शिक्षा के आरंभिक दौर से हर देश अपने विद्यार्थियों को विश्व स्तर की शिक्षा देने का प्रयास करता रहा है..
उसे अच्छे से अच्छा इंजीनियर और डॉक्टर बनाने का प्रयास सदियों से हो रहा है। ये अभी भी जारी है। और सदैव अनवरत रहेगा।
मगर भारत के “गुरु” शब्द का पर्याय पाश्चात्य जगत का प्रोफ़ेसर..या टीचर तो बमुश्किल ही बन पाएगा।
इस बिंदु पर थोड़ा चिंतन करने की आवश्यकता है। भारत के ‘ गुरु ‘ शब्द में जो भाव है। वो फोरिन लैंग्वेज के लेक्चरर, प्रोफेसर,रीडर आदि में नज़र नहीं आता है। क्योंकि “गुरु” शब्द में ‘गुरुत्व’ (Pedagogy) का भाव स्वत: ही समाहित है।
जबकि फौरिन टर्मोलॉजी में “शिक्षक या गुरु” जैसे टर्म (शब्द) के जो पर्याय हैं उनमें सैलरी पर कार्य करने का रूआब,तो नज़र आता है। मगर वे अपने शिक्षार्थी के साथ भारत के “गुरु” की तरह मुश्किल से ही कनेक्ट हो पाते हैं।
दरअसल, यह ‘ गुरु ‘ शब्द प्राचीन काल से ही अर्थ की अपेक्षा किए बिना अपनी शैक्षणिक शैली से बालक के मन की गहराई को बढ़ाने के प्रति पूर्ण समर्पित रहा है।
यह लौकिक शिक्षा से थोड़ा अधिक गहरा है। लौकिक शिक्षा देने की मना,तो नहीं है। स्वभावत:वह,तो देनी ही है।
लेकिन इसके साथ साथ जो शिक्षार्थी के जीवन की दशा एवं दिशा बदल दे, उसके अंत: ज्ञान चक्षुओं को खोल दे.. न सिर्फ प्रकृति एवं जीव, जगत का बोध करा दे,अपितु उन्हें एकात्म अर्थात केवल्य की अनुभूति करा दे.. वस्तुत: सांसारिक जीवन की सफलता के संग-संग ” मानव जीवन की सार्थकता” का भी अनुभव करा पाए मेरे विचार से उसको “गुरु” कहना कहीं तक उचित है।
जो अपने शाब्दिक अर्थ
गु=अंधकार,
रु =प्रकाश..
को चरितार्थ करता हुआ.. सदैव अपने शिष्यों को न सिर्फ तुच्छ ‘ सफलता..’ अपितु ‘जीवन की दिव्यता’ भी प्रदान करने की सामर्थ्य रखता है।
आधुनिक समय में शिक्षक के पर्याय के रूप में गढ़ा गया अंग्रेजी का लोक प्रचलित शब्द..”टीचर” ..जैसे विषय विशेषज्ञ,शिक्षा मित्र, इंस्ट्रक्टर,गेस्ट टीचर आदि देश के सत्ताधारियों की शिक्षा के प्रति अयोग्यता और नीरसता बयां करते हैं।
ये सभी भारतीय शब्द “शिक्षक” या “गुरु” के विकल्प के रूप में प्रयुक्त अवश्य किए गए हैं, मगर ‘विद आउट स्प्रिट’ हैं। उनमें से किसी शब्द में “गुरु” जैसे पवित्र शब्द के बराबर में खड़े होने तक की सामर्थ्य नज़र नहीं आती। “गुरु” का पर्याय बनना तो बहुत दूर की बात है।
हां, भौतिक जगत में विद्यार्थी को कुछ खाने कमाने लायक तो अवश्य बना देते हैं।
जबकि “गुरु” अपने विद्यार्थी को तेजस्वी बनाता है। और हर एंगल से वह अपने विद्यार्थी के जीवन को सार्थक बनाने में जुटा रहता है। ये कहना न होगा कि सफलता से सार्थकता कहीं बड़ी होती है।
भारत का गुरु अपने गुरुत्व के आधार पर सदैव अपने शिष्य के सर्वांगीण विकास के प्रति समर्पित रहा है। और वह बालक के अंतर्मन में ईश्वरीय बोध की अनुभूति तक करा देता है।
जबकि पाश्चात्य जगत में केवल व्यवसाय के तौर पर ही प्राध्यापक अपने विद्यार्थी के संपर्क में रहता है। इसके अतिरिक्त विद्यार्थी से उसका कोई सरोकार नहीं होता।
वास्तव में, ये अंतर Spirituality का है। क्योंकि यहां का शिक्षक सदैव आध्यात्म की चादर ओढ़े हुए है।
एक और बात..भारत में गुरु छोटा हो सकता है,बड़ा हो सकता है,डिग्री लेकर हो सकता है, ध्यान रहे..गुरु,तो बिना डिग्री के भी हो सकता है।
जिसने विद्यार्थी के जीवन को दिशा दे दी,धन्यता और दिव्यता दे दी। सच में ये सभी पहलू लौकिक शिक्षा से परे हैं।
शायद इसीलिए वह “गुरु” है। वही उसका “गुरुत्व”है।
अब एक उदाहरण आपके सामने रख रहा हूं.. जो हमें वास्तविक गुरु के दर्शन करा पाएगा..
जैसे; काशी बनारस विश्वविद्यालय में एक शिक्षक मुसलगांवकर जी अध्यापन कार्य कराते थे.. पांच विदेशी विद्यार्थी उनके घर पर भी पढ़ने आया करते थे। वे उन्हें वेदांग, व्याकरण, न्यायदर्शन अलग से पढ़ाते थे।
उनसे एकबार पूछा गया गुरुदेव! आपको इन शिष्यों को पढ़ाते समय कैसी अनुभूति होती है। तो श्रीमान मुसलगांवकर जी ने कहा,” मैं अपने विद्यार्थीयों को सदैव शिव के रूप में देखता हूं। वे साक्षात शिव के रूप में मेरे घर में आते हैं। मैंने अपने घर में बोल रखा है कि, जब विद्यार्थी आते हैं तब मैं जहां कहीं भी होऊं तुरंत मुझे बताइएगा, मैं आऊंगा। मेरे शिव तनिक भी मेरी प्रतीक्षा न करें।
वे अपनी इस अतिरिक्त अध्यापन कक्षा का विद्यार्थियों से कभी एक पैसा दक्षिणा रूप में स्वीकार नहीं करते थे।
जब श्री मुसलगांवकर जी से पूछा गया कि, महोदय! आपकी अंतिम इच्छा क्या है..??
“उन्होंने कहा! मेरी अंतिम इच्छा है कि जब मैं,मेरी अंतिम सांस लूं उस वक्त भी मैं अपने विद्यार्थियों के बीच हो ऊं, या मैं स्वाध्याय जो मेरा स्वभाव है..उसमें तल्लीन रहूं।”
फिर कुछ दिन बाद वे गुजर गए.. उनके परिवार से पूछा गया, कि मुसलगंवाकर जी कैसे गुजरे..?? उनके अंतिम क्रिया कलापों पर थोड़ा प्रकाश डालते हुए हमें कुछ बताइएगा..??
तो परिवारी जनों ने कहा,”बंधुवर! वे जब हॉस्पिटल में थे, तब भी मास्क लगाते हुए अपने बैड के बगल में दो विद्यार्थियों को प्रतिदिन पढ़ाते थे। अपने स्थूल शरीर के अंतिम दिनों तक भी वे दो विद्यार्थियों को निरंतर पढ़ाते रहे..शायद यही शिक्षक एवं गुरु का धर्म है।
अपनी अंतिम सांस तक “मैं शिक्षक हूं..” इस भाव को कंटिन्यू रख पाना आसान काम नहीं है। और अपने विद्यार्थियों में अपने इष्ट को देखना,तो और भी दुर्लभ है।
क्या पाश्चात्य जगत का टीचर इस भाव को कभी अपने अंदर जगह दे पाएगा??
नि:संदेह “कभी नहीं।”
पूर्व में भारत का हर गुरु अपने शिष्यों की पूजा इष्ट रूप में ही करता था।
मगर योजनाबद्ध तरीके से सत्ता लोलुपों की तरफ से कई एक दशकों से कुछ ऐसी रिपोर्ट पेश होती रही हैं। जो न देश हित में हैं और न जनता जनार्दन के ही पक्ष में हैं। जबकि किससे छुपा है कि, देश की सरकारें सरकारी शिक्षक को स्वतंत्र रूप से अपनी कला के प्रतिसमर्पित होकर शिक्षण कार्य करने ही नहीं दे रहीं हैं।
मैं यदि स्पष्ट कह दूं, तो निजीकरण की ओर ले जाने की अपनी षड्यंत्रपूर्ण साजिश के जरिए देश के शिक्षकों को बिना मतलब के कागज पीटने में इंगेज रखा जा रहा है। ताकि वह पढ़ा न सकें फिर बच्चों की धरातल पर जांच आदि कराकर ये साबित किया जा सके, कि देखो! सरकारी शिक्षक इतना वेतन लेने के बावजूद भी बच्चों को कुछ नहीं सीखता है।”
इसीलिए सभी वर्तमान शिक्षकों से विनम्र निवेदन है कि विभागाध्यक्षों के आदेशों के अनुरूप चाहे जो अतिरिक्त कार्य करें, लेकिन अपनी “शिक्षण कला” को जंग न लगने दें। अपना कर्तव्य सदैव प्राथमिकता पर रखते हुए..उम्दा तरीके से शिक्षण कार्य करें….ताकि अपने देश की “गुरु” वाली अवधारणा का निर्वहन होता रहे।
धन्यवाद
योगेंद्र सिंह,
मुखिया परिवार,नीमगांव, राया,मथुरा