Do you think so..??
अर्थ की दृष्टि से “भगवत प्राप्ति” का अभिप्राय है जी.. ते जी ईश्वर की प्राप्ति या उनसे मिलन की आनंदपूर्ण अनुभूति.. जब जीव (आत्मा) को अपना मूल उद्देश्य समझ में आने लगता है, तब वह धीरे धीरे सांसारिक व्यक्ति या वस्तुओं में से अपनी आसक्ति कम करते हुए.. दिन प्रतिदिन अपने इष्ट की सेवा में लीन होने लग जाता है। ये “भगवत प्राप्ति” के संकेत है।
जैसे; सोते समय देखे गए स्वप्न में होने वाली पीड़ा बिना जागे नहीं मिटती। ठीक वैसे ही संसार के भोगों में लिप्त “जीव” की मुक्ति “भगवत प्राप्ति” के बिना नहीं हो सकती।
क्योंकि मूल रूप से हम हैं,तो “सोल कॉन्शियस” ही। लेकिन एक लम्बे समय तक जीवन में भौतिक व्यवस्थाओं के सहारे रहने से मनुष्य की आत्मा पर दुनियादारी की ‘ कार्मिक लेयर ‘ इस कदर जम जाती है कि वह सिर्फ बॉडी कॉन्शियस होकर रह जाता है। उसकी परेशानियों का मूल कारण भी यही है।
ईश्वरीय विधान के अनुरूप स्थूल शरीर (Gross body) छूटने के बाद..तत्काल जीव आत्मा अपने मूल स्वरूप अर्थात सूक्ष्म शरीर (subtle body) में रूपांतरित हो जाती है।
मेरा अनुभव कहता है, वे पल उस “सूक्ष्म शरीर” के लिए काफ़ी परेशानी भरे होते हैं। क्योंकि तेरहवीं तक उसका अपने “स्थूल शरीर” के रिश्तों में लगाव भी बना रहता है। इस दौरान आत्मा स्वयं को बहुत असहाय महसूस करती है। वह अपने परिजनों को रोता बिलखता देख..वह बार बार अपने परिजनों को ये बताने का प्रयास करती है कि, “मैं ठीक हूं। आप परेशान क्यों हो रहे हैं।” मगर उस समय सूक्ष्म शरीर की दूसरी परेशानी ये भी होती है.. कि इस अवस्था में आत्मा के पास किसी को “स्पर्श या संपर्क करने की सामर्थ्य” नहीं होती है। जी,बिल्कुल ये बात उसे बड़ी देर से समझ आती है।
जिस प्रकार हमारे बुजुर्ग सदैव बताते आए हैं कि, “वक्त हर परेशानी का मरहम होता है।” सूक्ष्म शरीर की परेशानी लगभग बारह या तेरह दिन में जब स्थूल शरीर का विधि विधान से “अंतिम क्रिया कर्म सारे संस्कार” विधिवत हो जाते हैं। तब उस अमुक आत्मा का सांसारिक रिश्तों से जुड़ाव लगभग खत्म सा हो पाता है।
तब वह सूक्ष्म शरीर (subtle body) अपने “कर्म” खाते के अनुसार उन चौदह लोकों (सात पृथ्वी से ऊपर और सात नीचे होते हैं।) में से उस लोक की यात्रा पर निकलना होता है। दुनियां में की गई कमाई का उसके पास बैलेंस होता है।
लेकिन.. सांसारिक भाषा में लोकों की यात्रा के दौरान हर्डल्स या ब्रेकर्स भी बहुत मिलते हैं। कारण है..विकर्म अर्थात दुष्कर्म जो संसार में रहते समय उसके स्थूल शरीर द्वारा किए गए होते हैं।
दरअसल भौतिकवादी नज़रिए से देखें,तो वहां .. “कारण शरीर” के लिए “कर्म,अकर्म, विकर्म” की मैरिट / डिमेरिट पहले से ही चस्पा की हुई होती हैं। तब उनको आधार मानते हुए “कारण शरीर” “यातना शरीर” में कन्वर्ट कर दिया जाता है।
कुछ पुण्य आत्माओं को छोड़कर ऐसा अधिकतर आत्माओं के साथ होता ही है। क्योंकि अज्ञानतावश अहम के कारण जीवधारी द्वारा दुनियां बिच खेली गई अपनी सारी धमा चौकड़ियों का फल .. उसको भुगतना ही होता है। जिसमें कोड़ों की मार, गर्म तेल की कढ़ाईयों में डाले जाना..जैसी भयंकर दंड प्रक्रिया से गुजरने के बाद..फिर अगली व्यवस्था “आत्म शुद्धिकरण” की प्रक्रिया में जाना है।
जीवात्मा की सांसारिक व्यक्ति या वस्तुओं में आसक्ति/अनाशक्ति के ब्यौरे जो शरीर छोड़ने के समय दुनियां में उसकी मन: स्थिति रही होगी..को आधार मानकर ..नए जन्म से पहले.. “योनि निर्धारण” होता है।
उस दौरान हर जीवात्मा को धरती पर बिताया गया एक लंबा “जीवन” भी एक स्वप्न जैसा ही प्रतीत होता है।
इसीलिए हम अगर ध्यान दें,तो संतों की एकांत वार्ता में सतसंगों में सदैव “जगत मिथ्या” वाली थ्योरी को प्रोत्साहन दिया जाता है। जो कटु सत्य है। लेकिन वह इतनी आसानी से समझ नहीं आती।
शिक्षा;-
अतः मानव देह मिलने पर समय रहते “जीव” को दुनियां के सारे प्रपंच छोड़कर..अपने प्रारब्ध रूपी स्थायी खाते में गुरू प्रदत्त “मंत्र” जप एवं “नाम जप” का बैलेंस बढ़ाने के ध्येय से जितना हो सके निरंतर जप करते रहना चाहिए।
भगवत प्राप्ति के लिए..मानव जीवन में “मौन साधना” एवं शुद्ध भाव में “एकांतवास” को वरीयता देना श्रेयष्कर है।। इसीसे हमारा भगवत मार्ग प्रशस्त होगा।
कहना न होगा कि, इस “भव सागर” को पार करने के लिए.. “भगवत प्राप्ति” ही एकमात्र उद्देश्य है। जिसे हम सदैव भूले रहते हैं।
धन्यवाद
Yes absolutely true 🙏🏻👍🏻
LikeLike