261 – गिरगिट

विडंबना देखिए! हो सकता है.. ऐसा समूची दुनिया बिच चलता हो.. मगर मांफ कीजिएगा मैं,भारत जा एक नागरिक हूं, तो “भारतीय संस्कृति” के मानदंडों को देखता और सुनता हुआ बड़ा हुआ हूं, वे किसी इंसान को इस तरह गिरगिट के जैसा अपना रंग बदलने की अनुमति नहीं करते।

एक पिता जिसकी बेटी शादी के योग्य हो जाती है,तो वह बेहद असहाय अवस्था में एकदम निरीह प्राणी बन कर.. बेटी के लिए लड़का ढूंढने निकलता है। उसकी सोच हो जाती है कि, अधिक से अधिक लिफाफे आजाएं.. ये सोचकर परिचित कम परिचित सभी को ढूढ ढूंढकर निमंत्रण देता फिरता है।

उसका ध्येय शादी को कम से कम में निपटा लेने का जो होता है। ठीक भी है क्योंकि यहां लड़के वाले को संतुष्ट करना बड़ा ही दुर्लभ कार्य है।

अब देखिए.. कुछ वर्षों बाद वही पिता जो बेटी की शादी के दौरान अपने आपको निरीह व असहाय प्राणी दिखाने में लगा रहा।

उसी पिता का दिमाग़ अपने बेटे की शादी करते वक्त, सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। और यदि बेटा कहीं किसी सरकारी विभाग में सलेक्ट हो गया हो, तो फिर तो कुछ पूछिएगा ही नहीं। वही पिता लड़की वालों की नांक में दम करके रख देता है।

बेटे की शादी के समय उसके अपने परिवार,समाज एवं रिश्तेदारों से संबंधित व्यवहार की लिस्ट, बारात की लिस्ट सब सिमटकर रह जाती हैं।

एक ही वक्त में अपनी बेटी के संदर्भ में उसके ससुराल वालों से अपेक्षाएं कुछ..और होती हैं ?? उसी पिता की अपने बेटे की पत्नी अर्थात अपनी पुत्रवधु से और उसके मायके वालों से अपेक्षाएं एकदम विपरीत..उसी पिता के रवैए में इतना दोगलापन कि किसी भी भले मानुष को बड़ी आसानी से समझ में आ जाएगा.. कि वह कितना बड़ा “गिरगिट” है।

आश्चर्य की बात कहें या बेशर्मी की। ऐसे मंजर व्यक्ति का सिर नीचा करते हैं न कि ऊंचा।

There is a Just double standard.. example. Very disgusting.. घोर निंदनीय.. बड़े अदब के साथ सभी से निवेदन कि, ” कम से कम बुद्धिजीवी वर्ग को इस बिंदु पर चिंतन अवश्य करना होगा। धन्यवाद

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