ट्रांसफॉर्मेशन अर्थात वैचारिक “रूपांतरण” के मूल से जुड़ा हुआ लेख.. ये ..लेख क्या !! ग्रामीण अंचल की भाषा में मनुष्य के मन के उदगार हैं। और यदि भागवतिक नज़रिए से देखें, तो अपने इष्ट से एक भक्त के “मन की गुहार” भी कह सकते हैं।
विचार मंथन के लिए,तो सभी स्वतंत्र होते हैं। लेकिन ध्यान दीजिएगा केवल सार्थकता के दायरे में।
दरअसल, इस लेख का ‘थॉट ऑफ़ द थीम’ एक पुण्य आत्मा की स्मृति में भावुक मन के अर्पित कुछ “श्रद्धासुमन” हैं।
एक अंतर्मन की गुहार इसलिए भी है.. कि औपचारिक दुनिया से दूर.. अपने राधेगोविंद के चरणों में हर वर्ष इस अमुक दिन अपनी अर्धांगिनी की आत्मशांति के लिए अपने इष्ट को प्रसन्न करने का भाव मन में लिए हम पर..’राधे गोविंद’ की कृपा दृष्टि बनी रहे.. ऐसी चाह लिए महज़ एक अरदास है।
और यदि भौतिकवादी नज़रिए से..देखा जाए,तो अमुक तिथि सांसारिक जीवन में हुई अप्रत्याशित घटना की सिर्फ एक तारीख़ मात्र है।
कहना न होगा कि, सनातन इस तारीख को हमेशा मेरी “श्रीमतीजी” की ‘पुण्य तिथि’ के रूप में देखेगा।
पूर्व निर्धारित व्यवस्था (नियत नटी) के अनुरूप कर्मों के गणित के आधार पर शायद एक व्यक्ति के सुकृत्यों के सिमटने से अच्छी भली तारीख की परिणित इस रूप में हुई होगी।
इसे मानव मन का स्वभाव ही कहेंगे कि वो एक ऐसा मंज़र है जो मेरी आंखों के सामने बार बार आने को विवश रहता ही है,और श्रीमती जी के इलाज के दौरान अठारह वें दिन की शाम को उनकी सारी रिपोर्ट ठीक बताते.. बताते आगरा स्थित हॉस्पिटल में डॉ. पुरी दावा करते रह गए.. कि, सर! डोंट वरी आप इन्हें स्ट्रेचर पर लाए अवश्य थे, पर आज मैं ये कहने की स्थिति में हूं कि, नीरज चौधरी इसी सप्ताह यहां से अपने पैरों पर “चलकर”अपने घर जाएंगी। मगर उन्नीस वें दिन “कार्डियक अरेस्ट” ने उन्हें कौन से घर पहुंचा दिया..?? मेरे मन में उभरता ये प्रश्न अभी भी उत्तर की तलाश में रहता हैं। भौतिक नज़रिए से देखें,तो अचानक लगभग सब ध्वस्त हो गया था।
जबकि उनके दाह संस्कार से त्रयोदशी होने तक उन बारह तेरह शोक संतृप्त दिनों में मातम पोर्शी में आए लोगों के अध्यात्म से ओत प्रोत विचार सुने, तो कई एक बुजुर्गों द्वारा कहा गया कि, बेटा ! क्यों परेशान हों दे ओ, आपणा जीवन आपणे बच्चे नू लाइफ मा देखो, सदियों से चलता हुआ “जीवन चक्र” तो ऐसे ही घूमता चला आ रहा है।
सभी जीवात्माएं इस धरा पर अपना नियत समय लेकर आती हैं। और अपने शरीर रूपी वस्त्र को त्यागकर एक दिन चली जामें हैं। कुछ स्थाई रूप से अपने सुकृत्यो की अच्छी गुणवत्ता के आधार पर मोक्ष को प्राप्त हो जाती हैं, तो कुछ अपने कर्म विकर्मों का गणित बिगड़ जाने से पुनः किसी योनि में आकर इसी धरा पर हिचकोले खाने को बाध्य हो जाती हैं।
जो भी है.. इस पावन दिन श्रीमदभगवद के ग्यारह वें अध्याय का पाठ करने पर मैं,तो यही समझ पाया हूं कि..
भौतिकदृष्टि से इस दिन (छह मार्च) को मनहूस घड़ी कहूं, या नहीं ये तो पता नहीं..इस दिन मैं दुनियादारी से दूर आठों पहर “राधे गोविंदमय” वातावरण में कहीं खो सा अवश्य जाता हूं.. अपनी देवी जी के पसंदीदा ब्रज क्षेत्र के तीर्थों में जैसे; राधारानी,वृंदावन,गोकुल,नंदगांव,बरसाना,गोवर्धन आदि में से किसी भी जगह जाकर राधेगोविंदमय अनुभूति में… उनकी आत्मशांति का, तो पता नहीं.. लेकिन मुझे अपने मन में तो शांति महसूस होती है। जैसे; राधे किशोरी के गोरे चरणारबिंद में अपने सारे मोह के बंधनों से दूर.. अपनी जीवन संगिनी के साथ जीए.. लगभग उन बत्तीस वर्षों की सुखद स्मृति देखते ही देखते विरक्त जीवन में तब्दील गई।
“राधे गोविन्द मय” हो जाने से लगभग पिछले तीन वर्षों से मेरी अवस्था विरक्त जैसी होती जा रही है। परंतु राधे गोविंद के आश्रय से मानसिक सुकून के साथ साथ अपने सांसारिक दायित्वों को निभाने में पुनः नई ऊर्जा, एक रिचार्ज जैसा अनुभव करता हूं।
मेरे “ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ कंडक्ट” की आधारशिला हैं, दो महामानवों के विचार..
पहला : कवि जयशंकर प्रसाद जी ने कहा था, कि,” साहित्यिक व आध्यात्मिक स्वभाव वाले व्यक्ति का प्रारब्धवश दुनियां के प्रपंचों से ‘अकेला’ हो जाना, कभी अभिशाप नहीं सदैव एक ‘वरदान’ है।”
दूसरा: न सिर्फ वृंदावन में अपितु आज समस्त दुनियां में लोकप्रिय महान संत श्री प्रेमानंद जी के एकांतिक वार्ता में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में कि,”भगवत प्राप्ति के लिए व्यक्ति का “एकांत शुद्ध” होना नितांत आवश्यक है।”
शायद इन दोनों विचारों का संश्लेषण ही मेरे ब्रह्मचर्य की आधारशिला है। वरना आज हर पॉकेट में विराजमान कलयुगी महा दानव मोबाइल के रूप में “एंड्रॉयड सेट” के दौर में किसी व्यक्ति की क्या बिसात है, अपने आचरण में इतना शुद्ध रूपांतरण कर पाने की।
हो न हो ये सब “नियत नटी” के खेल के ही पार्ट्स ऑफ लाइफ हैं। “जब आंख खुली तभी सवेरा” वाले भाव से जो जब हो जाए तभी सही..
इंसान है ही क्या.. वह सिर्फ God द्वारा संचालित होने वाली एक कठपुतली ही,तो है। विचार कीजिएगा
राधे गोविन्द ..राधे गोविंद 🙏🏻🙏🏻