190-“याज्ञवल्क्य”

👇🏻 एक बार ‘याज्ञवल्क्य’ घर बार छोड़ कर जाने लगे.. वे जीवन के अंतिम पड़ाव में थे। और अब वह चाहते है कि घर-गृहस्थी छोड़ कहीं दूर पर्वतों की गुफाओं में जाकर शांति से ध्यान लगाया जाय..

याज्ञवल्क्य जी की दो पत्नियां थीं और बहुत सारी धन-दौलत भी। मग़र वे सबकुछ छोड़-छाड़ कर जाना चाह रहे थे।

क्योंकि वे उस समय के प्रकांड पंडित थे।विद्वता में उनका कोई मुकाबला नहीं था। तर्क में तो उनकी प्रतिष्ठा बहुत ऊंची थी।

चलो, उनकी तर्क-प्रतिष्ठा के एक प्रकरण पर नज़र डालते हैं..

ऐसे मान लो कि राजा जनक ने एक ‘वाद-विवाद’ का बहुत बड़ा सम्मेलन किया और एक हजार गौएं, उनके सींग सोने से मढ़वा कर उनके ऊपर बहुमूल्य वस्त्र डाल कर महल के द्वार पर खड़ी कर दीं और कहा: कि जो पंडित सही तर्को के आधार पर हमारी सभा में सबके समक्ष अपना ‘पांडित्य’ सिद्ध करेगा, वह इन हजार गौओं को इसी अवस्था में जीतकर अपने साथ ले जा सकेगा। यही इस ‘वाद-विवाद’ के सम्मेलन को जितने का पुरस्कार होगा।

दूर-दराज से बड़े-बड़े विद्वान आकर इकट्ठे हुए..दोपहर हो गई। काफ़ी देर ‘वाद-विवाद’ भी चला। लेकिन कुछ तय नहीं हो पा रहा था कि ‘कौन जीता.?’

तभी दोपहर में याज्ञवल्क्य कहीं से अपने कई एक शिष्यों के साथ वहां आ गये। दरवाजे पर उन्होंने गौएं खड़ी देखीं,तो उन्होंने पता लगाया कि, आख़िर माज़रा क्या है..? तो ‘वाद-विवाद सम्मेलन’ और पुरस्कार में दी जाने वाली गउओं के बारे में पता चला.. लेकिन उन्होंने गौर किया कि बेचारी गायें तो सुबह से खड़ी-खड़ी बुरी तरह थक गई हैं, धूप में उनका पसीना बहने लगा है। तब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, ऐसा करो, तुम गौओं को हांककर घर ले जाओ, मैं राजा जनक जी के सम्मेलन को देखता हूँ।और यहां चल रहे ‘वाद विवाद’ का निपटारा करके घर आता हूं।

उनकी प्रतिष्ठा के आगे राजा जनक की भी हिम्मत नहीं पड़ी उनसे यह कहने की, कि ये क्या बात है पहले वाद-विवाद जीतो! उसके बाद गउएँ जानी चाहिए।

क्योंकि ये जीतने के बाद मिलने वाला पुरुस्कार है।

हाँ, एकाध पंडित ने तो अवश्य कहा कि यह नियम के विपरीत है..पुरस्कार पहले ही ले चले.. वाह!!! जी वाह!!!

लेकिन याज्ञवल्क्य ने कहा, मुझे खुद पर भरोसा है। तुम फिक्र न करो। विवाद तो निपट ही जायेगा।

बेचारी गौएं थक गई हैं, इन पर ज़रा तरस खाओ..!! जाने दो.. बताइए..क्या मुद्दा है…?

ज़ाहिर है वे बहुत ही प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। बहुत धन-सम्पत्ति उनके पास बहुत थीं। बड़े सम्राट उनके शिष्य थे। और जब वह सन्यास के लिए जाने लगे,तब उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को बुला कर कहा कि आधा-आधा धन तुम्हें बांट देता हूं। बहुत सम्पत्ति है, सात पीढ़ियों तक भी खर्च नहीं कर सकोगी।

इसलिए तुम निश्चिंत रहो, तुम्हें जीवन में कभी कोई अड़चन नहीं आएगी। और मैं अब सन्यास ले रहा हूं। अब मेरे जीवन का ये अंतिम पड़ाव है। ऐसे दिनों मैं परमात्मा के साथ समग्रता से लीन हो जाना चाहता हूँ।

मैं कोई जीवन में नया प्रपंच नहीं चाहता। अपना एक क्षण भी अब मैं किसी और बात में नहीं गंवाना चाहता।

उनकी एक पत्नी जो भौतिकवादी थी, वह तो बड़ी प्रसन्न हुई, क्योंकि वे बहुत सारा धन जो छोड़कर जा रहे थे। उसमें से आधा उसे मिलने वाला था। वह सोच रही थी अब मैं ख़ूब मजे करूंगी।

लेकिन दूसरी पत्नी जो अध्यात्मवादी थी उसने सारा दृश्य-परिदृश्य ही बदल दिया.. कहा कि इसके पहले कि आप जाएं, मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे ते जाइये ..

क्या इस धन से आपको डालने जीवन में शांति,आनन्द एवं परमात्मा मिला..?

अगर मिल गया है,तो फिर कहां जाते हो..? और यदि नहीं मिला है, तो ये कचरा मुझे क्यों पकड़ाये जा रहे हो..? फिर मैं ही इसे लेकर क्या करूंगी..? चलो, मैं,भी तुम्हारे साथ चलती हूं।

जिन्हें कभी कोई निरुत्तर न कर सका आज वही याज्ञवल्क्य जी ‘नारी-शक्ति’ के सामने अपने जीवन में पहली बार निरुत्तर खड़े हैं। वे सोच रहे हैं कि,अब इस स्त्री को क्या कहे..? यदि ये कहे कि नहीं मिला, तो फिर कहेगी कि, धन बांटने में इतनी अकड़ क्यों दिखा रहे हो..? बांटते वक़्त हम ये अभी भी कह रहे थे कि, देखो इतने हीरे-जवाहरात, इतना सोना, इतने रुपये, और विस्तार की हुई सारी ज़मीन ये सब आपको दिए जा रहा हूँ। क्या किसी पति ने अपनी पत्नी के लिए इतना धन कभी दिया है..?

उस क्षण मुझमें वाक़ई थोड़ा अहंकार तो आ ही गया था।

मग़र दूसरी विद्वान पत्नी ने उनके सारे अहंकार पर पानी फेर दिया। उसने पुनः कहा ये उलझन हमें क्यों दिए जाते हो? अगर तुम इससे परेशान होकर सन्यास ले रहे हो तो ज़ाहिर है आज नहीं,तो कल हमें भी ऐसा ही कुछ करना पड़ेगा। तो फिर ‘कल’ ही क्यों..? ‘आज’ क्यों नहीं..? मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं।

तो यहां सांसारिक धन जो बांट रहा है वह क्या खाक बांट रहा है! उसके पास कुछ और मूल्यवान नहीं है। शायद इसीलिए बांट रहा है। कोई ज्ञान बांट रहा है, पाठशालाएं खोल रहा है, धर्मशास्त्र समझा रहा है, जब तक किसी ने स्वयं ध्यान और समाधि में डुबकी नहीं लगाई है, तो वह भी केवल ‘कचरा’ ही बांट रहा है। उसका कोई मूल्य नहीं है। बांटने योग्य यदि कुछ है तो सिर्फ: “परमात्मा” और उसकी अनुकरणीय बातें जिन पर हमें सदैव अडिग रहना चाहिए। और इसके अलावा कुछ भी नहीं है। वो भी उसे कोई तभी बांट सकता है जब पहले स्वयं पा ले, जान ले और जी..कर देख ले।उससे पहले नहीं।👍

सदैव प्रसन्न रहिये और स्वस्थ रहिए..दरअसल, “जो ‘प्राप्त’ है, मेरे ख़्याल से वही ‘पर्याप्त’ है।।” 🙏🙏🙏 👍👍

189-बेस-नॉलेज-2

जी हाँ पार्ट-2….

मेरा उद्देश्य है आने वाली जेनरेशन हमारी सनातनी-तहज़ीब अर्थात भारतीय संस्कृति को न केवल समझें वल्कि उन्हें इसकी जानकारी ठीक से होनी चाहिए।

मानता हूँ ये “माइंड ओवर मैटर” है। मगर मैं इसे आपके साथ शेयर करने की हिमांकत ‘सर्वजन हिताय..’ की दृष्टि से कर रहा हूँ। वरना मेरी क्या विसात है आपको ‘राइट-ट्रैक’ करने की।

दूसरे इसलिए भी कि, मेरा अनुभव कहता है..ऊपर गौलोक में जाने पर शायद प्रत्येक जीवात्मा से एक सवाल अक्सर पूँछा जाता है..? जिसे अधिकतर जीवात्मा बता नहीं पातीं हैं।

“आप!!.. अपनी अँगुलियों के नाम बताइए..?”

जवाब:- अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करके :- (1)जल (2) पृथ्वी (3) आकाश (4) वायू (5) अंगूठे को अग्नि बताते चले जाएं

ये वो बातें हैं जो सही वक़्त पर बहुत कम लोगों को याद रह पाती हैं। अक्सर भूल ही जाते हैं। जैसे;

5 जगह हँसना करोड़ो पाप के बराबर है

1. श्मशान में 2. अर्थी के पीछे 3. शोक में 4. मन्दिर में और 5.किसी भी कथा में ।

मेरे विचार से यदि हमने इसका अपने जीवन में अनुपालन कर लिया, तो जाने अनजाने में होने वाले बहुत से पापो से बचा जा सकता है। ।।

अकेले हो? परमात्मा को याद करो ।

परेशान हो? ग्रँथ या अपनी पसंद की पुस्तकें पढ़ो ।

उदास हो? कथाएं पढो ।

किसी तनाव में हो? भगवत गीता पढो ।

फ्री हो? अच्छी चीजे अपने प्रियजनों को फोरवार्ड करो..और कहो..

हे ! परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियो पर कृपा करो…… इंगित क्या करें आप सब जानते हों ?

हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को नियमित पढ़ने-सुनने से व्यक्ति की भयंकर बीमारियां तक टल जातीं हैं।

आरती—-के दौरान ताली बजाने से हमारा दिल मजबूत होता है ।

व्रत,उपवास करने से चेहरे का तेज़ बढ़ता है,सर दर्द और बाल गिरने से भी बचाव होता है

केवल आसुरी-प्रवृत्ति के लोग इसे न तो गम्भीरतापूर्वक पढ़ेंगे और नहीं अनुपालन में ही रुचि दिखायेंगे..मग़र..मैंने तो सर्वजन हिताय की दृष्टि से लिख दिया है।.

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”कैन्सर” एक खतरनाक बीमारी है…जाने अनजाने में बहुत से लोग इसको खुद दावत देते हैं …

अक्सर लोग खाना खाने के बाद “पानी” पी लेते है … खाना खाने के बाद “पानी” ख़ून में मौजूद “कैन्सर “का अणु बनाने वाले ”’सैल्स”’के लिए ”’आक्सीजन”’ पैदा करता है…

जबकि, बहुत मामूली इलाज करके इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है …

”ग्रंथो की मानें तो… खाने से पूर्व थोड़ा जल ले लेना अमृत”है..

. खाने के बीच मे जल ‘ पीना शरीर की ”पूजा” है..

. खाना खत्म होने से कुछ पहले ‘जल’ लेना औषधि” है…

लेकिन खाने की समाप्ति पर तुरन्त बाद ‘जल’ लेना” अनेक बीमारियों का घर है…

खाना खत्म होने के कुछ देर बाद..स्वतः प्यास लगने पर जल लेना सबसे उत्तम है।.

ये बात उनको अवश्य बतायें जो आपको अपनी “जान” से भी ज्यादा प्यारे है।

रोज एक सेब नो डाक्टर ।

रोज पांच बदाम, नो कैन्सर ।

रोज एक नीबू, नो पेट बढना ।

रोज एक गिलास दूध, नो बौना (कद का छोटा)।

रोज 12 गिलास पानी, चेहरे पै तेज।

रोज चार काजू, नो भूख ।

रोज मन्दिर जाओ, तनाव रहित जीवन जियो ।

“आंखों के लिए ताजा पानी”।

“मन के लिए गीता की बाते”।

“शरीर की आंतरिक मशीनरी” अर्थात सेहत के लिए योग ।

और खुश रहने के लिए जब भी समय मिले सदैव परमात्मा एवं अपने प्रियजनों से सम्बंधित यादों की नगरी में चले जाएं।

अच्छी बाते फैलाना पुण्य है. ऐसा करके किस्मत में करोड़ो खुशियाँ स्वतःलिख जाती हैं ।

जीवन के अंतिम दिनो में इन्सान इक इक पुण्य के लिए तरसता है।। जब-जब अच्छे मैटर शेयर करोगे..पुण्य मिलेगा..ही।

युग की..कलम से..

जय माँ शारदे 💐हमें सदबुद्धि दो

188-बेस-नॉलेज

हमारी सनातन संस्कृति से सम्बंधित आधारभूत जानकारियों से युक्त ..लेख 🙏

मेरा आपसे एक आग्रह है. ये “माइंड ओवर मैटर” अपने बच्चों के साथ अवश्य शेयर कीजियेगा👍

क्योंकि कई बार व्यक्ति खुद के बजूद से सम्बंधित ‘मूल-ज्ञान’ अर्थात “बेस-नॉलेज” के अभाव में कभी-कभी अपने जीवन को बहुत असुरक्षित महसूस करने लग जाता है। विशेषकर आज का ‘युवा-वर्ग’।

📜😇 दो पक्ष- कृष्ण पक्ष , शुक्ल पक्ष !

📜😇 तीन ऋण – देव ऋण , पितृ ऋण , ऋषि ऋण !

📜😇 चार युग – सतयुग , त्रेतायुग , द्वापरयुग , कलियुग !

📜😇 चार धाम – द्वारिका , बद्रीनाथ , जगन्नाथ पुरी , रामेश्वरम धाम !

📜😇 चारपीठ – शारदा पीठ ( द्वारिका ) ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम ) गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) , शृंगेरीपीठ !

📜😇 चार वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद , यजुर्वेद , सामवेद !

📜😇 चार आश्रम – ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ, संन्यास !

📜😇 चार अंतःकरण – मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार !

📜😇 पञ्च गव्य – गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र, गोबर !

📜😇 पंच तत्त्व – पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश !

📜😇 छह दर्शन – वैशेषिक , न्याय , सांख्य , योग , पूर्व मिसांसा , दक्षिण मिसांसा !

📜😇 सप्त ऋषि – विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप!

📜😇 सप्त पुरी – अयोध्या पुरी , मथुरा पुरी , माया पुरी ( हरिद्वार ) , काशी , कांची ( शिन कांची – विष्णु कांची ) , अवंतिका और द्वारिका पुरी !

📜😊 आठ योग – यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधि।

📜😇 दस दिशाएं – पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , ईशान , नैऋत्य , वायव्य , अग्नि आकाश एवं पाताल

📜😇 बारह मास – चैत्र , वैशाख , ज्येष्ठ , अषाढ , श्रावण , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष , पौष , माघ , फागुन !

📜😇 पंद्रह तिथियाँ – प्रतिपदा , द्वितीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावास्या !

📜😇 स्मृतियां – मनु , विष्णु , अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन , ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ।

शेष पार्ट-2 में..पढ़ियेगा👍

युग की कलम से..

जय माँ शारदे..💐

187- अटूट विश्वास

🕉️अटूट विश्वास🕉️

हालांकि, हमारे कई एक जन्मों के कर्म-संस्कारों से निर्मित “प्रारब्ध” को आधार मानते हुए.. “हानि,लाभ,जीवन,मरण,यश और अपयश” का निर्धारण होता है।

मग़र इन छह चीजों पर ‘निर्णय’..देने का अधिकार परमसत्ता ने अपने हाथ में रखा है।

इससे कोई सरोकार भी नहीं है कि इस तथ्य में कौन कितनी सहमति रखता है..? ये सार्वभौमिक सत्य जो है।

जी,हाँ आधुनिक भाषा में वहीं दूर.. अपने गौलोक धाम से नियंत्रित करने का रिमोट राधे गोविंद के हाथ में है।

अपने एक दोहे के मध्य से तुलसीदास जी ने भी इसकी पुष्टि की है….

” सुनहुँ भरत भावी प्रबल, बिलखि कहहुँ मुनिनाथ।

हानि,लाभु, जीवनु,मरणु, यश,अपयश विधि हाथ।।”

” विधि” यानी गोविंद ..

क्योंकि हमारे कई एक जन्मों के संचित कर्मों व संस्कारों से बुना हुआ ताना-बाना जो अध्यात्म की भाषा में “प्रारब्ध” अर्थात आत्मा में निहित एक स्थायी खाते की तरह है जिसमें ‘जीव’ के कई एक जन्मो का हिसाब-किताब होता है।

मग़र उसे समझकर निर्णय करने की सामर्थ्य व हक़ केवल और केवल गौलोक-धाम के परमसत्ता धारी यानि ‘राधे-गोविंद’ का ही है।

मानवता के दायरे में रहने वालों को कभी न कभी अपने जीवन में ऐसा अनुभव अवश्य होता ..

लेकिन चलो! इस बात को एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं..

एकबार की बात है..

अचानक रात के ढाई बजे एक सेठ की नींद खुल गयी..जबकि उसे स्वास्थ्य-सम्बन्धी कोई परेशानी नहीं थी। मगर वह एक अजीब बेचैनी महसूस कर रहा था।। वह अपने घर में चक्कर पर चक्कर लगाये जा रहा था, पर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था..मन की इसी धुना-बुनी में वह थक कर कोठी के नीचे वाले माले यानि ग्राउंड फ्लोर पर उतर आया, न तो उसे घर में किसी को जगाने का मन हुआ,न ड्राइवर को .. वश कार निकाली। और.. शहर की सड़कों पर वह निकल गया..

तभी रास्ते में उसे एक मंदिर दिखा, सोचा थोड़ी देर इस मंदिर में जाकर भगवान के पास बैठता हूँ। शायद मन को कुछ तसल्ली मिले। वह सेठ मंदिर के अंदर गया तो देखा, एक और आदमी वहां पहले से ही भगवान के सामने नतमस्तक है। लेकिन उसका चेहरा बहुत उदास था।

सेठ ने पूछा “क्यों भई इतनी रात को मन्दिर में क्या कर रहे हो ?” उस अजनबी ने कहा, महोदय! “मेरी पत्नी अस्पताल में है, वह दर्द से चीख रही है। सुबह यदि उसका आपरेशन नहीं हुआ तो वह मर जायेगी अब मेरे पास प्रभु से गुहार लगाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है। क्योंकि रिश्तेदारों से पहले ही मदद ले चुका हूँ।

गोविंद कृपा से उसकी बात सुनकर सेठ ने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी जेब में उस वक़्त जितने रूपए थे, तुरन्त खुशी-खुशी सब उस परेशान-व्यक्ति को सौंप दिए। न जाने क्या हुआ..? उस गरीब आदमी के चेहरे की मुस्कान के जादू से सेठ की बेचैनी एमदम से फुर्र हो गयी।

सेठ ने अपना कार्ड देते हुए कहा इसमें फोन नम्बर और पता भी है और जरूरत हो तो नि:संकोच बोल दीजियेगा।

उस गरीब आदमी ने कार्ड न लेते हुए बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा, “मेरे पास उनका पता है और उनके पास आप जैसे फ़रिस्तो का.. तो सेठ जी अपना एक कार्ड ही क्यों खराब करते हो!!”

सेठ ने कहा, “किसका पता है आपके पास..?”

उस गरीब आदमी ने अपने ‘अटूट-विश्वास’ के कॉन्फिडेंस में कहा, “जिसने मेरी करुण पुकार सुनकर रात को ढाई बजे अपने प्रिय भक्त..”सेठ जी ” आपको यहां मेरी मदद के लिए भेजा है। उसी ‘राधे गोविंद’ का पता है मेरे पास।”

आस्थावान लॉबी सदैव ये निर्देश देती आयी है कि, यदि व्यक्ति में किसी के प्रति भी ऐसा “अटूट विश्वास” है, तो उसके सारे कार्य समय से पूरे होते चले जाते हैं।’

यदि कभी ईश्वर से कुछ चाहें तो केवल ‘सदबुद्धि और ख़ुद को सदैव मानवता के दायरे में बने रहने का आशीर्वाद’। और कुछ नहीं। इसी में दुनियाँ का सारा तत्व समाहित है। और “तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा..” वाले भाव से प्रतिदिन अपने सारे कर्म उस परमसत्ता को समर्पित करते चलें जाएं.. मेरे ख्याल से यही जीवन का सद्मार्ग है।

हमेशा स्वस्थ रहिए और मस्त रहिए..

शिक्षा :

धीरे-धीरे अभ्यासगत होकर अपने ईष्ट के प्रति हमें भी अपने अंदर श्रद्धा के साथ वही अजनबी व्यक्ति वाला “अटूट विश्वास” पैदा करने का प्रयास करना चाहिए …

‘राधे गोविंद’ 👍

186-बेबे..( माँ )

जब शहीद भगत सिंह अंग्रेजों की कैद में थे। तब उनकी बैरक की साफ-सफाई करने वाले सफाई-कर्मी को छुआछूत फैलाने वाले समाज के ठेकेदार एक भद्दी गाली की तरह ऐसे भले मानुष को “भंगी” जैसे शब्द बोल कर बेइज्जत करते थे। उसे ही उसकी जाति बताते..जबकि उसका अपना नाम ‘बोघा’ था।

भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे। जब कोई पूछता कि भगत सिंह ये भंगी ‘बोघा’ तेरी बेबे कैसे हुआ? भई!! तब भगत सिंह बोलते, ‘मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने साफ़ किया था जब में छोटा बालक था। या आज इस बैरक में ये भला पुरूष बोधा उठाता है।

इसलिए बोधा मे, मैं अपनी बेबे यानि मां को देखता हूं। यू तो मेरी बेबे ही है। यह कहकर भगत सिंह बोधा को अपनी बाहों में भर लेता। भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खा वांगा। पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, “मेरे वीर भगतां तू रेंण दे, ज़िद न कर।”

सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोधा को कहा,” ए ! बेबे अब तो तेरा लाल चंद दिनों दा मेहमान सी, अब तो इच्छा पूरी कर दे!” ये सुणके बोधा की आँखों से आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस “वीर शहीद ए आजम” के लिए रोटिया पकाई, और अपने हाथों से ही खिलाई। भगत सिह के मुंह में रोटी का ग्रास डालते ही बोधा की रुलाई फूट पड़ी। “ओए भगतां, ओए! मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझ जैसे लाल कूँ जन्मा.. भगत सिंह ने बोधा को अपनी बाहों में भर लिया।

ऐसी सोच के धनी थे आपणे “वीर सरदार भगत सिंह जी..” परन्तु आजादी के सत्तर साल बाद भी हम भारतीय समाज में व्याप्त लोगों के रग-रग में ऊँच-नीच के भेद-भाव के विचार को दूर करने के लिये ऐसा कुछ न कर पाए जो 88 साल पहले ‘सरदार भगत सिंह’ करके चले गए।

ऐसे महान ‘शहीदे आजम’ श्रीमान भगतसिंह जी को हम सभी भारतीय नागरिकों का शत शत नमन है। जय हिंद जय भारत।👍

विचारक ; युग पचहरा, नीमगाँव, राया, मथुरा।

185- असली “लाल”

जी हां, प्रो.बी.बी. “लाल” ( बृज बासी लाल) अपनी कर्मशीलता के दम पर वाक़ई देश का “सच्चा-लाल” है। स्थूल रूप में भले ही वे आज हमारे बीच नहीं हैं मगर अपने कर्म और विचार से वे हर भारतीय के दिल में आज भी मौजूद हैं और हमेशा रहेंगे।

मग़र गुस्ताख़ी कहूँ या विडम्बना समझ नहीं आता।! एलिजाबेथ की मौत पर भारत के काफी लोग और मिडिया बार बार खबर दिखाते रहे कि एलिजाबेथ क्या-क्या करती थी, क्या खाती थी केसे सोती थी बगैरह..बगैरह..

मेरे विचार से भारतीय मीडिया के भटकाव की पराकाष्ठा है। क्योंकि कल रात्रि (10 सितंबर,2022) को भारत के एक महान भू-स्तर शास्त्री और इतिहासकार “प्रो.बी बी लाल” का गत रात्रि को नई दिल्ली में निधन हो गया। उनका जन्म 02 मई 1921 को झांसी में हुआ था । उनकी मृत्यु लगभग १०० वर्ष से अधिक आयु में हुई है। दूसरे वे देश की धरोहर हैं.. बहुत ही सम्मानित व्यक्तित्व है। परन्तु इस बारे में मीडिया अर्थात टीवी चैनल्स अथवा दूसरे संचार साधनों में कोई खबर नहीं थी ।

जबकि आप इस व्यक्तित्व की खाशियत समझिए.. रामायण, महाभारत, वेद उपनिषद आदि को स्कूली किताबों में जब महज़ एक मैंथ्योलोजी बता दिया गया था, राम और कृष्ण को काल्पनिक पात्र कह दिया गया, इन सभी षडयंत्रकारियों को प्रो. बी बी लाल जैसे व्यक्तित्व ने न केवल सिरे से ख़ारिज किया अपितु दुनियाँ के सामने उन्हें झुठा भी सिद्ध किया था।

राम मंदिर जो अभी अयोध्या में बनाया जा रहा है.. जो कभी सिर्फ एक पॉलिटिकल मुद्दा लगता था। इसलिए वहाँ मन्दिर बनना एकअसम्भव सी बात लगती थी, इसे सम्भव कर पाने के मूल में बेहद कर्मशील प्रो. बी.बी. लाल ही थे। जिन्होने ये साबित किया था कि राम मंदिर नामक देवालय वही था जिसे बाबर ने तोड़ दिया था।। प्रो. बी बी लाल के कारण ही भारत के हिंदुओ को पता चला है कि रामायण और महाभारत कोई काल्पनिक नही हैं। ये सच में घटित हुई घटनाये थी। बी बी लाल ने ही द्वारिका नगरी पर शोध किया था। कि,समुद्र में द्वारिका है इसे अपनी रिसर्च से सिद्ध भी किया।

भारत के रामायण और महाभारत काल के अवशेषों को खोज कर के उन्होंने ढेरो रिसर्च की थी। उनकी इन अनगिनत सेवाओं के आधार पर ही आज हम लोग उन अंग्रेजों और मुगलों के गुलाम बामपंथी हिंदूओ के मुंह बन्द करवा पाए हैं जो राम को काल्पनिक साबित करने पर तुले हुए थे।

इतिहास में लिखी हुई इस थ्योरी को भी झूठा साबित कर सिरे से खारिज कराया कि, ‘आर्य लोग बाहर से आए थे’ अब आप ही सोचिए कितने शर्म की बात है !! ऐसे व्यक्तित्व, के निधन को एक भी मिडिया या न्यूज पेपर में कहीं भी नही दिखा गया। क्या ये कोई इत्तेफाक हो सकता है..? उस वक्त सब के सब ब्रिटेन की रानी के पीछे पड़े हुए थे। आखिर देश में ये हो क्या रहा है..? हम किधर जा रहे हैं।

प्रो. बी बी लाल की महत्वपूर्ण पुस्तकें है:- “इंद्रप्रस्थ : द बेकिंग टाइम ऑफ दिल्ली”और एक है…. “टाइम्स ऑफ ऋग्वेद एरा पीपल्स” (ऋग्वेद के समय के लोग और व्यवस्था) और कई सारी पुस्तके हैं जिन्हें पढ़ना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है और इतनी अच्छे तरीके से उसमे साक्ष्य दिए गए है कि आपका भी पुस्तक को १०-२० बार पढ़ने का मन हो जाएगा।

ऐसे अविस्मरणीय व्यक्तित्व को मेरा सादर नमन और विनम श्रद्धांजलि 🙏🪷🙏

184- No Revenge

एक ऐसी सत्य कथा जिसको पढ़ने के बाद शायद.. आपके जीने का अंदाज़ बदल जाय..

सुनिए.. दक्षिण अफ्रीका में 1994 से पूर्व रंगभेद की नीति (Apartheid) से राज-काज चलता था.. यानी काले लोगों के लिए अलग कानून और गौरे लोगों के लिए अलग..

‘नेल्सन मंडेला’ काले रंग के यानी वंचित समाज के नागरिक थे। जैसे ही उन्होंने होश सम्भाला अपने अधिकारों की आवाज उठायी और तत्कालीन सरकार से समानता का अधिकार मांगा, तो नेल्सन मंडेला को 1964 में न केवल जेल में डाल दिया गया वल्कि बहुत ही क्रूर व अमानवीय यातनाओं को लगभग 30 वर्ष (एक लम्बे अर्से) तक सहना पड़ा। तब कहीं जाकर उनकी और उनके लोगों की विजय हुई,जिससे दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की षड्यंत्रकारी नीति का खात्मा हुआ। और नेल्सन मंडेला 1994 में अफ्रीका के पहले लोकतांत्रिक व अश्वेत राष्ट्रपति बने।

इसी वर्ष 1994 में प्रदेश की A ग्रेड संस्था “के.एल.जैन इंटर कॉलेज, सासनी” अर्थात मेरे सपनों के मन्दिर में मुझे भी एक पुजारी (शिक्षक) के रूप में तैनाती मिली थी। तारीख़ सहित वो मंजर मुझे आज भी बहुत अच्छी तरह याद है। 10 मई को श्री मंडेला साहब ने अंतरराष्ट्रीय लीडरशिप के सामने शपथ ली थी।

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद.. नेल्सन मांडेला.. एकदिन अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक होटल में खाना खाने पहुंचे । सबने अपनी अपनी पसंद का खाना आर्डर किया और..फिर खाना आने का इंतजार करने लगे । उसी समय.. मंडेला की सीट के ठीक सामने एक व्यक्ति भी बैठा खाने का इंतजार कर रहा था ।

मांडेला ने उसे पहचान लिया..और अपने सुरक्षा कर्मी से कहा कि उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ। उस बुलावे को राष्ट्रपति का आदेश समझ वह आ तो गया। मग़र खाना खाते हुए उसके हाथ कंपकपा रहे थे । खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर बहुत जल्दी रेस्तरां से बाहर चला गया।

उस आदमी के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि, वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था , खाते वख़्त न केवल उसके हाथ लगातार कांप रहे थे,वल्कि वह ख़ुद भी कांप रहा था । मांडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है । वह बीमार नहीं था। वह उसी जेल का जेलर था, जिसमें मुझे 30 वर्ष कैद में रखा गया था । और जब मुझे यातनाएं दी जाती थीं और मै.. कराहते हुए..पानी-पानी बोलता, तो ये जेलर आकर मेरे ऊपर पिशाब करता था ।

मांडेला ने कहा मै, अब राष्ट्रपति बन गया हूं , उसने समझा होगा कि..शायद मै भी उसके साथ वैसा ही कोई दुरव्यवहार करूंगा । पर नहीं, मेरा चरित्र ऐसा नहीं है । मैं ऐसा मानता हूँ.. बदले की भावना से काम करना..व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता है । जबकि धैर्य और सहनशीलता हमें सदैव विकास की ओर ले जाती है।

धन्यवाद 👍

विचारक ; युग पचहरा,

शिक्षक, जैन इंटर कॉलेज, सासनी,हाथरस

183-सामर्थ्य

अ——ज्ञ

हिन्दी वर्णमाला के अक्षरों ‘अ से ज्ञ ‘ के क्रम में एक कवितामय प्रयोग..करने के प्रयास के साथ-साथ ‘मानव-जाति’ को एक सन्देश देने की कोशिश भर है उसे समझकर..हमें आज ‘विश्व हिंदी दिवस’ पर ईश्वर प्रदत्त ‘ज़िंदगी’ को वही आकर देने का संकल्प लेना चाहिए..जिसके लिए वह सदैव से वांछनीय है…👍

अ चानक एकदिन

आ कर मुझ से

इ ठलाता हुआ एक पंछी बोला!

ई श्वर ने मानव को

उ त्तम ज्ञान-दान से तौला ।।

ऊ पर हो तुम सब जीवों में

ऋ ष्य तुल्य अनमोल हो तुम।

ए क अकेली जात अनोखी फिर भी

ऐ सी क्या मजबूरी तुमको,

ओ ट रहे होंठों की शोख़ी

औ र सताकर कमज़ोरों को।

अं ग तुम्हारा खिल उठता है

अ: तुम्हें क्या मिल जाता है.? मानव ने

क हा उसे भटकाते हुए ..कहो!

ख ग आज पूरे

ग र्व से कि- इस अभाव में भी

घ र तुम्हारा बड़े मजे से

च ल रहा है।

छो टी सी- टहनी के सिरे की

ज गह, बिना किसी

झ गड़े के,।

न ही किसी

ट कराव के तुम्हारा पूरा कुनबा पल रहा है।

ठौ र यहीं है उसमें

डा ली-डाली, पत्ते-पत्ते

ढ लता सूरज

त रावट देता है

थ कावट सारी, पूरे दिवस की-तारों की लड़ियों से

ध न-धान्य की लिखावट लेता है

ना दान-नियति से अनजान अरे!

प्र गतिशील मानव!

फ़ रेब के पुतले

ब न बैठे हो तुम, अपनी “सामर्थ्य”

भ ला कहाँ याद तुम्हें!

म नुष्यता का अर्थ भूले मानव!

य ह थी, प्रभु की एक अनुपम

र चना जिसे तुमने अपने…

ला लच,लोभ के

व शीभूत होकर

श र्म-धर्म सब तजकर

ष ड्यंत्रों के खेतों में

स दा पाप-बीजों को बोकर हो कर स्वयं से दूर .. क्यों तुम ..?

क्ष णभंगुर सुख में अटक हर तरफ

त्रा हि-त्राहि मचवाते हो .. अरे! मानव, अपनी “सामर्थ्य ” भूल तुम

ज्ञा न-पथ से भटक गए हो..?😢😢😢

🕯️🕯️🕯️’हिंदी-भाषा’ के बारे में मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि, व्यक्ति के मन के भाव जो “हिंदी भाषा” अभिव्यक्त कर पाती है। उतनी “सामर्थ्य” अन्य किसी भाषा में है मुझे नहीं लगता ।

हालांकि, मैं ‘अंग्रेजी ‘ का शिक्षक हूँ..मग़र हिंदी की ‘भावनात्मकता’ मुझे सदैव आकर्षित करती है। 👍

182-पिता या क्रेडिट-कार्ड

एक बेरोजगार युवा की आप बीती..

ये हम सभी बड़ी अच्छी तरह जानते ही हैं कि, किशोरावस्था से लेकर जवानी की शुरुआत के दिनों में व्यक्ति के ज़हन में जोश का प्रतिशत बहुत अधिक एवं होश का प्रतिशत बहुत कम होता है।

मग़र ईश्वर-प्रदत्त (God-gifted) “जीवन”.. को जिंदगी का आकार देने के लिए किया गया संघर्ष..व्यक्ति को मैच्योर बनाता है। तब.. होश का प्रतिशत दिन प्रतिदिन बढ़ता है..और फिर जोश भी अपने सीमित दायरे में स्थायी होने लगता है। जिससे धीरे-धीरे..’होश और जोश’ के बीच उचित टाइमिंग एवं संतुलन के साथ व्यक्ति समाज की नजरों में भी अच्छी सूझ-बूझ वाली छबि लेकर उभरता है।

हाँ, तो अब उस युवक की जुबानी सुनियेगा कि, उसने क्या..किया..?

: एक दिन मुझे लगा मेरे सब्र की बस इंतहा हो गयी..बड़े गुस्से से मैं घर से निकल पड़ा ..

इतना गुस्सा था की जल्दी-जल्दी में भूल से पापा वाले जूते पहन आया.. ख़्याल आ रहा था आज बस घर छोड़ दूंगा, और तभी लौटूंगा जब कुछ बन जाऊंगा …एक मोटर साइकिल तक नहीं दिलवा सकते, तो मुझे इंजीनियर बनाने के सपने ही क्यों देखतें है …..??

मैं पापा का पर्स, तो जानबूझ कर उठा लाया था …. इसे किसी को हाथ तक न लगाने देते थे …देखुंगा आख़िर इसमें क्या-क्या छुपा के रखते हैं। मुझे पता है इस पर्स मैं जरुर पैसो के हिसाब की डायरी होगी …. पता तो चले कितना माल छुपाया है ….

मुझे तो मुझे… माँ को भी अंधेरे में रखते हैं … जैसे ही मैं कच्चे रास्ते को पार कर.. पक्की सड़क पर आया, मुझे लगा जूतों में कुछ चुभ रहा है …. मैंने जूता उतार कर देखा …..तो मेरी एडी से थोडा सा खून भी रिसने लगा था … जूते की कोई कील निकली हुयी थी, दर्द तो हुआ पर तहस में जो था….

उस वक्त बस घर से बहुत दूर चले जाने के अलावा कुछ सूझ नहीं रह था …इसलिए चलता रहा.. कुछ दूर चला ही था कि, दूसरे पांव में गीला-गीला सा लगा, वहां सड़क पर पानी फैला हुआ था …. गीला वाला पैर उठा के देखा तो जूते का सोल यानी निचला हिस्सा चटका हुआ था ….. जैसे तेसे उन बेकार से जूतों से लंगडाकर बस स्टॉप तक पहुंचा।

वहां जाकर पता चला बस तो अभी-अभी गयी है..दूसरी बस लगभग एक घण्टे बाद जाएगी ….. मैंने सोचा क्यों न तब तक पापा के इस सीक्रेट पर्स की तलाशी ही ले लूँ …. मैंने पर्स खोला, एक पर्ची मिली, लिखा था.. लैपटॉप के लिए 40 हजार रु किसी साथी से उधार लिए हुए हैं.. पर लैपटॉप तो घर मैं मेरे पास है.. ? ओ आई सी..!!

दूसरा एक मुड़ा हुआ सा कागज देखा, उसमे उनके ऑफिस के किसी ‘हॉबी डे’ पर लिखा एक आर्टिकल था, मैंने जल्दी-जल्दी में सरसरी नज़र से पढ़ा,तो पापा ने अपनी हॉबी लिखी थी, जीवन में शानदार एवं चमकदार.. अच्छे जूते पहनना। ओह….अच्छे जुते पहनना ??? पर उनके जुते तो ………..!!!! ओ ! सि ड!!

मेरी बेहोशी जाती रही..अब मुझे याद आया. माँ पिछले चार महीने से पापा से हर पहली तारीख़ को बोलतीं नए जुते ले लो … और वे हर बार कहते “अभी पॉकेट टाइट है 6 महीने बाद देखता हूँ ..” अब मेरा ज़मीर जाग गया था.. ……

तीसरी पर्ची ……….मिली पुराना स्कूटर दे जाइये.. एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल ले जाइये …!! पढ़ते ही दिमाग घूम गया….. मैं वहीं से पापा-पापा.. कहकर चिल्लाया …………. ओह्ह्ह्ह..स्कूटर!!

मैं घर की ओर भागा…….. अब जूतों की कील-वील सब भूल गया …. मैं घर पहुंचा ….. घर पर न पापा थे न उनका स्कूटर था………….. ओह्ह्ह नही.. मैं समझ गया कहाँ गए …. होंगे ।

मैं दौड़ा ….. और मोटर-बाइक की एजेंसी पर पहुंचा…… पापा वहीँ थे …………… मैं उनके गले से लिपट गया और प्रायिश्चित के आंसुओ से उनका कन्धा भिगो दिया.. “नहीं…पापा नहीं…….. मुझे मोटर साइकल नहीं चाहिए ..अब मैं घर के हालात समझ गया हूँ.. बस आप नए जुते ले लो ..और घर चलो.. “

आज के समय की मांग के मुताबिक मैं,मेरे तरीके व आपकी सूझ-बुझ के सही मार्गदर्शन से अब कुछ बड़ा करके ही दम लूंगा।।

साथियों!! यहां मेरा अपना अनुभव ये कहता है कि,

“माँ” एक ऐसी बैंक है जहाँ आप हर भावना और अपना दुःख जमा कर सकते हो..

मग़र

“पिता” एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है जिनके पास बैलेंस न होते हुए भी बच्चों के सपने पूरे करने की भरपूर “कोशिश” होती है…”

इंडियन-फैमिलीज़..💐 को समर्पित ‘एक विचार’..👍

181 स्वर्णिम-काल

यानी ‘GOLDEN-ERA’

अगर हमारे अंदर थोड़ी बहुत भी देशभक्ति है, तो जिसकी वजह से आज हमारा वजूद है, ऐसे व्यक्तित्व को हमें, हरगिज़ नहीं भुलना चाहिए.. ये उस डाउन टू अर्थ पर्सनैलिटी..की ही क्षमता थी जो “भारत को सोने की चिड़िया” बना पाया!! अपनी संस्कृति से ओतप्रोत वह ऐसे राजा थे जिनके राजगद्दी पर बैठने के बाद सदैव उनकी जिव्हा पर माँ शारदे का वास रहता था..इसलिए हमेशा उनके श्रीमुख से “देववाणी” ही निकलती थी l और उसी “देववाणी” से,समस्त भारत में ‘पूर्णन्याय’ होता था..इसीलिए इतिहास दुनियाँ के सबसे न्याय प्रिय राजा के रूप में उनकी सराहना करता है। ध्यान रहे यही वह एकमात्र राजा हैं जिनके राज्य में अधर्म का “संपूर्ण नाश” हो गया था।

कौन होगा जो ऐसे वंदनीय,अनुकरणीय महाराजा “विक्रमादित्य” की ‘जजमेंट सीट ऑफ विक्रमादित्य’ के चमत्कार के बारे में नहीं जनता होगा। उनकी ईमानदारी व ‘न्यायप्रियता’ को मेरा शत शत नमन है।

मग़र बड़े ही दुख की बात है,कि देश “महाराज विक्रमादित्य” की उपेक्षा कर अनदेखी कर रहा है। आज देश का ध्यान व ज्ञान उनके बारे में लगभग “शून्य के बराबर” हो के रह गया है। जिसकी जिम्मेदार देश व प्रदेश स्तर पर बनी शिक्षा-जगत की “पाठ्यक्रम-निर्धारण समितियाँ है।

एक वाज़िब सवाल..?

जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया अर्थात हर क्षेत्र में सम्पन्न बनाया, और देश में “स्वर्णिम काल” स्थापित किया ऐसे प्रेरणादायक व्यक्तित्व को हमने विद्यालयी-पाठ्यक्रमों से अलग-थलग क्यों कर रखा है..?

● चलो इनका इतिहास जान लेते हैं.. उज्जैन में एक राजा थे.. गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी। सबसे बड़ी लड़की थी l मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा बेटा वीर विक्रमादित्य..l अर्थात स्वयं। बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा “पदमसैन” के साथ कर दी गयी l जिनके एक पुत्र हुआ गोपीचन्द l आगे चलकर गोपीचन्द ने “श्री ज्वालेन्दर नाथ जी” से “योग दीक्षा” ली l और “तपस्या करने जंगलों में चले गए”..l फिर मैनावती ने भी, “श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली”।

● मत भूलिए..! आज ये देश और यहाँ की “संस्कृति” केवल, “विक्रमादित्य” के कारण, “अस्तित्व” में है। अशोक मौर्य ने “बोद्ध धर्म” अपना लिया था l और फिर बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था। उस वक्त भारत में “सनातन धर्म”, लगभग “समाप्ति” पर आ गया था l देश में -“बौद्ध और अन्य का बोलबाला था।

● “रामायण, और महाभारत” जैसे “ग्रन्थ” भी लगभग खो से गए थे l “महाराज विक्रम” ने ही, पुनः उनकी “खोज “करवा कर, दोनों ग्रन्थों को पुनः”स्थापित” किया। उन्होंने ही “विष्णु और शिव जी” के “मंदिर” बनवाये l और “सनातन धर्म” को अपनी सामर्थ्य से “बचाया” l विक्रमादित्य के 9 रत्नों में से एक -“कालिदास” थे जिन्होंने “अभिज्ञान शाकुन्तलम्” लिखा। जिसमें भारत का इतिहास है l अन्यथा काफी वक्त तक भारत का इतिहास ही नहीं बन्धुवर ! उस वक़्त हम “भगवान् श्री कृष्ण और राम ” को ही, खो (भूल )चुके थे। हमारे ग्रन्थ तो अपने ही देश..भारत में खोने के कगार पर आ गए थे।

● उस समय -“उज्जैन के राजा भृतहरि” ने राज छोड़कर, श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली l और “तपस्या” करने जंगलों में चले गए l राज अपने छोटे भाई – “विक्रमादित्य” को दे दिया. I “वीर विक्रमादित्य” भी ,श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से -“गुरू दीक्षा” लेकर, “राजपाट सम्भालने लगे” तब कहीं जाकर सनातन धर्म बच सका। और हमारी “संस्कृति” भी बच पायी।

● “महाराज विक्रमादित्य” ने केवल धर्म ही, नही बचाया ? उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर इतना सम्पन्न बनाया..जिसे लोग “सोने की चिड़िया” कहने लगे..और यही भारत का वो राज है जिसे “भारत का स्वर्णिम काल” या राज कहा जाता है।

● “विक्रमादित्य” के इस काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी, “सोने के वजन” से खरीदते थे। “भारत में इतना सोना आ गया था”…, कि “विक्रमादित्य काल” में – “सोने के सिक्के” प्रचलन में थे। हाँ, “गूगल इमेज” करके …,”विक्रमादित्य-काल” के “सोने के सिक्के” आप भी देख सकते हैं।

● “कैलंडर”, पर व महापुरुषों की जीवनी व ऐतिहासिक तारीख़ में आप जो – “विक्रम संवत” लिखा देखते हो. उसकी शुरुआत भी, राजा वीर विक्रमादित्य जी के जन्म से हुई है.. आज जो भी, “ज्योतिष गणना” है ? जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथियां , राशि , नक्षत्र , गोचर ,आदि सब भी उन्ही की रचना है l वे बहुत ही, पराक्रमी , बलशाली, और बुद्धिमान, राजा थे। “विक्रमादित्य” के काल में हर “नियम” ,”धर्मशास्त्र” के हिसाब से बने होते थे। न्याय , राज, सब “धर्मशास्त्र” के नियमो पर चलता था। “विक्रमादित्य” का काल, “प्रभु श्रीराम जी के राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है”l जहाँ :- “प्रजा”, “धनी” होने के साथ-साथ किसी भी स्थिति में धर्म से नहीं डिगती थी”।

◆बड़े दुःख की बात है ,कि, ” भारत के सबसे महानतम राजा” “विक्रमादित्य” के बारे में हमारे स्कूलों /कालेजों मे आज कोई “स्थान” नहीं रह गया है। कैसी विडंबना है..भारत देश के नौनिहालों को होश सम्भालते ही अकबर, बाबर, औरंगजेब, जैसै – “दरिन्दो” का “इतिहास” पढाया जा रहा है।

निवेदन: मेरा इस विषय पर ब्लॉग लिखने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि,”हमारी वास्तविक-संस्कृति का ज्ञान”, “हमारी आने वाली पीढ़ियों को..बना रहे

🙏 जय हिन्द। जय भारत। मेरा एक कदम सनातन की ओर..🙏

विचारक..; युग पचहरा, नीमगाँव, राया,मथुरा