180 दुष्परिणाम

हमारे देश व प्रदेश की सरकारों द्वारा लागू की गयीं अधिकतर योजनायें सिर्फ कागज पर..सजायी जाती रही हैं और पैसा सम्बंधित लोग मिल बांटकर हाऊ-हप्प कर जाते हैं। ये बात ऊपर से नीचे तक सब समझते हैं… कभी-कभी मीडिया जाने-अनजाने सही काम कर जाता है..तो मुद्दा उछल भी जाता है,मग़र वे सब बहुत अच्छे ‘एक्टर ही नहीं रिएक्टर’भी हैं। जनता की एक नब्ज जानते हैं..इसलिए आश्वस्त करके कानूनी प्रक्रिया के पेच फंसा कर धीरे व चुपके से साफ निकल जाते हैं। ये विचारणीय, बिंदु क्या..? निसंदेह “निंदनीय” है।

मग़र अफसोस! जबतक देश की ‘जनता’ नेताओं द्वारा फेंके गए ‘जाति-धर्म’ के जाल में उलझी रहेगी तब तक उसका कुछ भी भला नहीं हो सकेगा।

हाल ही में.. मैं अंतरराज्यीय यात्रा से लौटा हूँ..ट्रैन का इंतजार करते वक्त जब मैं रेलवे ‘वेटिंग-रूम’ में बैठा था,तो वहां मेरी एक 36 वर्षीय बेरोजगार-युवक से बात हुई.. आपको उसी वार्ता के कुछ अंश……..सुनाता हूँ..जिससे देश में चल रही योजनाओं के परिणाम/दुष्परिणाम की तश्वीर स्पष्ट हो जाएगी।👍

मैंने शुरुआत यहां से की, कि और भई! क्या करते हो..? वह बोला :– बाबूजी! आजकल हम गरीबन कूँ कछु करने की जरूरत ही कहां है.? मैंने कहा :– क्या कहा..!! वो कैसे…..?

वह बोला :–बु ऐसे कि, आजकल देश/ प्रदेश की ससुरी सरकारन की योजनन में हम गरीबन कूँ सारी व्यवस्थाएं सेट जो कर दई हैं.. जैसे..शादी के लें.. श्रम कार्ड ते ‘मुख्यमंत्री राजमाता विजय राजे विवाह योजना.. 30,000 रुपिया और अंतर्जातीय कन्यादान योजना ते..250,000 रुपिया भी मिलत ए।

मैंने कहा :–भई! आपके बाल-बच्चे.. होंगे उनके लिए तो कुछ कमाना होगा…?

वह बोला :– जननी सुरक्षा ते डिलीवरी फ्री ए और साथ मे 1400 रूपिया कौ चेक। मे पास श्रम कार्ड हतुये। वा ते भगिनी प्रसूति योजना में वा टेंम मोय 20,000 रु और मिले हुते।।

मैने बोला :– बच्चे बड़ें होंगे.. पढ़ाई लिखाई के लिये भी तो पैसा चाहिए….?

वह मुस्कराकर बोला :– अरे बाबू जी जाकौ मानी आप बहुत ही भोले इंसानो..ई ससुरी सरकार बचवा लोगन की पढ़ाई, डिरेस,कितबिया और दुपैर का खनवा सब कछु फ्री…! देबत रही। श्रम कार्ड से ‘मुख्यमंत्री नौनिहाल और मेधावी छात्रवृत्ति योजना’ में हर साल बहुत पैसा मिल जातुए। साथ में लरिका कॉलेज हू कर रहौ है, आरटीई से डालकर BPL होने की वजह से बा कूँ फ्री एडमिशन और वजीफा दोनों मिलत ए। ताई ते तो हूँ ऐश कर रह तूं।

मैने बोला :– बरखुरदार! आपका घर कैसे चलाता है..?

वह बोला :– सब कछु योजनन ते है रो ए। जैसे; मेरी छोटी लरकिनी कूँ अभी सरकार ते साइकिलया मिली हैं। लरिका कूँ लॅपटाप, और बूढ़े मॉ-बापन कूँ वृद्धावस्था पेन्शन , और 1 रूपये किलो में गेहू और चावल भी मिलतए। तो बताओ घर चलावे की बात कर रये हो.. अब सब गरीबन कौ घर तो खूब दौड़ भररौ ए।

हालांकि, मुझे देश में चल रही योजनाओं की जानकारी थी। मग़र देश का आमजन/गरीब तबका / जरूरतमंद इन योजनाओं को इस रूप में ले रहा है इसका बिल्कुल भान नहीं था। वाक़ई उसकी बातें सुनकर मैं स्तब्ध रह गया!!! ज़ाहिर सी बात है कि, कोई भी शिक्षित-व्यक्ति योजनाओं के इस बैड-इफ़ेक्ट को सुनकर या समझकर चिंतित ही होगा। अब बात शुरू की थी तो ट्रैन आने तक कुछ तो बात करनी ही थी।..

मैं बोला :- अरे भई ! माॅ-बाप को कभी तीर्थयात्रा पर या कहीं घुमाने का मन हुआ, तो पैसा कहां से लाओगे..?

उसने कहा ……..अरे सर, एकबार तो मैंने उन लोगन कूँ मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना ते भेज भी दयो ए।

मैं बोला ……..हारी-बीमारी अर्थात इमरजेंसी के लिए.. ही सही दुनियाँ में आये हो तो कुछ काम तो तुम्हें करना ही चाहिए।

उसने कहा …….जा के लें तो हम सब गरीबन पै आयुष्मान कार्ड है न, जा से फ्री में पांच लाख तक कौ इलाज है जा तुये।

फिर मैंने बोला :–मांफ कीजियेगा..दुर्भाग्यवश आपके मा-बाप की उम्र है अगर अचानक चल वसे,तो अंतिम-संस्कार करोगे या नहीं..?उसमें तो पैसा खर्च होगा..?

वह बोला :–सरकार ने वा के लें भी 1 रू में ‘विद्युत शवदाह गृह’ बनवा रखे हैं..! बुड्ढे-बुढ़िया न कूँ उसी हीटरवा पै रखवा दंगो।

मैंने कहा :– अपने बच्चों की शादी-वादी के लिए तो कुछ सोचा होगा।..भई ! कर्म तो करना पड़ेगा। खाली दिमांग तो वैसे भी शैतान का घर कहा जाता है।

इस पर वह मुस्कुराया और चुटकी लेते हुए कहने लगा :–बाबूजी आप बड़ी जल्दी भूल जाओ। घूम फिर कर आप ! फिर ते बा ई बात पै आइगए। … तो फिर सुन लेउ…बच्चों की शादिया भी वैसे ही करुंगो जैसे मेरी भई थी…!! सरकारी योजना न ते।

अच्छा एक बात बता ये अच्छे-अच्छे कपड़े तू कहाँ से पहनता हैं ?

वह बोला :– राज की बात हैं..फिर भी मैं आपकूँ तो बता ही देता हूँ… “सरकारी जमीन पर कब्जा करो आवास योजना मे लोन मंजूर करवा लो और फिर वा ही मकान कूँ बेच कर फिर जमीन कब्जा कर पट्टा ले लो…!!” दूसरे तुम जैसे लाखों सर्विस-क्लास लोग काम करके हमारे लिए टैक्स भर ही रहे हैं। और किसान खेती में मेहनत करके अनाज पैदा करता है और सरकार उनसे औने-पौने दामों में खरीद कर हमे मुफ़्त में देती है ताकि हम काम न करें..बस वोट देने के लिए सदा ब ई गरीबी रेखा के नीचे बने रहें। फिर आप लोग क्यों बार-बार कहत रहे..कि हम कूँ काम करना चाहिए…?

वास्तव में ये बहुत बड़ी विडंबना है!!! देश व प्रदेशों की सरकारें हमारी मेहनत की कमाई कैसे लुट कर लोगों को निकम्मे बना रही हैं। वाह रे नेताओ..भारत माता की जय ….. वंदे मातरम…….🙏

179-मनभेद

मत,विचार,राय या फिर मशविरा..ये सब लगभग एक दूसरे के पर्याय तो हैं ही।

मत अर्थात विचार..

लोगों के बीच ‘मतभेद’ होना कोई बड़ी बात नहीं, क्योंकि विचार धाराएं हमेशां ‘पर्सन टू पर्सन डिफ्रेंसियेट’ होती हैं। लेकिन यदि मन में किसी के प्रति कोई द्वेष या भेद घर कर जाए तो वह धीर-धीरे ग्रंथि बन जाती है जो गलत है। वही एकदिन ‘मनभेद’ का रूप ले लेती है उससे सदैव दूर रहना होगा।

एक ऑथेंटिक रिपोर्ट के आधार पर दुनियाँ के लगभग अस्सी फीसदी लोग इस ‘मनभेद’ नामक भयंकर बीमारी के शिकार होते हैं।

एक और बात जहाँ ‘समर्थन’ या ‘विरोध’ के स्वर सुनाई पड़ते हैं, ज़ाहिर सी बात है वहाँ ‘वैचारिक मतभेद’ होते हैं।

मग़र आप गौर कीजियेगा जब कभी भी किसी अमुक व्यक्ति के विरोध या फिर समर्थन में ऐसे स्वर उठते हैं..उस वक्त वह बन्दा रिएक्ट ऐसे करता है..जैसे कि व्यक्तिगत समर्थन या विरोध उसी का हो रहा है क्या। जबकि धरातल पर ऐसा है नहीं।

मेरी राय में तो विरोध या समर्थन कभी किसी ‘व्यक्ति’ का होता ही नहीं है, ये तो सदैव किसी अनुपयुक्त या अनसुईटेबल ‘सोच’ का हुआ करता हैं।

इसीलिए तो कहा जाता है कि, “घृणा सदैव अपराध से करो अपराधी से नहीं।”

अच्छा ये भी जरूरी नहीं कि,”व्यक्ति के विचार व सोच का पैरामीटर हर समय उचित ही काम करे। समाज में अच्छी छबि वाला व्यक्ति भी दूषित वातावरण के कारण.. पूर्वाग्रह से ग्रसित होने पर अपने गलत विचार-प्रभाव से.. किसी सन्दर्भ में अनुचित बात कर सकता है.. ठीक वैसे ही निहायत अनसमझ कहे जाने वाले व्यक्ति का विचार सही हो सकता है।

मेरे ख़्याल से व्यक्ति को अपने जीवन में सच की कसौटी पर बने रहने के लिए..”भोजन के रूप में लेने वाले ‘अन्न’ के साथ-साथ रहन-सहन के शुद्ध वातावरण का भी बहुत बड़ा रोल है। मग़र ये सब प्रारब्ध के अधीन होता है।

अक्सर आपने देखा होगा..हर घर-परिवार के बीच कई एक बिंदुओं पर ‘बाप-बेटे’ की ‘राय’ भी अलग-अलग होती है..क्योंकि वह वैचारिक-धरातल पर उनका अपना-अपना ‘मत’ है। और ‘विचार’ का अपना एक दायरा भी होता है। दायरे से बाहर जाने पर उसी वैचारिक-अंतर-भेद को ‘मतभेद’ करार दे दिया गया है, हालांकि, मतभेद कोई असहज प्रतिक्रिया नहीं है। ये एक पूर्ण स्वाभाविक प्रक्रिया है।

अन्य सन्दर्भ में, यदि किसी वार्तालाप के दौरान वक्ताओं के बीच ‘मतभेद’ ज्यादा हों तो वहां समझदारी अपने को विड्रॉ कर लेने में है। यदि हम वक़्त रहते ऐसा कर पाएं, शायद हमेशा ‘मनभेद’ जैसी भयंकर बीमारी वहीं से लगती है।..

क्योंकि आवेश में आकर जब वक्त के रूप में हम अपनी हद लांघने लगते हैं तब ‘मतभेद’ जो है कब ‘मनभेद’ बन जाता है..ये पता ही नहीं चलता। ऐसी स्थिति से ही तो बचना है। धन्यवाद👍

178-दिल है कि मानता नहीं..

अपने कर्मयोगी माता-पिता, पारिवारिक संस्कार,गुरुओं के आशीर्वाद व अच्छे साथियों की संगति से ..जीवन के आरम्भ से ही सरल स्वभाव मेरे आचरण का हिस्सा रहा है। इसलिए जहाँ तक सम्भव होता है। सभी की भावनाओं का सम्मान करने की मेरी कोशिश होती है। मग़र एक दायरे तक।

मेरी माँ के अनन्त में विलीन होने के महज़ दस महीने के अंतराल पर जब मेरी सुयोग्य पत्नी मेरी ज़िंदगी ‘नीरज चौधरी’ सत्रह फरवरी,2022 को इंटेस्टाइन के एक सामान्य से आपरेशन के बाद ठीक होते-होते उन्नीसवें दिन आगरा के एस एन मेडिकल कॉलेज, में छह मार्च,2022 को अचानक मुझ से हाथ छुड़ाकर वे भी अनन्त में विलीन हो गयीं, तो ये मंजर न सिर्फ असहनीय था, वल्कि बहुत ही अप्रत्यासित भी था।

बात लम्बी है मगर सारे मंजर को क्लियर करती है। उनकी अंतिम यात्रा,अंतिम संस्कार सब कुछ अपनी आँखों से देखा, सारे आवश्यक कर्म-कांड हमारे होनहार बेटे के हाथों विधिवत होते देखे, गांव में अपनी पैतृक हवेली पर त्रियोदशी तक लोगों के बीच भी बैठे। रोजाना आने वालों का तांता लगा रहा.. घर-परिवार व नाते-रिश्तेदारों को उनकी याद में ख़ूब रुदन मचाते देखा।

मग़र न जाने क्यों ‘दिल है कि मानता नहीं’ कि, ‘देवीजी’ अब इस दुनियाँ बिच नहीं हैं.. दिल यही समझता रहा.. कि गांव में नहीं, तो अपने माइके में..या हाथरस वाले घर पर होंगी..

त्रियोदशी के बाद पंद्रह वें दिन हरिद्वार में गंगा तट पर ‘अस्थि-विसर्जन’ के समय शायद उनकी अंतिम विदाई के ख़्याल से मन बहुत भारी हो गया..था। उस वक्त दिल ने कुछ महसूस किया होगा.. तो मेरे अन्तर्मन में एक अजीब से घबराहट हुई..थी।

जब वह बीमार हुई तो सोलह फ़रवरी की रात हॉस्पिटल के डॉक्टटर्स व उनके दोनों डॉक्टर्स भाइयों के परामर्श पर नीरज जी को हॉस्पिटल सिनर्जी प्लस, आगरा ले के गए थे..इलाज के उन्नीस दिन और ये पंद्रह दिन अर्थात..बीस मार्च, 2022 तक नियति के हाथों मजबूर हमने विधिवत तरीके से उनके सारे संस्कार पूरे किए..फिर गांव आकर .. अगले दिन इक्कीस मार्च की सुबह लगभग चार बजे अपने आपको ठगा सा महसूस करते हुए बड़े भारी मन से दोनों बहन,बहनोई,बेटी-दमाद,प्यारी सी नातिन व बेटे रॉबिन के साथ..गांव से अपने हाथरस वाले घर के लिए रवाना हुए..

(19+15) चौंतीसवें दिन नीरज जी के बिना जब कॉलोनी में हमारी एंट्री हुई, तो अपने जीवन की ‘अधूरी कहानी’ के ख़्याल से..दिल को ऐसा लगा कि कॉलोनी की गलियां, पार्क, घर के सामने चौपाल के आस पास खड़े कुत्ते जिन्हें देवी जी नियम से रोटियां खिलाती थीं. ये सभी मुझ से पूछ रहे हों कि, मास्टरनी कहां हैं.. ? इस भाव से विह्वल होकर मेरे मन में एक हूक सी उठी..

नियति के सामने खुद को इतना मजबूर मैंने इससे पहले कभी नहीं पाया था। जैसे ही घर में घुसे,तो उनकी चीजों को देख-देख कर तो सब्र की इन्तिहा हो गयी.. अब तो बस दिल बैठने लगा..बच्चों से अपने आंसू छुपाते हुए बाथरूम में चला गया। अपने आपको सम्भालते हुए, पौधों में पानी लगाने के बहाने घर से बाहर चला आया।

मग़र मेरा धर्मसंकट समझिए .. कि मैं उस वक़्त एक मर्द होने के नाते..न केवल नीरज जी का पति ही था।अपितु उनके बच्चों के लिए एक पिता, दामाद जी के लिए गुरु के साथ साथ एक ससुर, दोनों बहनों का छोटा भाई, आई मीन एक ही समय में वहां उपस्थित सदस्यों के लिए मैं,कई एक रोल्स में था। इसलिए मेरे धैर्य की परीक्षा थी।

गांव में बुजुर्ग तेरह दिन तक यही तो समझाते रहे कि “बेटा! अब तुम्हें समझदारी से बहुत भारी-भरकम होना होगा” उस वक़्त ऐसे ख्यालों से किसी तरह मैने जज़्बातों पर काबू पाया।

हमारे व घर के हालात देखते हुए तसल्ली के लिए सभी रिश्तेदार हफ्ते दस दिन के लिए घर पर हमारे साथ ही रुक कर समझाते रहे..हमारा मन बांटते रहे..

ये पढ़कर आपको लग रहा होगा.. कि मानसिक स्तर पर लिखते वक़्त भी मेरी हालत बहुत अच्छी नहीं है।

मग़र ऐसा नहीं है अब दिल ने स्थिति को काफी समझ लिया है वह जान गया है कि अब ताउम्र ऐसे ही रहना होगा।

फिर बेटे रॉबिन की फुटबॉल के लीग मैच चल रहे थे .. तो वह दिल्ली चला गया ,इधर मैं कॉलेज की बोर्ड परीक्षाओं के कारण विद्यालय जाने लगा इस तरह धीरे धीरे व्यस्त होते गये। ड्यूटी जाने-आने से मेरी मनःस्थिति बदलने में मेरे विद्यालय-परिवार के साथियों ने भी मेरी बहुत मदद की।

वैसे खाली जगह तो किसी की कभी भरी ही नहीं जा सकती.. लेकिन नीरज जी जैसे चरित्र तो बहुत कम होते हैं दुनियां में इसलिए उनकी तो कभी भी नहीं..ऐसे व्यक्तित्वों में बेसुमार विशेषताएं जो होती है। जब मेरे हाथ कुछ बचा नहीं,तो अब उनके गुणों को बताने का क्या प्रयोजन..? ?😢

दरअसल, बच्चों के साथ-साथ मैंने हमारे पूरे परिवार ने नीरज जी को सदैव भरपूर प्यार व सम्मान दिया जो उनका हक था।

मग़र मैं, ऐसा सोचता हूँ कि, नीरु अपनी अधिक उदारता के कारण..सिर्फ ‘हाउस-वाइफ’ के फ्रेम में ही स्थापित होकर रह गयीं। जबकि वे एक सफल बिज़निस-वुमन, समाज-सुधारक वाली सूझ-बूझ व प्रतिभा की भी धनी थी।

नीरज जी को खो कर..सिर्फ एक पत्नी को ही नहीं.. मैंने एक बहुत ही गुणवान,तेज तर्रार सलाहकार व अपने एक अज़ीज दोस्त को भी खो दिया है।

इसीलिए मेरा तो कोई ऐसा पल नहीं है जब मैं उनकी कमी महसूस न करता होऊं। मैं विल्कुल भी अकेला नहीं हूँ, हरपल उनकी यादों के नगर में ही रहता हूं। मैं हरपल उन्हें अपने संग पाता हूँ। उमीद करता हूँ उनकी यादों के सहारे एकदिन ‘वक़्त’ मुझे भी पास आउट करदे।

मुझे इस बात का पछतावा सदैव रहेगा। क्योंकि गांव में हवेली वाले अपने लिविंग-पोर्शन का री-कंस्ट्रक्शन,

बिज़निस पॉइंट ऑफ व्यू से गांव में बनीं रोड-साइड दुकानें व बिल्डिंग,

खेरिया पर ओंन रोड टू-वे साइड खरीदा गया बेहतरीन लोकेशन का चार बीघा खेत कम प्लॉट..

ये सब देवीजी की ही सूझ-बूझ का नतीजा है। अब कोई मोटिवेटर न होने से लग रहा है कि, प्रगति का सिलसिला थम ही जाएगा।

हाँ, वक़्त को यदि मंजूर हो, तो हम चाहेंगे ईश्वर हमें शक्ति व सामर्थ्य दें कि, आने वाले समय में उनके ‘विज़न’ को धरातल पर क्रियान्वित कर..हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएं।

क्या करें..प्रारब्धवश उनकी उम्र ही कम पड़ गयी..जिससे नियति के आगे किसी का कोई बस न चल सका..अन्यथा आज हमारे घर-परिवार में जो सुख-सुविधाएं हमें प्राप्त हैं सही मैनेजमेंट के तहत सेटल की हुई सभी व्यवस्थाएं जिन्हें वे तैयार करके हमारे हवाले कर गयीं..जिनका वरबस हम उपभोग अवश्य कर रहे हैं। लेकिन आज ये व्यवस्थाएँ कचोटती हैं क्योंकि इन सुविधाओं का सच्चा आनन्द नीरज जी के साथ ही था।

सच कहूँ ..कि, ‘प्लेजर-फीलिंग ऑफ लाइफ’ तो उन्हीं के साथ चली गयी। अब तो बस लाइबिल्टीज के लिए जी..ना ही बाकी है। और कुछ नहीं… कभी-कभी “हमारी अधूरी-कहानी” का ख़्याल..मेरे दिल में घुटन पैदा कर देता है।

नीरज जी ने अपना जीवन सदैव त्यागपूर्ण भाव में ही जिया।

बात क्या है वे ‘हद से बेहद’ की सोच रखतीं थी। शायद उनका आध्यत्मिक स्तर ऊँचा था। जो एक सामान्य गृहणी के लिए बहुत बड़ी बात है। वे सहनशील, परिवार के लिये पूरी तरह समर्पित,उदार, मितव्ययी एवं बहुत ही ‘सरल’ हिर्दय.. थीं। शायद इसीलिए किसी भी मामले में ख़ुद के लिए वे कभी गंभीर नहीं रहीं। दुर्भाग्य से अपने स्वास्थ्य के..प्रति भी नहीं, वरना! आज परिणाम कुछ और हो सकते थे।

मग़र अफ़सोस!!!के अतिरिक्त अब कुछ भी नहीं बचा।

हां, कभी-कभी अपनी अधिक उदारता के लिए स्वयं को वे ज़िम्मेदार ठहराती भी थीं। उनकी वही बातें आज मेरे दिल को कचोटती हैं। मैं, पल-पल अपने आपको धिक्कारता हूँ..आख़िर उनकी परेशानी मैं, क्यों नहीं जान सका..?

परिवारीजन, रिश्तेदार, गुरुजन, शिष्यगण, मित्रमंडल व शुभचिंतक..जीवन में आये हुए मेरे इस ‘अकेलेपन’ को लेकर काफी चिन्तित रहते हैं,परेशान हैं। मानवता के नाते मेरे बारे में सोचकर उनका दुःखी होना स्वाभाविक ही हैं।

मैं उन सभी की भावनाओं का सम्मान करते हुए हिर्दयतल से हमेशा शुक्रऱ गुजार रहुँगा।

इसमें तो कोई दोराय है ही नहीं कि, यादों में आज भी मेरी ज़िंदगी मेरी हमदम ‘नीरज जी’ हर पल मेरे साथ हैं। और सदैव रहेंगी.. इसलिए किसी भी संयमी-चरित्र के लिए स्थूल रूप में ‘अकेलेपन’ के बहुत अधिक मायने होते भी नहीं हैं।

ऐसे वक़्त में वियोग-श्रृंगार का भी अपना एक अजीब रोल है।

सारे सवाल इसलिए भी सिरे से ख़ारिज हो जाते हैं क्योंकि अपनी व्यक्तिगत सैद्धांतिक विचारधारा के आधार पर आत्मिक दृष्टि से हम दोनों जन्म जन्मांतर एकरूप हैं।

दूसरे, यदि ‘अकेलापन’ है भी, और सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचें, तो इतिहास साक्षी है..आध्यात्मिक व साहित्यिक विचारधारा में विद्वानों के द्वारा किसी भी विचारक के लिए “अकेलेपन” को वरदान तक बताया गया है!!!

स्वाभाविक है, भौतिकता का प्रभाव लोगों पर जैसा होता है वैसी ही स्थिति व्यक्ति की होती है। मग़र ये ‘पर्सन टू पर्सन’ डिफरेंशियेट है। हाँ,उससे सामंजस्य बिठाने में थोड़ा वक़्त तो लगता है। फिर लगभग सब सामान्य सा होने लगता है।

चलो अब उनके साथ बितायी वो बेहतर “जिंदगी” न सही,एक आम ‘जीवन’ उनके संस्कारित बच्चों के बीच एवं उनकी तमाम यादों के सहारे गुज़र ही रहा है,बस ऐसे ही गुजरता रहे..आज स्थूल रूप में मुझसे जुदा हुए उन्हें लगभग तीन महीने हो गए.. त्रियोदशी तक समाज के अनुभवी व संयमी लोगों के विचारों को न केवल सुनकर वल्कि अक्षरशः पालन कर .. अपने बच्चों, परिवार व समाज में अपनी एक शिक्षक एवं विचारक की भूमिका का ख़्याल रखते हुए.. मैंने न केवल अपने व्यक्तिगत जज़्बातों पर नियंत्रण करने का प्रयास किया है अपितु खुद के खान-पान, रहन-सहन अर्थात लिविंग स्टाइल आदि में तब्दीली कर एक सिम्पल-जीवन जीने की ओर कदम बढ़ाए हैं.. इसके लिए मैं अपनी विल-पॉवर का शुक्रऱ-गुजार हूँ।

हाँ,चार मई,2021 को माँ के जाने के बाद से न जाने क्यों मुझे ऐसा लगने लगा है कि, मैं, बॉडी कॉन्शियस कम सोल-कॉन्शियस कहीं अधिक होता जा रहा हूँ,या शायद इन घटनाओं ने बना दिया है। क्योंकि मेरा लोगों व चीजों से अटैचमेंट कम होता जा रहा है। जबकि पहले ऐसा नहीं था।

कहीं ऐसा तो नहीं कि, मैं भी नीरज जी की तरह त्यागपूर्ण भाव में जीने लगा हूँ..?

क्योंकि भौतिक दूरियाँ अब पहले की तरह नहीं सताती।

इसलिए प्रारब्धवश बने मौजूदा हालातों से मैं सामंजस्य बिठाने में अपने आपको काफ़ी सहज महसूस कर रहा हूँ। आज न केवल अपने हाल पर..व्यस्त दिनचर्या में हूँ। वल्कि अपनी “ज़िंदगी” मतलव “नीरज जी” के साथ मानवता की जिन मर्यादाओं व संयम के साथ जी..रहा था। आज भी उसी संयम व धैर्य के साथ रहने के लिए दृढ़ संकल्पित हूँ। ईश्वर मुझे सामर्थ्य दें जिससे आप सभी को आश्वस्त कर सकूं, कि, आगे भी ऐसे ही रहते हुए हमेशा अपने फ़र्ज़ पर बना रहुंगा। ताकि मुझको लेकर मेरे अजीज परेशान न हों।

धन्यवाद👍

; योगेन्द्र पचहरा, नीमगाँव

177- भगवद्गीता

सभी जानते हैं कि, भगवद्गीता में..अर्जुन प्रश्न करते हैं और श्री कृष्ण उनके प्रश्नों के उत्तर देते हैं।

उन्होंने अर्जुन के प्रत्येक प्रश्न का उत्तर बड़े धैर्यपूर्वक दिया है.. क्योंकि श्रीकृष्ण चाहते हैं कि, युद्ध से पहले अर्जुन के सारे संशय मिट जाने चाहिए ताकि युद्ध वह पूरे मन से लड़ सके

‘विश्वास-पद्धति’ का ये सिद्धांत है कि, व्यक्ति को सदैव कोई भी कार्य शुरू करने से पूर्व उससे सम्बंधित अपने मन में उठे सारे संदेहात्मक-प्रश्नों का हल अवश्य जान लेना चाहिए।

बनारस की ‘सोनम पटेल’ अभी महज़ आठ वर्ष की एक बच्ची है। मग़र ‘बिलीव-सिस्टम’ के आधार पर उन्हें भगवद्गीता के पूरे सात सौ श्लोक कंठस्थ हैं। वो ये भी बता देती है कि, कौन से श्लोक का वर्णन किस अध्याय में हुआ है।

‘विश्वास-पध्दति’ के ही समर्थन में ब्रिटिश के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक मिस्टर जौलीनिक ने गीता का गहन अध्ययन करने के उपरांत कहा है.. कि,

चाहे जो परिस्थिति हों.. आप देख लीजियेगा अब तक “भगवद्गीता” का एक-एक श्लोक सही साबित हुआ है और आगे भी सदैव सही ही साबित होगा।

इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता की दृष्टि से भगवद्गीता सार्वभौमिक ग्रंथ है।

मेरे विचार से ‘गीता’ को किसी धर्म विशेष की धार्मिक पुस्तक की तरह न देखकर हमें भगवद्गीता को सनातन सत्य पर आधारित वेदव्यास जी द्वारा लिखे गये अंतिम ‘ग्रन्थ’ के रूप में मान्यता देना कहीं अधिक बेहतर रहेगा। निःसन्देह इसकी प्रासंगिकता तो जब तक ये दुनियाँ है तब तक रहेगी ही।

उसका मूल कारण है कि, “भगवद्गीता” एक वैज्ञानिक ग्रंथ (साइंटिफिक-एपिक) है।

भगवद्गीता से विमुख देश के ‘नीति-नियंताओं’ की ओच्छी-मानसिकता के कारण देश में तुष्टीकरण, जातिवाद, धर्मवाद भाई-भतीजावाद,ग़रीबी जैसी विकृतियों का उन्मूलन न करने की नीयत ही,जनता का असली दर्द है। बेहतर होगा..समय रहते ही देश के नेता भी अपने सही फ्रेम में आ जाएं।आ

अन्यथा की स्थिति ‘उनके’ लिए..न केवल चिंतनीय है वल्कि बहुत निन्दनीय भी होगी।

मग़र ये भी सच है कि,”चरित्रवान-व्यक्तित्व” भगवद्गीता का आश्रय अवश्य ले लेते हैं। क्योंकि वे स्वहित में कम ‘जनहित’ में कहीं अधिक सोचते हैं..

अब चौकाने वाली बात ये है कि, चाइना के ‘न्यूअंग्सकी’ ने ‘भगवद्गीता’ का गहन अध्ययन करने के बाद भगवद्गीता को न केवल अपने देश में पी.एस.एम. यानी ‘प्रॉब्लम-सॉल्विंग मन्नुअल’ घोषित कर दिया, वल्कि उन्होंने चाइना में “भगवद्गीता” को अपने शैक्षिक-पाठ्यक्रम में एक अनिवार्य विषय के रूप में भी जगह दी है।

आपको विदित होगा कि, भगवद्गीता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई भाषाओं में उपलब्ध है।

इसीलिए भगवद्गीता को दुनियाँ का ‘शिक्षा-जगत’ बहुत पहले स्वीकार चुका है।

सम्पूर्ण विश्व में चलने वाले मैनेजमेंट के पाठ्यक्रम की अवधारणाओं से संबंधित सोल्यूशन्स.. श्रीकृष्ण की ‘भगवद्गीता’ में बहुत स्पष्ट तरीके से बताये गए हैं। भगवद्गीता का अनुसरण करने वाले व्यक्ति व देश इसका लाभ ले रहे हैं।

मेरे ख़्याल से जब तक ये दुनियाँ है,तब तक भगवद्गीता की प्रासंगिकता बढ़ेगी.. कभी कम नहीं होगी।

अपने आकार, वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित गूढ़ अर्थ एवं वजन के आधार पर भी “भगवद्गीता” को दुनियाँ का सबसे बड़ा ग्रन्थ कह दिया जाय,तो शायद कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

वह इसलिए क्योंकि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मिस्टर मोदी ने अभी कुछ ही दिन पूर्व भगवद्गीता का अनावरण किया है जिसका वजन लगभग ‘आठ सौ किलोग्राम’ है। जी हाँ! आपने सही पढ़ा है आठ सौ किलोग्राम यानी उसका भार आठ कुन्तल ही है।

मांफ कीजियेगा भगवद्गीता के संदर्भ में.. मैं अपने पच्चीस नवम्बर, दो हजार उन्नीस (25 नवम्बर,2019) को प्रकाशित हुए सातवें आर्टिकल “गीता विज्ञान से आगे है..” की बात को बल देते हुए एक फिर से यही कहुंगा कि,

“आज भारत देश में भगवद्गीता को ‘कोर्ट’ से हटाकर ‘कोर्स’ में अनिवार्य रूप से पढ़ाये जाने की आवश्यकता है।”

जो, “मैं-मेरा,अपना-पराया,तू छोटा, मैं बड़ा..आदि” विकृतियों में हम लोग इस कीमती जीवन को खपा दे रहे हैं..यदि अभी भी भारत के पाठ्यक्रम में भगवद्गीता शामिल होती है, तो कम से कम आने वाली जैनरेशन के दिमांग में वैसी विकृतियां घर नहीं करेंगी। जो हम लोगों के मन-मष्तिष्क पर एक कार्मिक लेयर जैसी जम गईं है।

गीता के तीसरे अध्याय के चौथे श्लोक में श्रीकृष्ण, अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि, “इतिहास में झांक कर देख लो!.. जो व्यक्ति अपने मन व इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर पाते, देर-सवेर उनका विनाश ही होता है।”

स्वामी विवेकानंद ने भी भारतीय शिक्षा प्रणाली के संदर्भ में अपने एक वक्तव्य में ये कहा है कि, “व्यक्ति के लिए अपने मन व इंद्रियों पर नियंत्रण पाना ‘शिक्षा’ का पहला ‘सबक’ है।”

‘महाभारत’ का एक प्रकरण बहुत ही रोचक है..ये मंजर उस दौर का है जब पांडवों और श्रीकृष्ण दोनों के लाख प्रयासों के बावजूद युद्ध नहीं टल सका..

और दुर्योधन ने बड़ी होशियारी से श्रीकृष्ण की सारी सेना मांग ली। तब कृष्ण अर्जुन को व्यंग्य करते हुए कहते हैं..

“अर्जुन ! हार निश्चित है तेरी।

पर मत हो उदास!

अरे ! सारा मख्खन, तो दुर्योधन ले गया

तेरे लिए बची है सिर्फ छाछ।”

श्रीकृष्ण ने ये व्यंग्य अर्जुन की मनःस्थिति को परखने के लिहाज़ से किया था।

व्यंग्य के जवाब में अर्जुन ने भी चुटकी लेते हुए माधव को बोल दिया कि,

“जीत निश्चित है मेरी।

क्यों होऊं..उदास।

मख्खन रखकर होगा क्या..?

‘माँखन-चोर’ जो है मेरे साथ।।”

उस वक़्त श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सम्पूर्ण गीता सुनाने के बाद अन्त में यही कहा कि,

“मामेकं शरणम व्रज..”

हे अर्जुन ! यदि तुझ से कुछ न हो तो तू मेरी शरण में आजा। और अपने सारे कर्म मुझे अर्पित करता चल.. तो तू निश्चय ही संशय रहित ज्ञान से परिपूर्ण हो जाएगा..?

श्री कृष्ण का विराट रूप देखने के बाद..अर्जुन ने यही किया।

“बिन जले भभूति नहीं।

बिन चले अनुभूति नहीं। अर्थात

कोई चलता पदचिन्हों पर है।

तो कोई.. पदचिन्ह बनाता है।

रचता है, जो इतिहास जग में

दुनियाँ में पूजा भी वही जाता है।”

धन्यवाद👍

176- बुरी-नज़र

मेरी सुयोग्य पत्नी श्रीमती नीरज चौधरी हॉस्पिटल में इलाज के दौरान ठीक होते-होते अचानक ‘कार्डियक-अरेस्ट’ या अटैक जो भी होता है उसके कारण अपना भौतिक-शरीर छोड़ अनंत में विलीन हो गयीं। जिससे हमें ऐसा लगता है कि, पिछले अट्ठारह दिन से बीमारी के ख़िलाफ़ पूरी मुस्तेदी के साथ हम एक युद्ध सा लड़ रहे थे। डॉक्टर या हमारी मेडिकल टीम से न जाने कहाँ चूक हुई कि,अचानक उन्नीसवें दिन हम लगभग एक जीती हुई बाजी हार गये..😢

इस घटना से आहत.. अप्रैल,2022 के तीसरे सप्ताह में मेरे एक शुभचिंतक बहुत जज़्बाती होकर .. एक दिन मेरे पास आये उन्होंने बड़े आग्रह के साथ पहले मुझ से वचन लिया..मुझे लिखने को बाध्य कर लिया..तब कहा, “भईया जी! मेरे इन विचारों को मेरे ही सामने कोई भी पॉइंट कट न करते हुए..जो आप ब्लॉग लिखते हो उसी रूप में मेरी ओर से ऑनलाइन पब्लिश कर दो, तो आपकी मुझ पर बड़ी मेहरबानी होगी। क्योंकि मैं अपना विचार आपके ब्लॉग के थ्रू ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहता हूँ.. जबकि,

एक कॉमन सी बात है अपने बारे में स्वयं लिखना या बोलना..पार्ट ऑफ बूस्टिंग में ही आता है जिसके लिए मैं एग्री नहीं हो सकता था..मगर .. महाशय जी ने पहले वचन जो भरवा लिया था। खैर..मेरा जीवन जैसा भी है शुरू से आप सबके सामने खुली किताब की तरह है..और सदैव ऐसे ही रहेगा।

शुभचिंतक महोदय अपना नाम छुपाते हुए लिखवाते हैं, कि कोई माने या न माने हमारे भैया-भाभी की जोड़ी लाखों में एक थी।उनका ये मानना है,अवश्य ये जोड़ी किसी ‘बुरी नज़र’ की शिकार हुई है..”

ज़ाहिर है..’पचहरा-परिवार’ के प्रति उनका ये आत्मीय भाव उनके प्रेम और सम्मान को दर्शाता है। इसके लिए मैं अपने परिवार के हर सदस्य की ओर से उनका आभार प्रकट करते हुए बार-बार सादुवाद देता हूँ।

आगे वे लिखते हैं .. कि, एकबार को लोग ये भी कह सकते हैं कि, हम पर भैया का रंग चढ़ हुआ है..परन्तु वे जो भी कहें..मेरे ख़्याल से भईया-भावी जैसी छबि के लोगों का प्रारब्ध इतना खराब नहीं हो सकता!! जैसा अजीब-खेल उनके साथ हुआ है।

क्योंकि, पिछले लगभग बीस वर्ष से मैं ही नहीं ‘हम सब’ और आप भी इन दोनों के आचरण को देखते चले आ रहे हैं.. केवल वे ही नहीं उनके परिवार का हर सदस्य गुणवान, सहनशील एवं समझदार हैं। और ज्यादा क्या कहूँ..खानदानी-संस्कार वाले लोग सब ऐसे ही होते हैं।

मग़र मांफ कीजियेगा.. नीमगाँव के मुखिया परिवार की हवेली में मेरे अकेले ‘भईया-भाभी’ की ही नहीं वल्कि मेरे भतीजे-भतीजी की भी छबि एकदम अलग है। जैसे ;

उनकी बेटी निधि शादी से पूर्व ही लॉर्ड कृष्णा पब्लिक स्कूल, व दिल्ली पब्लिक स्कूल, अलीगढ़..एवं ट्रांसफर के बाद डी पी एस मुरसान । जैसे स्कूलों में महज़ अपनी योग्यता व वाकपटुता के आधार पर एज ए टीचर सेलेक्ट हो..पढ़ा चुकी है और देखिए…ईश्वर ने इतनी कम उम्र में भईया+भाभी को सही वक़्त पर बेटी की शादी से (फरबरी,2015) भी निवृत कर दिया। और अधिक खुशी की बात तो ये हुई कि, उनकी बेटी और दामाद जी ने वसुंधरापुरम के स्पेशल कैंपस में लगभग तीन वर्ष पूर्व अपना ख़ुद का एक सुंदर आशियाना भी बना लिया है।

कौन नहीं जानता..? उनका बेटा रॉबिन मेरा मतलव ‘सिद्धांत पचहरा’ राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल व गोआ से दो-दो “स्वर्ण-पदक” लेकर दिल्ली असोसिएशन के बेहतरीन क्लब रॉयल-रेंजर्स फुटबॉल क्लब, दिल्ली का एक अच्छा फुटबॉलर होने के साथ-साथ..भविष्य में अच्छे से फाइनेंशियली सेटल होने की सही दिशा में आगे बढ़ रहा है…

सब कुछ एकदम अच्छा चल रहा था.. भईया-भाभी भी हर वर्ष आपसी सूझ-बूझ के साथ स्टेप-वाइज अपने उत्तरदायित्व-सम्बन्धी कार्यो को समय से करते चले जा रहे थे।

अचानक एकदम से न कोई बहुत बड़ी बीमारी..जो दिक्कत थी उसके ट्रीटमेंट में भी लाभ होते-होते दूसरे सारी रिपोर्ट्स अच्छी आने के बावजूद हॉस्पिटल से उन्नीसवें दिन डिसचार्ज होने के दो दिन पूर्व ..अटैक का क्या औचित्य था..? जबकि ECG आदि सब कुछ ठीक आया था। शुभचिंतक महोदय लिखते हैं..”मुझ से पूछो तो ये सिर्फ “दूसरों के सुख से दुःखी रहने वाले गंदे विचार वाली मानसिकता” की “बुरी-नज़र” का ही दुष्परिणाम है,और कुछ नहीं।”

भले ही आज के दौर में लोग इन नज़र-बजर की

बातों में विश्वास नहीं करते,..फिर भी मेरे ख़्याल से चाहे किसी भी स्तर पर सही.. इस घटना की समीक्षा तो होगी ही..

भईया कहें न कहें .. मैं, तो यही कहुंगा कि किसी “बुरी-नज़र” का शिकार हो गया हमारे “पचहरा-परिवार” का “हंसता-खेलता घर” देवी जैसी भाभी जी आज हम सबके बीच नहीं रही..!! मेरी तो इस घटना का ख़्याल आते ही छाती फटती है… तो सोचिए!! भईया और उन दो मासूम बच्चों पर..रोजाना उन्हें घर न देखकर क्या बीतती होगी!!!

ये सत्य है। स्त्री ही हर परिवार में ‘घर’ को अच्छे से मैनेज कर पाती हैं। इसलिए दुर्भाग्यवश कभी स्त्री को कुछ हो जाने पर घर तो क्या ऐसा लगता है.. पूरी दुनियाँ’ ही लुट गयी हो।

हम मानते हैं, पुरूष यदि बहुत ततपरता से घर सम्भालना चाहे.. तो जरूर सम्भाल सकता है। सक्षम है लेकिन एक स्त्री की तुलना में पुरूष को बहुत अधिक जुगत एवं सहनशीलता की आवश्यकता होगी।

वो तो अच्छा है संयोगवश उनके दोनों बच्चों के घर पहले से एक ही कॉलोनी में हैं। उनकी बेटी ने ये भी अच्छा किया कि, जो कामवाली उनके अपने घर में काम कर रही थी। जो शायद जाति से नाई है, उसी को 1500 रु महीने में अपने भाई रॉबिन के घर पर भी लगा दिया। धन्यवाद बेटा ठीक किया 👍

क्योंकि हमें पता है। उनका बेटा और दामाद जी दोनों लोग पहले से ही अपने-अपने जॉब के कारण आउट ऑफ स्टेशन रहते हैं।

इसीलिए कॉमन सी बात है। बाप-बेटी का खाना एक जगह ही बनता होगा, मेरा मतलव रॉबिन वाले घर। ठीक है।

सुना है,अपनी नानी को बहुत मिस करने के बावजूद भी निधि की तीन वर्ष की प्यारी सी बच्ची “रिया” रात में नींद आने तक अपनी ‘अधूरी-कहानी’ के चरित्र बन रह गये नानू के साथ खेल-खेलकर .. उनका मन बहलाने का पूरा प्रयास करती है।

यदाकदा पचहरा भईया से हमारी भी बात हो जाती है।

वैसे वे अपने कॉलेज, बिज़नेस एवं लेखन-कार्य आदि में पहले से ही काफ़ी व्यस्त रहते हैं। व्यस्त रहना सदैव अच्छी बात है।

अग़र कुछ समय के लिए लोगों की सिमपैथी को एक तरफ रखकर देखा जाय, तो उस मनहूस तारीख़ 6 मार्च,2022 से आजतक के अनुभव का हवाला देते हुए वे बडे अफ़सोस के साथ कहते हैं कि, “भई! पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश में बिना “गृह-लक्ष्मी” के पुरुष की “ज़िंदगी” के मायने कुछ भी नहीं होते।”

उनकी वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि, ‘वक़्त और हालात ने उनकी खुशहाल-जिन्दगी को एकदम “वीरान” ही कर दिया है।

जो घर उन्होंने किसी समय बड़े चाव से बनाया होगा। जिस प्रकार कॉलेज या ऑफिस से छुट्टी होने पर सभी को अपने घर पहुँचने की जल्दी होती है। स्वाभाविक है उन्हें भी होती होगी। मग़र मुझे ऐसा लगता है। आजकल उसी घर पर जाने के वक़्त एकबार को पुनः ‘अकेलेपन’ के वातावरण में जाने से उन्हें थोड़ी घुटन तो होती होगी।

“बुरी नजर” ने आज कुछ ऐसे हालात पैदा कर दिये हैं कि, वही वसुन्धरापुरम वाला मंदिर सा घर..”88A पचहरा-हाउस” उन्हें काटने को आता होगा।

बहरहाल, मेरे युग भईया स्टूडेंट-लाइफ से ही आध्यात्मिक विचारधारा के हैं। और काफी ब्रेव हैं। मुझे पूरा भरोसा है, वे अपने आप को संभाल पाएंगे..

लेकिन, आप सोचिएगा, मैंने तो देखा है।

गैरिज सहित उनके घर में पांच बड़े-बड़े कमरे हैं। उनमें ‘एक अकेले’ व्यक्ति का रहना.. कितना खालीपन है!

ये सिर्फ महसूस किए जाने वाले हालात हैं जिन्हें कभी शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

हे ईश्वर! आज जिस जगह वे, खड़े हैं ऐसी जगह पर कभी किसी को खड़ा मत करिएगा।

ये तो शुकर है कि, वे लिखने-पढ़ने के शौकीन हैं। ये भी सच है कि, वे अपने आपको सदैव अच्छे कार्यों में व्यस्त रखते हैं। भटकाव से हमेशा दूर रहे हैं। उनके डेली-सड्यूल व कार्य-शैली तो पहले से ठीक रही है।

मग़र इसमें कोई शक नहीं है कि, भाभी जी के न रहने से हमारा ‘वट-वृक्ष’ भी हिल गया है।

हे! ईश्वर बहुत जल्द उन्हें इस हालात से उबरने की शक्ति व सामर्थ्य प्रदान कीजियेगा।

जाहिर है अब उनसे ज़िंदगी उस तरह तो नहीं जी..जाएगी.. जैसा उनका स्वभाव है।आजकल पूछने पर वे इतना ही बोलते हैं, .. “हाँ, बस ठीक हैं..सही हैं..” आप कैसे हैं..?

उनके ये शब्द हमारे सीने में तीर की तरह चुभते हैं। मग़र करें भी तो क्या..? इस जगह पर आकर सभी असहाय हो जाते हैं।

एक शुभचिंतक की कलम से..🙏🏻

175- ‘राग-द्वेष’

महर्षि कपिल ने अपने सांख्य योग अर्थात दर्शन में बताया है कि,

“संसार में कहीं भी, कोई व्यक्ति पूरी तरह सुखी नहीं होता।” कभी फिजिकली,तो कभी मेंटली,व्यक्तिगत नहीं,तो पारिवारिक/ सामाजिक या देश – दुनियां के स्तर पर.. मगर “अपसेट” सिनेरियो तो किसी न किसी अवस्था में थोड़ा बहुत रहता है।

अगर आप ‘राग और द्वेष” को समझते हो, तो उसी सांख्य दर्शन में उन्होंने एक बात और..कही है कि,

“संसार ही वो जगह है जहां दिन-रात ‘राग और द्वेष’ चलता रहता है।”

अब आप खुद ब ख़ुद समझ गए होंगे , कि ये संसार कैसा है..?

जो लोग ऐसा मानते हैं, कि “संसार में बहुत आकर्षण है,बहुत सुख है। पता नहीं क्यों.. मुझे उन पर दया आती है। क्योंकि वे बड़ी भूल में हैं। मेरे ख्याल से वे अभी “सुख” और “आनंद” के अंतर से भी लगभग अपरिचित हैं।

चलो! मान लेते हैं..संसार में आकर्षण है,सुख है। मग़र क्या लोगों की मन:स्थिति में चैन / आनंद है..??

सांसारिक “सुख” की पहुंच केवल ‘शारीरिक-स्तर’ तक ही है। इसलिए केवल भौतिक चक्षु वाली लॉबी को उनके जीवन में कभी कोई कमी नहीं..दिखती। क्योंकि वे विज्ञान प्रदत्त असीमित भौतिक साधनों वाली सुविधाओं के सुख में जीवन तलाशते रहे हैं।

ये कहना अनुचित नहीं होगा कि, लोगों ने फेयर & फाउल किसी भी तरह से..असीमित ‘सुख-साधन’ जुटा लिए हैं मगर अंत:करण का ‘सुकून’ साधनों में होता ही नहीं।

क्योंकि सुकून या चैन मिलता हैं मन की शांति से,सब्र से.. यदि कम्पेरेटिव-स्टडी के आधार पर कुछ कहा जाय, तो भटकाव या अति भटकाव से व्यक्ति का मानसिक-स्तर हिला हुआ है।

इसीलिए ये सच है,कि आज लोगों के पास ‘मेंटली-प्लेज़र’ आई मीन “चैन” नहीं है। जिससे वे थोड़े में भी “चैन की वंशी” बजाते हुए आनंदित होकर सुकून में जी..सकें ।

आपसी झगड़े, फ्रॉड-मैटर्स, हत्याएं, दुर्घटनाएं,व्यभिचार, खान-पान शुद्ध न होने से,अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिद्वंदी देशों में वायरस फैलाकर जनहानि – धनहानि कराने के षड्यंत्रों से आए दिन नई-नई बीमारियों का उजागर होना।

इस प्रकार अनेकों ऐसी खबरें सुन-सुनकर व्यक्ति पूरा दिन राग-द्वेष, चिंता, तनाव, आदि से व्यथित “बेचैन” बना रहता है।

अच्छे समाचार तो कभी कभार ही मिलते हैं, जो उसे ख़ुशी देते हैं।

अब लोग सवाल करते हैं कि, “जब जीवन में दु:ख बहुत अधिक हैं, तो फिर कैसे जिएं..?

उत्तर – में यही कहना उचित है.. कि हम लोग अपने सोचने का ढंग बदलें। जिस प्रकार सुख स्थाई नहीं है, ठीक वैसे ही दुख भी हमेशा नहीं रहेगा। विश्वास न हो, तो इतिहास में झांक लीजिएगा। कि, जिस प्रकार सुख स्थाई नहीं है, वैसे ही दुःख के भी पांव ज्यादा देर नहीं टिकते, बस आवश्यकता होती है,नियम-संयम एवं ‘धैर्य’ के साथ अपने आचरण को पवित्र बनाए रखने की।

अगर हम थोड़ा बहुत अध्यात्म समझते हैं, तो ये भी सब व्यक्ति के अपने ही ‘संचित-कर्मों’ का खेला होता है। जो समय-चक्र के अनुसार गतिमान रहता है। समस्याएं आती हैं, और कुछ समय बाद स्वतः हट भी जाती हैं। जरूरत होती है, सम्भल कर कदम रखने की।

शिक्षा ;

ये “दु:ख / समस्याएं” आत्मिक स्तर पर व्यक्ति की चेतना को जगाते हुए.. उसका ध्यान “इष्ट” की ओर मुखातिब हो..इस ध्येय से आते हैं! क्योंकि माया का स्वभाव है इंसान को पल पल भ्रमित करना।

दरअसल, ये दुःख भी तो मानव की ही संपत्ति है। फिर भी न जाने लोग दुःख से इतने.. क्यों घबराते है..??

“संसार में सदैव रहने की तो छोड़ ही दीजिए, लम्बा जीवन जीने की खुशफ़हमी..भी बुद्धिमत्ता की बात नहीं होती।

चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न रहा हो!! क्योंकि इस संसार नियति है। यहां मानव मन को शारीरिक-सुख की अपेक्षा मानसिक-दु:खो की अनुभूति कहीं अधिक होती है। संतों ने इस समस्त संसार को दु:खालय कहा है। इसीलिए परम आनंद की प्राप्ति, तो यहां सर्वथा असंभव ही है।”

अब प्रश्न बनता है, कि – “दु:खों से पूर्णतया निवृत्ति, और पूर्ण सुख कैसे प्राप्त हो सकता है..?” विद्वानों के दिखाए रास्तों के आधार पर, तो इस प्रश्न का उत्तर

केवल वेदों और ऋषियों के बनाए शास्त्रों में ही है वो भी आत्मिक स्तर पर..पूर्ण सुख या परम आनंद की प्राप्ति, तो सिर्फ और सिर्फ “केवल्य / मोक्ष” से ही संभव है, अन्यत्र कहीं भी नहीं।”

“इसलिए “भगवत प्राप्ति” एवं मोक्ष की ओर अग्रसर होने के लिए वेदों,संतो और ऋषियों द्वारा बताए गए आदर्शों का अनुपालन देर सबेर करना ही होगा।

अच्छा! जब “मोक्ष” शब्द से पूछते हैं, तो वह मुस्कराते हुए अपने जवाब में कहता है.. कि दरअसल, सरल अर्थ में “मोक्ष” .. व्यक्ति के “मोह का क्षय हो जाना” ही है। अर्थात मनुष्य जी, ते जी.. दुनिया के सारे प्रपंचों का मोह त्याग दे ” बस उसका मोक्ष हो गया।

यदि इस सारे वृत्तांत पर मनुष्य की “तर्क बुद्धि” सच की मुहर लगाने को आतुर है, तो फिर “राग-द्वेष” क्यों..??

‘सच्चाई’ को न केवल जानने में वल्कि उसे सहज स्वीकारने में समझदारी होती है। तब जाकर “ज्ञान बुद्धिमानी” में कन्वर्ट हो पाता है।

आपके वेशकीमती समय को मेरा दिल से नमन..है।धन्यवाद 👍

174-Paying Guest..

आप भी कुछ ऐसा ही सोचते हैं..क्या..?

उदाहरण के तौर पर..

” परम् सत्ता की पूर्व निर्धारित-व्यवस्था के अंतर्गत हम सब इस संसार में एक नियत समय के लिए सिर्फ ‘पेइंग गेस्ट’ अर्थात किरायेदार की हैसियत से हैं।”

आप भी ऐसा ही मानते हैं क्या.. ? अगर नहीं तो ज़रा सोचिए!!

“जब कभी आपके ऑफिस की कोई कुर्सी टूट जाती है, तो आपको उतना कष्ट नहीं होता, जितना कि,अपने घर की कुर्सी टूट जाने, पर होता है।” क्यों..?

विचारणीय है ..

“क्योंकि व्यक्ति को जो कष्ट होता है, वह किसी वस्तु या व्यक्ति के अपने पास से हट जाने का नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे उसके साथ रहने से जो मुहब्बत या लगाव हो जाता है। कष्ट की असल बजह वो होती है।”

आप जानते हैं कि, हमारे अपने ऑफिस की कुर्सी के साथ स्वामित्व या एक मालिक वाला वो संबंध नहीं जुड़ पाता, जितना कि अपने घर की कुर्सी के साथ जुड़ जाता है। ये स्वतः प्रक्रिया..है। घर की कुर्सी के हम मालिक हैं..वह हमारी संपत्ति है। ऐसा हमने मान लिया है।

अब इसे ज़रा अध्यात्म के नज़रिए से देखिए!! ….

“यदि हम अपने आपको शरीर का मालिक समझते हैं, तो इस शरीर के रोगी होने पर, चोट लगने पर, अथवा अन्य किसी प्रकार की कोई भी हानि होने पर, या हानि होने की संभावना पर भी, हमको अनेक प्रकार की चिंताएं सताने लग जाती हैं।, हमारा बी पी बढ़ जाता है,”

कि “कहीं ऐसा न हो..कहीं वैसा न हो..? वगैरा.. वगैरा..

मेरे विचार से इस भाव में जीना शायद कहीं बेहतर होगा.. कि, आपके पास ये ईश्वर-प्रदत्त शरीर उसकी धरोहर है। इसलिए न केवल कभी भी इसका दुरुपयोग हो.. वल्कि इसे पूर्णत: उसीको समर्पित करते हुए.. जैसे ”मैं एक आत्मा हूँ जो एक नियत वक़्त के लिए इस शरीर में महज़ एक “किराएदार” की हैसियत से हूँ।” मेरे विचार से इस भाव में ..जीवन की तश्वीर ही कुछ और होगी।

यदि हम ऐसा ‘भाव’ बना पाए और दुनियाँ में वैसा आचरण कर पाएं, तो हमको कभी चिंता,तनाव व अहंकार आदि नहीं होगा।

दूसरे हम अपने शरीर की सुरक्षा करते हुए.. सही दिशा में इसका सद्पयोग भी कर पाएंगे। तथा कोई परेशानी आने की स्थिति में हम शायद तनाव से उतने ग्रस्त नहीं होंगे जितने कि सामान्यतः होते हैं।

जैसे हम ऑफिस की कुर्सी की सुरक्षा का ख्याल करते हुए उसे उपयोग में लेते हैं।

परंतु फिर भी किसी कारण से यदि वह डैमेज जाती है, तो

हम बहुत ज्यादा परेशान नहीं होते,शायद एकदम से तनाव ..में तो नहीं आते।

“यदि ऐसा भाव हम अपने शरीर के साथ भी बनाएं तो शायद ‘जीवन’ को सामान्य से असामान्य होने में वक़्त नहीं लगेगा।”

ये शरीर ईश्वर-प्रदत्त है। सदैव इस भाव के साथ इसका उचित तरीके से उपयोग करें।

हम ऐसा सोचें कि, ये ‘जीवात्मा’ हमारे संचित कर्मों पर आधारित प्रारब्ध के अनुरूप अपना नियत-वक़्त लेकर इस शरीर में महज़ एक किराएदार की तरह है, तो जाहिर सी बात है एक न एक दिन उसे जाना तो होगा ही।

जब हम अपने अंतःकरण में इस “शाश्वत-सत्य” को बिठा लेंगे,तो

ऐसा भाव रखने वालों के साथ..बाई द वे किन्हीं परिस्थितियों वश अपने किसी प्रिय साथी के ‘स्थूल-शरीर’ की हानि होने से भौतिक दूरी बन भी जाती है, तो उससे कोई बहुत अधिक फ़र्क नहीं पड़ेगा ..!!

स्थूल में रहें न रहें.. ऐसे लोगों में आपसी “भावनात्मक-एकत्व” था। वही उन्हें सदैव एक दूसरे के साथ ही रखता है। अर्थात वे कभी अकेलापन महसूस नहीं करते।हालाँकि इस परिस्थिति को फेस करने का मेरा अनुभव अभी बहुत ज्यादा तो नहीं है मग़र मैं इतना कह सकता हूँ कि अपने किसी प्रियजन के स्थूल-शरीर की ‘दूरी’..तो भावनात्मक रूप से और अधिक नजदीकियां पैदा कर देती है। इसलिए दुःखी होने का सवाल यहाँ खत्म हो जाता है।

दूसरे

“जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए..”

वाले सन्देश को सहज स्वीकार लेना ही अब उनकी नियति है।

इस प्रकार की मनःस्थिति उन्हें सामान्य करने में काफ़ी सहायक होती है।👍

173- स्वार्थी

मैं ‘स्वार्थी’ शब्द के पैरा मीटर से बात करूं, तो संसार में तीन प्रकार के लोग ‘स्वार्थी’ इमेज के होते हैं।

तीन प्रकार के स्वार्थी लोगों में से भी, दो अच्छे होते हैं, तीसरे प्रकार के लोग ‘स्वार्थ की मर्यादा’ से परे होते हैं।.. और इनसे भी परे कोई हैं..तो फिर वे ‘इंसान’ नहीं वे ‘राक्षस’ प्रवृत्ति के बहुत निकृष्ठ श्रेणी के होते हैं।”

स्वार्थी का अर्थ है, स्व+अर्थ अर्थात अपने लाभ के लिए काम करने वाला व्यक्ति।

व्यक्ति के जीवन में बहुत सा अभाव होता हैं। धन, बल, विद्या, भोजन, वस्त्र, मकान, सम्मान, सुख आदि का।

ये सब स्वभाविक हैं.. इसलिए मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी है। परन्तु एक हद तक। वह सदा अपनी इन कमियों को पूरा करने के लिए कार्य करता रहता है।

एक निश्चित हद तक स्वार्थी होना बुरा नहीं है, बस इतना ध्यान रखना चाहिए, कि अपना स्वार्थ पूरा करते-करते आप से दूसरों का नुकसान न हो जाए। किसी की आत्मा आहत न हो जाय। यदि अपना स्वार्थ पूरा करते-करते किसी दूसरे व्यक्ति का नुकसान करने लगे, तो यह ग़लत है,अन्याय है।

मेरा आंकलन कहता है, संसार में स्वार्थी लोग तीन प्रकार के होते हैं।

“उत्तम, मध्यम, और निकृष्ट”

‘उत्तम स्वार्थी’ वे लोग हैं, जो दूसरों को सुख देते हैं। दूसरों को सुख देने के लिए, स्वयं को थोड़ा कष्ट हो जाय, तो उसकी भी वे परवाह नहीं करते।”

वे सोचते हैं, कि “हमें परोपकार करना है। दूसरों को सुख देना है। इसके फलस्वरूप हमारा प्रारब्ध सही हो जाय, शायद भगवान हमें सुख-शांति दे ।”

ऐसे लोग, संसार के लोगों से अपने परोपकार रूपी कर्म के फल की भी बहुत आशा नहीं रखते, बल्कि वे सिर्फ ईश्वर के प्रति आशावादी होते हैं।

“ईश्वर न्यायकारी है इसमें कभी कोई संदेह नहीं। वह उचित समय आने पर निश्चित रूप से उत्तम फल देता है।” ऐसा सोचकर वे निंदा, स्तुति की परवाह किए बिना ही, कर्म करने में लगे रहते हैं। ऐसे लोग सुख तो प्राप्त करना चाहते ही हैं, इसलिए स्वार्थी की परिधि में जरूर हैं,मग़र वे उत्तम श्रेणी के स्वार्थी हैं।

“दूसरे प्रकार के लोग ‘मध्यम स्वार्थी’ हैं। वे भी दूसरों को सुख देते हैं। परंतु उस दायरे तक जहां तक उन्हें कोई विशेष कष्ट न उठाना पड़े।” वे अपने कर्म फल के रूप में दूसरों से सुख प्राप्ति की आशा रखते हैं। वे दूसरों से सुख लेते भी हैं, और उन्हें सुख देते भी हैं। ये भी स्वार्थी लोग ही हैं। “परन्तु ये लोग पहले वालों से कुछ कम परोपकारी होने के कारण, मध्यम श्रेणी के ‘स्वार्थी’ कहलाते हैं। यहां तक भी ठीक है। ये लोग भी मानवता की परिभाषा में ही होते हैं, क्योंकि ऐसे लोग, कम से कम दूसरों को दुख तो नहीं दे रहे।”

पहले स्तर के ‘उत्तम-स्वार्थी’ लोग तो ‘देवतुल्य’ होते हैं।

दूसरे स्तर के ‘सामान्य- मनुष्य’ कहलाते हैं।

परंतु जो तीसरे स्तर के स्वार्थी हैं, जिनकी पहचान ‘निकृष्ट-स्वार्थी’ के रूप में की गई है, वे तो बहुत ही घटिया हैं। उन्हें हम सिर्फ “घटिया ही कह सकते हैं “घटिया लोग” भी नहीं क्योंकि वे “लोग” शब्द की परिभाषा से परे होने के कारण मनुष्यता की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं।” क्योंकि वे दूसरों के विनाश में अपना स्वार्थ देखते हैं। इनको ‘निकृष्ट-स्वार्थी’ कहा जाना ही ठीक है।

संसार के लोगों से क्या !! एसों को हर स्तर पर ‘घृणा’ व ‘आलोचना’ ही मिलती है। वे इसी लायक होते हैं।

चौथे प्रकार को कोई संज्ञा देना भी मैं उचित नहीं समझता!

जो ‘अत्यन्त ही घटिया स्तर’ के होते हैं। “वे न तो स्वयं शांति से रहेंगे, और न ही दूसरों को रहने देंगे। वे धन-संपदा का केवल विनाश ही करेंगे। इसलिए वे ‘स्वार्थी’ की श्रेणी में भी नहीं आते। ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोग तो ‘पागल’ कहलाते हैं।” उनके कार्यों में बुद्धिमत्ता तो कहीं होती ही नहीं।

इसलिए मेरा ऐसा मानना है कि, उनका नाक-नक्शा, शारीरिक डिजाइन भले ही मनुष्यों जैसा हो, फिर भी उनको मनुष्य की श्रेणी से बाहर ही समझना चाहिए।”

यदि आप संसार में सुखपूर्वक जीवन जीना चाहते हैं, तो आपको ये चारों प्रकार के व्यक्ति पहचानने ही होंगे।

“जो व्यक्ति इन चारों को पहचान लेगा, और पहले दो प्रकार के व्यक्तियों के साथ उचित व्यवहार करता हुआ, बाकी दो प्रकार के लोगों से किसी भी प्रकार अपने आपको बचा लेगा बस समझलो! उसे जीने की असली कला समझ आ गई है।

वही जीवन में सफल और सुखी हो सकता है। बाकी तो सब लोग दुख में हैं ही।”👍

172- वक़्त

🙏🏽 “वक़्त”

अर्थात “समय”

जी,बिल्कुल समय का स्वभाव है सदैव अपनी गति से चलते रहने का.. जो सबके लिए अनुकरणीय है ..

सच,तो यही है जैसे “वक़्त” कभी भी ठहरता नहीं, ठीक वैसे ही हर जीवात्मा को धैर्य पूर्वक किसी स्थिति या फिर परिस्थिति में भी चलते रहना चाहिए।

शायद “चलते रहने..” का ही नाम “जीवन” है। ..चलते रहो..मगर हर सांस व हर कदम पर अपने इष्ट के नाम जप के साथ.. चलें।

सांस की बात करें,तो सामान्यतः व्यक्ति चौबीस घंटे में लगभग बीस हजार से पच्चीस हजार सांसें लेता है।

भौतिकवाद की चकाचौंध में भटके हुए बंदे नू संत लॉबी अपने प्रवचनों में अक्सर 24 घंटे में 21600 सांस खर्च हो जांदीए.. ऐसी चेतावनी वे देते रंहदे ऐं।

एक सुव्यवस्थित जीवन के लिए..हमेशा से हमारे शास्त्र भी इसी ओर संकेत करते रहे हैं।

वक़्त की प्रतिकूलता में हमें ‘धैर्य रखना चाहिए’, क्योंकि जीवन में आई प्रतिकूलता भी हमारे ही किन्हीं पूर्व कर्मों का परिणाम होती है।

और यदि जीवन में समय की अनुकूलता है, तो अपने पूर्व कर्म-संस्कारों के लिए परम सत्ता का आभार व्यक्त करते रहें.. ताकि अहंकार न पुष्ट हो सके।

मनुष्य अगर पारखी स्वभाव का है, तो वह ‘परछाई’ व ‘आईने’ से भी सीख ले सकता है।

क्योंकि ‘परछाई’ ही है जो मनुष्य का कभी साथ नही छोड़ती, और ‘आईना’ उससे कभी झूठ नहीं बोलता।

क्या आपको नहीं लगता कि, ‘धन’ की संपन्नता से ‘मन’ की संपन्नता (परिपक्वता) सदैव बेहतर सिद्ध हुई है।

शास्त्रों में ऐसे कई एक प्रसंग है जहां ‘धन’ की संपन्नता हुई है वहां ‘अहंकार’ पुष्ट होने से परिणाम में सब मटिया मैट हो गया है। जहां ‘मन’ की संपन्नता बरकार रही है वहां अच्छे ‘संस्कार’ विकसित होते रहने से व्यक्ति आध्यात्मिक जगत के उच्च पद को प्राप्त हुए है।

अभी सोलह फरवरी, 2022 की रात्रि को जब मैं अपनी कार से आगरा की ओर जा रहा था, तो कार ड्राइव करते ‘वक़्त’ मुझे कोहरे से एक सीख मिली..

कि, व्यक्ति को ‘कर्म-संस्कारों’ के वशीभूत कभी जीवन में भी ऐसे मंज़र से गुजरना पड़े..कि, कोहरे की तरह.. उसे कभी अपने निजी जीवन में आगे का रास्ता साफ नज़र न आये, तो उस वक्त बहुत दूर तक देखने की कोशिश न करके..धीरे धीरे एक एक कदम बड़ी सूझ-बूझ के साथ आगे बढ़ाते रहने से कई बार अड़चन भरे रास्ते भी सुगमता से खुलते चले जाते हैं।

लोग कहते हैं.. जिन पर “वक़्त” की मेहरबानी हो जाती है, कई बार बड़े-बड़े खतरों में से भी ‘जिन्दगी’ सुरक्षित निकल आती हैं, इसलिए हमें अपना आत्मविश्वास हमेशा बनाए रखना चाहिए। वक्त ही वो मरहम है जो मानव जीवन में आईं हुई असहनीय पीड़ा को भी मिटा देता है।

यहां महाभारत में वर्णित देवी कुन्ती का वह प्रसंग अनुकरणीय है.. युद्ध के उपरांत जब पांडवों को विजय श्री के साथ साथ हस्तनापुर का सारा राज्य प्राप्त हो जाता है तब श्री वासुदेव कृष्ण वहां से चलने लगते हैं, तो स्वाभाविक सी बात है.. कि जाने वाले की पीठ आपकी तरफ हो ही जायेगी। तब देवी कुन्ती ने कहा था.. प्रभु हमें कभी पीठ मत दीजिएगा..श्री कृष्ण ने कहा,” बुआ ये संसार का परम सत्य है.. सामान्यतः भौतिक सुख में इष्ट की विस्मृति हो ही जाती है। सामान्य जन को अजीब लगेगा परंतु इष्ट की निरंतर स्मृति तो सदैव दुःख में ही संभव है।

लेकिन दुःख को तो लोग किसी दूसरे की संपत्ति मानके बैठे हुए हैं न..? जबकि ये “दुःख” भी किसी और की नहीं इस मानव की ही संपत्ति है। जो उसके अपने ही कर्मों का परिणाम होता है।

आध्यात्मिक नजरिए से कई मायनों में दुःख..सदैव सुख से कहीं बेहतर सिद्ध हुआ है। मगर वह “दुःख” है, अतः सहज स्वीकार हो नही पाता..!!

बात हवा में नहीं कही जा रही है.. आप देख लीजिएगा.. स्थितप्रज्ञ योगियों ने जब जब इस “दुःख” को सहर्ष स्वीकार किया है,तो परिणाम में सदैव उच्च पदों को भी प्राप्त हुए हैं।

“भक्त माल” में अनेकों संतो के चरित्र इस बात के प्रमाण हैं। चाहे पूज्य मीरा जी,पूज्य सुदामा जी,पूज्य हनुमान प्रसाद पौदार उर्फ भाईजी महाराज, पूज्य राधा बाबा और वर्तमान में पूज्य श्री प्रेमानंद जी आदि के चरित्र.. देवी कुंती के “दुःख” मांगने की बात का समर्थन करते हैं। सच में ये “दुःख” ही जो मानव के चरित्र को निखारता है।

धन्यवाद

171 – सूझ-बुझ

वैसे तो अधिकतर लोग अपने दोष किसी को बताते नहीं। फिर भी कभी-कभी भोलेपन के कारण कुछ गलतियां हो भी जाती हैं। मेरे कहने का आशय है कि,सभी लोग अपना जीवन हमेशा सावधानी से एवं पूरी सूझ-बूझ के साथ जिएं

आवश्यकता पड़ने पर जीवन में अपने से अनुभवी लोगों, जैसे; माता-पिता एवं गुरुजनों या अपने किसी समझदार खास मित्र, रिश्तेदार अर्थात पात्र व्यक्तित्व (पत्नी भी मित्र ही होती है।) को ही अपनी परेशानी बताएं, सबको नहीं।”

इतना लम्बा जीवन है, सही ‘सूझ-बुझ से काम करें क्योंकि मनुष्य तो पहले से ही अल्पज्ञ है। उससे कभी न कभी, कहीं न कहीं, छोटी-बड़ी किसी भी प्रकार की गलती हो ही जाती है।

परंतु मनुष्य को सदैव सचेत रहना चाहिए ऐसा न हो कि, वही गलती बार-बार करके सॉरी बोलने की अपनी छबि बनाकर अपने आपको दूसरों की नज़रों से भी गिरा लें..।

अपने आचरण में ख़ुद के अनुभवों की सीख लेकर जीवन में आगे बढ़े..अबोध न बनें “कौन सा कार्य गलत है, और कौन सा सही..?” इसकी जानकारी सदैव अपने जहन में बिठाएं।

“सही और गलत को जानने पहचानने की अंतिम और निर्दोष कसौटी ईश्वर है। दूसरे कुछ हद तक खुद की अंतरात्मा भी। ध्यान रहे सर्वज्ञ ईश्वर ही है। जो कभी गलती नहीं करता। इसलिए सही-ग़लत के निर्णय हेतु ईश्वर पर “अटल विश्वास होना चाहिए।”

और दूसरी बात– हमारे कर्मों का अंतिम निर्णय भी ईश्वर को ही करना है। इस कारण से भी हमें ईश्वर का विधान जानना नितान्त आवश्यक है। “उसी की कसौटी पर सही गलत का निर्णय करना होगा, ताकि हम ईश्वर के न्यायालय में अपराधी होकर दंड के पात्र न बन पाएँ।”

अगर हम बेकार की चीजों में न उलझ कर.. वक़्त का सही सद्पयोग करें..तो ईश्वर ने चार वेदों में यह सब जानकारियां दे रखी हैं, कि कौन सा काम ठीक है, और कौन सा गलत। कौन सा काम करें, और कौन सा न करें। “

परन्तु फिर भी मनुष्य लोग, अलग-अलग देशों में, अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार सदैव कानून बनाते रहे हैं..और बनाते रहेंगे भी परन्तु वे अंतिम रूप से कभी प्रामाणिक नहीं होते!!

क्योंकि मनुष्य अल्पज्ञ है, वह कानून बनाने में, भाषा बोलने में, अथवा आचरण करने में, कहीं न कहीं गलतियां करता ही है।

इसीलिए आपने देखा या सुना होगा बार-बार संसद भवन में पिछले कानूनों पर बहस और संशोधन होते रहते हैं।

ऐसे लोग जो वेदों को जानते हों। और आपके सम्पर्क में हों तो अपने दोष उन्हें वे हिचक बता देने में कोई हर्ज नहीं है।

बताने से मेरा उद्देश्य सिर्फ अपने आप में ‘कन्फेश’ करने से है, कुछ और नहीं। ताकि आप अपने दोषों को, गलतियों को दूर करके अपने खुद के जीवन का आत्मचिंतन करके वक़्त रहते अपना जीवन सुधार सकें जिससे आपके दुख कम हो जाएं, और आपके जीवन में सुख बढ़ने लगें..जिससे जीवन की रुकी हुई गाड़ी पुनः खुशहाली की पटरी पर चलने लगे।

ये सच है सभी के माता पिता और वेदों के विद्वान सच्चे गुरु जी अपने बच्चे या शिष्य के सच्चे हितैषी होते हैं। वे हमेशा ठीक मार्गदर्शन ही करेंगे।” मग़र इनमें से कोई भी कड़ी अल्पज्ञ होने के कारण, या उनका दृष्टिकोण अलग होने से उनसे भी भूल चूक हो सकती है. वे भी आख़िर मनुष्य ही हैं।

परंतु वे आपके शत्रु विल्कुल नहीं हैं। इसलिए उनसे सहायता अवश्य लेनी चाहिए। वे आपकी कमियों को दूर करने में अपनी समझ के अनुसार कुछ न कुछ मदद ही करेंगे।

“बाई द वे कभी उनकी कोई बात, प्रमाण और तर्क से, आपको ईश्वरीय विधान अर्थात वेदों के विरुद्ध लगे, तो उसे भले ही आप छोड़ दे, उसे न मानें। परंतु 10 में से 7/8 बातें जो उनके द्वारा ठीक बताई गयी हों, कम से कम उनसे तो लाभ उठाएं।” अपने अक्ल के चक्षुओं से देख या समझकर ख़ुद के ‘सच्चे-हितैसी’ की पहचान कर अपनी परेशानी बताकर उनसे परामर्श लेकर जीवन में प्रगति कर लेनी चाहिए।

अन्य सामान्य सांसारिक लोग , या माता-पिता, गुरुजन किन्हीं कारणों वश वेदों को नहीं पढ़ पाए हैं, उनसे अपनी जटिल समस्याओं को शेयर न करें, वे उन परिस्थितियों को समझ पाने में लगभग असमर्थ होते हैं इसीलिए ये कहना भी गलत नहीं होगा कि, प्रायः वे आपके हितैषी नहीं होते।

बल्कि अपने अनुभव व समझ की कमी छुपाने में कभी कभी स्वार्थी और अवसरवादी भी हो सकते हैं। वे आपके दोषों और कमियों को जानकर उनका दुरुपयोग कर सकते हैं। आप को ब्लैकमेल कर सकते हैं। आप का शोषण भी कर सकते हैं। इसलिए जीवन को बड़ी सावधानी से जिएं।

व्यवहार रूपी पैमाने से उनका परीक्षण करें। उनमें से अच्छे लोगों को सहयोग दें, और स्वयं भी उनसे सहयोग लें।

अपनी सुरक्षा अपने हाथ में है। जीवन का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कोई भी निर्णय सदैव आपसी “सूझ-बुझ” से ही लें।

सम्भव हो सके तो गलतियाँ करने से बचें। यदि हो भी जाए, तो अपने अनुभवी बड़े बुजुर्गों से सहायता ले कर उन्हें शीघ्र दूर करें। किसी भी समस्या को लम्बा न खीचें तभी आपका जीवन सुंदर,सुखमय और शांतिपूर्ण बन पायेगा।

धन्यवाद👍