264 – मन

मन को परिभाषित करना असंभव,तो नहीं मगर कठिन जरूर है। एक मत कहता है.. “मैं” नही कोई दूसरा है..बालक के “शिक्षा जगत” में पहला कदम रखने के समय “मन की चंचलता” को अभिव्यक्त करते हुए.. परमसंत स्वामी विवेकानंद जी ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि, जो “मन पर नियंत्रण” पा लेगा वह स्वयं को,तो पा ही लेगा..अपितु उसमें समूची दुनियाँ को भी पाने की सामर्थ्य हो जायेगी। ✍️

हां,भटके हुए ‘ मन ‘ को कभी भी एकांत पसंद नहीं होता। क्योंकि वह हमेशा दूसरों के बारे में ही, सोचता है,और यदि ऐसे मन को सोचने के लिए कोई बिंदु न मिले तो वह बेचैन हो उठता है,इस अवस्था में फंसे मन का वजूद दूसरों में निहित नजर आता है। अगर दूसरे नहीं होंगे तो ऐसा मन स्वयं को शक्तिहीन पाएगा..

जो उसके स्वभाव में बिल्कुल नहीं है। यही वो कारण है जिससे भटका हुआ मन हमेशा एकांत से दूर… दुनियां के प्रपंच की ओर भागता है।

ऐसा मन हमेशा लोगों को बाहर की दुनिया में लगाए रखता है,ताकि उसका अपना वजूद बना रहे। और इस तरह सामान्य जन जीवन “मन” के इस जाल से बमुश्किल ही मुक्त हो पाता है।

सदैव स्मरण रखें..स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार..मन को वश में करने का नाम ही “साधना” है। पहले मन वश में हो जाए, तो दूसरों के बारे में अनर्गल चिंतन भी स्वत: बंद हो जायेगा। फिर व्यक्ति सिर्फ अपने इष्ट के रुप लीला धाम और गुंण यशगान और नाम जप में तल्लीन हो जाने से एकांत उसके लिए चिर आनंददायी हो जाता है..!!

राधे गोविंद राधे गोविंद 🙏🏻 🙏

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