275 Control of the Mind

“कंट्रोल ऑफ़ द माइंड” मानव जीवन के धरातल पर क्रियान्वित करने के नज़रिए से शायद दुनियां का सबसे जटिल “सिद्धांत” है। जटिल है मगर कठिन नहीं।

मनुष्य इस सिद्धांत को अपने जीवन में अपनाना चाहे,तो बहुत अच्छे से अपना सकता है। इतना दुर्लभ भी नहीं है। कि मनुष्य की सामर्थ्य से परे हो।

कुछ जटिलताएं अवश्य हैं परंतु सामर्थ्यवान मनुष्य उन्हें दर किनार करते हुए..करना चाहेगा,तो अपने “मन पर नियंत्रण” कर सकता है और इतिहास साक्षी है हमारे देश के अनेक संतों,वैज्ञानिकों और महापुरुषों ने इसे संभव करके दिखाया है।

अध्यात्मवाद या भौतिकवाद दोनों ही नजरिए से “मानव जाति” की सद्गति के दृष्टिकोण से इस सिद्धांत का दैनिक जीवन में अनुपालन होना नितांत आवश्यक है।

मनुष्य यदि आंकलन करे,तो वह समझ सकता है कि, जिस प्रकार “बुद्धि” कुमति और सुमति दो आयामों पर चलती है। ठीक वैसे ही ये “मन” भी दो रूपों में क्रियान्वित होता है।..”सत” और “असत”।

“सत मन” सदैव मनुष्य को अच्छे मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। मगर अपने सौम्य स्वभाव में.. जबकि “असत मन” बहुत आकर्षक तरीके से प्रलोभन देते हुए व्यक्ति को सही मार्ग से हटाने के लिए दबाव बनाने में निपुण है।

इसीलिए संत लोग “असत मन” को सदैव डांट – डपट कर नियंत्रण में रखने की बात कहते आए हैं। भटके हुए “मन को नियंत्रण” में रखने का ये “पहला कदम” है।

एक हिंदी कहावत भी इसी बात की पुष्टि करती है कि “अभ्यास ही आदमी को पूर्ण बनाता है।” निसंदेह “मन की वृत्ति” को समझकर चलने वालों का सही अभ्यास ही हमेशा उन्हें पूर्णता की ओर ले जाने में सफल रहा है।

पदम पुराण के अनुसार.. समस्त चौरासी लाख योनियों में “मनुष्य योनि” केवल ‘चार लाख’ हैं। शेष सब..सूअर,कुत्ता, बंदर, सांप,बिच्छू आदि हैं। एक श्लोक की सहायता से इस तथ्य को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है..

जैसे; “जलज,नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष्य विम्शन्ति। क्रम्यो रुद्र संख्यक:, पक्षिणाम दस लक्षणम।

तीस लक्षाणी पशव:, चतुर लक्षाणी मानव:।”

भावार्थ: दुनियां में जलचर अर्थात जल में रहने वाले जीवों की योनियां नौ लाख बताई गईं हैं।,

पेड़,पौधे,जड़ी,बूटी आदि की बात करें,तो इनकी बीस लाख योनियां हैं।,

कीट,पतंगे, मक्खी,मच्छर आदि की यौनी ग्यारह लाख हैं।

दस लाख योनियां पक्षी या उड़ने वाले जीवों की होती हैं।,

तिर्यक जीवों अर्थात चार पैरों पर चलने वाले पशुओं की योनियां तीस लाख हैं।,

समस्त चौरासी लाख योनियों के योग में से..अंत में मात्र ‘ चार लाख ‘ योनियां बचती हैं जो मनुष्य,देव, दानव आदि के लिए हैं।

हम सब मनुष्य योनि में आने से पहले..अन्य अस्सी लाख योनियों में कई कई बार जन्म ले चुके होते हैं। तब कहीं जाकर ये ‘ मानव देह ‘ मिलती है। आज की नई पीढ़ी के पास वेद शास्त्रों को जानने की न रुचि है न समय है।और न वे संत जनों को ही सुनती है। वरना वे लोग अपने जीवन का सार तत्व बहुत ही सरलतम रूप में अपने प्रवचन आदि के जरिए.. समझाते हुए सदैव इस मानव योनि को मोक्ष या मुक्ति का द्वार बताते रहते हैं। वास्तव में मानव देह मिलना बहुत दुर्लभ है। विश्वास कीजिएगा.. हर जन्म में हम मनुष्य नहीं होते।

मृत्युलोक में देव तुल्य हमारे “मातापिता” द्वारा प्रदत्त इस मानव शरीर में अंतर्निहित “मन” को अपनी प्रारंभिक अवस्था में होश संभालने पर ..एक परिवार का बोध होता है..फिर धीरे धीरे और बड़े होने पर नाते रिश्तों का भी अहसास…होने लगता है..इसी तरह एक दिन समाज, देश और दुनियां में प्रचलित परंपराओं एवं समाज में एक सभ्य लॉबी द्वारा निर्धारित कुछ मानकों का जिनके दायरे में संघर्ष करते-कराते “ज़िंदगी” को एक सही आकर देने के लिए.. संतो की वाणी..एवं धार्मिक ग्रंथो द्वारा सामान्य जन को सृष्टि के आरंभ से अक्सर निर्देशित किया जाता रहा है।

अतः मनुष्यात्मा को पूर्वाग्रहों की गिरफ्त से.. दुनियां के प्रपंचों में लिप्त होने से..बचकर..इस “मानव देह” को सजीवता में परिभाषित करने वाली वेशकीमती अपनी एक एक सांस को.. तारण शक्ति सम्पन्न भगवन के किसी भी “नाम” के जप.. जिसमें हमारी गहरी आस्था हो, के ज़रिए..पूर्व में किए गए अपने अशुभ कर्मों को डिलीट करके ऊंचे लोकों में जाने का मार्ग प्रशस्त करना ही मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य होता है। जो “भगवत प्राप्ति” का आधार बनता है।

कलयुग में मनुष्य के लिए सभी कर्मों में इष्ट के नाम का “निरंतर जप” ही श्रेयस्कर बताया गया है।

मगर ऐसा.. कुछ विरले ही कर पाते हैं..?? जिन पर उनके अपने इष्ट यानी “राधे गोविंद” की कृपा होती है। वरना दुनियां की अस्सी फीसदी आबादी की अंतिम सांस एक दिन दुनियां के प्रपंचों में उलझते.. उलझते ही टूट जाती है।

संतों द्वारा दुर्लभ बताई गई “मानव देह” को सद्कर्मों में संलग्न करने की सामर्थ्य सिर्फ और सिर्फ पूज्य स्वामी विवेकानंद जी द्वारा बताए गए.. “Control of the mind” के सिद्धांत में निहित है। दूसरी किसी थ्योरी में वैसी सामर्थ्य मुझे,तो नहीं दिखती। अतः हम सब अपने “मन को नियंत्रित” करने के लिए सदैव प्रयासरत रहें।

ह्रदय की गहराइयों से इन पवित्र भावनाओं के साथ अपने सभी शुभचिंतकों को मैं इस लेख के माध्यम से अनंत शुभकामनाएं..प्रेषित करता हूं..

पढ़ने वाले सभी सुयोग्य पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद ..✍🏻 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🏻🙏🏻

विचारक; योगेंद्र सिंह पचहरा,

मुखिया परिवार,नीमगांव

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