कोई एक नहीं,
अंत:करण और अंतरात्मा दोनों।
क्योंकि अंतःकरण और अंतरात्मा के बीच शब्दार्थ में जाओगे, बहुत अंतर है।
जी, बिल्कुल ‘अंतःकरण’ और ‘अंतरात्मा’ में अर्थ के आधार पर विशेष अंतर है।
हालांकि ये दोनों शब्द “आत्मा” और “मन” के गहरे आयामों की ओर संकेत करते हैं: फिर भी..
अंतःकरण’ भारतीय दर्शन में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – इन चारों का समुच्चय है, जिसे “अंतःकरण चतुष्टय” भी कहते हैं।
यह व्यक्ति के सोचने, निर्णय लेने, स्मृति रखने और ‘मैं’ पन (I-ness) से जुड़ा आंतरिक मनोविज्ञानिक तंत्र है।
इसका मुख्य कार्य किसी क्रिया के सही या गलत होने का विवेकपूर्ण निर्णय करने में मदद करना है,
अर्थात यह व्यक्ति का नैतिक और बौद्धिक विश्लेषण तंत्र भी है।
‘अंतरात्मा’ मूलतः “आत्मा” का सूक्ष्म और सबसे शुद्ध, दिव्य स्वरूप है।
यह ‘परमात्मा’ से जुड़ी हुई उस आत्म-चेतना या गूढ़ आंतरिक शक्ति को दर्शाता है, जो बिना किसी नैतिक उलझाव.. के केवल शुद्ध भाव या चेतना के रूप में अंदर मौजूद है।
विदेश व नैतिक संदर्भ में..
‘अंतरात्मा की आवाज़’ का तात्पर्य वह “सहज बोध” है, जो हर परिस्थिति में सही निर्णय व आंतरिक शांति की भावना को उत्पन्न करता है।
सारांशत:–
अंतःकरण ;- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का समुच्चय; नैतिक निर्णय क्षमता मानसिक कार्य प्रणाली, विवेकपूर्ण विश्लेषण के रूप में परिभाषित किया जाता है। जबकि,
अंतरात्मा:- को आत्मा का शुद्ध, ईश्वर-संलग्न स्वरूप ,आंतरिक परम चेतना, शुद्ध और दिव्य बोध स्वरूप है।
इस प्रकार, ‘अंतःकरण’ अधिक मनोवैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक है, जबकि ‘अंतरात्मा’ परम चेतना, शुद्ध बोध और दिव्यता से संबंधित होती है।
साभार..
राधे गोविंद.. राधे गोविंद