दैनिक जीवन में इन “सूत्रों” का क्रियान्वयन कठिन, तो है परंतु असंभव नहीं।
क्योंकि जीव के चौरासी लाख योनियों में कई कई बार “पुनरपि जनमम.. पुनरपि मरणम..” की कठिन प्रक्रिया से गुजरने के बाद मनुष्य योनि की ये दुर्लभ ‘मानव देह’ अर्थात “मनुष्य जीवन” को गर्त में जाने से.. बचाना है, तो एक परम संत की वाणी से निकले हुए इन “जीवन सूत्रों” पर अमल करना नितांत आवश्यक है।
1 हमारे बात करने का अंदाज़ ऐसा हो कि,भूल से भी अपने मुख से अपनी बड़ाई न हो जाए।
2 हमारे आचरण में किसी भी सांसारिक वस्तु के प्रति कोई लोलुपता (लालच) न हों।
3 हम अपमान सहनीय बनें..ताकि कहीं जाने अंजाने में अपमान हो भी जाए, तो बहुत विचलित न हों।
4 क्रोध व द्वेष कराने वाली बातों का चिंतन कदापि नहीं।
5 आश्रित की रक्षा करने में अपनी जान पर बन आए, तो भी हमें कोई गुरेज न हो।
6 अज्ञानता के वशीभूत निडर व हर्षित होकर शारीरिक बल के मद में कभी हम से कोई पापाचार न हो।
7 कामवासना..आदि के चिंतन से सदैव बचें।
8 एक समान प्राणी, वस्तु आदि के साथ किसी भी प्रकार की विषमता का आचरण न हो।
9 अपने आपको कभी भी “अत्यंत मान प्रीता” अर्थात अति महत्वाकांक्षी न बनने दें।
10 दान सदैव अपनी क्षमता के अंतर्गत ही हो, ताकि दान देने के बाद कभी मन में पश्चाताप का भाव न आए। और यदि दान देने की बात की हो,तो कभी अपनी बात से मुकरना नहीं।
11अति होशियारी में अपनी “कृपणता” को कभी भी “मितव्यता” का जामा मत पहनाइऐगा
धन्यवाद
Some nectar words..
from Saint Vani.
Everything is true based on destiny
LikeLike
Yes, Udit ji
LikeLike