278 चिंतन..

सोच – विचार के संदर्भ में चिंतन..के माध्यम से हम तथ्य के मूल में जाकर.. विचार तत्व को समझ पाते हैं। क्योंकि,

जब तक हम अपने “अद्वैत बोध” को नहीं जान पाएंगे, तब तक हमारा संतो के प्रति विश्वास..स्थाई हो नहीं पाएगा। बार बार बदलता रहेगा। क्योंकि,

सच्चे संत कभी झूंठी सांत्वना नहीं देते, वे साधक को वैचारिक चिंतन..में जाने को बाध्य करते हैं।

सामान्यतः संत प्रश्नों के उत्तर ऐसे देते हैं फिर..मन में उठने वाले अन्य प्रश्न स्वत: शांत होते चले जाते हैं।

कई बार व्यक्ति संतों द्वारा बताए गए मार्ग पर तो चलता है, लेकिन उस मार्ग का स्वानुभव नहीं कर पाता। अतः उसके मन में प्रश्न उठते रहते हैं, उसके लिए “जीवन” एक पहेली बनके रह जाता है।

गोकुल धाम में जब परमात्मा हम से प्रश्न करेगा, तो उत्तर हमें ही देना होगा हमारे संत और महंतो को नहीं।

परमात्म तत्व हम से यह कभी नहीं पूछेगा, कि हम किसके अनुयायी हैं..जैसे; कृष्ण के, राम के, बुद्ध के या महावीर के। वह यह भी नहीं पूछेगा कि हमने गीता,कुरान,बाइबिल आदि..ग्रंथों में से किसका अध्ययन किया है..??

परमात्म तत्व इन बातों पर बहुत ज़ोर नहीं देता। ईश्वर, तो बस हम से यही पूछेगा क्या हम स्वयं के अनुयायी बन पाए..? अपने अंदर बैठे “आत्म” तत्व जो ईश्वर का ही अंश है। क्या हमने उस अंतर्निहित शक्ति को जाना..?? क्या हम अपने भीतर जल रहे चैतन्य के दीप से अपने सूक्ष्म शरीर को प्रकाशित कर सके ??

यदि नहीं, तो उन प्रश्नों के उत्तर हम कहाँ से लाएंगे..? और जो प्रश्न हम सत्संग या एकांत वार्ता में अपने संतों से पूछते हैं, वे सब हमारे ‘मन’ के प्रश्न हैं।

मन के बारे में कुछ कहें,तो ये भी दो में विभक्त है.. सत और असत.. स्वाभाविक रूप से ‘असत मन’ बहुत चंचल होता है। जो प्रमाद,भ्रांतियों के वशीभूत.. प्रश्न..बहुत करता है।

वास्तव में, ये मन हमसे कभी यह नहीं पूछेगा कि “मैं कौन हूँ।” मन तो केवल यही पूछेगा कि “जीवन क्या है..??”, “ईश्वर क्या है..??” , “दुनिया क्या है..??”

असत मन के सहारे हम कभी उच्च स्तर तक नहीं पहुंच सकते, उच्च स्तर अर्थात जहाँ से इन सभी प्रश्नों के उत्तर भीतर से मिलते हैं। जिस दिन हमने अपने स्व के बोध को जान.. लिया, उस दिन हमारे सारे प्रश्न शून्य..’0′ हो जाएँगे।

विवेकशीलता के समक्ष सांसारिकता से जुड़े प्रश्न मिथ्या लगते हैं।

मानव जीवन में यदि कोई प्रश्न हमें गहराई.. में..चिंतन की स्थिति में ले जाता है,तो केवल एक ही प्रश्न है कि, “मैं कौन हूँ..??” और इस प्रश्न का उत्तर कभी दूसरों के पास नहीं है।

ये प्रश्न, तो प्रत्येक जन को स्वयं से ही पूछना होता है। सांसारिक प्रश्न.. अक्सर दूसरों से पूछे जाते रहे हैं।

जब “मन” तुमसे पूछे कि “दुनिया क्या है..??”, परमात्मा क्या है..??” ,” प्रकृति क्या है..??”

तब आँखें बंद करना.. और अपने भीतर सिर्फ एक ही प्रश्न को दोहराएगा.. “मैं कौन हूँ…??” “मैं कौन हूँ…??” तब हमें अपनी “अद्वैत” प्रतिभा का बोध,तो होगा ही साथ ही स्वयं को भी जान सकेंगे।

क्योंकि संत वही है, जो हमें हमारे भीतर “चिंतन..” करने को बाध्य कर दें।

धन्यवाद..राधे गोविंद.. राधे गोविंद 🙏🏻🙏🏻

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