258- ट्रैक-ऑन

आने वाली पीढ़ी को वक्त रहते “ट्रैक-ऑन” हो ही जाना चाहिए..

इस संदर्भ में समस्त जनमानस से नैतिक एवं मानवीय मूल्यों के हवाले से.. एक अपील है।

“अभिभावक लोग अवश्य ध्यान दें.. आपके बच्चों की गलती पर स्कूल में शिक्षक द्वारा डांटने पीटने पर बुरा मानना बंद करें.. इस बात की गहराई समझें कि, बच्चे की प्रारंभिक अवस्था में होने वाली गलतियों पर स्कूल/कॉलेज में थोड़ी बहुत डांट फटकार एवं पिटाई उन्हें “ट्रैक-ऑन” रखती है।

अन्यथा आप देख ही रहे हो.. जब से अभिभावकों की शिकायतें सुनकर सरकार ने बच्चों को डांटने पीटने पर रोक लगाई है, तब से वेअक्ल बड़े होते बच्चे निरंतर “आउट ऑफ ट्रैक” होते चले जा रहे हैं..और परिणाम स्वरूप वे ही बच्चे बालिग या नाबालिग अवस्था में किसी न किसी अपराध में लिप्त होकर पुलिस की तगड़ी पिटाई-ठुकाई खा ने को मजबूर हो जाते हैं।

जहां कोई भी अभिभावक कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता। खर्च खराबी अलग।

अनुशासन के लिए प्रतिष्ठित स्कूल /कॉलेजों में विद्यार्थियों के हेयर स्टाइल और उनके टपोरी चाल-ढाल को देखते हुए कभी कभी थोड़े बहुत दिशा निर्देश अवश्य दिए जाते हैं। मगर उनके व्यवहार में सुधार कम ही नजर आता है। ऐसे रवैए पर बेचारे शिक्षक निराश होकर केवल देखते ही रह जाते हैं, लेकिन अभिभावकों की बिना सोची समझी शिकायतों के सामने कुछ कर नहीं पाते।

जबकि इसके एकदम विपरीत अभिभावक कहे जाने वाले उन माता-पिताओं का बच्चों पर ध्यान और नियंत्रण बिल्कुल भी नहीं रहा है।

कुछ निश्छल अभिभावक अपने बच्चों के रवैए से परेशान होकर भवावेश में कई बार कॉलेज/स्कूलों में आकर बोल भी देते हैं कि, गुरु जी हम तो आपकी डांट के डर से खूब पढ़ते थे। अब आप इन बच्चों को क्यों नहीं डांटते हो..??

अब उनको कौन समझाए..?? कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी आप लोगों ने स्वैम ही तो मारी है। ऐसे मासूम अभिभावकों को यहां “वृद्धि और विकास” का अंतर अब कौन समझाए.. ??

“कि बच्चों की शारीरिक वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन मस्तिष्क का विकास और ह्रदय की गहरियां,चरित्र निर्माण आदि.. अवस्थाओं का क्रियान्वयन उनके जीवन में अनुशासित होकर पढ़ाई के प्रति पूर्ण समर्पण एवं परिश्रम करने से होगा।”

शिक्षक के कार्यों में हस्तक्षेप करके अभिभावकों ने जाने अंजाने में अपने नौनिहालों के लिए .. “पथ भ्रष्ट” होने के सारे दरवाजे खोल दिए हैं।

ज़रा चिंतन के साथ साथ अपनी नज़रों को विस्तार दीजिएगा..नैतिकता एवं मानवता के नजरिए से देखकर समझिएगा कि अनुशासन केवल बातों से नहीं आता है। इसके लिए थोड़ा बहुत “साइको फियर” अर्थात मन में थोड़ा सा डर होना आवश्यक माना गया है।

अभिभावकों के अधिक हिमायती होने के दुष्परिणाम..देखिए..

आज बच्चों को स्कूल का डर रहा नहीं,

स्कूल टाइम में घर लौटने पर भी उन्हें कोई डर नहीं

, ऐसे हालातों में समाज का भयभीत होना लाज़मी है।

क्योंकि वही बच्चे आज गुंडे बनकर लोगों पर हमला कर रहे हैं।

उनके दुर्व्यवहार से कई लोग अपनी जान तक गंवा देते हैं।

परंतु अंततोगत्वा ऐसे लोगों के व्यक्तिगत जीवन की बहुत भयंकर तश्वीर बनती है। बदमांशियों की सारी हदें पार करते कराते साल छह महीने के बाद जब वे पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं,तो फिर शुरू होता है उनके अभिभावकों का वर्षों कोर्ट कचहरी की धूल फांकने व रुपए की बेशुमार बरबादी का सिलसिला….और अदालत से सजा वगैरह।

ये अखंड सत्य है कि, “गुरु का सम्मान न करने वाला समाज नष्ट हो जाता है।”

गुरु का न भय है, न सम्मान। ऐसे में पढ़ाई और संस्कार कैसे आएंगे?

अभिभावकों की शिकायतों के आधार से निकले सरकारी आदेश..

“मत पीटो! मत डांटो! जो खुद नहीं पढ़ना चाहता उससे सवाल ही क्यों करते हो..? उसे उसी के हाल पर छोड़ दो। फिर भी यदि पढ़ाने पर जोर दिया गया या काम कराया गया तो गलती शिक्षकों की होगी!”

पांचवीं कक्षा से ही अजीब हेयर स्टाइल, कटे हुए जींस, दीवारों पर बैठना और आते-जाते लोगों का मजाक उड़ाने की आदत बन जाती है। यदि कोई कहे, “अरे सर आ रहे हैं!” तो जवाब होता है, “तो क्या हुआ..आने दो!” कुछ माता-पिता तो यहां तक कहते हैं, कि “हमारा बच्चा न भी पढ़े तो कोई बात नहीं, लेकिन शिक्षक उसे हाथ न लगाएं।”

बच्चों के पास पढ़ने की आवश्यक सामग्री तक नहीं होती। पेन है, तो पुस्तक नहीं, पुस्तक ले आए हैं,तो पेन नहीं।

बिना डर के शिक्षा कैसे संभव है? बिना अनुशासन के शिक्षा का कोई परिणाम नहीं। एक हिंदी कहावत है.. कि “डर न रखने वाली मुर्गी मार्केट में अंडे नहीं देती।”

आज के बच्चों को गंभीरता से समझाया भी नहीं जा सकता। आज के माता-पिता चाहते हैं कि सबकुछ दोस्ताना माहौल में कहा जाए। क्या यह संभव है? क्या घर पर ऐसे बच्चों के अभिभावक उनके आचरण से संतुष्ट रहते हैं..??

अब शिक्षकों के अधिकार नहीं बचे हैं। यदि शिक्षक सीधे बच्चे को सुधारने की कोशिश करें, तो वह अपराध बन जाता है। लेकिन वही बच्चा बड़ा होकर गलती करे तो उसे मृत्युदंड तक दिया जा सकता है।

माता-पिता से एक विनती: बच्चों के व्यवहार को सुधारने में शिक्षक मुख्य भूमिका निभाते हैं। कुछ शिक्षकों की गलती के कारण सभी शिक्षकों का अपमान न किया जाए।

ये भी एकदम सच है कि,90% शिक्षक केवल बच्चों के सर्वांगीण विकास एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। इसलिए गार्जियन कभी भी हर छोटी बड़ी गलती के लिए शिक्षकों पर आरोप न लगाएं।

जब हम पढ़ते थे, तब कुछ शिक्षक बच्चों से गलती होने पर कभी कभी थोड़ा सा पीट भी दिया करते थे। फिर भूल सुधार होने पर वही शिक्षक बड़े प्यार से पेश आते थे। लेकिन हमारे समय के माता-पिताओं ने शिक्षकों से कभी शिकायत या कोई सवाल नहीं किया क्योंकि तब ये रिश्ता विश्वास का था। छात्रों और अभिभावकों का अर्थात दोनों पर अटूट विश्वास था।

सच तो ये भी है कि उस दौर में शिक्षक भी सदैव अपने छात्र कल्याण की ही सोचते थे।

इसलिए सुधार की शुरुआत करें…पहले माता-पिता अपने अपने घरों पर बच्चों को गुरु के महत्व को समझाने की जिम्मेदारी उठाएं।

बच्चों के भविष्य के बारे में एक बार अवश्य सोचें।

बच्चों की बर्बादी के 50% कारण हैं –मौका परस्त दोस्त, मोबाइल और मीडिया।

लेकिन 40% में बच्चों पर माता-पिता का नियंत्रण न होना भी है..शेष कारण शिक्षक या विद्यालय के हिस्से में रह जाता है वह मात्र 10% ही है।

आज के 70% बच्चे –

👉 माता-पिता यदि कार या बाइक साफ करने की कह दें, तो बस…और बिना प्रयोजन की चीजें वो भी महंगी महंगी खरीदने का वातावरण बनाते रहते हैं,

👉 बाजार से सामान लाने के लिए तैयार नहीं होते। अब तो ऑनलाइन ही मंगा लेते हैं। खरीददारी का तजुर्बा भी नहीं है।

👉 स्कूल का पेन या बैग सही जगह नहीं रखते। 👉 घर के कामों में मदद नहीं करते। और टीवी में कुछ से कुछ देखते रहते हैं।

👉 रात 10 बजे तक सोने की आदत नहीं और सुबह 6-7 बजे जागते नहीं।

👉 गंभीर बात कहने पर पलटकर जवाब देते हैं। 👉 डांटने पर चीजें फेंक देते हैं।

👉 पैसे मिलने पर दोस्तों के लिए खाना, आइसक्रीम और गिफ्ट्स पर खर्च कर देते हैं।

👉 नाबालिग लड़के बाइक चलाते हैं, दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं और फिर केस में फंस जाते हैं।

👉 लड़कियां दैनिक कार्यों में मदद नहीं करतीं।

👉 मेहमानों के लिए पानी का गिलास तक देने का स्वत: मन नहीं होता।

👉 20 साल की उम्र में भी कुछ लड़कियों को खाना बनाना नहीं आता।

👉 सही ढंग से कपड़े पहनना भी एक चुनौती बन गया है।

👉 फैशन, ट्रेंड और तकनीक के पीछे भाग रहे हैं। विचार कीजिएगा..इस सबका कारण हम ही हैं। हमारा गर्व, प्रतिष्ठा और हमारे खुद के प्रभाव बच्चों को जीवन के पाठ नहीं सिखा पा रहे हैं।

“कष्ट का अनुभव न करने वाला व्यक्ति जीवन के मूल्य को नहीं समझ सकता।”

आज के युवा 15 साल की उम्र में प्रेम कहानियों, धूम्रपान, शराब, जुआ, ड्रग्स और अपराध में लिप्त हो रहे हैं। दूसरे आलसी बनकर जीवन का कोई लक्ष्य नहीं रखते। बच्चों का जीवन सुरक्षित रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। यदि हम सतर्क नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी बर्बाद हो जाएगी। बच्चों के भविष्य और उनके अच्छे जीवन के लिए हमें बदलना ही होगा।

ध्यान रहे.. आपके शिक्षक एक बार को रहम कर भी सकते हैं, लेकिन पुलिस नहीं।

धन्यवाद 🙏

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