जी, हां प्राणी में “घमंड” या “अहंकार” किस बात का.. ??
एक बार की बात है.. महाकवि कालिदास को जंगल में चलते चलते बीच रास्ते बड़ी तेज प्यास लगने लगी.. उन्होंने देखा.. कि, कुएं पर एक पनिहारन पानी भर रही है। कालिदास ने.. कहा, मुझे जल पिला दो।
पनिहारन बोली, “बेटा! मैं तुम्हें जानती तक नहीं, पहले अपना परिचय तो दो, अरे! आप महाकवि कालीदास को नहीं जानती। तो फिर जानती ही क्या हैं..?? खैर छोड़ो, मुझे एक मेहमान समझकर जल पिला दो।
इस पर पनिहारन ने कहा, ” तुम मेहमान कैसे हो सकते हो..?? इस दुनियां बिच दो ही तो मेहमान हैं..पहला ‘धन’ और दूसरा ‘यौवन’ जो जाने में कभी वक्त नहीं लगाते।..
अचानक चल देते हैं।
पहले बताओ, तो तुम हो कौन ..?? जवाब सुनकर.. अहंकार से युक्त कालीदास दंग रह गए!!
विचार करके बोले हे देवी! मैं “सहनशील” हूं। अब तो जल पिला दो.. पनिहारन ने कहा, बिल्कुल नहीं..तुम सहनशील भी कैसे हो सकते हो..?? सहनशील तो संसार में दो ही हैं ..एक – धरती माता जो बिना उफ किए..पापी और पुण्य आत्माओं का बोझ सहती है। जबकि लोग उसकी छाती चीर चीर कर कुछ दाने डाल देते हैं, और मां उनके लिए भी अनाज के भंडार लगा देती हैं।
दूसरे सहनशील होते हैं “पेड़” लोग उन्हें पत्थर मारते हैं और वे उन्हें सदैव मीठे मीठे फल देते रहते हैं।
सच कहो, तुम कौन..हो ??
कालीदास की प्यास बहुत तीव्र होती जा रही थी जिसके कारण उन पर मूर्छा सी छाने लगी। और वे तर्कों से परेशान होकर झल्ला उठे..
फिर काफ़ी विचार कर बोले! मैं “हठी” हूं। जल पिला दो..
पनिहारन बोली, तुम झूठ बोल रहे हो। कोई इंसान हठी कैसे हो सकता है..?? दुनियां में हठी तो दो ही हैं.. एक नाखून और दूसरे केश (बाल) जो काटने पर बार बार निकल आते हैं।
सच सच कहो! तुम कौन हो..??
अब तो कालीदास का सारा घमंड जाता रहा.. गुरुर के घोड़े से उतर कर कालिदास अपने आपको अपमानित व पराजित देख कहने लगे, हे माते! मैं निरा मूर्ख हूं कृपया मुझे जल पिला दीजिए..
कालिदास के अंतस में समाये अहंकार को पूर्णत: निकालने के उद्देश्य से ..पनिहारन के रूप में प्रकट मां सरस्वती ने फिर कहा, तुम मूर्ख भी भला कैसे हो सकते हो..?? लोगों की बनाई दुनियां में दो मूर्ख होते हैं। पहला मूर्ख “राजा” जो अयोग्य होते हुए भी लोगों पर शासन करने की हिमांकत करता है।
दूसरा मूर्ख राजा का “दरबारी पंडित” या मंत्री होता है जो अपनी चमचा गिरी से राजा को खुश करने के लिए गलत बातों को सिद्ध करने के तर्कों में झूठ सांच बोलने में अपना बहुमूल्य जीवन खपा देता है। जिससे उस मंत्री या पंडित का ये तो ये परलोक भी खराब हो जाता है।
कालिदास अब कुछ कहने की स्थिति में न रहे, और उस वृद्ध महिला पनिहारन के पैरों में गिर ही पड़े।और जल की याचना में गिड़गिड़ाने लगे..
एकदम से उस पनिहारन की आवाज भारी सी होती गई। और बोली, “उठो वत्स!” कालीदास ने ऊपर की ओर देखा, तो साक्षात मां शारदे सामने खड़ी थीं।
अब तो कालीदास अपना सारा घमंड छोड़ उनके सामने नतमस्तक हो गए.. मां ने मुस्कराते हुए..कहा, ” शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार। लेकिन अहंकारी जीव शिक्षा से प्राप्त “मान एवं प्रतिष्ठा” को स्वयं की उपलब्धि समझ अहंकार कर बैठता है। और पतन की राह पकड़ लेता है।
जबकि शिक्षा से प्राप्त ज्ञान कहता है कि,
“अन्न के एक एक कण को और आनंद के प्रत्येक क्षण को कभी भी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।”
वैसे थोड़ा गहनता से सोचिए! तो प्राणी को “घमंड” होता किस बात का है..??
क्योंकि,
“दुनियां में प्राणी निर्वस्त्र आता है
निर्वस्त्र ही जाता है।
न कुछ लाता, न ले जाता है।
जन्म एवं मृत्यु दोनों ही वक्त वह बेहद निरीह अवस्था में होता है।
यहां तक है कि वह अपना पहला और अंतिम स्नान तक भी स्वयं नहीं कर पाता।”
उल्लिखित तथ्य की सच्चाई ..को देखते हुए..शरीर की क्षणभंगुरता के बावजूद भी मनुष्य दुनियां बिच इतनी असहाय अवस्था में जीता है कि बस! कुछ कहते नहीं बनता।
तभी, तो ये सवाल बनता कि, “घमंड किस बात का”..?? न सिर्फ इसका जवाब सोचिएगा, अपितु सोचने के बाद उसका अपने जीवन में अनुपालन भी कीजिएगा।
धन्यवाद
Ignorance about oneself in life is the real cause of ego🙏🏻👍🏻
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