!! आत्मबोध!!
रिटायरमेंट के बाद सेवानिवृत्त सचिव (IAS) राजीव यदुवंशी को हुआ आत्मबोध..
हां, तो देखिए!
रिटायरमेंट के बाद ये उनकी पहली दिवाली थी।
जबकि, दिवाली से एक हफ़्ते पहले, लोग तरह-तरह के उपहार लेकर आना शुरू हो जाते थे। उपहार इतने ज़्यादा होते थे, वे बताते हैं कि उनका वह कमरा किसी उपहार की दुकान से कम नहीं लगता था। बाद में या त्योहार के ही वक्त अधिकतर ये उपहार अनजान रिश्तेदारों को दे दिए जाते थे। सूखे मेवे इतने ज़्यादा हो जाते, कि अपने रिश्तेदारों और दोस्तों में बाँटने के बाद भी बहुत सारे बचते थे।
लेकिन वे कहते हैं इस बार उनकी दिवाली बिल्कुल अलग थी। उपहारों की तो बात छोड़िए.. दोपहर के दो बज गए थे, लेकिन कोई भी उन्हें दिवाली की शुभकामना देने तक नहीं आया था। वे अचानक उसे भाग्य का उलटफेर समझ.. अपने अंतर मन से बहुत उदास हो गए थे।
विचलित होते अपने मन को संतुलन में लाने के लिए, उन्होंने समाचार पत्र खोला और उसमें रूटीन वे में छपने वाले “आध्यात्मिकता” के कॉलम को पढ़ना शुरू कर दिया..
शिक्षा:- जिसे सामान्य लोग सहज स्वभाव में “सौभाग्य या दुर्भाग्य के मत्थे मढ देते हैं।
मेरे विचार में दुनियां बिच होने वाली हर छोटी या बड़ी घटना.. सब “नियति” के खेल में सुमार होती है। जीव के “कर्म” खाते के अनुरूप वह सब ईश्वर की “पूर्व निर्धारित व्यवस्था” का ही पार्ट कहलाता है।
व्यक्ति द्वारा पूर्व में किया हुआ “कर्म” जीवन के धरातल पर जैसे जैसे घटना शुरू होता है.. समीकरण भी ठीक वैसे ही बनते चले जाते हैं। और प्राणी मात्र एक कठपुतली की तरह वो सब करता चला जाता है। जो “निर्धारण व्यवस्था” के अनुरूप उसके प्रारब्ध में लिखा होता है।
अच्छा चलो! अब मुद्दे पर लौटते हैं..
राजीव जी यदुवंशी को समाचार पत्र के “आध्यात्म” वाले कॉलम में एक दिलचस्प कहानी मिल गई। जो उन्हें “आत्मबोध” कराने के लिए पर्याप्त थी। वह कहानी एक गधे के बारे में थी, जो किसी धार्मिक समारोह के लिए देवताओं की मूर्तियों को अपनी पीठ पर लादकर ले जा रहा था।
रास्ते में जब वह गांवों से गुजर रहा था..तो स्वाभाविक सी बात है लोग मूर्तियों के आगे अपना सिर झुकाते ही हैं। हर गांव में यही हो रहा था.. ऐसा देख, गधे को लगने लगा कि गांव वाले उसके सामने नतमस्तक हो रहे हैं। अब तो गधा अपने इस नए सम्मान और आदर से रोमांचित हो उठा। और गधे में असीमित अहम पनपने लगा.. कहानी में ऐसा मंजर पढ़कर ..सेवा निवृत आई.ए.एस. राजीव जी के मन मस्तिष्क पर पिछले तीस वर्ष से जमी हुई “पद प्रतिष्ठा” की सारी कार्मिक लेयर एक झटके में उतर गई.. और उन्हें ऐसा “आत्मबोध” हुआ.. कि वे अपना ये “आत्मबोध” लोगों के बीच शेयर करते हुए लिखते हैं.. कि बिल्कुल गधे जैसी ही गलतफहमी हो जाती है देश दुनियां की व्यवस्था में सेवा दे रहे हर पदासीन व्यक्ति को चाहे वो जिस स्तर पर तैनात हो…
कहानी के अनुरूप गधे की पीठ पर लदी उन मूर्ति रूपी.. जिम्मेदारियों एवं पद पर आसीन होने के बाद व्यक्ति की कर्मठता वाली भूमिका के आगे दुनियां झुकती है न कि किसी अमुक व्यक्ति के आगे। क्योंकि..
कहानी के अनुसार जब वही गधा मूर्तियों को पहुंचा कर वापस उसी रास्ते से पुनः गुजरा.. तो कोई भी उसके आगे नहीं झुका.. क्योंकि अब उसकी पीठ पर उसके मालिक की निजी चीजें लदी हुई थीं। मगर हद से ज्यादा सम्मान पा कर गधे का अहम चर्म पर जो पहुंच गया था, जिसकी उसे आदत सी हो गई थी..तो गधे ने ढेंचू..ढेंचू .. बोल कर अपनी भाषा में उनसे सम्मान करने के लिए कहा, तो इस पर उसे अपने मालिक की डांट और डंडे दोनों खाने पड़े।
अर्थात सेवानिवृत हो जाने के बाद किसी भी स्तर के पद पर आसीन रहे..प्रत्येक व्यक्ति को समय रहते अपने समाज में सामंजस्य बनाकर रहना अवश्य सीख लेना चाहिए।
शायद इसीलिए, श्रीमान राजीव जी यदुवंशी (सेवा निवृत आई ए एस) ने उसी वक्त से सारी ताम झाम और लोगों से पाली हुई अपनी सभी अपेक्षाओं को छोड़कर, एक सादा..सरल “जीवन-शैली” अपनाने का सबक लिया.. और वे आनंद से रहने लगे..
धन्यवाद..
अनुकरणीय 🙏🏻😊