निर्देश : छात्र शरारत या “आइडिया मेकिंग” में स्वयं को कितने ही स्मार्ट क्यों न समझें। मगर अपने माता पिता एवं गुरु के सामने कभी भी उन आइडियाज को प्रयोग में न लाएं।
क्योंकि गुरु, आख़िर गुरु, ही होते हैं..उनके सामने शिष्यों द्वारा की जाने वाली कोई भी होशियारी एक पल में धराशाई हो जाती हैं।
मैं,तो ह्यूमैनिटी का छात्र था.. लेकिन मेरे कुछ साथी साइंस वर्ग में थे..
उन मित्रों ने आइडिया मेकिंग में स्वयं को बहुत एक्सपर्ट समझ, एकबार परीक्षा के दौरान उपर्युक्त निर्देश को न मानने की हिमांकत की।
चलो! आज शिक्षक दिवस पर इस सच्ची घटना के माध्यम से एक गुरु के “गुरुत्व की सामर्थ्य” भी जान ले ते हैं।
एक बार आई.आई.टी. मुंबई में स्टडी कर रहे चार छात्र देर रात तक “ताश खेलते” रह गए.. जिससे वे अगले दिन की परीक्षा की तैयारी नहीं कर सके। वे आइडिया मेकर्स तो थे ही सुबह उनको एक आइडिया आया।
वे चारो ग्रीस, धूल और गंदगी से सने हुए कपड़े पहन कर अपने “डीन” ( गुरु ) के पास जाकर बोले… सर! कल रात अचानक एक साथी की तबीयत खराब होने के कारण उसे अस्पताल ले गए थे। और वापस आते समय कार का टायर फट गया, हॉस्टल तक पहुंचने के लिए हमें पूरी रात कार को धक्का लगा.. लगाकर आना पड़ा।
सर! इससे हमारी परीक्षा की तैयारी भी नहीं हो सकी है। इसलिए हम इस हालत में परीक्षा नहीं दे पाएंगे।
डीन साहब को उनकी परेशानी का एहसास हुआ और उन्होंने सहानुभूति व्यक्त की और उन्हें तीन दिन का समय देते हुए परीक्षा को एक्सटेंड न करके कुछ असमर्थ परीक्षार्थियों की स्थिति समझकर विकल्प पत्र भरके देने के लिए बोल दिया…
मात्र उन चार छात्रों ने इस विकल्प को सहर्ष स्वीकार किया। और डीन को इस बात के लिए धन्यवाद भी दिया। वे चारों परीक्षा की तैयारी में जुट गए।
तीसरे दिन वह डीन के सामने उपस्थित हुए डीन ने कहा, चूंकि यह एक _”विशेष स्थिति वाली परीक्षा” है, इसलिए परीक्षा के लिए चारों को अलग-अलग रूम में बैठना होगा। ।
उन्होंने पिछले तीन दिनों में अच्छी तैयारी कर ली थी इसलिए चारों सहमत भी हो गए।
इस परीक्षा में पचास – पचास अंकों के केवल 2 प्रश्न रखे गए..थे।
प्र.नंबर 1. कार का कौन सा टायर फटा था..? (50 अंक) केवल टिक करें।
ए – फ्रंट लेफ्ट
बी – सामने दाएँ
सी – रियर लेफ्ट
डी – पीछे का दाहिना भाग
प्र.नंबर 2. कार में कौन कहाँ बैठा था ? (50 अंक) सामने उत्तर में चारों के नाम मेंशन करें।
ए- ड्राइवर सीट पर:
बी – सामने बाएँ:
सी – पीछे बाएँ:
डी – पीछे दाएं:
विशेष नोट: अंक तभी दिए जाएंगे जब चारों छात्र दोनों प्रश्नों का उत्तर समान रूप से दें सकेंगे।
आई.आई.टी बॉम्बे बैच 1992 की एक सच्ची कहानी।
परिणाम: ऐसी स्थिति में आप भी समझ सकते हैं। कि “चारों का एक जैसा उत्तर,तो कभी हो ही नही सकता था।”
इसीलिए कभी भी अपने गुरु को कम न आंकें शिष्य चाहे कितने भी बड़े “आइडिया मेकर्स” क्यों न हों वे रहेंगे शिष्य ही।
अतः मान लो ! “गुरु सदैव गुरु ही रहेगा”
ब्लॉग पढ़ने वालों को “शिक्षक दिवस,2025” की हार्दिक बधाई.. धन्यवाद 🙏 राधे गोविंद..राधे गोविंद