक टॉप सेक्रेट्स सामने आएंगे जब..एकबार को तो आप अर्थात देश-दुनियाँ के अधिकतर लोग भौ-चक्के रह जाएंगे। देखते जाइए..

     इसमें कोई दोराय नहीं, देश के नेतृत्व व विदेश मंत्रालय ने दुनिया भर के देशों के साथ संबंध विकसित किए हैं। उसी मेहनत का ये परिणाम है कि, आज “न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी” को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अनेक देशों के लोगों ने ससम्मान चुन दिया है।  

    भारत के न्यायमूर्ति दलवीर सिंह को 193 मतों में से 183 मत मिले। (प्रत्येक देश से एक का प्रतिनिधित्व ही किया गया था।) अर्थात 193 देशों में से ब्रिटेन के न्यायमूर्ति “क्रिस्टोफर ग्रीनवुड” को मात्र 10 मत ही मिल सके।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस उपलब्धि को हासिल करने के लिए देश का शीर्ष नेतृत्व और विदेश मंत्रालय पिछले 6 महीने से लगातार काम कर रहे थे। 

        अब आप एक मिनट उन चार बिंदुयों को गम्भीरतापूर्वक देख लीजियेगा.. 

  1- सभी 193 देशों के प्रतिनिधियों से संपर्क करना।

2- अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ब्रिटिश उम्मीदवार के समक्ष अपना उम्मीदवार खड़ा करना।

3- फिर सभी देशों के सामने भारत की स्थिति को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना।

4- सभी को इस पॉइंट पर कौनफीडेंस में लेना कि “मुख्य न्यायाधीश हमारा यानी भारत का ही क्यों होना चाहिए।

ये बात अपने आप में जितनी बड़ी  है…ये काम उतना ही मुश्किल भी था..,!!! इस दुर्लभ कार्य को फिर “जीत” में सुनिश्चित करना, तो अति दुर्लभ था।

मेरे अनुभवों की समझ कहती है कि, ‘नेक-नियत’ व ‘पक्का-इरादा’ हो तो क्या नहीं हो सकता..? मेरा मतलव है देश-दुनियाँ में तो सब कुछ हो सकता है👍 

       ग़ौर कीजियेगा, 11 राउंड के मतदान में,भारत के न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी को महासभा में 193 देशों में से 183 देशों ने अपना समर्थन दिया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों में से पूरे 15 के पन्द्रह वोट मिले।

श्रेय चाहे जिसको भी मिले ऐसे मंज़र देश के लोगों में जज्बा अवश्य भरते है..? 

   अब भारत के “दलवीर भंडारी” 9 साल की अवधि के लिए इस पद पर अंतरराष्ट्रीय-मामलों के

मुख्य-न्यायाधीश बने रहेंगे।   

ये 183 देश “अंधे मोदी भक्त” हैं क्या..?  जिन्होंने भारत को वोट कर दिया..!!

   गौरव की बात तो ये है कि, न सिर्फ भारत के इतिहास में वल्कि जब तक दुनियाँ रहेगी तब तक “अंतरराष्ट्रीय इतिहास” में ये ‘उत्कृष्ट उदाहरण’ दर्ज रहेगा।

70 वर्ष की आजादी के बाद इतनी बड़ी उपलब्धि देश के लिए सराहनीय है।👍 

  जय हिंद-जय भारत।

168- हम-कदम..

कौन थे.. वे हम-कदम..?

जब अस्पताल नहीं थे तो बच्चे की नाभि से नाल काटते थे।

क्या उस वक्त लोग उनकी जाति से अनजान थे..कि उनके हम-कदम किस जाति के हैं..?

मेरा मतलब पिता से भी पहले कौन सी जाति की महिला या पुरुष बच्चे को स्पर्श करते थे.. ?

मुंडन करते वक्त भी बच्चा किसी से स्पर्श होता होगा।

शादी के मंडप में वे ही हम-कदम नाईं और धोबी के रॉल में अपना काम करने को मौजूद रहते थे।

लड़की का पिता लड़के के पिता से इन दोनों के लिए पहनने के कपडे.. रजाई-बिस्तर आदि सिफारिश करके दिलवाता था।

आज भी वाल्मीकि लोगों के बनाये हुए सूप से ही छठ-पूजा होती है। क्या आपको लगता है..? उसे छठ-मां स्वीकार नहीं करती..?

कौन थे वे हम-कदम..? जब हैंडपम्प नहीं थे तब आपके घर में कुँए से पानी की व्यवस्था करते थे..?

भोजन के लिए पत्तल कौन लोग बनाते थे..? क्या उस कर्मठ-जाति का भान नहीं था..?

कौन थे वे धुरन्धर..? दुल्हन बनी बेटियों की डोली अपने कंधे पर मीलो-मील दूर से लाते थे। उनके जिन्दा रहते किसी की मजाल थी कि आपकी बिटिया को कोई छू भी दे। कितना बड़ा विश्वास था!! हम लोगों में एक दूसरे का।

कौन थे वे हम-कदम..? जिनके हाथो से बनाये मिटटी की सुराही से ज्येष्ठ-मास की गर्मी में आपकी आत्मा तृप्त हो जाया करती थी.. ?

कौन आपकी छान-झोपड़ियां तैयार करते थे..?

कहाँ हैं वे हम-कदम..? जो फसल काटकर अनाज घर तक सुरक्षित पहुंचाने में अन्नदाता के कंधे-से कंधा मिलाकर जी-जान से काम करते थे..?

मांफ कीजियेगा कौन थे वे लोग..? जो आपके अंतिम संस्कार.. ‘चिता’ तक जलाने में भी सहायक सिद्ध होते थे..?

मेरे कहने का आशय स्पष्ट है..जीवन से लेकर मृत्यु तक सबको कभी न कभी एक दूसरे को स्पर्श करते ही थे, वे लोग। इसीलिए वे “हम-कदम” थे उन्हें कभी अलग नहीं किया जा सकता। हमें उन हम कदमों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, न कि उन्हें हेय दृष्टि से देखकर दुत्कारना। और आज कुछ लोग कहते हैं जब छुआ-छूत अधिक था ?? अगर बहुत पहले..रहा हो तो मैं कह नहीं सकता..वो भी किसी पिछड़े क्षेत्र में आज की तरह पूरे देश में व्याप्त नहीं रहा होगा।

दरअसल, मेरा शोध कहता है ये छुआ-छूत की बीमारी मुगलों व अंग्रेजों की देन है और बाद में इन मौकापरस्त नेताओं ने अपनी वोट-नीति के लिए हम सबको विघटित करके रखने का बहुत बड़ा षड्यंत्र है।

चाहे उच्च स्तर पर देश-दुनियाँ के नक्शे में देखकर समझ लो या ग्राम-समाज व पारिवारिक स्तर पर.. देख कर समझ लो आपको हर तरफ ‘डिवाइड & रूल’ का ही खेल नज़र आएगा।

अभी भी वक्त है..!! समझ जाइयेगा..

पहले भी जातियाँ थी, पर उन लोगों के हिर्दय में एक दूसरे के प्रति प्रेम व सम्मान की एक धारा बहती थी। वे एक दूसरे की खैर-ख़बर रखते थे। जिसका कभी कोई उल्लेख नहीं करता था। तब जनसँख्या-घनत्व कम होने से परिवार के लोग अनुशासित भी रहते थे। आज ऐसा कम ही देखने को मिलता है।

अगर जातिवाद होता तो राम कभी सबरी के झूठे बेर ना खाते,

निषादराज, केवट, आदिवासी, वनवासी उनके सहायक कभी न होते।

लगभग दस वर्ष की उम्र से जब से होश संभाला है तब से मैं किसी न किसी प्लेट-फॉर्म से पुरज़ोर आग्रह करता रहा हूँ और शायद ताउम्र करता रहुँगा..” भाइयों जाति-धर्मों में मत टूटिए.. मानव-धर्म को तवज्जो दीजिए सब ठीक हो जाएगा। . . .

देश की कमजोर कड़ी मत बनिये । सभी अपने-अपने स्तर से अपने लोगों को समझाएं कि सभी जातियाँ समान और आदरणीय,पूज्यनीय हैं।

अगर खराब होता भी है तो कोई “व्यक्ति-विशेष” होता है। उससे सम्बन्धित सभी लोग नहीं। वैचारिक मुद्दा है विचार कीजियेगा। 👍

जय श्री राधे

167- दो बातें

दो बातें अमल में लाने से मनुष्य का “व्यक्तित्व” वाक़ई निखर जाता है..

यदि आप ये समझें कि, कि आपके पास सब कुछ है, आप भौतिक स्तर पर लगभग सम्पन्न हैं, तो फिर आप!

जैसे; जब आप ये समझें कि, किन्हीं कारणों से आपके पास कुछ भी नहीं बचा.. तब

बात नंबर-एक ‘धीरज’ पर अमल अवश्य करें.. अर्थात धैर्यपूर्वक रहें..और

बात नंबर-दो ; अपने रोजमर्रा के आचरण में “व्यवहार” पर न केवल अमल करें अपितु विशेष ध्यान दें👍

साभार

166- अद्भुत-संस्मरण

राम धनुष टूटने की एक सत्य घटना……

ये मंज़र सन 1880 , अक्टूबर-नवम्बर में होने वाली बनारस की एक रामलीला मण्डली का है।

उस ‘रामलीला-मण्डली’ में करीब 22-24 कलाकार थे जो बनारस के एक गांव में किसी सज्जन व्यक्ति के घर रुके हुए थे।

सभी कलाकार प्रति दिन रिहर्सल करते और वहीं खाना बनाते-खाते थे…

पण्डित कृपाराम दुबे उस रामलीला मण्डली के निर्देशक थे। वही हारमोनियम पर बैठ के मंच संचालन करते थे। और एक फौजदार शर्मा नाम के व्यक्ति साज-सज्जा और रामलीला से जुड़ी अन्य व्यवस्था देखते थे…

एक दिन पूरी मण्डली बैठी थी और रिहर्सल चल रहा था तभी पण्डित कृपाराम दूबे ने फौजदार जी से कहा इसबार वो शिव धनुष हल्की और नरम लकड़ी की बनवाएं ताकि राम का पात्र निभा रहे 17 साल के युवक को परेशानी न हो..

क्योंकि पिछली बार धनुष तोड़ने में कुछ समय लग गया था…वो अच्छा नहीं लगता।

इस बात पर फौजदार कुछ कुपित हो गया क्योंकि पिछला धनुष उसी ने बनवाया था…

जिससे उस वक़्त पण्डित जी और फौजदार में थोड़ी कहा सुनी सी हो गयी..फौजदार तमोगुणी स्वभाव का था, वह पण्डित जी से कुछ ज्यादा ही नाराज हो गया..

और पंडित जी से बदला लेने की सोचने लगा….. संयोग से अगले दिन सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन होना था, मण्डली जिसके घर रुकी थी वह उनके घर गया और कहा रामलीला में लोहे के एक छड़ की जरूरत आन पड़ी है सो दे दीजिए…..

गृहस्वामी ने उसे एक बड़ा और मोटा लोहे का छड़ दे दिया। छड़ लेके फौजदार दूसरे गांव के लोहार के पास गया और उसे धनुष का आकार दिलवा लाया।

रास्ते मे उसने धनुष पर कपड़ा लपेट कर और रंगीन कागज से सजा के चुपके से गांव के एक आदमी के घर रखवा दिया।

रात में रामलीला शुरू हुई..तो फौजदार ने चुपके से धनुष बदल दिया और लोहे वाला धनुष ले जा के मंच के आगे रख दिया और खुद पर्दे के पीछे जाके तमाशा देखने के लिहाज़ से खड़ा हो गया…

रामलीला शुरू हुई पण्डित जी हारमोनियम पर राम चरणों मे भाव विभोर होकर रामचरित मानस के दोहे का पाठ कर रहे थे…

हजारों की संख्या में दर्शक शिव धनुष भंग देखने के लिए मूर्तिवत बैठे थे… लीला धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी सारे राजाओं के बाद राम जी गुरु से आज्ञा ले के धनुष भंग को आगे बढ़े…

पास जाके उन्होंने जब धनुष हो हाथ लगाया तो धनुष उनसे उठा ही नहीं..राम की भूमिका निभा रहे कलाकार को सत्यता का आभास हो गया। उस 17 वर्षीय कलाकार ने पंडित कृपाराम दुबे की तरफ कातर दृष्टि से देखा तो पण्डित जी समझ गए कि दाल में कुछ काला है…

उन्होंने सोचा कि आज इज्जत चली जायेगी हजारों लोगों के सामने..उन्हें लगा ये कलाकार की नहीं स्वयं ‘प्रभु राम’ की इज्जत दांव पर लगने वाली है..

पंडित जी ने कलाकार को आंखों से रुकने और धनुष की प्रदक्षिणा करने का संकेत किया और स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के चरणों में समर्पित करते हुए..पूर्ण श्रद्धाभाव से आंखे बंद करके अपनी उंगलियां हारमोनियम पर रख दी और राम जी की स्तुति शुरू करदी..

जिन लोगों ने ये लीला अपनी आँखों से देखी थी, बाद में उन्होंने बताया कि इस इशारे के बाद जैसे पंडित जी ने आंख बंद करके हारमोनियम पर हाथ रखा हारमोनियम से उसी पल दिव्य सुर निकलने लगे ऐसा वादन करते हुए किसी ने पंडित जी को पहले कभी नहीं देखा था…

सारे दर्शक मूर्तिवत हो गए… नगाडे से निकलने वाली परम्परागत आवाज भीषण दुंदभी में बदल गयी..

पेट्रोमैक्स टाइप ऑयल लैंप की धीमी रोशनी बढ़ने लगी आसमान में बिन बादल बिजली कौंधने लगी.. और पूरा पंडाल अद्भुत आकाशीय प्रकाश से रह रह के प्रकाशमान हो रहा था…

दर्शकों के कुछ समझ में नही आ रहा था कि क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है….

पण्डित जी खुद को राम चरणों मे आत्मार्पित कर चुके थे और जैसे ही उन्होंने चौपाई बोली—

“लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥

तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥”

पण्डित जी के चौपाई पढ़ते ही आसमान में भीषण बिजली कड़की और मंच पर रखे लोहे के धनुष को उसी कलाकार ने तत्काल दो भागों में तोड़कर रख दिया…

लोग बताते हैं कि ये सब कैसे हुआ..? और कब हुआ..?

मानो किसी ने कुछ नही देखा। ये सब एक पल में झट से हो गया..और धनुष टूटने के बाद सब स्थिति अगले ही पल सामान्य हो गयी पण्डित जी मंच के बीच गए और टूटे धनुष और कलाकार के सन्मुख दण्डवत हो गए….वाकई प्रभु की लीला अपरम्पार है।

लोग शिव धनुष भंग पर जय श्री राम का उद्घोष कर रहे थे..जय..जयकार कर रहे थे। और पण्डित जी की आंखों से श्रद्धा के आँसुओं की झड़ी लग गयी…

श्रीराम “सबके” है एक बार “श्रीराम का” होकर तो देखिए…..👍

It is narrated by my friend’s great grandfather when he was posted as a “Peshkar” in British ruled era. 🙏

165- सीख..

✍🏻 वृक्ष से सीखें..

“वृक्ष कभी भी गिरने वाले अर्थात अलग किए जाने वाले अपने फलों और फूलों के लिये परेशान नहीं होता है।”

मनुष्य का अजीज़ मित्र “वृक्ष” हमेशा नई कलियों को फूल बनाकर खिलाने व कच्चे फलों को पकाने की प्रकृति प्रदत्त अपनी प्रक्रिया में सदैव तल्लीन रहता है।

इस कथन से मेरा आशय भी कुछ वैसा ही है..कि, ‘मनुष्य’ भी उन चीजों में अपना “वक़्त” जाया करने के लिए नहीं बना है, जो प्रारब्धवश उससे दूर हो गई हैं या अपने जीवन को वो आकार नहीं दे सका है, जैसा उसने कभी सपना देखा था…या सोचा था.. !!

दरअसल, ‘मनुष्य’ ईश्वर की वो कृति है अर्थात उसमें वो सामर्थ्य है कि, वह मर्यादित रहते हुए अपने कार्य के प्रति समर्पित होकर स्वयं के अथक प्रयासों की से जो ठान ले, उसे प्राप्त कर लेने की सामर्थ्य रखता है।

इसीलिए..

हे मानव! तू वक़्त रहते सम्भल जा..!!इसी में तेरी भलाई है।

तू! ख़ुद को और अपनी क्षमताओं को जान ले, अपना ‘हरपल’ जीवन की बेहतरी में लगा दे।

Know your capabilities..& always do the “Best-Karma” for your life.. thanks 👍

: साभार 👍

164- उपवास

दुनियाँ में लोग अपने इष्ट को खुश करने के लिए क्या-क्या नहीं करते.. जैसे; अधिकतर लोग केवल खाद्यान्न का उपवास करके ही अपने को पावन मान लेते हैं।

जबकि मेरा ऐसा मानना है कि, आचरण की पवित्रता बनाये रखने के लिए

दुनियाँ में दिन प्रतिदिन गिरते नैतिक मूल्यों एवं मानव मूल्यों के स्तर को ध्यान में रखते हुए हमें अन्न आदि का उपवास लेने के साथ-साथ लोभ, लालच, पाप, चुगलखोरी, झूठ, फरेब, क्रोध, षड़यंत्र, जैसे; अमानवीय कृत्यों एवं बुरे विचारों का उपवास करने का संकल्प भी अवश्य लेना चाहिए..!!! 💐 👍

163-मन-दर्पण

आपने देखा होगा कार ड्राइव करते वक़्त पीछे का दृश्य देखने के लिए कार में एक शीशा दिया होता है। चलने से पूर्व ड्राइवर उसे अपनी अनुकूलता से सैट कर लेता है।

ठीक उसी प्रकार आपका मन रूपी दर्पण भी वैसे ही है। समझदार लोग इसे भी संसार के दृश्य देखने के लिए अपनी अनुकूलता के अनुसार सैट कर लिया करते है।

मेरा ऐसा मानना है कि, संसार तो सबके लिए एक जैसा ही है। परन्तु हम मनुष्यों के सोचने का.. संसार की घटनाओं को देखने और समझने का जो दृष्टिकोण है वह “पर्सन टू पर्सन डिफ्फरेंसीएट” करता है।

अर्थात सब का नज़रिया अलग-अलग होता है। इसलिए किसी को संसार सुखदाई लगता है,तो किसी को दुखदाई।

ऐसा कौन है ..?

जो संसार में सुख से जीना नहीं चाहता..।

कॉमन सेंस की बात है….सभी चाहते हैं।

जिस प्रकार कार का ड्राइवर अपने हिसाब से शीशे को सेट कर लेता है, और उसे सड़क के पीछे का दृश्य ठीक प्रकार से दिखाई देने लग जाता है। वैसे ही हमको अपना ‘मन-दर्पण’ प्राकृतिक नियमों के अनुरूप सैट कर लेना चाहिए।

यदि आप अपने मन के दर्पण को उन प्रकृति के नियमों के अनुसार सेट कर पाए, तो आपको भी संसार उसी प्रकार दिखाई देगा, जैसा के संसार के अन्य सुखी लोगों को दिखाई देता है और आप भी आनंद से जी पाएंगे।”

“मेरे कहने का तात्पर्य यह विल्कुल भी नहीं है, कि संसार बदल जाएगा, या इसमें होने वाली घटनाएं अब होंगी नहीं, और संसार में शुभ ही शुभ होगा,

यहां मेरा आशय भी वही है जो महाकवि तुलसीदास, अपनी एक चौपाई के माध्यम से बहुत पहले कह गए हैं..

“जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।।

जिस दृष्टिकोण से आप संसार या संसार के व्यक्तियों व चीज़ो को देखोगे जाहिर सी बात है वे भी आपको वैसी ही दिखेंगी।

ईश्वर न सुख देता है न दुख, हमारी ‘कर्म-गति’ के अनुरूप “जीवन में होने वाली घटनाएं अच्छी भी होंगी, और बुरी भी। मनुष्य के जीवन में आने वाला सुख-दुख तो उसके कर्म-संस्कार की नियति है जिसका जिम्मेदार मनुष्य स्वयं ही है।

‘विजडम’ आने से आपके सोचने का ढंग ऐसा हो जाएगा जो प्रकृति के सास्वत नियमों के अनुरूप होगा,

आपका नजरिया ठीक होने से दुख आपको अधिक प्रभावित नहीं करेगा। ऐसा करने से आप कम से कम दुखी होंगे तो अधिक से अधिक सुखी जीवन जी पाएंगे।”

अब सवाल उठता कि हमें किस दृष्टिकोण से संसार को देखना होगा..? इस सवाल के जवाब में मेरा अनुभव कहता है कि, व्यक्ति, वस्तु, घटनाओं से ऊपर उठकर हमें ‘विचार’ के प्रति गम्भीर होने के साथ-साथ हमारा चिंतन भी सदैव “सकारात्मक” होना चाहिए।

पॉजिटिव-थिंकिंग रखते हुए हर चीज को गॉड-गिफ्टेड अपने कर्म-फल के रूप में स्वीकारते हुए प्रकृति की सास्वत-व्यवस्था से प्राप्त “हमें बहुत कुछ मिला है। हमें जितना मिला, वह काफी है। हमारे जीवन को ठीक-ठाक चलाने के लिए पर्याप्त है। इस भाव में रहना चाहिए।

और दूसरी बात — ” मानलो कुछ चीजें जो आपको आपकी इच्छा के अनुकूल, या अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाई, उनके बारे में भी निराशा धारण न करते हुए.. यही सोचेंगे, कि “कोई बात नहीं। अब नहीं मिला, तो आगे मिल जाएगा।

चलो उसके लिए और अधिक प्रयास करेंगे। शायद हमारे पुरुषार्थ में कहीं कमी रही होगी, इसीलिए वह वस्तु हमें प्राप्त नहीं हो सकी। हम अब और अधिक पुरुषार्थ करेंगे। सास्वत सत्ता की कृपा से भविष्य में वह वस्तु भी मिल जाएगी।” और यदि नहीं भी मिली, तो भी हम यही सोचेंगे, कि “कोई बात नहीं। संसार में ऐसे करोड़ों व्यक्ति हैं, जिनको ये सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं, जितनी सुविधाएं हमें आज प्राप्त हैं। हम उतने में ही संतोष कर लेंगे।” यदि हमारे चिंतन का स्तर ये होगा तो कभी दुःखी नहीं होंगे।

यदि आप इस ढंग से मन के अंदर विचारों से अपना “माइंड-सैट” कर लेंगे, तो आप कभी दुखी नहीं होंगे। सदा सुखी शांत प्रसन्न और आनंदित ही होंगे। कभी शिकायत नहीं करेंगे। ऐसा सोचने से “आपका संसार सुंदर एवं उत्तम होगा। आप सदा ईश्वर का और समाज के लोगों का धन्यवाद ही करेंगे। शायद यही सुख पूर्वक जीवन जीने का रहस्य है।”👍

162-डिग्री या संस्कार

पढ़िए

एक पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी का अनुभव क्या कहता हैं:-✍️

“2009 में जब शशि थरूर राजनीति में आए तो, मैं बहुत उत्साहित था। मुझे अब भी अपने कई एनआरआई दोस्तों से बात करना याद है कि कैसे भारत की राजनीति बेहतर तरीके से बदलेगी और उनके जैसे बुद्धिमान लोग राजनीति में शामिल होंगे।”

“फिर 2013 तक, मेरा कांग्रेस से मोहभंग हो गया और मुझे लगा कि अन्ना हजारे, आईआईटीयन केजरीवाल, आईपीएस किरण बेदी, अभिनेता आमिर खान द्वारा समर्थित भारत में एक नए बदलाव की शुरुआत होगी। मैंने भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत को कुछ दान भी दिया, रामलीला मैदान में जाकर नारे भी लगाये।”

“अब अगर मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मैं केवल खुद पर हंसता हूं। लेकिन मुझे खुशी है कि मेरी अपनी सोच में जो खामी थी मुझे उसका एहसास, तो हो गया ।

हमारे द्वारा शशि थरूर या केजरीवाल जैसे लोगों का समर्थन करने का कारण यह है कि वे उचित संस्थानों से शिक्षित हैं।

बचपन से ही हमारा ब्रेनवॉश किया जाता है कि व्यक्ति में अच्छी शिक्षा से ही अच्छाई आती है.”.

मग़र नहीं ऐसा विल्कुल नहीं है।

चिदंबरम हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए हैं और हम सब जानते हैं कि उन्होंने क्या किया..?

कैम्ब्रिज से हैं मणिशंकर अय्यर हम सभी जानते हैं कि वह किस तरह की बकवास करते हैं।

कपिल सिब्बल हार्वर्ड लॉ ग्रेजुएट हैं और वे केवल आतंकवादियों के लिए दया याचिका लिखते हैं और गोमांस बेचते हैं।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास पार्टी में उच्च शिक्षित लोग नहीं थे। कई एक थे। लेकिन वे सभी दिमांगी तौर पर बदमाश ही थे। और

कई तरह से स्पष्ट हो चुका है..कि, एक सामान्य स्तर पर शिक्षा प्राप्त व्यक्ति से एक ‘उच्च शिक्षित-बदमाश’ समाज के लिए कहीं अधिक खतरनाक साबित होता है।

क्योंकि वह आपको और भी नए-नए तरीकों से ठगता है।

इस्लामी आक्रमणकारियों से लेकर अंग्रेजों तक सभी को उच्च शिक्षित और बुद्धिमान भारतीयों का समर्थन प्राप्त था।

हाँ, आपको देश पर प्रभुता करने के लिए उनकी आवश्यकता है? इसलिए भारत के शासकों ने बदमाशों का एक समूह बनाकर देश में बदमाशों की एक फसल जैसी वो डाली। जो आम जनता पर शासन करने और हमें सदैव गरीब रखने में अच्छी तरह से पारंगत थे।

अब नेहरू चाचा और उनके परिवार ने भी इसी प्रवृत्ति को बल दिया और ऐसे तत्वों के लिए समर्थन जारी रखा। और भारत पर शासन करने के लिए उच्च शिक्षित बदमाशों का एक समूह तैयार करते चले गए।

आज इस समूह को ‘पॉलिटिकल-लैंगुएज’ में लुटियन कहा जाता हैं। क्योंकि वे दिल्ली में लुटियंस नामक क्षेत्र में रहते हैं और वे हमेशा आप जनता को लूटने की ही योजनाएं बनाते रहे हैं। मांफी चाहूँगा देश के नेताओं की वास्तविक तश्वीर आपके समक्ष प्रस्तुत करने का कोई प्रयास नहीं है.. ये तो मेरा एक ‘तुलनात्मक-अध्ययन’ है। इसलिए मेरे कुछ राजनैतिक साथी इसे अन्यथा न लें।

भाजपा के सत्ता में वापस आने और मोदी को पी.एम.प्रोजेक्ट करने से देश की राजनीति में क्या-क्या अहम बदलाव आये.. ?

इसने मेरे जैसे कम अक्ल लोगों को यह एहसास अवश्य कराया है। कि “आई वी लीग-डिग्री” आपको देशभक्त नहीं बनाती है,

इससे आप में ईमानदारी नहीं आती है या कोई भी अच्छाई नहीं सिखाती है। दूसरे,

“जो लोग भारत की संस्कृति और सभ्यता के लोकाचार के आधार पर.. अपने चरित्र, एवं व्यक्तित्व का विकास करते हैं उनमें देशभक्ति और अच्छाई कूट-कूट कर भरी होती है।”

विश्वास न हो तो एक प्रयोग करें:

आप देश के किसी भी हिस्से में और वर्ष के किसी भी समय किसी भी .. यादृच्छिक आर.एस.एस. शाखाओं में जाएं..

और देखें कि वे देश के युवकों को क्या सिखाते हैं –

देशभक्ति, सच्ची-सेवा, अच्छाई, ईमानदारी और सादगी प्रतिदिन सिखाते हैं जो देश के नागरिकों के लिए नितान्त आवश्यक है।

वहाँ यह हर दिन और पूरे वर्ष भर निरन्तर सिखाया जाता है।

अब आप ही बताईये..

आइ.वी.लीग. यूनिवर्सिटी, आई.आई.टी, आई.आई.एम, सेंट स्टीफेंस, दून-स्कूल या कोई भी स्कूल जहां आप फीस के रूप में लाखों रुपये भरते हैं..?

क्या ये संस्थान देश के लिए युवकों में “चरित्र-निर्माण” करते हैं..? हमारे आई.पी.एस. महोदय बताते हैं..कि,

“मैं दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में गया हूं, मेरे पास छह डिग्री है लेकिन मेरी शिक्षा ने मुझे देशभक्ति या अच्छाई कतई नहीं सिखाई..”

इस विश्लेषण के आधार पर मैं ये कहने को मजबूर हूँ..कि देश में प्रचिलित ये अन्य शिक्षण संस्थाएं हमें मानवीय-संवेदनाओं से परे केवल एक पूर्ण भौतिकवादी नोट छापने की मशीन ही बनाती हैं।और कुछ नहीं।

मेरे माता-पिता ने मुझे पढ़ाया और मैंने स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखी गई पुस्तकें पढ़ीं..

वह व्यक्ति जिसे मैं शहीद भगत सिंह की मूर्ति मानता हूं जिन्होंने देश के लिए वो किया जो डिग्री धारक कभी नहीं कर सकते..

वही आर.एस.एस. की शाखाएं संघ के सभी कार्यकर्ताओं के लिए प्रतिदिन करती हैं।

इसीलिए तो मोदी जैसे अनेक लोग इतने देशभक्त और ईमानदार हैं।

मुझे परवाह नहीं कि वह स्कूल गये थे या उन्होंने किसी विषय में एम.ए.भी किया था या नहीं।

एक व्यक्ति जो स्वामी विवेकानंद को पढ़ता है या आर.एस.एस. की शाखा में जाता है, देश में किसी भी स्तर पर हो रही गड़बड़ी से आहत होता है और अपने पद-प्रतिष्ठा व अपनी जान तक की भी परवाह न करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है। वह हर पैमाने पर.. आई.आई.टी. या हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की डिग्री वाले उन बदमाशों से कहीं अधिक बेहतर हैं।

वरना अधिक शिक्षित लोग परिवार,समाज, व देश-दुनियाँ की हरपल लुटिया डुबोने में लगे हैं।

यस, मेरे ख्याल से आज देश की युवा पीढ़ी को इसी तथ्य को गहनता से समझने की आवश्यकता है।

हम, अपने स्वयं के लोकाचार , भारतीय संस्कृति व अपने देश की अच्छाई में ही विश्वास करें।

कम पढ़े-लिखे जरूर हैं मग़र ऐसे गद्दारों से हर दृष्टि में बेहतर हैं।

जरूर पढ़ें।👆

सभी लेखों की तुलना में शायद मेरा ये लेख कहीं अधिक “आई-ओपनर” है।

इसीलिए एकबार पढियेगा जरूर

धन्यवाद👍

161- काबिल ए तारीफ़

“रोजमर्रा के अपने व्यवहार में आपको कुछ लोग ऐसे भी मिलते होंगे, जो आपकी पीठ पीछे निंदा करते होंगे..

और ज़ाहिर सी बात है, जिनमें कुछ समालोचक होंगे तो कुछ आलोचक भी होंगे।

मेरे अनुभव की समझ ये कहती है कि, आप कभी भी ऐसे लोगों से घृणा मत करिएगा। वे आदतन मुफ्त में आपको.. ‘आपकी’ कमियों की जानकारी देते हैं, वर्ना

आप ही बताइयेगा..? इस दुनियाँ बिच ‘ग़लती’ किससे नहीं हों दी ए ..? “एरर इज ह्यूमन” प्रोवर्ब को कौण नी जां न दा. ए..? आलोचक हों या समालोचक आचरण की शुद्धि के लिए तो वे एक आवश्यक कैरेक्टर हैं।

सोचो! यदि किसी मामले में बड़े वकील साहब से आप परामर्श लें, तो फीस के नाम पर लाखों रुपया देना होगा। सही-सलाह महंगी हो गई हैं.. फिर भी उस सलाह की कोई गारेंटी नहीं है।

दरअसल, आप मेरे चश्मे से देखें, तो ऐसे चरित्र के लोग “काबिल ए तारीफ़” होते हैं न कि उपेक्षित।

ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति आप को मुफ्त में अच्छी सलाह दे रहा है..आपके चित्त का शुद्धिकरण कर रहा है, तो मेरे ख़्याल से वह आपका बहुत बड़ा शुभचिंतक है।

वह व्यक्ति चाहे आपके सामने आपमें दोष निकाले, चाहे वह आपकी पीठ पीछे आपकी किसी कमी को अन्य लोगों से कहता फिरे.. और भले ही वह जानकारी वाया-वाया आप तक पहुंच जाय। हालांकि, उसका ये रवैया जैसा भी है। आखिरकार है आपके हित में ही।

आप उस व्यक्ति द्वारा बताई गई अच्छी सलाह पर अथवा उसके बताए गए खुद के दोष पर खूब गहराई से चिंतन करें,सोचें, विचार करें.. उन्हें यथार्थ की कसौटी पर परखें “उसने जो आपमें दोष निकाले हैं.. क्या वे सही है..? क्या वे दोष वास्तव में आपके अंदर हैं.? यदि हैं, तो उस सत्य को तत्काल स्वीकार करें, और उन दोषों को अविलम्ब दूर करें, तो इससे आपके आचरण की शुद्धि होगी। और जीवन पवित्र होगा। जिससे आपके सारे दुख दूर हों जाएंगे।

जिन कमियों के कारण आप जो गलतियां करते थे..अपराध होते थे..वे गलतियां, वे अपराध सब दूर हो जाएंगे। अर्थात भविष्य में आप वैसी गलतियां पुनः नहीं दुहरायेंगे। और उनके दंड से भी बच जाएंगे।”

इससे स्पष्ट होता है कि, यदि कोई व्यक्ति कभी आपके बारे में कभी इस तरह की बात करता है तो वह अपनेपन से आपको करेक्ट करने की चेष्टा कर रहा है।

इसीलिए वह घृणा का नहीं सदैव धन्यवाद का पात्र है। आपको तो उपकार मानना चाहिए। और जब भी वक्त मिले, उसका हिर्दयतल से आभार व्यक्त करना चाहिए।

दूसरा पक्ष — “उसके द्वारा बताई गयी कमियां यदि आपके अंदर हैं ही नहीं, तो फिर चिंता किस बात की..? तब तो आपको मस्त एवं प्रसन्न रहना चाहिए।”

क्योंकि दुनियाँ में बहुत से लोग अल्पज्ञ के साथ-साथ अपने-अपने पूर्वाह ग्रहों से भी तो ग्रसित रहते हैं। उन लोगों के जानने में.. अर्थात आपको ठीक से समझने में कई बार भूल भी हो,तो सकती हैं। कभी-कभी वह अज्ञानतावश भी आप पर झूठे आरोप-प्रत्यारोप लगाये जा सकते हैं। और कभी जानबूझकर भी।

चाहे अनजाने में लगाए अथवा जानबूझकर लगाए, उनके कर्म का फल तो वे ही भोगेंगे। परंतु आपको तो उनकी बात से लाभ उठा लेना चाहिए। जैसा कि ऊपर बताया गया है। “यदि आप ऐसा करेंगे तो आपके दोष कम होते जाएंगे, और आप में अच्छे गुण आते जाएंगे।

परिणामस्वरूप “आपके दुख कम होते जाएंगे, और सुख बढ़ते जाएंगे।”

” जिससे आपका जीवन आनंदमय होगा”

इसीलिए वे लोग..

“काबिल ए तारीफ़!!!” हैं। 👍