270 – सोच बदलो..

जी, हां! ये कोई कहानी नहीं.. ये एक आध्यात्मिक चिंतन है.. यदि हम अपनी “सोच बदलें, तो “मानव देह” में आना सार्थक होने के साथ साथ हमारा “लोक” भी बदल जाएगा”

चलो! इस आध्यात्मिक रहस्य से आज पर्दा उठाने का एक प्रयास करते हैं। हमने अक्सर सुनते हैं कि हमारे ब्रह्मांड में चौदह भुवन या “चौदह लोक” हैं।

ये सत्य भी है। जिस ब्रह्मांड में हम रहते हैं उसमें कुल चौदह लोक हैं। सात लोक ऊपर वाले और सात लोक नीचे वाले।

संसार में व्याप्त माया..या दुनियां भर के प्रपंचों से बचकर..अध्यात्म के ज़रिए जो आत्मा अपने उत्थान की ओर अग्रसर होती हैं,तो वे सदैव ऊर्ध्व यानी ऊपर के सात लोकों की ओर अपना रुख करती हैं।

संख्या में जाओगे तो मध्य में है.. पृथ्वी लोक या भू लोक भू लोक को

गिनती के नज़रिए से No.1 रखते हैं.. जिसमें हम मनुष्य स्थूल शरीर में विचरण करते रहते हैं। संतों की वाणी में इसे मृत्युलोक या दु:खालय भी कह दिया जाता है। क्योंकि यहां जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है।

2- भूव: लोक – ये लोक ‘भू लोक’ और ‘स्वर्ग लोक’ के बीच स्थित है। ये ऊर्जा रूपों का क्षेत्र है जो भौतिक और दिव्य लोकों को जोड़ता है।

3- स्वर्ग लोक – ये देवताओं का लोक है जहां इंद्र आदि देव निवास करते हैं।अच्छे कर्म करने वालों को इसी लोक में स्थान मिलता है। सुख,संपत्ति और आनंद की अनुभूति इस स्वर्ग लोक में ही होती है।

4- महर्लोक – ये दिव्य ऋषि, तपस्वियों और महान आत्माओं का निवास स्थान है जहां वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे तपस्वी तपस्या करते रहते हैं।

5- जन लोक – इस लोक में वे आत्माएं तपस्या करती हैं जिन्होंने ज्ञान और ध्यान में परम सिद्धि प्राप्त की होती है। यहां के वासी ब्रह्मा जी की लीलाओं में लीन रहते हैं।

6- तप लोक – ये लोक शक्ति शाली तपस्वियों का स्थान है जो शरीर से परे.. सूक्ष्म रूप में हर पल केवल अपनी चेतना में स्थित रहते हैं।

7- ब्रह्म्म लोक – अंतिम लोक के साथ साथ ये ऊंचाई का अंतिम लक्ष्य वाला लोक है।

जहां केवल “सत्य” है “मोक्ष” है और प्रतिपल “ईश्वर का साक्षात्कार” है। ये ब्रह्म लोक है। इन ऊर्ध्व लोकों में आत्मा के जाने का मतलब है सदैव शुद्ध और पवित्रता में बने रहना।

चलो! अब चर्चा करते हैं..नीचे के उन सात लोकों की। जहां भोग, मोह और भ्रम का राज रहता है।

नीचे की ओर पहला लोक है ..

1- अतल लोक – ये राक्षसों और मायावी शक्तियों का घर जैसा है।

2- वितल लोक – यहां लोगों में कामना और भोग हावी रहता है।

3- सुतल लोक – राजा बली का लोक..हालांकि वे बहुत दानवीर थे मगर उनमें अहंकार की पराकाष्ठा होने से सुतल लोक के वासी थे।

4- रसातल लोक – भ्रम,लालच और अज्ञान के घने अंधेरे वाला लोक।

5- तलातल लोक – छल,धोखा और झूंठ से लवालव भरा हुआ लोक।

6- महातल लोक – ऐसा लोक जहां अंधकार और अहंकार का सदैव बोलवाला हो।

7- पाताल लोक – सबसे नीचे का लोक तामसिक ऊर्जा और इच्छाओं का लोक।

लेकिन इस सबका मतलब सिर्फ बाहरी दुनियां के वे चौदह भुवन या चौदह लोक ही नहीं है।

यदि हम अपने आध्यात्मिक नज़रिए को थोड़ा एक्सप्लोर करें..तो पाएंगे कि ये सभी लोक हमारे अंदर हमारी सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से स्वयं निर्मित और विखंडित होते रहते हैं।

जब व्यक्ति सच्चाई,भक्ति और सेवा के मार्ग पर चल पड़ता है,तो वह यहीं रहते हुए आत्मिक स्तर पर निरंतर ऊपर के लोकों से जुड़ता चला जाता है।

मगर दुर्भाग्यवश जब व्यक्ति अपने लालच, मोह और गुस्से पर काबू नहीं कर पाता है,तो वह धीरे धीरे नीचे के लोकों की तरफ गिरता चला जाता है। अर्थात ऐसी आत्माओं का उत्थान होने के बजाय निरंतर पतन होता रहता है।

संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी एक चौपाई के माध्यम से लोगों को जगाने का प्रयास किया है जैसे..

“बिनु सत्संग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।”

अर्थात अच्छे लोगों का संग करने से व्यक्ति अपने मन की चंचलता और बुद्धि भरमाने जैसी परिस्थितियों से बचकर अपने विवेकपूर्ण निर्णय से..सही लोकों की तरफ मुखातिब होता चला जाता है।।

इसीलिए. पहले हम “सोच बदलें..तो लोक भी बदले जा सकेंगे।” धन्यवाद

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