भंडारा यानी community feast.. एक धार्मिक या सामाजिक आयोजन होता है जिसमें लोगों को बड़ी श्रद्धापूर्वक भोजन कराया जाता है।
अब, “भंडारा या लंगर…..कैसे करें…??” आम व्यक्ति के लिए, ये सवाल अपने आप में पहली दृष्टया लगभग दुर्लभ सा ही प्रतीत होता है..क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में अर्थ यानी पैसा लगता है। जब किसी के पास पर्याप्त पूंजी न हो, तो अन्नदान के प्रतीक जो लंगर या भंडारे.किए जाते हैं। कोई आमजन बेचारा अपने मन के भाव पूरे करे भी तो कैसे..??
ब्रज में स्थित बरसाना धाम में तीन भावुक युवाओं द्वारा “भंडारा” एवं “लंगर” को लेकर हुए वृतांत को भक्ति के धरातल पर हम भावना से ओतप्रोत एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे।
एकबार तीन दोस्त बरसाना के एक भंडारे में भोग पा रहे थे।
उनमें से एक बोला….” काश..हम भी कभी ऐसा भंडारा कर पाएं.!!
दूसरा बोला…. हां यार..हर माह ऐसा ही कुछ होता है हमारी ‘ सैलरी ‘ आती बाद में है। अपने जाने के रास्ते पहले बना लेती है।
तीसरा बोला….जी, बिल्कुल दिन प्रति दिन पारिवारिक खर्चे इतने बढ़ते जा रहे हैं कि कोई धार्मिक अनुष्ठान या भंडारा.. करना,तो दूर भंडारे के बारे में सोच भी नहीं सकते ..???
पंगति में उन तीनों मित्रों के पास बैठे एक “संत” भंडारे का भोग पाते पाते.. उन युवाओं को बड़े ध्यान से सुन रहे थे।
तभी संत जी उन युवकों से बोले..बेटा! भंडारा करने के लिए बहुत अधिक धन नहीं परंतु अच्छे मन एवं भाव की जरूरत अवश्य होती है।
वे तीनो युवक आश्चर्यचकित होकर संत जी के चमकते हुए मुखारबिंद की ओर देखने लगे..!!!
संत जी ने उनकी उत्सुकता को देखकर हंसते हुए कहा, बच्चों..!!! आवश्यक नहीं है कि, हम जिस योनि में हैं और व्यावहारिकता के बोझ तले केवल संपर्क में आए लोगों के लिए भंडारा करने पर अपने आप को सक्षम समझें जो हमारी अपनी योनि के है।
ऐसा करना, तो अपना व्यक्तिगत रीति, चलन एवं व्यवहार हुआ ना..?? “भंडारा” कब हुआ..??
मान लो! यदि किसी अमुक नागरिक की सामर्थ्य कम है,और भंडार करने का आनंद या सुकृत्य लेने का भाव उसके मन में बन रहा है.., तो वह ऐसा करके..भी सुकृत कमा सकता है जैसे;
वह बिस्किट का एक पैकेट ले और उन्हें चीटियों के स्थान पर तोड़कर उनके खाने के लिए रख दे, तो आप अनुभव कीजिएगा कि, उस जगह की चीटियां उतना ही खुश होकर खाएंगी जैसे हम मनुष्य प्रसन्न हो होकर भंडारे की प्रसादी पाते हैं।
और भाव बने,तो..दाल,चावल या अनाज के कुछ दाने लेकर किसी मकान की छत पर बिखेर दिया करो,तो.. चिडिया, कबूतर और अन्य पक्षी आकर खा जाया करेंगे। लो बस हो गया भंडारा..।
बच्चों..आपने बुजुर्गों को ये कहते अक्सर सुना होगा कि ईश्वर ने जीवों के लिए जन्म के साथ ही अन्न का प्रबंध भी किया होता है।
भंडारे,लंगर आदि में बैठकर रोटी,पूड़ी सब्जी या पुए आदि पाते हैं। पूर्व निर्धारित ब्रह्ममंडीय व्यवस्था ने जिन अन्न के दानों पर जिस जिस का नाम अंकित कर दिया होता है..हर हालत में वही उसे पाने का भागीदार होता है।
इंसान चाहे,तो इन निरीह जीव जन्तुओं के लिए उनके नाम के भोजन का प्रबंध करने में अपना योगदान दे सकता है।
हालांकि ऐसे योगदान किसी न किसी के माध्यम से हमारे यूनिवर्स में व्याप्त दृश्य/अदृश्य “ब्रह्ममंडीय संवाद” के अंतर्गत ही संभव हो पाते हैं।
जाने कौन कहां से आ रहा है..? कहां को जा रहा है..? संस्कारवश जीव के कर्मों द्वारा बुना हुआ एक ताना बाना समूचे ब्रह्मांड में फैला हुआ है। परंतु देहाभिमानियों को लगता है कि, वे कर रहे हैं जबकि सब स्वत: ही घटित हो रहा है।
संत जी द्वारा ये सुनकर..तीनों युवकों के चेहरे पर एक सुकून देने वाली खुशी साफ़ झलक रही थी.. वे अब सोच रहे थे..ऐसे अच्छे दान पुण्य के काम करते रहने से हमको भी अपने जीवन में अपार प्रसन्नता मिल सकती है..!! साभार
🙏🏼राधे गोविंद 🙏